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Thursday, April 1, 2010

अप्रैल फूल एक सामाजिक बुराई

अल्लामा इक़बाल ने कहा थाः

उठा कर फेंक दो बाहर गली में
नई   तहज़ीब   के   अण्डे   हैं   गंदे

नवीन संसकृति के इन गंदे अण्डों पर गर्व करने और पश्चिम की बिना सोचे समझे नक्क़ाली की जिज्ञासा ने हमारे समाज में विभिन्न बुराईयों को जन्म दिया है जिनकी एक समय पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। उन्हीं सामाजिक बुराइयों में से एक अप्रैल फूल भी है। अप्रैल की प्रथम तिथि को एलेक्ट्रानिक और प्रिंट मेडिया हम से झूठ बोलवाती है। मनोरंजन के लिए....मज़ाक़ करने के लिए....दूसरों को मुर्ख सिद्ध के लिए...दूसरों को परेशान करने के लिए... दूसरों को आश्चर्यचकित करने के लिए।

इस झूठ ने न जाने कितने लोगों को आर्थिक हानि पहुंचाया है। कितने लोगों की जानें चली गई हैं। किसी को उसके घर में आग लगने की सूचना दी गई अचानक वह होश व हवास खो बैठा। किसी को उसकी पत्नी के दूसरों के साथ शारीरिक सम्बन्ध की ख़बर दी गई यहाँ तक कि दोनों में मतभेद शुरू हो गया। किसी को उसकी माता, उसके पिता, उसके बेटी, उसकी पत्नी के मृत्यु की अचानक सूचना दी गई जिसे सुनने की ताब न ला सके और जीवन से हाथ धो बैठे।

यह प्रथा जिसका आधार झूठ, फ्राड और मुर्ख बनाने पर है, जो मानव आचरण के माथे पर कलंक का टीका तो है ही इसका ऐतिहासिक पहलू भी अति निन्दनीय है। हम अभी इस विषय में नहीं जाना चाहते हम तो मात्र यह बताना चाहते हैं कि इस्लाम में झूठ प्रत्येक बुराईयों की जड़ है, विनाश का स्तम्भ है और तबाही का द्वार है। इस्लाम में झूठ हर समय निषेध है। वर्ष के किसी भी महीने में झूठ की अनुमति नहीं, इस्लाम की दृष्टि में झूठ बोलना नेफाक़ की पहचान बताई गई है।

कुछ लोग समझते हैं कि मनोरंजन के लिए झूठ बोलना वैध है हालाँकि झूठ हर स्थिति में झूठ है मनोरंजन में भी इसका पाप इतना ही है जितना सचमुच झूठ बोलने का है। मुहम्मद सल्ल0 ने फरमायाः "बर्बादी है उसके लिए जो लोगों से बात करता है और उन्हें हंसाने के लिए झूठ बोलता है, बर्बादी है उसके लिए, बर्बादी है उसके लिए"। (अबूदाऊद, तिर्मिज़ी, नसाई)

यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने मनोरंजन हेतु डराने से भी मना फरमायाः "किसी व्यक्ति के लिए वैध नहीं है कि किसी दूसरे व्यक्ति को डराए"। बल्कि अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने इस बात को बहुत बड़ा विश्वासघात बताया है कि आप किसी व्यक्ति से झूठ बोलें और वह आपको सच समझ रहा हो, हदीस हैः "यह बहुत बड़ा विश्वासघात है कि तुम अपने भाई से कोई बात कहो वह तुम्हें सच्चा समझ रहा हो और तुम उस से झूट बोल रहे हो।" (मुस्नद अहमद, तबरानी)।

तात्पर्य यह कि झूठ का व्यक्तिगत तथा समाजिक जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, झूठ से सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। कारोबार से बरकत उठ जाती है। मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सकों ने भी शारीरिक जीवन पर झूठ की विभिन्न हानियाँ बताईं हैं। इस धरती पर पाए जाने वाले प्रत्येक धर्मों ने भी झूठ से रोका और उस पर प्रंतिबंध लगाया है। कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसमें झूठ की अनुमति दी गई हो। मुहम्मद सल्ल0 ने फरमायाः " तुम हमेशा सच बोला करो, क्योंकि सच नेकी की ओर अग्रसर करता है। और नेकी जन्नत (स्वर्ग) का रास्ता देखाती है। एक व्यक्ति हमेशा सच बोलता और सच की तलाश में रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह तआला के हाँ लिख दिया जाता है कि "यह अति सच्चा व्यक्ति है"। और तुम झूठ से बचते रहो, क्योंकि झूठ पाप की ओर ले जाता है, और पाप नरक तक पहुंचा देता है, और एक व्यक्ति सदैव झूठ बोलता और झूठ की खोज में लगा रहता है यहाँ तक कि अल्लाह के हाँ लिख दिया जाता है "यह बहुत झूठ बोलने वाला है"।( मुस्लिम)
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Saturday, March 20, 2010

मक्का भूमण्डल का केंद्रीय शहर

उस समय संसार आश्चर्यचकित रह गया जब कि 1977 में एक आधुनिक वैज्ञानिक खोज सामने आई कि मक्का भूमण्डल के सर्वथा मध्य में स्थित है। इस खोज का क्रेडिट एक मुसलमान वैज्ञानिक डा0 हुसैन कमालुद्दीन को जाता है। जब उन्होंने खोज का आरम्भ किया तो उनका अभिप्राय सर्वथा भिन्न था। वह ऐसा माध्यम तैयार करना चाहते थे जो संसार के किसी भी कोने में क़िबला का दिशा निर्देशन में सहायक बन सके। इसी उद्देश्य के अंतर्गत उन्होंने भूमण्डल का एक आधुनिक भौगोलिक रेखाचित्र तैयार किया और खोज शुरू की। अपनी प्रारम्भिक खोज में प्रथम लकीर खींजी और उस पर पाँच महाद्वीपों का मानचित्र बनाया। फिर हाथ में औज़ार बक्स लेकर उसके एक किनारा को मक्का के मानचित्र पर रखा और दूसरे किनारे को सारे महाद्वीपों की ओर घुमाया तो आकस्मिक रूप में यह नवीन खोज उनके सामने आ गई कि मक्का सारे संसार के मध्य में स्थित है।

और अभी कुछ दिनों पहले अल इस्कांडरिया के एक वैज्ञानिक सभा में मिस्र के विश्व इस्लामी दावत कौंसल के अध्यक्ष डा0 यहया वज़ीरी ने अपने एक गवेषणिक लेख में कहा कि प्रत्येक वैज्ञानिक तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि मक्का ही भूमण्डल का केंद्रीय शहर है।

प्रिय पाठकगण: यहीं पर हमें यह बात समझ में आती है कि इस्लाम चूंकि विश्वव्यापी धर्म है, मुहम्मद सल्ल0 की आगमन सम्पूर्ण संसार के लिए हुई है तथा क़ुरआन सारे मानव के मार्गदर्शन हेतु ईश्वर की ओर से बहुमूल्य उपहार है, इस लिए आवश्यकता थी कि मक्का में ही विश्व नायक आएं ताकि इस्लाम का संदेश विश्व के कोने कोने तक सरलतापूर्वक पहुंच सके।

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Monday, March 8, 2010

इस्लाम में महिलाओं का सम्मान

यदि आप धर्मों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हर युग में महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया गया, हर धर्म में महिलाओं का महत्व पुरुषों की तुलना में कम रहा। बल्कि उनको समाज में तुच्छ समझा गया, उन्हें प्रत्येक बुराइयों की जड़ बताया गया, उन्हें वासना की मशीन बना कर रखा गया। एक तम्बा युग महिलाओं पर ऐसा ही बिता कि वह सारे अधिकार से वंचित रही। यह इस्लाम की भूमिका है कि उसने हव्वा की बेटी को सम्मान के योग्य समझा और उसको मर्द के समान अधिकार दिए गए। क़ुरआन की सूरः बक़रः (2: 228) में कहा गया "महिलाओं के लिए भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं जैसे मर्दों के अधिकार उन पर हैं।" इस्लाम में महिलाओं का बड़ा ऊंचा स्थान है। इस्लाम ने महिलाओं को अपने जीवन के हर भाग में महत्व प्रदान किया है। माँ के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, पत्नी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बेटी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बहन के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, विधवा के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, खाला के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, तात्पर्य यह कि विभिन्न परिस्थितियों में उसे सम्मान प्रदान किया है जिन्हें बयान करने का यहाँ अवसर नहीं हम तो बस उपर्युक्त कुछ स्थितियों में इस्लाम में महिलाओं के सम्मान पर संक्षिप्त में प्रकाश डालेंगे।

माँ के रूप में सम्मानः माँ होने पर उनके प्रति क़ुरआन ने यह चेतावनी दी कि "और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है - उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे - कि "मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है॥14॥ " कुरआन ने यह भी कहा कि "तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें 'उँह' तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्‍टापूर्वक बात करो॥23॥ और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ बिछाए रखो और कहो, "मेरे रब! जिस प्रकार उन्होंने बालकाल में मुझे पाला है, तू भी उनपर दया कर।"॥24॥ (सूरः बनीइस्राईल 23-25)
माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने का अन्तिम ईश्दुत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी आदेश दिया, एक व्यक्ति उनके पास आया और पूछा कि मेरे अच्छे व्यवहार का सब से ज्यादा अधिकारी कौन है? आप ने फरमायाः तुम्हारी माता, उसने पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारी माता. पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारी माता, पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारे बाप। मानो माता को पिता की तुलना में तीनगुना अधिकार प्राप्त है। अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः अल्लाह की आज्ञाकारी माता-पिता की आज्ञाकारी में है और अल्लाह की अवज्ञा माता पिता की अवज्ञा में है" (तिर्मज़ी)

पत्नी के रूप में सम्मानः पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फरमाया और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। (निसा4 आयत 19) और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "एक पति अपनी पत्नी को बुरा न समझे यदि उसे उसकी एक आदत अप्रिय होगी तो दूसरी प्रिय होगी।" (मुस्लिम) उसी प्रकार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह भी फरमायाः "संसार भोग-विलास की चीज़ है और संसार की सब से उत्तम भोग-विलास की सामग्री नेक पत्नी है" (मुस्लिम)

बेटी के रूप में सम्मानः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "जिसने दो बेटियों का पालन-पोषन किया यहां तक कि वह बालिग़ हो गई वह महाप्रलय के दिन हमारे साथ होगा" (मुस्लिम) आपने यह भी फरमायाः जिसने बेटियों के प्रति किसी प्रकार का कष्ट उठाया और वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करता रहा तो यह उसके लिए नरक से पर्दा बन जाएंगी" (मुस्लिम)

बहन के रूप में सम्मानः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः जिस किसी के पास तीन बेटियाँ हों अथवा तीन बहनें हों उनके साथ अच्छा व्यवहार किया तो वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा" (अहमद)

विधवा के रूप में सम्मानः इस्लाम ने विधवा की भावनाओं का बड़ा ख्याल किया बल्कि उनकी देख भाल और उन पर खर्च करने का बड़ा पुण्य बताया है। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "विधवाओं और निर्धनों की देख रेख करने वाला ऐसा है मानो वह हमेशा दिन में रोज़ा रख रहा और रात में इबादत कर रहा है।" (बुखारी)

खाला के रूप में सम्मानः इस्लाम ने खाला के रूप में भी महिलाओं को सम्मनित करते हुए उसे माता का पद दिया। हज़रत बरा बिन आज़िब कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "खाला माता के समान है।" (बुखारी)
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Wednesday, December 30, 2009

अज़ान क्या है? ( भाग २)

अज़ान क्या है? के दूसरे भाग के साथ हम आपकी सेवा में उपस्थित हैं, इस भाग में आप देखेंगे कि मानव कल्यान तथा ईश्वरीय मार्गदर्शन हेतु अज़ान क्या संदेश देता है। तो आईए चलते हैं अज़ान के तीसरे शब्द की व्याख्या की ओरः
तीसारा शब्दः मैं वचन देता हूं कि मुहम्मद सल्ल0 ईश्वर के अन्तिम संदेष्टा हैं। (दो बार)
जब यह सिद्ध हो गया कि ईश्वर को किसी की आवश्यकता नहीं पड़ती तथा उसका पृथ्वी पर मानव रूप धारण करके आना उसकी महिमा को तुच्छ सिद्ध करता था, इसी लिए उसने मानव द्वारा ही मानव-मार्गदर्शन का नियम बनाया, और हर देश तथा हर युग में मानव ही से पवित्र लोगों का चयन कर के उन्हें अपना दूत बनाया तथा आकाशीय दूतों द्वारा उन पर अपनी प्रकाशना भेजी जिनका अन्तिम क्रम मुहम्मद सल्ल0 पर समाप्त हो गया। आपको "सम्पूर्ण संसार हेतु दयालुता" बना कर भेजा गया। आपके आगमन की भविष्यवाणी प्रत्येक धार्मिक ग्रन्थों ने की थी, आप ही नराशंस तथा कल्कि अवतार हैं, आप ही के बताए हुए नियमों द्वारा ईश्वर की पूजा करने की घोषणा करते हुए अजान देने वाला कहता है कि मैं मैं वचन देता हूं कि मुहम्मद सल्ल0 ईश्वर के अन्तिम संदेष्टा हैं। अर्थात मैं ईश्वर की पूजा जैसे चाहूं वैसे नहीं करूँगा बल्कि मेरी पूजा भी अन्तिम ईश्दूत मुहम्मद सल्ल0 के बताए हुए नियमानुसार होगी।
चौथा शब्दः आओ नमाज़ की ओर (दो बार)
इस वाक्य द्वारा ऐसे व्यक्ति को नमाज़ की ओर बोलाया जाता है जो मौखिक तथा हार्दिक प्रतिज्ञा दे चुके होते हैं कि {ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं तथा मुहम्मद हमारे अन्तिम संदेष्टा हैं} इसी प्रतिज्ञा को व्यवहारिक रूप देने के लिए मस्जिद में बोलाया जाता है ताकि जिस शब्द से उसने स्वयं को मुस्लिम सिद्ध किया है उसका व्यवहारिक प्रदर्शन कर सके। नमाज़ मात्र एक ईश्वर के लिए पढ़ी जाती है जिसमें स्तुति, प्रशंसा, कृतज्ञता आदि सब एकत्रित हो जाते हैं और सामूहिक रूप में अदा करने से इस्लामी समता तथा बन्धुत्व का पूर्ण प्रदर्शन होता है जहाँ धनी और निर्धन, स्वामी और सेवक, काले और गोरे, बड़े और छोटे सब एक साथ मिल कर नमाज़ अदा करते हैं।
पाँचवा शब्दः आओ सफलता की ओरः(दो बार) इस शब्द द्वारा एक व्यक्ति के मन एवं मस्तिष्क में यह बात बैठाई जाती है कि सफलता न माल एकत्र करने में है, न ऊंचे ऊंचे भवन बनाने में, बल्कि वास्तविक सफलता केवल एक ईश्वर की पूजा में है, जो महाप्रलय के दिन का भा मालिक है। और यह संसार परीक्षा-स्थल है परिणाम स्थल नहीं, परिणाम के लिए हर व्यक्ति को अपने रब के पास पहुंचना है तथा अपने कर्मो का लेखा जोखा देना है। यदि एक ईश्वर के भक्त बने रहे तो स्वर्ग के अधिकारी होगें जो बड़ा सुखमय तथा हमेशा रहने वाला जीवन होगा, परन्तु यदि एक ईश्वर के आदेशानुसार जीवन न बिताया तो नरक में डाल दिए जाएंगे जो बड़ी दुखमय तथा पीड़ा की जगह होगी। इस प्रकार अजान देने वाला घोषणा करता है कि हे मनुष्यो आओ और नमाज़ अदा करके सफलता प्राप्त करो।
वास्तविकता यही है कि ईश्वर से अनभिज्ञता मानव के लिए सब से बड़ी असफलता है, इसी लिए एक स्थान पर कुरआन में कहा गया कि {प्रत्येक मनुष्य घाटे में हैं, सिवाए उसके ईश्वर के आज्ञाकारी बन गए, सत्य कर्म किया, सत्य की ओर बोलाया, और इस सम्बन्ध में आने वाली कठिनाइयों को सहन किया} काश कि इस बिन्दू पर हम चिंतन मनन कर सकें।
छठवाँ शब्दः ईश्वर सर्वमहान है, ईश्वर सर्वमहान है, ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं। ईश्वर की महानता को बल देते हुए अज़ान देने वाला पुनः कहता है कि हे मनुष्यो ईश्वर सर्व महान है, उसके अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, इस लिए अपने ईश्वर की पूजा से विमुख हो कर अन्य की पूजा कदापि न कर, मात्र एक ईश्वर की पूजा कर जो तुम्हारा तथा सम्पूर्ण संसार का सृष्टा, स्वामी, संरक्षक और प्रभु है।

Tuesday, December 29, 2009

अज़ान क्या है?

एक सांस्कृतिक सभा में एक बार हमने अपने देशवासियों से यह प्रश्न किया कि अज़ान क्या है ? अधिकांश लोगों का उत्तर था कि अज़ान में ईश्वर को पुकारा जाता है, कुछ लोगों ने कहा कि यह ईश्वर की भक्ति का एक नियम है। जबकि एक सज्जन ने कहा कि अज़ान में अकबर बादशाह को पुकारा जाता है। अज़ान के सम्बन्ध में अपने देशवासियों के यह उत्तर सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ और दुख भी कि हम सब अपने देश में शताब्दियों से एक साथ रहने के बावजूद एक दूसरे की धार्मिक संस्कृति के प्रति संदेह में पड़े हुए हैं अथवा दोषपूर्ण विचार रखते हैं।
वास्तविकता यह है कि अज़ान में न तो ईश्वर को पुकारा जाता है, न अकबर बादशाह को, और न ही यह पूजा करने का कोई तरीक़ा है। बल्कि इसके द्वारा लोगों को नमाज़ के समय की सूचना दी जाती है ताकि लोग मस्जिद में उपस्थित हो कर सामूहिक रूप में ईश्वर की भक्ति करें।
ईश्-भक्ति हेतु हर मुसलमान पुरुष एवं स्त्री पर दिन और रात में पाँच समय की नमाजें अनिवार्य की गई हैं जिनकी अदाएगी महिलाओं को अपने घर में करनी होती है परन्तु पुरुषों को आदेश दिया गया है कि वह उन्हें मस्जिद में जाकर सामुहिक रुप में अदा करें। पाँच समय की यह नमाजें ऐसे समय में भी आती हैं जिसमें एक व्यक्ति सोया होता है या अपने कामों में व्यस्त होता है, अतः ऐसे माध्यम की अति आवश्यकता थी जिसके द्वारा लोगों को नमाज़ों के समय के सूचित किया जा सके। अज़ान इसी उद्देश्य के अंतर्गत दी जाती है। परन्तु इस्लाम का कोई भी आदेश केवल आदेश तक सीमित नहीं होता बल्कि उसमें मानव के लिए पाठ भी होता है। अज़ान के शब्दों पर चिंतन मनन करने से हमें यही बात समझ में आती है। इस विषय में इस्लाम के एक महान विद्वान शाह वलीउल्लाह देहलवी लिखते हैं « ईश्वर की हिकमत का उद्देश्य भी यही था कि अज़ान केवल सूचना अथवा चेतावनी हो कर न रह जाए बल्कि धर्म का परिचय कराने में दाखिल हो जाए, और दुनिया में इसकी प्रतिष्ठा केवल चेतावनी की नहीं धर्म प्रचार की भी हो, और उसकी आज्ञापालन और उपासना का चिह्न भी समझा जाए, इस लिए अनिवार्य यह हुआ कि इसमें अल्लाह की प्रशंसा हो, अल्लाह और उसके अन्तिम संदेष्टा हज़रत मुहम्मद सल्ल0 के वर्णन के साथ नमाज़ की ओर बुलावा हो ताकि इस उद्देश्य की भली-भाति पुर्ति हो सके»
अब आपके मन में यह प्रश्न पैदा हो रहा होगा कि अज़ान के शब्दों का क्या अनुवाद होता है तो आइए सर्वप्रथम हम अज़ान के शब्दों का अर्थ जानते हैं
" ईश्वर सब से महान है (चार बार) मैं वचन देता हूं कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा उपासना के योग्य नहीं (दो बार) मैं वचन देता हूं कि मुहम्मद सल्ल0 ईश्वर के अन्तिम संदेष्टा हैं (दो बार) आओ नमाज़ की ओर (दो बार) आओ सफलता की ओर (दो बार) ( नमाज़ सोने से उत्तम है [दो बार] यह मात्र सुबह की नमाज़ में कहे जाते हैं) ईश्वर सब से महान है, ईश्वर सब से महान है, ईश्वर के अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं।
यह रहा अर्थ अज़ान का, अब आइए अज़ान के इन शब्दों पर चिंतन मनन कर के देखते हैं कि अज़ान में क्या संदेश दिया जाता है।
पहला शब्दः ईश्वर सर्व महान है (चार बार) अज़ान देने वाला सब से पहले मनुष्यों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि ईश्वर जो सम्पूर्ण संसार का सृष्टा, स्वामी और पालनहार है, वह सर्वमहान है, वह अनादी और अनन्त है, निराकार और निर्दोश है, उसके पास माता पिता नहीं, उसको किसी की आवश्कता नहीं पड़तीन वह न किसी का रुप लेकर पृथ्वी पर आता है और न उसका कोई साझीदार है। परन्तु जब मनुष्य इस महान पृथ्वी पर आकाश को देखता है, सूर्य, चंद्रमा, और सितारों पर दृष्टि डालता है, बिजली की चमक, बादल की गरज, और किसी पीर फक़ीर के चमत्कार आदि पर गौर करता है तो इन सब की महानता उसके हृदय में बैठने लगती है तो अज़ान देने वाला यह याद दिलाता है कि यह सब चीज़ें ईश्वर की महानता के सामने बिल्कुल तुच्छ हैं क्यों कि वही इन सब चीज़ों का बनाने वाला है, वही लाभ एवं हानि का मालिक है। यह चीज़े अपनी महानता के बावजूद ईश्वरीय दया की मुहताज हैं, ईश्वर ही सब की आवश्यकतायें पूरी कर रहा है, संकटों में वही मुक्ति देता है, सब की पुकार को सुनता है, परोक्ष एवं प्रत्यक्ष का जानने वाला है, सारे पीर फक़ीर, साधु संत और दूत सब उसी के मुहताज हैं और उनको किसी को लाभ अथवा हानि पहुंचाने का कुछ भी अधिकार नहीं क्योंकि मात्र एक ईश्वर सर्वमहान है।
दूसरा शब्दः ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं। (दो बार)
पहले शब्द से जब यह सिद्ध हो गया कि ईश्वर सर्वमहान है, सारी चीज़ें उसी की पैदा की हुई हैं तथा उसी के अधीन हैं तो अब यह पुकार लगाई जाती है कि उसी की आज्ञाकारी भी की जानी चाहिए। अतः अज़ान देने वाला कहता है कि मैं वचन देता हूं कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई उपासना के योग्य नहीं। वीदित है की जब सब कुछ ऊपर वाला ईश्वर ही करता है तो फिर सृष्टि की कोई प्राणी अथवा वस्तु उपास्य कैसे हो सकती है ? अतः यह पुकार लगाई जाती है कि हे मनुष्यो! सुन लो कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं की जानी चाहिए। अब प्रश्न यह था कि ईश्वर की पूजा कैसे की जाएगी और ईश्वर ने मानव मार्गदर्शन हेतु क्या नियम अपनाया तो इसे अज़ान के अगले शब्दों में बताया गया है जिसका वर्णन अगली पोस्ट में होगा। धन्यवाद (जारी )

Saturday, November 28, 2009

हज्ज और क़ुर्बानी के नायक (दूसरा भाग )

अग्नि से सुरक्षित निकलने के बाद आपका प्रचा हर ओर हो चुका था। ईश्वरीय संदेश भी सारे कानों तक पहुंच गया था। केवल वहाँ के सम्राट तक न पहुंच सका था। अतः आप इसी उद्देश्य से वहां के शासक "नमरूद" के पास आए जो स्वयं को परमेश्वर सिद्ध करता था। उसके मन मस्तिष्क में अहंकार और घमण्ड कूट कूट कर भरा हुआ था। उसने जब ईब्राहीम अलै0 से ईश्वर के अस्तित्व पर प्रमाण मांगा तो आपने कहाः "मेरा प्रभू वह है जिसके अधिकार में जीवन और मृत्यु है"। उसने कहाः ज़िन्दगी और मौत मेरे अधिकार में हैं फिर उसने दो व्यक्तियों को बोलाया जिसमें से एक का खून वैध था उसे मार दिया और दूसरे को छोड़ दिया फिर कहाः "देखा! मैं जीवन औऱ मृत्यु पर अधिकार रखता हूं ना?" जब इब्राहीम अलै0 ने उसकी बुद्धि की यह दुर्बलता देखी तो उसके समक्ष ऐसा प्रमाण पेश कर दिया कि शक्ल में भी उसके समान कुछ न कर सके। आपने कहाः अच्छा! ईश्वर सूर्य को पूर्व से निकालता है तू तनिक उसे पश्चिम से निकाल ला" इसका कोई ज़ाहिरी टूटा फूटा उत्तर भी उस से न बन सका और वह चुप साधे बगलें झांकने लगा।
अब इब्राहीम अलै0 का चर्चा पूरे देश में हो चुका था, लोग उनके चमत्कार और अग्नि से सुरक्षित निकलने के प्रति बातें करने लगे थे, सम्राट के साथ उनका व्यवहार और उसे विवश करने का मआमला प्रचलित होने लगा था। इधर इब्राहीम अलै0 ईश्वरीय संदेश को फैलाने में प्रयत्नशील थे। प्रतिदिन विरोध में वृद्धि हो रही थी। मात्र एक महिला और एक पुरुष ने उनके संदेश को स्वीकार किया था। महिला का नाम सारा था जो बाद में उनकी पत्नी बनीं और पुरुष लूत अलै0 थे जो बाद में ईश्वरीय संदेष्टा नियुक्त किए गए।
जब इब्राहीम अलै0 के समक्ष यह विदित हो गया कि ईश्वरीय संदेश को कोई अपनाने वाला नहीं रहा तो देश-त्याग का निर्णय कर लिया। परन्तु देश-त्याग से पूर्व अपने पिता को इस्लाम का संदेश पहुंचाया पर पिता तो कट्टर बहुदेववाद था, वह कब बेटे की बात मानता। इस प्रकार आप उन से प्यार भरे शैली में बात करने के बाद लूत और अपनी पत्नी सारा को साथ लिए वहाँ से निकल गए। शाम, हारान से होते हुए फलस्तिन पहुंचे, फिर मिस्र गए। मिस्र में पहुंचने के पश्चात एक चमत्कारिक घटना पेश आई, जिसका संक्षिप्त यह है कि जब आप मिस्र पहुंचे तो वहाँ का सम्राट बड़ा अत्याचारी था। किसी ने मस्राट को सूचना दी कि एक यात्री के साथ बड़ी सुन्दर महिला है और वह इस समय हमारे देश में है। सम्राट ने तुरन्त सेनिक भेजा कि वह हज़रत सारा को उसके पास उपस्थित करे। हज़रत सारा वहाँ से चलीं, और इधर इब्राहीम अलै0 नमाज़ में खड़े हो गए। जब हज़रत सारा को अत्याचारी महाराजा ने देखा और उनकी ओर लपका तो तुरन्त ईश्वरीय प्रकोप में ग्रस्त हो गया। हाथ, पैर ऐंठ गए। भयभित होकर विन्ती करने लगाः हे पवित्र महिला! ईश्वर से प्रार्थना कर कि वह मुझे क्षमा कर दे, मैं वचन देता हूं कि फिर तुझे हाथ न लगाऊंगा। आपने प्रार्थना की, उसी समय वह अच्छा हो गया। परन्तु अच्छा होते ही उसने फिर उनकी ओर हाथ बढ़ायाः वही प्रकोप फिर आ पहुंचा, और यह पहली बार से अधिक कठोर था। फिर उसने विन्ती की और हाजरा की प्रार्थना से ठीक हो गया। तात्पर्य यह कि तीन बार ऐसा ही हुआ। तीसरी बार छूटते ही अपने सैनिक को आदेश दिया कि तू इसे यहाँ से निकाल और हाजरा (जो सम्राट की सेविका थी) को इसकी सेवा के लिए इसके साथ कर दे, यह कोई इनसान नहीं बल्कि पवित्र-आत्मा है। उसी समय सारा वहाँ से निकाल दी गईं और हाजरा उनके समर्पित की गईं। ईधर हज़रत इब्राहीम अलै0 उनकी आहट पाते ही नमाज़ से छूटे और पूछा कि कहोः क्या गुज़री? कहा कि अल्लाह ने उस अत्याचारी के प्रतारण को उसी पर लौटा दिया और हाजरा मेरी सेवा के लिए आ गईं।
इस प्रकार उत्तरोत्तर संकटों और परीक्षाओं में इब्राहीम अलै0 की आयु 80 वर्ष की हो गई। अब तक इब्राहीम अलै0 को कोई संतान न हुई थी, हृदय में संतान की इच्छा हचकोले खा रही थीं। अतः हज़रत सारा के अनुरोध पर आपने हाजरा से विवाह कर लिया। फिर ईश्वर से प्रार्थाना की कि " हे प्रभू!तू मुझे एक बेटा प्रदान कर जो नेकों में से हो"।

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़ति-परवाज़ मगर रखती है।

अतः प्रार्थना स्वीकार कर ली गई और हज़रत हाजरा अलै0 के गर्भ से इस्माइल अलै0 पैदा हुए। बुढ़ापे में शिशु पा कर इब्राहीम अलै0 का हृदय प्रसन्नता से खिल उठा परन्तु दूसरी ओर अल्लाह की ओर से परिक्षाओं का क्रम शुरू हो गया। इब्राहीम अलै0 को आदेश मिला कि अपनी पत्नी हाजरा और अपने प्यारे बेटे इस्माईल को मक्का के मरुस्थल पर रख आइए। आदेशानुसार बिना किसी संकोच के अपने पुत्र इस्माईल और अपनी पत्नी हाजरा को लिए मक्का के रेगिस्तान में पहुंच गए। खानपान के लिए कुछ खुजूर और जल वहाँ रख दिया और लौटने के लिए मुड़े। पत्नी तेज़ी से उनके पीछे लगी और बोलीः इब्राहीम! आप इस रेगिस्तान में हमें छोड़ कर कहाँ जा रहे हैं? कोई उत्तर नहीं मिल रहा है, बिल्कुल छुप हैं, चलते जा रहे हैं और यह पूछती जा रही हैं। अंततः ध्यान आता है कि शायद ईश्वर का आदेश है। पूछती हैं "क्या आपको अल्लाह का आदेश मिला है?" उत्तर मिलता हैः हाँ। विश्वसनीय पत्नी यह सुनते ही बोल उठती हैं "जब अल्लाह का आदेश है तो वह अवश्य हमारी सुरक्षा करेगा" इब्राहीम अलै0 चले यहाँ तक कि एक पहाड़ की ओट में आ कर खड़े हुए, अपना दोनों हाथ आसमान की ओर उठाया और ईश्वर से प्रार्थना कीः "हे मेरे प्रभू! मेंने एक निर्जल और ऊसर घाटा में अपनी सन्तान के एक भाग को तेरे प्रतिष्ठित घर के पास बसाया है। प्रभू! यह मैंने इस लिए किया है कि यह लोग यहाँ नमाज़ स्थापित करें, अतः तू लोगों के दिलों को इनका इच्छुक बना,औऱ इन्हें खाने को फल दे,शायह कि यह कृतज्ञ बनें" (इब्राहीम सूरः14आयत37)
तात्पर्य यह कि इब्राहीम अलै0 लौट चुके हैं। हाजरा अलै0 अपने दूध पीते शिशु के साथ निर्जल स्थान पर निवास की हुई हैं। दो दिन के पश्चान खान-पान की सामग्री समप्त हो जाती है। माँ का स्तन भी सूखा जा रहा है। हाजरा और इस्माइल प्यास से विकल हैं, अति कठोर और गंभीर परिस्थिति है। प्यास से इस्माइल तड़प रहे हैं, माता जल की खोज में इधर उधर दौड़ लगा रही है। कभी तेज़ी से सफ़ा पर्वत पर चढ़ती हैं कि शायद कोई कुवाँ, मानव, अथवा यात्रीदल देखाई दे परन्तु कुछ नहीं देखती हैं। सफ़ा से उतर कर मर्वा तक दौड़ती हुई जाती हैं, मर्वा पर चढ़ती हैं कि शायद कोई दिखाई दे पर दूर दूर तक किसी का पता नही हैं.... थक हार कर शिशु के पास आती हैं, बच्चा प्यास की सख्ती से तड़प रहा है। व्याकुलता की स्थिति में तेज़ी से सफ़ा की ओर आती हैं. फिर मर्वा की ओर दौड़ती हैं, इस प्रकार जाते और लौटते हुए सात चक्कर काट लेती हैं। हाजरा की इसी स्मृतिचिन्ह को हज तथा उमरा में सफ़ा और मर्वा का सात चक्कर लगा कर ताज़ा किया जाता है। तात्पर्य यह कि सातवीं बार हाजरा अलै0 व्यकुल, थकी हारी और निराशाजनक शिशु के पास बैठ जाती हैं। रोते रोते और प्यास की कठोरता से आवाज़ बैठी जा रही थी। इसी स्थिति में ईश्वरीय दया उमडती है, इस्माइल रोते हुए पृथ्वी पर पैर पटखते हैं तो पैर के नीचे से ज़मज़म स्रोत जारी हो जाता है। इस प्रकार माँ और बेटा दोनों मृत्यु के मुंह से निकल आते हैं।
फिर क़ुरआन के बयान के अनुसार जब इस्लामाइल अलै0 चलना फिरना सीख गए और "फर्रा" के कथनानुसार जब 13 वर्ष के हो गए तो इब्राहीम अलै0 का परीक्षा आरम्भ हुआ। स्वप्न में आदेश दिया गया कि अपने प्यारे बच्चे इस्माइल को अल्लाह के नाम पर बलि दे दो।
प्रिय मित्रो! तनिक चिन्ता मनन से काम लीजिए और देखिए कि कितनी इच्छाओं के बाद बच्चा पैदा हुआ था, मानो आँखों की ठण्डक, जिगर का टुकड़ा और बढ़ापे की लाठी है। परन्तु इधर ईश्वर का आदेश था... अपने बच्चे के पास आते हैं और कहते हैं "बेटा मैं सवप्न में दखता हूं कि मैं तुझे ज़बह कर रहा हूं? अब तू बता तेरा क्या विचार है….? आदेशापालक बेटा तुरन्त उत्तर देता हैः "पिता जी! जो कुछ आपको आदेश दिया जा रहा है उसे कर डालिए, आप यदि अल्लाह ने चाहा तो हमें सब्र करने वालों में से पाएंगे"।
फिर वह समय आता है कि मेना कि ऐतिहासिक रेगिस्तानी धरती पर इब्राहीम अलै0 अपने पुत्र इस्माइल मुख के बल लिटा चुके हैं। इब्राहीम अलै0 का चाकू इस्माइल की गर्दन पर बराबर चल रहा है लेकिन चाकू काट नही रहा है क्योंकि एक ओर यदि इब्राहीम को आदेश मिला था कि अपने पुत्र को ज़बह करो तो दूसरी ओर चाकू को आदेश मिला था कि तुम कदापि न काटना...चाकू भी तो ईश्वरीय आदेश के अधीन है....वह अपना प्रभाव देखाए तो कैसे...?ईश्वरीय तत्वदर्शीता को समझना सरल नहीं, अतः ईश्वर ने अपनी तत्वदर्शीता का रहस्य खोलते हुए आकाशीय दूत जिब्रील अलै0 के माध्यम से एक मेंढ़ा भेज दिया और इस्माईल के बदले उस मेंढ़ा को ज़बह करा कर फरमायाः हे इब्राहीम!तूने स्वप्न सच कर दिखाया, हम सत्कर्मियों को ऐसा ही बदला देते हैं"। यही वह इब्राहीमी यादगार है जिसको सम्पूर्ण संसार के मुसलमान हर वर्ष ईदे-क़ुर्बाँ के अवसर पर जानवर की क़ुर्बानी की शक्ल में ताज़ा करते हैं।
अभी कुछ देर पहले हमने बताया है कि जिस समय ईब्राहीम ने अपने बच्चे इस्माइल और अपनी पत्नी हाजरा को मक्का में बसाया था उस समय वह स्थान सर्वथा रेगिस्तान और निर्जल था। कुछ अवधि के पश्चात बनू-जुर्हुम का एक यात्रीदल वहाँ से गुज़रा। पानी देखा तो वहीं ठहर गए। इस प्रकार वहाँ कई घर आबाद हो गए। इब्राहीम अलै0 अपनी पत्नी और अपने प्यारे बच्चे से भेंट करने के लिए मक्का आया करते थे। एक बार उन्होंने अपने बेटे से कहा कि मुझे अल्लाह ने अपना घर बनाने का आदेश दिया है। इस प्रकार इब्राहीम और इस्माइल ने मिल कर काबा का निर्माण किया। इब्राहीम अलै0 निर्माता थे और इस्माइल अलै0 उनकी सहायता करते थे। निर्माण के बीच जिब्रील स्वर्ग से हज्रे-अस्वद ले कर आए। इब्राहीम अलै0 ने उसे उसकी मौजूदा जगह पर रख दिया। फिर आपने ईश्वरीय आदेशानुसार हज्ज की घोषणा की.... वह स्वर जो मरुस्थल में इब्राहीम अलै0 के मुख से निकला था, हर ईश्-भक्तों के कानों तक पहुंचा... और आज तक उसी का प्रभाव है कि संसार के कोने कोने से लोग आकर्शित उसकी ओर आ रहे हैं। यही वह हज है जो इस्लाम के पाँच मूल स्तंभों में से एक है। जो हर आर्थिक सामर्थ्य रखने वाले मुसलमान पर जीवन में एक बार अनिवार्य है।

Wednesday, November 25, 2009

हज्ज और क़ुर्बानी के नायक

अभी हज्ज और क़ुर्बानी का त्योहार आ रहा है। हज्ज और क़ुर्बानी का इतिहास क्या है?मुसलमान हज़्ज और क़ुर्बानी क्यों करते हैं। और हज्ज और क़ुर्बानी का वास्तविक अभिप्राय क्या है? इन सब को समझने के लिए सब से पहले हमें हज्ज और कुर्बानी के नायक को समझना होगा तो आइए! सब से पहले हम हज्ज और कुर्बानी के नायक को जानते हैं?
हज्ज और क़ुर्बानी के नायकः ईब्राहीम (ईश्वर की उन पर शान्ति हो)
आज से अनुमानतः साढ़े चार हज़ार वर्ष पूर्व इब्राहीम अलैहिस्सलाम (ईश्वर की उन पर शान्ति हो) इराक़ के शहर "बाबुल" के एक सम्मानित परिवार में पैदा हुए। आप संदेष्टा "नूह" के बेटे "साम" की संतान में से थे। अतिथिगन थे इसी लिए उनकी उपाधि "अबू-ज़ैफान" (अतिथियों वाला) पड़ गई थी। जिस वातावरण में पैदा हुए क़ुरआन ने उस समय की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की ओर संकेत किया है जिस से ज्ञात होता है कि उस समय लोग तीन भागों में बटे हुए थे। (1) कुछ लोग चंद्रमा एंव सूर्य की पूजा करते थे। (2) कुछ लोग पत्थर और कंकड़ी से बनाई गई मुर्तियों के सामने झुकते थे। (3) जबकि कुछ लोग उस समय के शासक "नमरूद" की पूजा करते थे।
ऐसे ही अंधकार वातावरण में एक प्रोहित "आज़र" के घर ईब्राहीम अलै0 की पैदाईश हुई। उनके पिता "आज़र" लोहार थे, वह लकड़ी की मूर्ति बनाते, उन्हें बेचते और लोगों को उनकी पूजा की ओर आमंत्रित किया करते थे।
समय गुज़रता रहा। इब्राहीम अलै0 बाल्यावस्था ही से मूर्तियों को अप्रिय दृष्टि से देखते, उनकी आलोचना करते और सोचते रहते कि यह मूर्तियाँ न खा सकती हैं, न पी सकती हैं, न बोल सकती हैं, न सुन सकती हैं तो आखिर लोग इनकी पूजा क्यों करते हैं? इन से लाभ की आशा एवं हानि का भय क्यों रखते हैं? यह कैसे लोग हैं जो अपने हाथों से मूर्ति बनाते हैं और फिर कहते हैं कि यह हमारे पूज्य हैं।
जब ईश्वर ने इब्राहीम अलै0 को अपने समुदाय की ओर संदेष्टा बनाकर भेजा तो सब से पहले आपने अपने पिता को समझाया कि "पिता जी! आप क्यों उन चीज़ों की उपासना करते हैं, जो न सुनती हैं, न देखती हैं, और न आपका कोई काम बना सकती हैं? पिता जी! मेरे पास एक ऐसा ज्ञान आया है जो आपके पास नहीं आया, आप मेरी बात मानें मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊंगा। पिता जी! आप शैतान की पूजा न करें शैतान तो करुणामय ईश्वर का अवज्ञाकारी है। पिता जी! मुझे डर है कि कहीं आप करुणामय ईश्वर के प्रकोप में ग्रस्त न हो जाएं।" (सूरः19 आयत 42-45)
परन्तु पिता ने एक न सुनी और झटकते हुए कहा "हे इब्राहीम! यदि तू अपने इस काम से न रुका तो मैं तुझे पत्थर से मार मार कर बर्बाद कर दूंगा.....बस यही कहता हूं कि तू हमेशा के लिए मुझ से अलग हो जा"।
जब आपको अपने पिता से निराशाजनक उत्तर मिला तो अपने समुदाय के चंद्रमा और सूर्य की पूजा करने वालों को अति तत्वदर्शिता से समझाया, जब रात का अंधकार छा गया तो आपने सब के समक्ष एक सेतारा को देखकर कहा कि यह मेरा भगवान है। परन्तु जब वह डूब गया तो सुबह होते ही कहने लगेः "मैं डूबने वाले की पूजा नहीं कर सकता"। दूसरी रात जब चंद्रमा को देखा तो समुदाय के लोगों से कहने लगेः "यह मेरा भगवान है"। जब वह भी डूब गया तो कहने लगेः "यदि मेरे रब ने मेरा मार्गदर्शन न किया तो मैं पथभ्रष्ट लोगों में से हो जाऊंगा"।
ऐसी शैली मात्र इसलिए अपनाई ताकि समुदाय के लोगों को विश्वास दिला सकें कि आख़िर ऐसी चीज़ों की पूजा से क्या लाभ जो छुपती हों, विदित होती हों, निकलती हों, डूबती हों। पहली रात न समझ सके तो दूसरी रात चंद्रमा को देख कर समझाना चाहा लेकिन फिर भी न समझे तो सुबह में जब सूर्य को निकलते देखा तो कहाः "यह मेरा रब है....यह महान भी है"। फिर जब वह भी डूब गया तो आपने वार्ता समाप्त करते हुए कहाः "हे मेरे समुदाय के लोगो! निःसंदेह मैं तेरे बहुदेववाद से बेज़ार हूं जिन्हें तुम ईश्वर का साझीदार ठहराते हो। मैंने तो एकाग्र हो कर अपना रुख उस सत्ता की ओर कर लिया जिसने आकाश एवं पृथ्वी की रचना की है और मैं कदापि बहुदेववादियों में से नहीं हूं"। (सूरः6 आयत 79-80)
फिर आपने मुर्तिपूजकों को समझाते हुए कहाः"यह मात्र लकड़ी और पत्थर की मूर्तियाँ हैं, यह लाभ अथवा हानि की मालिक नहीं, यह तुमको रोज़ी देने का अधिकार नहीं रखते, केवल तुम अल्लाह से ही रोज़ी माँगो, उसी की उपासना करो,और उसी का शुक्रिया अदा करो। यदि तुम मेरी बात नहीं मानते और मुझे झुटलाते हो तो तुम से पहले भी लोग अपने संदेष्टाओं को झुटला चुके हैं। उन्हों ने भी इब्राहीम अलै0 की एक न मानी और बस... यही रट लगाते रहे कि "आखिर हम इनकी पूजा कैसे छोंड़ दें जबकि हमने अपने पूर्वजों को उनकी पूजा करते हुए पाया है?...."।
आज भी कुछ लोगों को सत्य संदेश बताया जाता है तो तुरंत यही कहते हैं कि हम ऐसी प्रथा का त्याग कैसे कर सकते हैं जो हमारे पितामह से चली आ रही है। इस लिए आपने उनको संतोष-जनक उत्तर देते हुए कहाः "तुम भी अंधकार में हो और तुम्हारे पितामह भी खुले अंधकार में पड़े थे"। अर्थात हमारी आपत्ति जो तुम पर है वही तुम्हारे पूर्वजों पर है, यदि एक गुमराही में तुम्हारे पूर्वज ग्रस्त हों और तुम भी उसमें ग्रस्त हो जाओ तो वह भलाई बनने से रही। मैं कहता हूं कि तुम और तुम्हारे पूर्वज सत्य मार्ग से भटक गए हो।
अब तो उनके कान खड़े हो गए क्यों कि उन्हों ने अपने बुद्धिमानों का अपमान होते देखा औऱ अपने पूर्वजों के प्रति अप्रिय शब्द सुने तो घबरा गए और कहने लगेः "इब्राहीम! क्या वास्तव में तुम ठीक कह रहे हो या मज़ाक कर रहे हो, हमने ऐसी बात कभी नहीं सुनी"?। अब आपको ईश्वर के परिचय का शुभ अवसर मिलाः आपने कहाः "ईश्वर तो केवल आकाश एवं धरती का सृष्टिकर्ता ही है, प्रत्येक चीज़ों का स्वामी वही है, तुम्हारे यह पूज्य किसी तुच्छ चीज़ के न निर्माता हैं, न मालिक। फिर पूज्य कैसे हो गए? मैं साक्षी हूं कि ईश्वर ही उपासना योग्य है, उसके सिवा न कोई प्रभू है औऱ न पूज्य। उसके बावजूद समुदाय के लोगों पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा।
तब ईब्राहीम अलै0 ने अपने दिल में यह ठान ली कि उनकी मुर्तियों का कुछ न कुछ अवश्य इलाज किया जाए। आपने सोचा कि उनके त्योहार का दिन निर्धारित है, उसी दिन यह काम भलि-भांति पूर्ण रूप में सम्पन्न हो सकता है। त्योहार के दिन जब उन से त्योहार में भाग लेने का अनुरोध किया गया तो उन्हों ने कहा कि "मैं बिमार हूं"। जब सब लोग त्योहार मनाने के लिए निकल गए तो एक तेज़ कुल्हारी लिए देवता-वास में प्रवेश किया और प्रत्येक मूर्तियों को टूकड़े टूकड़े कर दी, मात्र बड़ी मूर्ति को रहने दिया ताकि उनके मन मस्तिष्क में यह ख्याल पैदा हो कि शायद बड़ी मूर्ति ने छोटी मूर्तियों को नष्ट कर दिया है।
जब लोग त्योहार से लोट कर आए तो यह देख कर आश्चर्यचकित हो गए कि सारी छोटी मूर्तियां मुंह के बल गिरी हुई हैं। बल्कि उनके पैरों से ज़मीन खिसक गई और कहने लगे कि यह कौन ज़ालिम था जिसने हमारी मूर्तियों का अपमान किया? कुछ लोगों ने कहा कि हमने इब्राहीम को इन पूज्यों के प्रति अपशब्द बोलते सुना है। समुदाय के लोगों ने पारस्परिक परामर्श के बाद यह निर्णय लिया कि सब लोगों के समक्ष इब्राहीम को बुला कर उसे सज़ा दी जाए। अतः जब सब लोग आ गए तो इब्राहीम अलै0 - जो अपराधी के रूप में वहाँ उपस्थित थे - से पूछा गयाः हमारे पूज्यों के साथ यह अपमानजनक कर्म किसने किया है ? उस पर इब्राहीम अलै0 ने कहाः "बल्कि यह काम इस बड़ी मूर्ति ने किया है, तुम अपने इन पूज्यों से ही पूछ लो, यदि यह बोलते हों"। अभिप्राय यह था कि लोग स्वयं समझ लें कि यह पत्थर क्या बोलेंगे, और जब वह इतने विवश हैं तो वह पूज्यनीय कैसे हो सकते हैं?। इस ठोस उत्तर ने उन्हें थोड़ी देर के लिए हिला कर रख दिया, निराशाजनक शैली में कहने लगे कि हमने स्वयं ग़लती की, अपने पूज्यों के पास सुरक्षा-दल रखे बिना त्योहार मानाने चले गए। फिर चिंतन मनन के पश्चात यह बात बनाई कि "तुम जो यह कहते हो कि हम उन से पूछ लें.... तो क्या तुम्हें पता नहीं कि वह बोलते नहीं हैं?...."।
अब इब्राहीम अलै0 को अपने संदेश के परिचय का शुभ अवसर मिल गया, अति दयालू होने के बावजूद तनिक ठोस स्वर में उनको सम्बोधित कियाः "खेद है कि तुम उनकी पूजा करते हो जो न तुम्हें कुछ भी लाभ पहुंचा सकें, न हानि। धिक्कार है तुम पर और तुम्हारे उन देवताओं पर जिनकी तुम ईश्वर को छोड़ कर पूजा करते हो, यह तो गूंगे और बहरे हैं, बोलने तक की क्षमता से वंचित हैं तो तुम्हारी सहायता कैसे करेंगे, क्या तुम कुछ भी बुद्धि नहीं रखते?"।
नियम यह है कि जब एक व्यक्ति प्रमाण से निरुत्तर हो जाता है तो भलाई उसे घसेट लती है अथवा बुराई उसपर अधिकार प्राप्त कर लेती है। यहाँ उन लोगों को उन के दुर्भाग्य ने घेर लिया और अपने दबाव का प्रद्रशन करने के लिए ईब्राहीम अलै0 को आग में जलाने का लिर्णय ले बैठे। लकड़ियाँ एकत्र की गईं, पृथ्वी में एक गहरा कुवां खोदा गया, लकड़ियों से उसे भर दिया गया। फिर उसमें आग लगा दी गई। आसमान से बातें कर रही अग्नि में ईब्राहीम अलै0 को डाल दिया गया। जिस समय आपको अग्नि में डाला गया आपने मात्र यह शब्द बोला कि "अल्लाह हमारे लिए काफी है और वह उत्तम सहायक है"। उसी समय ईश्वर की ओर से अग्नि को आदेश मिला कि "हे आग! ठण्डी हो जा और सलामती बन जा इब्राहीम पर" हर ओर से अग्निशिखा निकल रही थी परन्तु आग ने आपको छुआ तक नहीं और वह अहानिकारक बन कर रह गई (शेष अगले पोस्ट पर )

Sunday, October 25, 2009

महान चमत्कार के होते हुए एक मानव-मात्र

मानव पथभ्रष्टता का मूल कारण महापुरुषों तथा संदेष्टाओं की चमत्कारियाँ हैं। ईश्वर ने मानव मार्गदर्शन हेतु हर युग एवं हर देश में जब संदेष्टाओं को भेजा, तो उनकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी। परन्तु लोगों ने इन चमत्कारियों की वास्तविकता को न समझने के कारण उन्हीं को अवतार, ईश्वर, ईश्वर का बटा आदि मान लिया। यह सब से बड़ा अत्याचार था जो संदेष्टाओं पर हुआ। इसी कारण आज लोग अपने सृ,ष्टिकर्ता, अन्नदाता औऱ पालनकर्ता को भूल कर सब कुछ महापुरुषों को समझ चुके हैं। इन प्रत्येक महापुरुषों में केवल मुहम्मद सल्ल0 एक ऐसे महापुरुष हैं जिनको आज तक एक मानव-मात्र माना जाता है। जबकि हम देखते हैं कि मुहम्मद सल्ल0 की चमत्कारियाँ बड़ी बड़ी थीं। उदाहरण-स्वरूप
(1) मक्का वालों ने आपके संदेष्टा होने का प्रमाण माँगा तो आपके एक संकेत पर चाँद के दो टुकड़े हो गए जिसका समर्थन आधुनिक विज्ञान ने भी किया है। इस चमत्कार का समर्थन चाँद पर जाने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक निल आर्म्-स् ट्रंग ने भी किया बल्कि इसी कारण उन्होंने इस्लाम भी स्वाकार किया जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
(2) हुदैबिया की सन्धि के अवसर पर अंगुलियों से पानी निकला और 1400 व्यक्तियों ने प्यास बुझाई।
(3) मुहम्मद साहिब का सब से बड़ा चमत्कार दिव्य क़ुरआन है, वह कैसे ? क्यों कि वह न लिखना जानते थे न पढ़ना और न ही उनको किसी गुरू की संगती प्राप्त हुई थी, ऐसा इन्सान क़ुरआन पेश कर रहा है जो स्वयं चुनौती दे रहा है कि ( यदि तुझे क़ुरआन के ईश्वाणी होने में संदेह है तो इसके समान एक सूरः «अध्याय» ही पेश कर दो, यदि तुम सच्चे हो) [सूरः अल-बक़रः23] परन्तु इतिहास साक्षी है कि वह अरब विद्वान जिनको अपने भाषा सौन्दर्य पर गर्व था, अपनी भाषा के सामने दूसरों का गुंगा समझते थे, उसके समान एक टुकड़ा भी पेश न कर सके। हालांकि उन्हीं के समाज में पलने बढ़ने वाला एक अपढ़ व्यक्ति ऐसी वाणी पेश कर रहा था। जिस से ज्ञात यह होता है कि क़ुरआन मुहम्मद साहिब की वाणी नहीं बल्कि ईश्वर की वाणी है। औऱ आज तक क़ुरआन सारे संसार वालों के लिए चैलेंज बना हुआ है। जी हाँ! क़ुरआन की शैली ही ऐसी है कि उसके समान न कोई बना सका है न बना सकता है।
प्रिय भाई ! इन स्पष्ट चमत्कारियों के होते हुए क्या मुहम्मद सल्ल0 का हक़ नहीं था कि उनकी पूजा की जाए ? या वह अपने पूज्य होने का दावा करें ? यदि वह ऐसा दावा करते तो वह संसार जिस ने राम को ईश्वर बना डाला, जिसने कृष्ण जी को गभवान कहने से संकोच न किया, जिसने ईसा अलै0 (जिसस) को ईश्वर का बटा मान लिया। वह ऐसे महान व्यक्ति को ईश्वर मानने से कभी संकोच न करता। लेकिन वह ऐसा कैसे कह सकते थे जबकि वह सत्य संदेश ले कर आए थे। वह तो स्वंय को केवल एक मानव के रूप में प्रकट करते हैं और कहते हैं «मैं एक मानव-मात्र हूं तुम्ही जैसा» आज यदि कोई मुस्लिम मुहम्मद साहिब की पूजा करने लगे तो वह इस्लाम की सीमा से निकल जाएगा।

Saturday, October 3, 2009

एक लाख चौवीस हज़ार ?

आज एक सज्जन ने बड़ा अच्छा प्रश्न किया कि क्यों ईश्वर ने एक लाख चौबीस हज़ार संदाष्टाओं को भेजा? शायद प्रमात्मा पहली बार सही धर्म न भेज पाया, क्यों नबियों का संदेश अधोरा रहा ? यह एक संदेह है जिसका निवारण होना चाहिए ताकि सत्य खुल कर सामने आ सके। इसी उद्देश्य के अन्तर्गत आपकी सेवा में हम यह लेख प्रस्तुत कर रहे हैं।
यह सत्य है कि इस्लाम उसी समय से है जिस समय से मानव है। प्रथम मानव को इस्लाम ही की शिक्षा दी गई थी। औऱ इसी शिक्षा को मानव तक पहुचाने के लिए हर युग में संदेष्टा आते रहे। शुरु में हर एक जाति में अलग-अलग संदेशवहाक आते थे,उनकी शिक्षायें उनकी जाति तक ही सीमित रहती थीं। और उन्हें एक पूर्ण जीवन व्यवस्था भी नही दिया जाता था। उसका कारण यह था कि उस समय प्रत्येक जातियाँ एक दूसरे से अलग थीं। उनके बीच अधिक मेल जूल न था। भाषायें विभिन्न होती थीं, जिन्हें सीखने की ओर लेग बहुत कम ध्यान देते थे। मानव बुद्धि भी बहुत सीमित थी, ऐसी स्थिती में एक ही शिक्षा का प्रत्येक जातियो में फैलाना अत्यन्त कठिन था, क्यों कि मानव जाति की प्रगति उसी प्रकार हुई है जिस प्रकार एक बच्चे की प्रगति होती है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था फिर युवावस्था। इस प्रकार ईश्वरीय संदेश का भी उसी युग के अनुसार होना आवश्यक था। अतएवं ईश्वर ने रोगी की सामर्थ्य के अनुकुल औषधि का भी चयन किया और मानव जाति को इतने ही आदेश दिए जिसकी वह शक्ति रखती हो।इसी लिए उनको पूर्ण-जीवन व्यवस्था नहीं दिया गया। यह उस तत्वदर्शी ईश्वर की तत्वदर्शीता थी।
जबकि हम देखते हैं कि सातवीं शताब्दि ई0 मे ऐसी स्थिती नहीं थी। यातयात के साधन बहुत हद तक ठीक हो गए थे। व्यापार, कला-कौशल, की उन्नति के साथ साथ जातियों में परस्पर सम्बन्ध का़यम हो गये थे। चीन और जापान से लेकर यूरोप और अफ्रीक़ा के देशों तक जलीय तथा स्थलीय यात्राओं की शुरुआत हो गई थी बड़े बडे़ विजेताओ ने कई कई देशो को एक राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ दिया था। इस प्रकार वह दूरी और जुदाई जो पहले मानव जाति के बीच पाई जाती थी धीरे धीरे कम होती गई और यह सम्भव हो गया कि इस्लाम की एक ही शिक्षा और एक ही धर्म विधान प्रत्येक संसार के लिए भेजा जाय़े। इस संक्षिप्त विवरण से शायद संदेह का निवारण हो गया होगा ।
विश्व संदेश मक्का में क्यों?
(1) यह देश एशिया और अफ्रीका के ठीक मध्य में स्थित है और यूरोप भी यहां से बहुत निकट है। अन्य अधिक लोगों ने भौगोलिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि थल भाग में मक्का भूतल के बीचोबीच स्थित है। इस प्रकार विश्व नायक का संसार के मध्य में आना अधिक उचित था।
(2) अरब हर प्रकार की बुराइयों में लतपथ होने के बावजूद भी वीर थे ,निडर थे,दानशील और उदार थे, स्वतन्त्र विचार रखने वाले थे, अपनी प्रतिष्ठा के लिए प्राण निछावर कर देना उसके लिए सरल था।
(3) इस देश में कोई शासक भी नहीं था,जो ईश्वरीय आदेश के विरोद्ध में खडा़ होता। क्यों कि इतिहास साक्षी है कि जिस दश एवं जाति में भी ईश्दूत भेजे गए सर्वप्रथम उस देश के राजाओं एवं प्रजाओं ने उन का विरोध किया कि कहीं हमारी हुकुमत न छिन जाये। यहाँ तक कि किसी की हत्या की गई,किसी को देश निकाला कर दिया गया।
इस्लाम ही क्यो?
अब प्रश्न यह उठता है कि इंसान के लिए वह कौन सी प्रकाशना है जिस का वह पालना करके स्वर्ग का अधिकार बन सकता है तो उस का उत्तर बिल्कुल आसान है कि बाद के लोगों के लिए वही प्रकाशना पालना करने योग्य हो सकती है जो सब के बाद आई हो।
सरकार एक देश में किसी व्यक्ति को अपना राजदूत बनाकर भेजती है स्प्रष्ट है कि उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व उसी समय तक के लिए है जब तक वह अपने पद पर आसीन है, जब उसकी अवधि समाप्त हो जाये और दूसरे व्यक्ति को उस पद पर नियुक्त कर दिया जाये तो उसके बाद वही व्यक्ति सरकार का प्रतिनिधि समझा जाएगा। इस एतबार से मुहम्मद सल्ल० ही वह अन्तिम संदेष्टा हैं जो आज और आगे प्रलय के दिन तक मानवता के पथप्रदर्शक और नायक हैं। आपका प्रत्येक संदेष्टाओं के बाद आना इस बात का पर्याप्त कारण है कि आपको और केवल आपको वर्तमान और भविष्य के लिए ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाये।
हो सकता है कि मानव इतिहास की सब से आरंभिंक और प्रचीन धार्मिक पुस्तक ऋवग्वेद हो जो ईश्वर के आदेसानुसार संपादित की गई हो जैसा कि बाईबल भी ईश्वरीय ग्रन्थ था परन्तु यह सब अब निरस्त हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त इस में से कोई ग्रन्थ भी अपने आपको अन्तिम और स्थाई ग्रन्थ के रुप में प्रस्तुत नहीं करता, यदि रामचन्द्र जी की शिक्षा शुद्ध रुप में मौजूद होती तो श्रीकृष्ण जी की आवश्कता न पड़ती, अतः केवल यह बात कि कुरआन अन्तिम ग्रन्थ है उस से पूर्व आने वाले प्रत्येक ग्रन्थों को निरस्त करता है।

Friday, October 2, 2009

क्या इस्लाम मानवरचित धर्म है ?

इस्लाम का कोई मानव संस्थापक नहीं जैसा कि अन्य धर्मों का है उदाहरणस्वरूप बुद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध हैं , सिख धर्म के संस्थापक गुरूनानक हैं, जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी हैं, हिन्दू धर्म भी अपने गुरूओं का धर्म कहलाता है जबकि इस्लाम का संस्थापक कोई मानव नहीं। इसका अर्थ ही होता है एक ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण। अधिकांश लोग इसी तथ्य को न समझ सके जिसके कारण यह कहने लगे कि इस्लाम मुहम्मद सल्ल0 का लाया हुआ धर्म है अथवा एक नया धर्म है।

हालांकि हर मुसलमान यह जानता मानता तथा इस बात पर आस्था रखता है कि मुहम्मद सल्ल0 इस्लाम के संस्थापक नहीं बल्कि उसको अन्तिम स्वरूप देने वाले हैं। ऐसा ही जैसा किसी एक देश में भारत का राजदूत भेजा जाता है तो राजदूत को अपने आदेश का पालन कराने का अधिकार उस समय तक रहता है जब तक अपने पद पर आसीन रहे। जब दो साल की अवधि गुज़रने के बाद दूसरा राजदूत आ जाए तो पहला राजदूत अपना आदेश नहीं चला सकता क्योंकि उसकी कार्य-अवधि समाप्त हो चुकी, ऐसा ही ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो जिस प्रकार कोई कम्पनी जब कोई सामान तैयार करती हैं तो उसके प्रयोग का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को संसार में बसाया तो अपने बसाने के उद्देश्य से अवगत करने के लिए हर युग में मानव ही में से कुछ पवित्र लोगों का चयन किया ताकि वह मानव मार्गदर्शन कर सकें वह हर देश और हर युग में भेजे गए उनकी संख्या एक लाख चौबीस हज़ार तक पहुंचती हैं, वह अपने समाज के श्रेष्ट लोगों में से होते थे, तथा हर प्रकार के दोषों से मुक्त होते थे। उन सब का संदेश एक ही था कि केवल एक ईश्वर की पूजा की जाए, मुर्ती पूजा से बचा जाए तथा सारे मानव समान हैं उनमें जाति अथवा वंश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं क्यों कि उनकी रचना एक ही ईश्वर ने की है, सारे मानव का मूलवंश एक ही पुरूष तक पहुंचता है ( अर्थात आदि पुरुष जिनसको कुछ लोग मनु और सत्रोपा कहते हैं तो कुछ लोग आदम और हव्वा, उनका जो धर्म था उसी को हम इस्लाम अथवा सनातन धर्म कहते हैं ) पर उनका संदेश उन्हीं की जाति तक सीमित होता था क्योंकि मानव ने इतनी प्रगति न की थी तथा एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध नहीं था। उनके समर्थन के लिए उनको कुछ चमत्कारियां भी दी जाती थीं, जैसे मुर्दे को जीवित कर देना, अंधे की आँखों का सही कर देना, चाँद को दो टूकड़े कर देना .

परन्तु यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि पहले तो लोगों ने उन्हें ईश्दूत मानने से इनकार किया कि वह तो हमारे ही जैसा शरीर रखने वाले हैं फिर जब उनमें असाधारण गुण देख कर उन पर श्रृद्धा भरी नज़र डाला तो किसी समूह ने उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया तो किसी ने उन्हें ईश्वर की संतान मान कर उन्हीं की पूजा आरम्भ कर दी। उदाहरण स्वरूप गौतम बुद्ध को देखिए बौद्ध मत के गहरे अध्ययन से केवल इतना पता चलता हैं कि उन्होंने ब्रह्मणवाद की बहुत सी ग़लतियों की सुधार किया था तथा विभिन्न पूज्यों का खंडन किया था परन्तु उनकी मृत्यु के एक शताब्दी भी न गुज़री थी कि वैशाली की सभा में उनके अनुयाइयों ने उनकी सारी शिक्षाओं को बदल डाला और बुद्ध के नाम से ऐसे विश्वास नियत किए जिसमें ईश्वर का कहीं भी कोई वजूद नहीं था। फिर तीन चार शताब्दियों के भीतर बौद्ध धर्म के पंडितों ने कश्मीर में आयोजित एक सभा में उन्हें ईश्वर का अवतार मान लिया।

बुद्धि की दुर्बलता कहिए कि जिन संदेष्टाओं नें मानव को एक ईश्वर की ओर बोलाया था उन्हीं को ईश्वर का रूप दे दिया गया।इसे यूं समझिए कि कोई पत्रवाहक यदि पत्र ले कर किसी के पास जाए तो उसका कर्तव्य बनता है कि पत्र को पढ़े ताकि अपने पिता का संदेश पा सके पर यदि वह पत्रवाहक को ही पिता समझने लगे और उसी का आदर सम्मान शुरू कर दे तो इसे क्या नाम दिया जाएगा,आप स्वयं समझ सकते हैं।

जब सातवी शताब्दी में मानव बुद्धि प्रगति कर गई और एक देश का दूसरे देशों से सम्बन्ध बढ़ने लगा को ईश्वर ने अलग अलग हर देश में संदेश भेजने के नियम को समाप्त करते हुए विश्वनायक का चयन किया। जिन्हें हम मुहम्मद सल्ल0 कहते हैं, उनके पश्चात कोई संदेष्टा आने वाला नहीं है, ईश्वर ने अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 को सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शक बना कर भेजा और आप पर अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन अवतरित किया जिसका संदेश सम्पूर्ण मानव जाति के लिए है । उनके समान धरती ने न किसी को देखा न देख सकती है। वही कल्कि अवतार हैं जिनकी हिन्दु समाज में आज प्रतीक्षा हो रही है।

Wednesday, September 16, 2009

रोज़ाः और मानव जीवन पर उसका प्रभाव

विज्ञान के इस आधुनिक युग में इस्लामी उपवास के विभिन्न आध्यात्मिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक लाभ सिद्ध किए गए हैं। जिन्हें संक्षिप्त में बयान किया जा रहा है।

आध्यात्मिक लाभः

(1) इस्लाम में रोजा का मूल उद्देश्य ईश्वरीय आज्ञापालन और ईश-भय है, इसके द्वारा एक व्यक्ति को इस योग्य बनाया जाता है कि उसका समस्त जीवन अल्लाह की इच्छानुसार व्यतीत हो। एक व्यक्ति सख्त भूक और प्यास की स्थिति में होता है, खाने पीने की प्रत्येक वस्तुयें उसके समक्ष होती हैं, एकांत में कुछ खा पी लेना अत्यंत सम्भव होता है, पर वह नहीं खाता पीता। क्यों ? इस लिए कि उसे अल्लाह की निगरानी पर दृढ़ विश्वास है। वह जानता है कि लोग तो नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो देख रहा है। इस प्रकार एक महीने में वह यह शिक्षा ग्रहण करता है कि सदैव ईश्वरीय आदेश का पालन करेगा और कदापि उसकी अवज्ञा न करेगा।

(2) रोज़ा ईश्वरीय उपकारों को याद दिलाता औऱ अल्लाह कि कृतज्ञता सिखाता है क्योंकि एक व्यक्ति जब निर्धारित समय तक खान-पान तथा पत्नी के साथ सम्बन्ध से रोक दिया जाता है जो उसकी सब से बड़ी इच्छा होती है फिर वही कुछ समय बाद मिलता है तो उसे पा कर वह अल्लाह ती प्रशंसा बजा लाता है।

(3) रोज़ा से कामवासना में भी कमी आती है। क्योंकि जब पेट भर जाता है तो कामवासना जाग उठता है परन्तु जब पेट खाली रहता है तो कामवासना कमज़ोर पड़ जाता है। इसका स्पष्टिकरण मुहम्मद सल्ल0 के उस प्रबोधन से होता है जिसमें आया है कि "हे नव-युवकों के समूह ! तुम में से जो कोई विवाह करने की शक्ति रखता हो उसे विवाह कर लेना चाहिए क्योंकि इसके द्वारा आँखें नीची रहती हैं और गुप्तांग की सुरक्षा होती है।"

(4) रोज़े से शैतान भी निदित और अपमानित होता है क्योंकि पेट भरने पर ही कामवासना उत्तेजित होता है फिर शैतान को पथभ्रष्ट करने का अवसर मिलता है। इसी लिए मुहम्मद सल्ल0 के एक प्रवचन में आया है "शैतान मनुष्य के शरीर में रक्त की भांति दौड़ता है। भूक (रोज़ा) के द्वारा उसकी दौड़ को तंग कर दो"।
शारीरिक लाभ

(1) मनुष्य के शरीर में मेदा एक ऐसा कोमल अंग है जिसकी सुरक्षा न की जाए तो उस से विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार रोज़ा मेदा के लिए उत्तम औषधि है क्योंकि एक मशीन यदि सदैव चलती रहे और कभी उसे बंद न किया जाए तो स्वभावतः किसी समय वह खराब हो जाएगी। उसी प्रकार मेदे को यदि खान-पान से विश्राम न दिया जाए तो उसका कार्यक्रम बिगड़ जाएगा।

(2) डाक्टरों का मत है कि रोज़ा रखने से आंतें दुरुस्त एंव मेदा साफ और शुद्ध हो जाता है। पेट जब खाली होता है तो उसमें पाए जाने वाले ज़हरीले किटानू स्वंय मर जाते हैं और पेट कीड़े तथा बेकार पदार्थ से शुद्ध हो जाता है।उसी प्रकार रोज़ा वज़न की अधिकता, पेट में चर्बी की ज्यादती, हाज़मे की खराबी(अपच), चीनी का रोग(DIABATES) बलड प्रेशर,गुर्दे का दर्द, जोड़ों का दर्द, बाझपन, हृदय रोग, स्मरण-शक्ति की कमी आदि के लिए अचूक वीण है।

डा0 एयह सेन का कहना हैः "फाक़ा का उत्तम रूप रोज़ा है जो इस्लामी ढ़ंग से मुसलमानों में रखा जाता है।मैं सुझाव दूंगा कि जब खाना छोड़ना हो तो लोग रोज़ा रख लिया करें।"इसी प्रकार एक इसाई चिकित्सक रिचार्ड कहता हैः "जिस व्यक्ति को फाक़ा करने की आवश्यकता हो वह अधिक से अधिक रोज़ा रखे। मैं अपने इसाई भाइयों से कहूंगा कि इस सम्बन्ध में वह मुसलमानों का अनुसरण करें। उनके रोज़ा रखने का नियम अति उत्तम है।" (इस्लाम और मेडिकल साइंस 7) तात्पर्य यह कि उपवास एक महत्वपूर्ण इबादत होने के साथ साथ शारीरिक व्यायाम भी है। सत्य कहा अन्तिम ईश्दूत मुहम्मद सल्ल0 नेः "रोजा रखो निरोग रहोगे"
नैतिक लाभः

रोजा एक व्यक्ति में उत्तम आचरण, अच्छा व्यवहार, तथा स्वच्छ गुण पैदा करता है, कंजूसी,घमंड,क्रोध जैसी बुरी आदतों से मुक्ति दिलाता है। इनसान में धैर्य, सहनशीलता और निःस्वार्थ भाव को जन्म देता है। जब वह भूक की पीड़न का अनुभव करता है तो उसके हृदय में उन लोगों के प्रति दया-भाव उभरने लगता है जो प्रतिदिन अथवा सप्ताह या महीने में इस प्रकार की पीड़नाओं में ग्रस्त होते हैं। इस प्रकार उसमें बिना किसी स्वार्थ और भौतिक लाभ के निर्थनों तथा ज़रूरतमंदों के प्रति सहानुभूति की भावना जन्म लेती है, और उसे पूर्ण रूप में निर्धनों की आवश्यकताओं का अनुभव हो जाता है।

सामाजिक लाभः

रोजा का सामाजिक जीवन पर भी बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।

(1) वर्ष के विशेष महीने में प्रत्येक मुसलमानों का निर्धारित समय तक रोज़ा रखना, फिर निर्धारित समय तक खाते पीते रहना, चाहे धनवान हों या निर्धन समाज को समानता एवं बंधुत्व के सुत्र में बाँधता है।

(2) धनवान जब भूख एवं प्यास का अनुभव करके निर्धनों की सहायता करते हैं तो उन दोंनों में परस्पर प्रेम एवं मुहब्बत की भावनायें जन्म लेती हैं और समाज शत्रुता, घृणा और स्वार्थ आदि रोगों से पवित्र हो जाता है, क्योंकि सामान्यतः निर्धनों की सहायता न होने के कारण ही चोरी एवं डकैती जैसी घटनाएं होती हैं। सारांश यह कि रोज़ा से समानता, भाईचारा तथा प्रेम का वातावरण बनता है। समुदाय में अनुशासन और एकता पैदा होता है। लोगों में दानशीलता, सहानुभूति और एक दूसरों पर उपकार करने की भावनायें उत्पन्न होती हैं।

मानसिक लाभः

रोजा में एक व्यक्ति को शुद्ध एवं शान्ति-पूर्ण जीवन मिलता है। उसका मस्तिष्क सुस्पष्ट हो जाता है। उसके हृदय में विशालता आ जाती है। फिर शरीर के हल्का होने से बुद्धि विवेक जागृत होती है। स्मरण-शक्ति तेज़ होती है। फलस्वरूप एक व्यक्ति के लिए कठिन से कठिन कामों को भलि-भांति कर लेना अत्यंत सरल होता है।

Sunday, September 13, 2009

दो जगत की यात्रा

आज हम सब अपने मन एवं मस्तिष्क में दो जगत की यात्रा करेंगे और वहाँ जो चीज़ें हैं उन्हें देखने के बाद हम निर्णय लेंगे कि हम किस जगत में रहना पसंद करेंगे।
प्रथम जगतः जिसकी धरती मुश्क और ज़ाफरान की है। वहाँ बड़े बड़े भवन हैं जिन्हें सोने और चाँदी की ईंटों से बनाया गया है। वहाँ चार नहरें हैं साफ जल की, शुद्ध दूध की,नशा से खाली शराब की, और शुद्ध शहद की। वहाँ बागीचे भी हैं जिसमें बड़े बड़े वृक्ष हैं जिसकी जड़ें सोने की हैं। वहाँ खान-पान की चीज़ें भी हैं जिसे छोटे छोटे सुन्दर बच्चे पेश कर रहे हैं। विभिन्न प्रकार के फल तथा चिड़ियों के गुश्त भी हैं। प्याले भी सोन और चाँदी के हैं। वहाँ चाँद जैसी रूप की महिलायें सोने और रेशम से बने कपड़े पहने सेवा के लिए उपस्थित हैं। मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में आता है कि " वहाँ की एक महिला यदि धरती वालों की ओर झाँक दे तो धरती और आकाश के बीच की सारी चीज़ों को प्रकाशमान कर दे और अपनी खुशबू से भर दे। तथा उनके सर का दो पट्टा दुनिया और उसमें जो कुछ भी है उस से बिहतर है।" (बुखारी)
जी हाँ! यही वह स्थान है जिसके सम्बन्ध में कहा गया कि वहाँ ऐसी ऐसी नेमतें हैं जिन्हें किसी आँख ने देखा नहीं, न किसी कान ने सुना है, और न ही किसी दिल में उनका ख्याल गुज़रा है।
दूसरा जगतः जिसकी धरती आग से दहक रही है, वह आग भी ऐसी है जो दुनिया की आग की तुलना में सत्तर गुना ज्यादा है। वहाँ के निवासी आग की पोशाक पहने हुए हैं। उनके सरों पर खौलता हुआ पानी ऊंडेला जा रहा है। वह चींख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। आँखें खून के आँसू बहा रही हैं। नबी सल्ल0 ने फरमायाः "नरकवासी इतना रोएगें कि यदि उनके आँसूओं में नाव चलाया जाए तो चल पड़े। और वह आँसू की जगह खून रोएंगे।" (हाकिम) जब भूक और प्यास से तड़पने लगेंगे और खाना माँगेंगे तो उनके मुंह में उनके शरीरों से बहने वाले पीप जो आग में जोश मार रहे होंगे उनके मुंह में डाल दिए जाएंगे जिससे उनके पेट की सारी अंतरियाँ पाएखाने के रास्ते से बाहर आ जाएंगी। और काँटेदार खाना "ज़क्क़ुम" भी मुंह में डाल दिया जाएगा। जिसके सम्बन्ध में हदीस में बताया गया है " यदि ज़क्क़ुम का एक कतरा धरतीवसियों की ओर गिरा दिया जाए तो वह सारी दुनिया वालों के खान-पान की सामग्रियों को नष्ट भर्ष्ट कर दे, तो फिर उसकी क्या स्थिति होगी जिसको इसे खाना होगा।" (तिर्मिज़ी)
यही वह तथ्य था जिसके कारण हमारे प्यारे नबी मुहम्मद सल्ल0 ने फरमायाः " उस ज़ात की क़सम जिसके कब्ज़े में मेरी जान है यदि तुम वह जानते जिसे मैं जानता हूं तो रोते ज्यादा और हंसते कम"
अन्तिम बातः हमने दोनो जगत की यात्रा की। एक में आराम ही आराम है और दूसरे में परेशानी ही परेशानी है। अब हमें निर्णय लेना है कि हम किसमें जाना पसंद करेंगे। ज़ाहिर है हम में का हर व्यक्ति पहले जगत में जाना पसंद करेगा और दूसरे जगत से पनाह माँगेगा। पहले जगत का नाम जन्नत (स्वर्ग) है और दूसरे जगत का नाम जहन्नम (नरक) है। यदि हम जन्नत में जाने और जहन्नम से बचने के इच्छुक हैं तो हमें सदैव यह याद रखना होगा कि " जन्नत को तबियत पर सख्त गुज़रने वाली चीज़ों से ढ़ांप दिया गया है और जहन्नम को शहवतो (सहवास) से ढ़ाँप दिया गया है।" फिर हमें वह काम करने होंगे जो जन्नत में ले जाने का माध्यम हैं। तो लीजिए इनमें से कुछ माध्यम का ज्ञान प्राप्त कीजिए मुहम्मद सल्ल0 के निम्नलिखित बहुमूल्य प्रवचनों की रोशनी में
(1) " अल्लाह से डरो,पाँच समय की नमाज़ें पढ़ो, रमज़ान के रोजे रखो, अपने माल की ज़कात दो, और अपने हाकिम की इताअत करो तो अपने रब की जन्नत में चले जाओगे" (मुस्लिम)
(2) "जिसने रात और दिन में 12 रकअत (फर्ज़ नमाज़ों के अतिरिक्त) सुन्नत नमाज़ें पढ़ी अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत में घर बनाता है" (मुस्लिम)
(3) " ऐ लोगो !सलाम को फैलाओ, (निर्धनों को ) खाना खिलाओ, रिश्तेदारों की सहायता (सिला रहमी) करो, जब लोग सो रहे हों तो नमाज़ पढ़ो जन्नत में शान्ति के साथ दाखिल हो जाओगे।" (तिर्मिज़ी)
(4) " उस आदमी के नाम में मिट्टी लगे, उस आदमी के नाम में मिट्टी लगे, उस आदमी के नाम में मिट्टी लगे (अर्थात उसकी बर्बादी हो) जिसने अपने माता-पिता अथवा उनमें से किसी एक को बुढ़ापे में पाया और जन्नत में न दाखिल हो सका"। (मुस्लिम)

Saturday, September 12, 2009

८३ वर्ष ४ महिना से उत्तम रात

अभी हम रमज़ान के अन्तिम दशक से गुज़र रहे हैं। रमज़ान के अन्तिम दशक को नरक से मुक्ति का दशक कहा गया है। इस लिए इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा उपासनाओं और प्रार्थनाओं में व्यस्त रहना चाहिए। अल्लाह वाले इन दिनों की प्रतीक्षा बड़ी तड़प से करते थे। स्वयं अल्लाह के रसूल सल्ल0 इन दिनों जैसा कि उनकी पत्नी आइशा रजि0 बयान करती हैं "जब रमज़ान का अन्तिम दशक आरम्भ हो जाता तो नबी सल्ल0 इबादत के लिए कमर कस लेते, उन रातों को स्वयं भी रात भर जागते और अपने घर वालों को भी जगाए रखते।" (बुखारी, मुस्लिम)
अब प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों करते थे ? तो इसका उत्तर स्वयं अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने दिया हैः " इन दिनों में एक ऐसी रात आती है जो हज़ार महीनों (83 वर्ष 4महीने) से उत्तम है जो इस रात की भलाइयों से वंचित रहा वह हर प्रकार की सांसारिक एवं पारलौकिक भलाइयों से वंचित है"।
इस रात को "शबे कद्र" कहा जाता है। इस्लाम में यह रात बहुत महत्वपूर्ण है जिसकी चार विशेषतायें निम्न में बयान की जा रही हैं।
(1) शबेकद्र हजार महीनों से बिहतर है। हजार महीनों की मात्रा 83 वर्ष 4 महीने से होती है जो एक लम्बी आयु पाने वाले इनसान की मुद्दत है। यदि एक व्यक्ति 83 वर्ष चार महीना तक इबादत करता रहा और आपने केवल इस रात में इबादत की तो आपकी इबादत उस व्यक्ति की इबादत से उत्तम और बिहतर है। इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह कितनी महान रात्री है।
(2) इसी रात में अल्लाह ने सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शक हेतु अन्तिम ग्रन्थ कुरआन को अवतरित किया जो किसी विशेष जाति अथवा धर्म के लिए नहीं है बल्कि सारे संसार के लोगों के लिए है। इसी लिए गैर-मुस्लिम भाइयों को भी चाहिए कि वह इस रात के महत्व को जानें क्योंकि यह महत्व उनके अल्लाह और उनके अन्तिम अवतार मुहम्मद सल्ल0 की ओर से है।
(3) इस रात की तीसरी विशेषता यह है कि इस रात में पूरे वर्ष इनसानों को जो कुछ मिलने वाला है उसका फैसला होता है।
(4) इस रात में अल्लाह की बर्कतें और रहमतें उतरती हैं इसी लिए जिब्रील और फरिश्ते इस रात ज़मीन पर अवतरित होते हैं।
एक संदेह का निवारणः
एक सज्जन ने मुझ से कहा कि जनाब जब एक रात की इबादत 83 वर्ष चार महीने की इबादत से उत्तम है तो हम एक ही रात इबादत कर लेंगे तो क्या यह सम्पूर्ण जीवन के लिए काफी नहीं, बल्कि ज्यादा ही हुई क्योंकि सब लोगों को तो 83 वर्ष इबादत करने का अवसर प्राप्त भी नहीं होता है ?
मैंने कहाः भाई जान! आपका फल्सफा तो बहुत अच्छा है पर इस्लामी नियमानुसार नहीं। हम सब अल्लाह के दास हैं और दास का काम है सेवा करना और इसी उद्देश्य के अन्तर्गत हमें इस संसार में बसाया गया है, यह संसार परीक्षा-स्थल है परिणाम-स्थल नहीं । स्वयं अल्लाह पाक ने हम पर दिन और रात में पाँच समय की नमाज़ अनिवार्य की है। इसी लिए कुरआन में कहा गया "अल्लाह की इबादत करते रहो यहां तक कि मौत आ जाए "
फिर मैंने कहा कि अब आप पुछ सकते हैं कि इतने पुन्य जो दिए गए हैं क्या इसका कोई तात्पर्य है ? तो इसका उत्तर यह है किः अल्लाह पाक ने मुहम्मद सल्ल0 की समुदाय को सब से उत्तम समुदाय बनाया है और यह समुदाय जन्नत (स्वर्ग) में भी सब से पहले प्रवेश करेगी। जबकि उनकी आयु साठ से सत्तर वर्ष तक रखी गई है "मेरी उम्मत की आयु साठ से सत्तर वर्ष के बीच है" जबकि पहले नबियों और उनकी कौमों की उमरें हज़ार हज़ार वर्ष की होती थीं स्वयं हजरत नूह अलै0 ने अपनी क़ौम को साढ़े नौ सौ वर्ष तक एकेश्वरवाद की ओर बुलाते रहे। जाहिर है कि जब उनकी इतनी लम्बी उमरें थीं तो इनमें उन्होंने अल्लाह की इबादत भी किया होगा फिर भी यह उम्मत अफ्ज़ल कैसे हो जाती और कैसे सब से पहले स्वर्ग में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्त करती? इसका तरीक़ा इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं था कि इस अम्मत को नेकियों के ऐसे ही मोसम दिए जाएं जिन में वह ज्यादा से ज्यादा नेकियाँ कमा कर पहली उम्मतों पर बाज़ी ले जाएं।
इसी से आप अनुमान लगा सकते हैं कि हमारा मुहम्मद सल्ल0 की उम्मत में पैदा होना कितने गर्व की बात है। क्योंकि आप तो सम्पूर्ण संसार के मार्गदर्शक बना कर भजे गए।
यह रात कब होती है? इस रात को अल्लाह पाक ने अपनी हिकमत से छुपा दिया है परन्तु इतना अवश्य बयान कर दिया गया कि इसे अन्तिम दशक की विषम रातों (21,23,25,27,29) में खोजा जाए। तिर्मिज़ी की रिवायत के अनुसार अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने फरमायाः " रमज़ान के अन्तिम दस दिनों की विषम (ताक़) रातों में शबे-क़द्र की खोज करो"।
इन रातों में क्या पढ़ा जाए ?
अल्लाह के रसूल सल्ल0 की पत्नी हज़रत आइशा रजि0 ने एक बार आप से पूछा था कि जब हम इस रात को पाएं तो इसमें क्या प्रार्थना करें तो आपने फरमाया थाः यह दुआ किया करो " अल्लाहुम्म इन्नक अफुव्वुन तोहिब्बुल अफ़व फअफु अन्नी।" "हे अल्लाह ! तू क्षमा करने वाला है और क्षमा करने को पसंद करता है। अतः तू मेरे पापों को क्षमा कर दे"।

प्रवचन

अल्लाह के अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्ल0 ने फरमायाः जहाँ कहीं भी रहो अल्लाह से डरते रहो, गुनाहों के बाद नेकियाँ कर लो, नेकियाँ गुनाहों को मिटा देंगीं, और लोगों के साथ अच्छे आचरण से पेश आओ। (तिर्मिज़ी, रावीः हज़रत अबूज़र और हज़रत मुआज़ बिन जबल रजि0)
यह मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों में से एक महान प्रवचन (हदीस) है, जिसके शब्द कम हैं परन्तु अर्थ अत्यधिक हैं, प्यारे नबी सल्ल0 ने इसमें लौकिक तथा पारलौकिक सारी भलाइयों को एकत्र कर दिया है। इसमें मात्र तीन शब्दों में तीन मूल सम्बन्धों को बयान कर दिया गया है।
1. अल्लाह के साथ तेरा सम्बन्ध कैसा हो ?
2. अपने नफ्स के साथ तेरा सम्बन्ध कैसा हो ?
3. आम जनता के साथ तेरा सम्बन्ध कैसा हो ?
अल्लाह के साथ सम्बन्धः इस बिन्दू की स्पष्टता हदीस के पहले शब्द से होती है। जहाँ कहीं भी रहो अल्लाह से डरते रहो,घर में हो या घर से बाहर, एकांत में हो या साथियों के साथ,रात में हो या दिन में हर समय और हर जगह अल्लाह का डर दिल में बसाए रहो। क्योंकि अल्लाह तुझे देख रहा है। उसकी निगाह से किसी पल तुम ओझल नहीं हो सकते।
जब यह आस्था एक व्यक्ति के दिल में पैदा हो जाती है कि अल्लाह हर समय हमें देख रहा है तो उसका पूरा जीवन सुधर कर रह जाता है।वह जहाँ भी होता है अल्लाह की अवज्ञा नहीं करता, बन्द कमरे में भी होता है तो उसके मन मस्तिष्क में यह बात घूमती होती है कि यधपि यहाँ हमें लोग नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो यहां भी देख रहा है।
एक बार इस्लाम के ख़लीफ़ा उमर रजि0 अपने शासन में जनता की देख-भाल के लिए एक रात निकले, जब थक गए तो एक दीवार के सहारे बेठ कर विश्राम करने लगे। इसी बीच एक महिला ने घर के अन्दर से अपनी बच्ची को आवाज़ दिया किः बेटी उठो और दूध में पानी मिला दो ताकि बेचते समय दुध कुछ ज्यादा हो जाए।बेटी ने कहाः अम्मी जान उमर (बादशाह) के आदमी ने यह घोषना की है कि बेचने के लिए दूध में पानी न मिलाया जाए। माँ ने कहाः बेटी अभी तुम ऐसी जगह पर है जहाँ न उमर देख रहे हैं और न उनके आदमी। बेटी ने कहाः माँ उमर नहीं देख रहे हैं तो अल्लाह तो देख रहा है।
तात्पर्य यह कि इस हदीस में यह आदेश दिया गया है कि एक व्यक्ति को चाहिए कि वह हर समय अल्लाह का निगरानी को अपने ऊपर बसाए रहे, और यही रोज़े का भी सार है अल्लाह ने फरमायाः ऐ ईमान वालो तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए हैं जैसा कि तुम से पूर्व लोगों पर अनिवार्य किए गए थे ताकि तुम्हारे अन्दर तक्वा(अल्लाह का डर) पैदा हो गाए।
तक्वा की परिभाषा करते हुए हज़रत अली रजि0 फरमाते हैं अल्लाह का डर, इस्लामी शास्त्रानुसार अमल, कम पर संतुष्ठी, और मौत के दिन की तैयारी।
इस परिभाषा से ज्ञात हुआ कि मुत्तक़ी होने के लिए इन चार विशेषताओं का पाया जाना अनिवार्य है कि अल्लाह का भय ह्दय में समाया हुआ हो, शरीयत के अनुसार उसका पूरा अमल हो रहा हो, अल्लाह ने उसे जितना दे रखा है उस पर संतुष्ट हो,और मरने के दिन को हमेशा याद रखता हो।
हज़रत अबू हुरैरा रजि0 से किसी ने तक्वा की परिभाषा पूछा तो आपने फरमायाः क्या तुझे कभी काँटेदार रास्ते से गुज़रने का इत्तेफाक़ हुआ? उसने कहाः जी हाँ बहुत बार, आपने पूछाः वहाँ तुम कैसे गुज़रे? उन्हों ने कहा कि कपड़े को खूब समेट कर गुज़रा कि कहीं काँटे दामन से उलझ न जाएं। अबू हुरैरा रजि0 ने फरमायाः यही तक्वा है।
अपने नफ्स के साथ सम्बन्धः कुछ लोग यह समझ सकते हैं कि जो लोग अल्लाह का डर रखने वाले होते हैं उनसे गुनाह कभी होता ही नहीं। ऐसी सोच ग़लत है, इनसान है तो गलतियाँ हो ही सकती हैं, परन्तु एक मुत्तक़ी और पापी में अन्तर यह होता है कि मुत्तक़ी से जब ग़लती होती है तो वह तुरन्त पश्चाताप करता है, और अल्लाह से अपने पापों की क्षमा-याजना में लग जाता है जबकि पापी को अपने पाप की कोई चिंता नहीं होती। अतः जह एक व्यक्ति अपने पापों पर पछताते हुए तौबा कर लेता है तो अल्लाह तआला उसके गुनाहों का माफ कर देते हैं।
हदीस के दूसरे शब्द में यही बताया गया है कि जब गलतियाँ हो जाएं तो नेकी कर लो, नेकियाँ गलतियों को मिटा देंगीं। यह अल्लाह तआला की दया और कृपा है कि वह नेकियाँ करने से गुनाहों को मिटा देता है। बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस है एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल सल्ल0 के पास आया औऱ अर्ज़ कियाः ऐ अल्लाह के रसूलः मैं ने अवेध तरीक़े से आज एक महिला को बोसा ले लिया है। अल्लाह के रसूल सल्ल0 चुप रहे यहाँ तक कि यह आयत अवतरित हुईः (और दिन के दोनों किनारों में नमाज़ क़ाएम रख और रात की कई घड़ियाँ में भी, बेशक नेकियाँ बुराइयों को दूर कर देती हैं। यह नसीहत है नसीहत हासिल करने वालों के लिए।)
(सूरः हूद 114)
जब यह आयत उतरी तो अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने उस व्यक्ति को बुलाया और उसके सामने यह आयत पढ़ी। वहाँ पर उपस्थित एक दूसरे व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल क्या यह इसी के लिए खास है या यह हुक्म सब के लिए समान है ? आपने फरमायाः यह सारे लोगों के लिए सामान्य है।
सामान्य जनता के साथ सम्बन्धः
हदीस के तीसरे शब्द में आम जनता के साथ सम्बन्ध कैसा हो? इसको स्पष्ट किया गया है। इसी लिए फरमाया गया कि लोगों के साथ चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला हो, तथा किसी भी जाति से सम्बन्ध रखता हो अच्छा व्यवहार करो। अपने लिए जो पसंद करते हो वही दूसरों के लिए भी पसंद करो, हर एक व्यक्ति से ख़ूश-दिली के साथ मिलो,दूसरे कोई कष्ट पहुंचाएं तो उन्हें क्षमा कर दो, और स्वयं दूसरों को कष्ट मत पहुंचाओ।
आज दिलों को जीतने के नियमों पर विभिन्न पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं और उनकी बाज़ार में माँग बढ़ रही है केवल इस कारण कि यदि किसी को यह सलीक़ा आता है तो लोग उसे टूट कर चाहते हैं। उदाहरण स्वरूप यदि आप किसी से ख़ूश-दिली के साथ मिलते हैं और उच्च आचरण का व्यवहार करते हैं तो वह आपसे प्रेम करने लग जाता है और आपकी प्रसनन्नता के लाग अलापने लगता है। इस्लाम ने अपने मानने वालों को यह शिक्षा दिया कि तुम्हारा दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना इस कारण न होना चाहिए कि लोग तुम से प्रेम करें बल्कि इस लिए होना चाहिए कि इस से हमारा रब ख़ूश होगा, और हमें अपने से निकट करेगा। इसी लिए हदीस में बताया गया है कि एक व्यक्ति अपने अच्छे आचरण से रोज़ा रखने वाले और क़्याम (रात में नमाज़ पढ़ने वाले) करने वाले के पद पर आसीन हो जाता है। और जब आप सल्ल0 से पूछा गया कि वह कौन सी चीज़ है जो लोगों को जन्नत में ज्यादा दाखिल करती है? आपने फरमायाः अल्लाह का डर और अच्छा आचरण।

Thursday, September 10, 2009

मृत्यु से छुटकारा नहीं

कहते हैं कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के पास मौत का फरिश्ता आता रहता था। एक बार जब मौत का फरिश्ता आया तो उनके सामने एक आदमी बैठा बातें कर रहा था जिसे मौत के फरिश्ते ने घोड़ कर देखा। जिससे उस आदमी को भय हुआ। उसके जाने के बाद उसने सुलैमान अलैहिस्सलाम से पूछाः यह कौन साहिब थे ? सुलैमान अलैहिस्सलाम ने बताया कि यह मौत के फरिश्ता थे। इतना सुनना था कि वह भय से काँपने लगा, उसने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम से अनुरोध किया कि आप हवा को आदेश दें कि वह हमें भारत के किसी कोने में पहुंचा दे। अतः सुलैमान अलैहिस्सलाम ने ऐसा ही किया। जब कल हो कर मौत का फरिश्ता हजरत सुलैमान अलैहिस्सलाम के पास आया तो आपने उस व्यक्ति के सम्बन्ध में बताया कि उसने मौत के भय से हम से अनुरोध किया कि उसे भारत के किसी कोने में पहुंचा दिया जाए। फरिश्ते ने कहा कि जिस समय मैं आप से बात किया था उसी समय मैंने उसकी रूह (आत्मा) भारत में जा कर निकाली थी।
जी हाँ! इनसान की मृत्यु कब होगी ? और कहां होगी ? इसका ज्ञान अल्लाह के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं जानता। उस आदमी ने सोचा था कि वह भारत के किसी खाड़ी में पहुंचा दिया जाएगा तो मौत से बच जाएगा। परन्तु सत्य यह है कि इनसान कितनी भी तदबीर कर ले मौत से भाग नहीं सकता। हम जहां भी जाएं वहाँ भी मौत आ कर रहेगी। इसी लिए कुरआन में कहा गया है "तुम जहाँ कहीं भी रहोगे मौत तुझे आकर रहेगी"। और सूरः लुकमान में अल्लाह ने फरमायाः "कोई इनसान नहीं जानता कि वह किस धरती पर मरेगा"।
जब बात यह ठहरी तो हमें निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण उपदेशों को सदैव अपने सामने रखना चाहिए क्योंकि मरने के बाद यही तीन चीज़े हमें काम आ सकती हैं।
(1) सदक़ए जारिया (जारी रहने वाला दान) उदाहरणस्वरूप पानी का क़ुवाँ खोदवा देना, धार्मिक स्थल बना देना, मस्जिद बना देना अच्छी पुस्तक खरीद कर दान कर देना आदि। इस लिए जो कुछ आपके पास है उसमें से अवश्य खर्च करें चाहे एक रुपया ही सही क्योंकि अल्लाह की दृष्टि में मात्रा का महत्व नहीं बल्कि दिली कैफियत का एतबार है। नेक दिली से खर्च किया गया एक रूपया लाखों रूपयों पर भारी पड़ जाता है। यदि एक व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है तो उसे भी अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने दान करने का तरीक़ा बता दिया है, आप ने फरमायाः "तुम्हारा अपने भाई से हंसी ख़ूशी मिलना भी दान है"।
(2) इस्लामी ज्ञान प्राप्त करना और दूसरों को इस्लाम का ज्ञान देना।
(3) अपने बच्चों की दीनी तर्बियत करना।

क्योंकि यह तीनों वह माध्यम हैं जिनके द्वारा हमें मरने के पश्चात भी पुन्य मिलता रहेगा। अल्लाह के रसूल सल्ल0 ने फरमायाः जब आदमी मर जाता है तो संसार से उसका सम्बन्ध कट जाता है मात्र तीन चीज़ें बाक़ी रहती हैं सदकए जारिया,दीनी इल्म जिस से फायदा उठाया जाता हो, या नेक लड़का जो उसके लिए दुआ करे। (मुस्लिम)