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Sunday, March 28, 2010

क्या सूद का कारोबार करने वाले को ज़कात का माल देना वैध है ?

हमारी अन्जुमन में आप लोग पिछले दिनों आपने जाना कि: 

समलैंगिकता (Homosexuality/Lesbianism) को इस्लाम में हराम (वर्जित) क्यूँ समझा जाता है?
मैं सुअर के मांस के निषिध होने का कारण जानना चाहता हूँ! Why Pork is Prohibited
मुसलमानों को कुत्ता रखने, उसे छूने और उसे चूमने के बारे में क्या हुक्म है?


और इसी श्रृंखला को आगे बढाते हुए हम आज जानेंगे कि:



क्या सूद का कारोबार करने वाले को ज़कात का माल देना वैध है ?


अथवा क्या धन के ज़कात को क्रेडिट कार्ड के ऋण का भुगतान करने में देना जाइज़ है ?

ऐसे "क्रेडिट कार्ड" से लेन देन करना जो ऋण का भुगतान करने में देरी करने की अवस्था में आर्थिक जुर्माना लगाने पर आधारित हो हराम (वर्जित) है, क्योंकि यह एक हराम सूद पर आधारित शर्त है


ज़कात के हक़दार लोगों में से जिनका उल्लेख अल्लाह तआला ने अपनी किताब में किया है उन में से एक "अल-ग़ारेमीन" हैं, अर्थात क़र्ज़दार (ऋणी) लोग, अत: जिस व्यक्ति ने अपनी आवश्यकता को पूरी करने और अपने हित को साकार करने के लिए उधार (ऋण) लिया, फिर ऋण को चुकाने में विफल रहा, तो उसे ज़कात के पैसे से इतनी राशि दी जायेगी जिस से वह अपने क़र्ज़ का भुगतान कर सके, और इतनी मात्रा में दिया जायेगा जिस का भुगतान करने में वह असक्षम रहा है।

तथा क़र्ज़ में डूबे हुये व्यक्ति को ज़कात का पैसा देने के लिए यह शर्त है कि :

उस का क़र्ज़ किसी पाप के काम में न हो, अत: जो व्यक्ति किसी पाप में क़र्ज़दार हो गया है जैसेकि शराब, जुआ, सूदखोरी, तो उसे ज़कात के पैसे से देना वैध नहीं है। हाँ, अगर वह उस पाप से तौबा कर ले, उस को तुरन्त त्याग कर दे और उस पर पछतावा करे, और इस बात का पक्का संकल्प करे कि पुन: उस पाप को नहीं करेगा ; तो ऐसी स्थिति में उसे ज़कात का पैसा देने और तौबा करने पर उस की मदद करने में कोई आपत्ति नहीं है

अल्लामा मर्दावी कहते हैं : "यदि वह किसी अवज्ञा (गुनाह के काम) में क़र्ज़ दार हुआ है तो बिना किसी मतभेद के उसे ज़कात के माल से नहीं दिया जायेगा।" (किताब "अल इंसाफ" 3/247)

और अल्लामा शैकानी कहते हैं : "जहाँ तक उस के अन्दर यह शर्त लगाने का संबंध है कि वह पाप के काम में न हो तो यह सहीह है, क्योंकि ज़कात को अल्लाह सुब्हानहु व तआला की अवज्ञा के कामों में नहीं दिया जायेगा, और न ही उन कामों में दिया जायेगा जिन के द्वारा सर्वशक्तिमान अल्लाह की हुर्मतों का उल्लंघन करने पर शक्ति प्राप्त की जाती है।" (किताब "अस्सैलुल जर्रार" 2/59).

और चूंकि "क्रेडिट कार्ड" के द्वारा क़र्ज़ लेना हराम (निषिद्ध) है, इसलिए उस के ऋण को ज़कात के पैसे से चुकाना जाइज़ नहीं है। हाँ, यदि वह इस से तौबा कर ले, उस पर पछतावा करे और इस पाप की ओर दुबारा न लौटने का पक्का संकल्प कर ले, तो ऐसी स्थिति में उसे अपने क़र्ज़ को चुकाने के लिए ज़कात के पैसे से दिया जा सकता है।

अल्लामा मर्दावी कहते हैं : "अगर वह इस से तौबा न करे, और उस पाप (अवज्ञा) पर अटल हो तो उसे क़र्ज़ दारों के हिस्से से देना जाइज़ नहीं है, क्योंकि उस के लिए अवज्ञा और पाप करना निषिद्ध है, इसलिए गुनाह के काम में उसके ऋण को उठा कर उस पर उसकी सहायता नही की जाये गी।" (किताब "अल-ह़ावी" 8/508)

शैख मुहम्मद बिन उसैमीन रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

"प्रश्न : जो आदमी किसी हराम चीज़ के अन्दर क़र्ज दार हो गया है, तो क्या हम उसे ज़कात का पैसा दे सकते हैं ?
उत्तर : अगर वह उस (हराम) काम से तौबा कर ले तो हम उसे देंगे, अन्यथा हम उसे ज़कात का पैसा नहीं देंगे, क्योंकि यह हराम काम पर मदद करना है, यही कारण है कि अगर हम उसे देंगे तो वह दुबारा ऋण लेगा।"
"अश्शर्हुल मुम्ते" (6/235)

तथा डॉ. सुलैमान अल अश्क़र कहते हैं : "जो आदमी सूद पर क़र्ज़ लेता है, तो उस के क़र्ज़ को ज़कात के अध्याय में क़र्ज़ दारों के हिस्से से नहीं दिया जायेगा, सिवाय इस के कि वह सूद के लेन देन से तौबा कर ले और उस से पलट आये।"

और अल्लाह तआला ही सब से श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है।


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Thursday, March 25, 2010

मुसलमानों को कुत्ता रखने, उसे छूने और उसे चूमने के बारे में क्या हुक्म है?

सवाल को कुछ इस तरह से भी कहा जा सकता है जैसे:  
कुत्ता रखना नापाकियों में से समझा जाता है, किन्तु यदि मुसलमान केवल घर की रखावाली के लिए कोई कुत्ता रखे, और उसे घर के बाहर रखे और उसके परिसर के अंतिम भाग में किसी जगह रखे, तो वह अपने आप को किस प्रकार पाक (पवित्र) रखेगा ? और जब वह अपने आप को साफ-सुथरा रखने के लिए मिट्टी (धूल) या कीचड़ न पाये तो इस का क्या हुक्म है ? और क्या मुसलमान के लिए अपने आप को पाक साफ रखने के लिये कोई विकल्प उपलब्ध है ? और कभी कभार वह आदमी दौड़ने के लिए कुत्ते को अपने साथ लेकर जाता है, और उसे थपकता और चूमता है ... 
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हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :
पवित्र इस्लामी शरीअत (धर्म शास्त्र) ने कुत्ता रखना मुसलमान पर हराम (निषिद्ध) कर दिया है, और इस का उल्लंघन करने वाले को इस प्रकार दंडित किया है कि प्रत्येक दिन उसकी नेकियों में से एक क़ीरात या दो क़ीरात की कमी कर दी जाती है, किन्तु इस दण्ड से वह कुत्ता अलग कर दिया है जिसे शिकार के लिए, या मवेशियों की रखवाली के लिए या खेती (फसल) की रखवाली के लिए रखा जाता है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस ने मवेशियों, या शिकार, या खेती के कुत्ते के अलावा कोई कुत्ता रखा, उसके अज्र (पुण्य) से हर दिन एक क़ीरात कम कर दिया जाता है।" (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है हदीस संख्या : 1575).

तथा अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि उन्हों ने कहा कि अल्ला के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस आदमी ने पशुधन की रक्षा के लिए, या शिकार के अलावा कोई कुत्ता रखा उसके अमल से हर दिन दो क़ीरात कम कर दिया जायेगा।" (बुखारी हदीस संख्या : 5163, मुस्लिम : 1574).

क्या घर की रखवाली के लिए कुत्ता रखना जाइज़ है ?

इमाम नववी कहते हैं :
"ऊपर उल्लिखित तीन कामों के अलावा किसी और उद्देश्य जैसे कि घरों और रास्तों की रक्षा के लिए कुत्ता रखने के जाइज़ होने के बारे में मतभेद है, और राजेह (उचित) बात यह है कि हदीस से समझी जाने वाली इल्लत (कारण) अर्थात् ज़रूरत पर अमल करते हुये और उपर्युक्त तीनों चीज़ों पर क़ियास करते हुये वह जाइज़ है।"

"शरह सहीह मुस्लिम" (10/236)

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"इस आधार पर जो घर शहर के बीच में है उस की चौकीदारी के लिए कुत्ता रखना जाइज़ नहीं है, अत: इस तरह की स्थितियों में इस उद्देश्य के लिए कुत्ता रखना हराम है वैध नहीं है, और उसके रखने वाले के अज्र व सवाब से प्रति दिन एक या दो क़ीरात कम कर दिया जायेगा। इसलिए उन लोगों पर अनिवार्य है कि वे इस कुत्ते को भगा दें और उसे अपने पास न रखें। किन्तु अगर यह घर बाहर एकांत मैदान में है, उस के आस पास कोई नहीं है तो उस के लिए घर की चौकीदारी और उस में रहने वालों की रखवाली के लिए कुत्ता रखना जाइज़ है, तथा घर वालों की रखवाली और रक्षा करना पशुधन और खेती की रक्षा करने से अधिक महत्वपूर्ण है।" (मज्मूअ़ फतावा इब्ने उसैमीन 4/246)

शब्द "अल-क़ीरात" (अर्थात् एक क़ीरात) और शब्द "अल-क़ीरातैन" (अर्थात् दो क़ीरात) की हदीस के बीच मिलान के बारे में कई कथन हैं :

हाफिज़ ऐनी रहिमहुल्लाह कहते हैं :

1- ऐसा भी हो सकता है कि यह दोनों दो प्रकार के कुत्तों के बारे में हों, जिन में से एक दूसरे से अधिक हानिकारक हो।
2- एक कथन यह है कि : दो क़ीरात शहरों और गांवों के बारे में है, और एक क़ीरात दीहात के बारे में है।
3- एक कथन यह है कि : यह दोनों रिवायतें दो ज़मानों (समय) के बारे में हैं, पहले एक क़ीरात का उल्लेख किया गया, फिर सख्ती को बढ़ाते हुये दो क़ीरात कर दिया गया।
"उमदतुल क़ारी" (12/158)

दूसरा :

प्रश्न करने वाले का यह कहना कि "कुत्ता रखना नापाकियों में से समझा जाता है" तो यह सामान्य रूप् से सहीह नहीं है, क्योंकि नापाकी (अशुद्धता) स्वयं कुत्ते में नहीं है बल्कि उस के थूक (लार) में है जब वह किसी बर्तन से पानी पीता है, अत: जिस ने किसी कुत्ते को छू लिया, या उसे कुत्ते ने छू लिया तो उस के लिए अपने आप को पानी या मिट्टी से पवित्र करना अनिवार्य नहीं है, अगर कुत्ता किसी बर्तन से पानी पी ले तो उस पर पानी को फेंक (उंडेल) देना और उसे सात बार पानी से और आठवीं बार मिट्टी से धोना अनिवार्य है यदि वह उस बर्तन को इस्तेमाल करना चाहता है, अगर उस ने उस बर्तन को कुत्ते के लिए विशिष्ट कर दिया है तो उस के लिए उसे पवित्र करना आवश्यक नहीं है

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "तुम में से किसी व्यक्ति के बर्तन की पाकी (शुद्धता) जब कि कुत्ता उस में मुँह डाल दे, यह है कि वह उसे सात बार धोये उन में से पहली बार मिट्टी के द्वारा हो।" (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है हदीस संख्या : 279)

और मुस्लिम की एक रिवायत (हदीस संख्या : 280) के शब्द यह हैं कि : "जब कुत्ता बर्तन में मुँह डाल दे तो उसे सात बार धुलो, और आठवीं बार उसे मिट्टी से साफ करो।"

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"कुत्ते के बारे में विद्वानों ने तीन कथनों पर मतभेद किया है :

पहला : वह पवित्र है यहाँ तक कि उस का थूक (लार) भी पाक है, यह इमाम मालिक का मत है।

दूसरा : वह अशुद्ध (नापाक) है यहाँ तक कि उसका बाल भी अपवित्र है, यह इमाम शाफेई का मत है, और एक रिवायत के अनुसार इमाम अहमद का भी यही कथन है।

तीसरा : उस का बाल पाक है, और उस का थूक (लार) अशुद्ध (नापाक) है, यह इमाम अबू हनीफा का मत है और एक रिवायत के अनुसार इमाम अहमद का भी यही कथन है।

और यही सब से शुद्ध कथन है, अत: जब कपड़े या शरीर पर उस के बाल की नमी (गीलापन) लग जाये तो वह इस से नापाक नहीं होगा।"
"मजमूउल फतावा" (21/530).

तथा एक दूसरे स्थान पर फरमाया :

"इसका कारण यह है कि वस्तुओं में असल पवित्रता का होना है, इसलिए किसी चीज़ को अशुद्ध (नापाक) और निषिद्ध ठहराना वैध नहीं है जब तक कि कोई सबूत न हो, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :

"और उस (अल्लाह तआला) ने तुम्हारे लिए उन सभी चीज़ों की तफसील बयान कर दी है जो तुम पर हराम किया गया है।" (सूरतुल अनआम : 119)

तथा अल्लाह तआला का फरमान है : "और अल्लाह ऐसा नहीं करता कि किसी क़ौम को हिदायत देने के बाद भटका दे जब तक उन बातों को साफ-साफ न बता दे जिन से वे बचें।" (सूरतुत्तौबा : 115)

और जब ऐसी बात है तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "तुम में से किसी व्यक्ति के बर्तन की पाकी (शुद्धता) जब कि कुत्ता उस में मुँह डाल दे, यह है कि वह उसे सात बार धोये उन में से पहली बार मिट्टी के द्वारा हो।"
और एक दूसरी हदीस में है कि : "जब कुत्ता बर्तन में मुँह डाल दे तो उसे सात बार धुलो, और आठवीं बार उसे मिट्टी से साफ करो।"

सभी हदीसों में केवल बर्तन में मुँह डालने का उल्लेख किया गया है, उस के अन्य भागों का उल्लेख नहीं किया गया है, अत: उन्हें (अर्थात् अन्य भागों को) अपवित्र ठहराना मात्र क़ियास करना है ...

तथा यह बात भी है कि : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शिकार, तथा पशुधन और फसल की रखवाली के लिए कुत्ता रखने की अनुमति दी है, और उसे रखने वाले को उसके बालों की नमी का लगना आवश्यक है जैसाकि खच्चर, गधे इत्यादि पशुओं की नमी उसे लग जाया करती है, इसलिए उसके बालों को अशुद्ध ठहराने की बात जबकि स्थिति यह है, उस हरज (तंगी) में से है जो इस उम्मत (समुदाय) से समाप्त कर दी गयी है।"
"मजमूउल फतावा" (21/617, 619)

सावधानी का पक्ष यह है कि : जिस ने इस हालत में कुत्ते को छुवा कि उसके हाथ में नमी थी, या कुत्ते के शरीर पर नमी थी तो वह उसे सात बारे धोये जिन में एक बार मिट्टी से होना चाहिये

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

"जहाँ तक इस कुत्ते को छूने का प्रश्न है तो अगर उस ने बिना नमी के छुआ है तो उस का हाथ नापाक नहीं होगा, और अगर नमी के साथ छुआ है तो इसके कारण अधिकांश विद्वानों के मतानुसार उसका हाथ नापाक हो जायेगा, और उसके बाद हाथ को सात बार धोना अनिवार्य है, जिस में एक बार मिट्टी से होना चाहिये।"
"मजमूअ़ फतावा इब्ने उसैमीन" (11/246)

तीसरा :
तथा अनिवार्य यह है कि कुत्ते की अशुद्धता को सात बार धोया जाये जिन में एक बार मिट्टी से होना चाहिए, और मिट्टी उपलब्ध होने की अवस्था में उसी को इस्तेमाल करना अनिवार्य है, और उसके अलावा कोई अन्य चीज़ पर्याप्त नहीं होगी, परन्तु जब मिट्टी न मिले, तो उस के अतिरिक्त अन्य डिटर्जेन्ट जैसे साबुन के इस्तेमाल करने में कोइ बात नहीं है।

चौथा :
प्रश्न करने वाले ने कुत्तों को चूमने की बात का जो उल्लेख किया है तो यह बहुत सारी बीमारियों का कारण है, और वो बीमारियाँ जो मनुष्य को कुत्तों को चूमने या उसके मुँह डाले हुये बर्तन से उस को पाक करने से पहले ही पी कर के शरीअत की अवहेलना करने के कारण लगती हैं, बहुत अधिक हैं।

उन्हीं में से एक "पास्चरलोसिस" का रोग है, वह एक जीवाणु का रोग है, जिस के रोग का कारण स्वभाविक रूप से मनुष्यों और पशुओं के ऊपरी श्वसन प्रणाली में मौजूद होता है, और विशेष परिस्थितियों के तहत यह जीवाणु शरीर पर आक्रमण करता है और रोग को जन्म देता है।

और उन्हीं में से एक "पानी की थैलियाँ" है, वह परजीवी रोगों में सै है जो मुष्यों और पशुओं के आंतरिक अंगों (आँतों) को प्रभावि करता है, और सब से अधिक जिगर और फेफड़ों को प्रभावित करता है, उसके बाद उदर गुहा और शरीर के बाक़ी अंगों को प्रभावित करता है।

इस बीमारी का कारण एक टेप कृमि (tapeworm) है जिसे एकायनिकोस क्रानिलेसिस कहा जाता है, यह एक छोटा कीड़ा है जिसके व्यस्क की लंबाई (2-9) मिमी होती है, जो तीन वर्गों और सिर और गर्दन से मिलकर बनता है और सिर में चार चूसक होते हैं

व्यस्क कीड़े उनके मेज़बानों जैसे कुत्तों, बिल्लियों, लोमड़ियों और भेड़ियों की आँतों में रहते हैं।

यह रोग कुत्तों को पालने के शौक़ीन मनुष्य को उस समय स्थानांतरित होता है जब वह उसे चुंबन करता है, या उसके बर्तन से पानी पीता है।

देखिये : किताब "अमराज़ुल हैवानातिल अलीफा अल्लती तुसीबुल इंसान" (पालतु पशु रोग जो मनुष्य को प्रभावित करते हैं) लेखक : डॉ. अली इसमाईल उबैद अस्सनाफी

सारांश:

यह कि शिकार या पशुधन और फसलों की रखवाली के अलावा के लिए कुत्तों को रखना जाइज़ नहीं है, तथा घरों की रखवाली के लिए कुत्तों को रखना इस शर्त पर जाइज़ है कि वे (घर) शहर से बाहर हों तथा यह शर्त भी कि (घर की रखवाली का) कोई अन्य साधन उपलब्ध न हो। और मुसलमान के लिए कुत्तों के साथ दौड़ने में ग़ैर-मुस्लिम की छवि अपनाना उचित नहीं है, तथा उस के मुँह को छूना और उसे चुंबन करना ढेर सारे रोगों का कारण है

इस पवित्र और परिपूर्ण शरीअत पर हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए है, जो कि लोगों के दीन और दुनिया (आध्यात्मिक और सांसारिक मामलों ) का सुधार करने के लिए आई है, किन्तु अधिकतर लोग जानते ही नहीं ।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ जानता है

मैं सुअर के मांस के निषिध होने का कारण जानना चाहता हूँ! Why Pork is Prohibited ?



हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह तआला के लिए योग्य है ।

मूल रूप से एक मुसलमान अल्लाह के आदेश का पालन करता है और उसकी मना की हुई बातों से बचाव करता है, चाहे उस चीज़ के अन्दर अल्लाह सुब्हानहु व तआला की हिकमत (तत्वदर्शिता) का उसे बोध हा या न हो।

मुसलमान के लिए वैध नहीं है कि वह शरीयत के आदेश को नकार दे, या उसको लागू करने में संकोच करे यदि उसे उसकी हिक्मत का बोध न हो, बल्कि किसी चीज़ के हलाल (वैध) और हराम (अवैध) ठहराये जाने के बारे में शरीयत के हुक्म को स्वीकार करना अनिवार्य है जब भी वह प्रमाण सिद्ध हो जाये ; चाहे उसे उसकी हिकमत की समझ हो या न हो। अल्लाह तआला का फरमान है :

"और (देखो) किसी मुसलमान मर्द और औरत को अल्लाह और उसके रसूल के फैसले के बाद अपनी किसी बात का कोई अधिकार बाक़ी नहीं रह जाता। (याद रखो!) अल्लाह तआला और उसके रसूल की जो भी नाफरमानी करेगा वह खुली गुमराही में पड़ेगा।" (सूरतुल अहज़ाब : 33)

तथा अल्लाह तआला का फरमान है :

"ईमान वालों का कहना तो यह है कि जब उन्हें इसलिए बुलाया जाता है कि अल्लाह और उसके रसूल उन में फैसला कर दें, तो वे कहते हैं कि हम ने सुना और मान लिया, यही लोग कामयाब होने वाले हैं।" (सूरतुन नूर : 51)

इस्लाम में सुअर का मांस क़ुर्आन के स्पष्ट प्रमाण के द्वारा हराम (निषिद्ध) किया गया है, और वह अल्लाह तआला का यह कथन है : 

"तुम पर मुर्दा, (बहा हुआ) खून और सुअर का मांस हराम है।" (सूरतुल बक़रा : 173)

किसी भी परिस्थिति में मुसलमान के लिए उसको खाना वैध नहीं है सिवाय इसके कि उसे ऐसी ज़रूरत पेश आ जाये जिस में उसका जीवन उसे खाने पर ही निर्भर करता हो, उदाहरण के तौर पर उसे ऐसी सख्त भूख लगी हो कि उसे अपनी जान जाने का भय हो, और उसके अतिरिक्त कोई दूसरा भोजन न हो, तो शरीयत के नियम : "आवश्यकतायें, अवैध चीज़ों को वैध बना देती हैं" के अंतर्गत उसके लिए यह वैध होगा

शरीयत के ग्रंथों में सुअर के मांस के हराम किए जाने के किसी विशिष्ट कारण का उल्लेख नहीं किया गया है, इस के बारे में केवल अल्लाह तआला का यह कथन है कि : "यह निश्चित रूप से गंदा -अशुद्ध और अपवित्र- है।"

"रिज्स" (अर्थात् अपवित्र) का शब्द उस चीज़ पर बोला जाता है जो शरीयत में तथा शुद्ध मानव प्रकृति वाले लोगों की निगाह में घृणित, घिनावनी और अशुद्ध हो। और मात्र यही कारण उस के हराम होने के लिए पर्याप्त है। इसी तरह एक सामान्य कारण भी वर्णित हुआ है, और वह खाने और पीने इत्यादि में हराम चीज़ों की निषिद्धता के बारे में वर्णित कारण है, और वह पोर्क के निषेद्ध की हिक्मत की ओर संकेत करता है, वह सामान्य कारण अल्लाह तआला का यह फरमान है :

"और वह (अर्थात् पैग़म्बर) पाक (शुद्ध) चीज़ों को हलाल (वैध) बताते हैं और नापाक (अशुद्ध) चीज़ों को हराम (अवैध) बताते हैं।" (सूरतुल आराफ : 157)

इस आयत का सामान्य अर्थ सुअर के मांस के निषिद्ध होने के कारण को भी सम्मिलत है, और इस से ज्ञात होता है कि पोर्क इस्लामी शरीयत के दृष्टिकोण में अशुद्ध और अपवित्र चीज़ों में से गिना जाता है।

इस स्थान पर "अपवित्र चीज़ों" (खबाइस) से अभिप्राय वह सब कुछ़ है जो मानव के स्वास्थ्य, धन और नैतिकता के लिए हानिकारक हो, अत: हर व चीज़ जिस का मानव जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं में से किसी एक पर भी नकारात्मक परिणाम और दुष्टप्रभाव हो वह अपवित्र (खबाइस) के अतंर्गत आता है।

वैज्ञानिक और चिकित्सा अनुसंधानों ने भी यह सिद्ध किया है कि सुअर, अन्य सभी जानवरों के बीच मानव शरीर के लिए हानिकारक रोगाणुओं का एक भण्डार है, इन हानिकारक तत्वों और रोगों का विस्तार लंबा है, संछिप्त रूप से वे इस प्रकार हैं : परजीवी रोग, जीवाणु रोग, वायरल रोग, बैक्टीरियल बीमारियां, और अन्य

ये और अन्य हानिकारक प्रभाव इस बात का प्रमाण हैं कि बुद्धिमान शास्त्रकार ने सुअर का मांस खाना किसी व्यापक हिक्मत के लिए ही हराम ठहराया है, और वह मानव के जान (स्वास्थ्य) की रक्षा है, जो कि इस्लामी शरीयत के द्वारा संरक्षित पाँच बुनियादी ज़रूरतों में से एक है।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है।