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Tuesday, April 20, 2010

भूकंपों की अधिकता के कारण: Saleem Khan

आज कल कई सारे देश जैसे कि : तुर्की, मेक्सिको, ताईवान, जापान, और अन्य देश ... भूकंप से ग्रस्त हुए हैं तो क्या ये किसी बात के संकेतक हैं ? आख़िर इस तरह के भूकंप की अधिकता की वजह क्या है??? 


हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है, तथा दया और शान्ति अवतरित हो अल्लाह के पैगंबर, आप के परिवार, आप के साथियों और आप के द्वारा निर्देषित मार्ग पर चलने वालों पर, अल्लाह की प्रशंसा और गुणगान के बाद :


सर्वशक्तिमान और पवित्र अल्लाह जो कुछ भी फैसला करता और मुक़द्दर करता है, उस में वह सर्वबुद्धिमान और सर्वज्ञानी है, जिस तरह कि उस ने जो कुछ धर्म संगत बनाया है और जिस का हुक्म दिया है उस में वह सर्वबुद्धिमान और सर्वज्ञानी है, और वह पवित्र अल्लाह जो भी निशानियाँ चाहता है पैदा करता और मुक़द्दर करता है ; ताकि बन्दों को डराये धमकाये, और उन के ऊपर अल्लाह का जो हक़ अनिवार्य है उन्हें उस का स्मरण कराये, और उन्हें अपने साथ शिर्क करने, और अपने आदेश का प्रतिरोध करने और अपने निषेद्ध को करने से सावधान करे, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है : "हम तो लोगों को केवल धमकाने के लिए निशानियाँ भेजते हैं।" (सूरतुल इस्रा : 59)
तथा सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फरमाया : "जल्द ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ दुनिया के किनारों में भी दिखायें गे और खुद उन के अपने वजूद में भी, यहाँ तक कि उन पर खुल जाये कि सच यही है। क्या आप के रब का हर चीज़ से अवगत होना काफी नहीं।" (सूरत फुस्सिलत : 53)

तथा अल्लाह तआला का फरमान है : "आप कह दीजिये कि वही तुम पर तुम्हारे ऊपर से कोई अज़ाब भेजने या तुम्हारे पैरों के नीचे से (अज़ाब) भेजने या तुम्हें अनेक गिरोह बनाकर आपस में लड़ाई का मज़ा चखाने की ताक़त रखता है।" (सूरतुल अंआम : 65)

तथा इमाम बुखारी ने अपनी सहीह में जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत करते हैं कि जब अल्लाह तआला का यह फरमान कि : "आप कह दीजिये कि वही तुम पर तुम्हारे ऊपर से कोई अज़ाब भेजने में सक्षम है" तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : (मैं तेरे चेहरे की शरण में आता हूँ।) "या तुम्हारे पैरों के नीचे से" तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : (मैं तेरे चेहरे की पनाह में आता हूँ।) (सहीह बुखारी 5/193)

तथा अबुश्शैख अल असबहानी ने इस आयत की तफसीर (व्याख्या) कि : "आप कह दीजिये कि वही तुम पर तुम्हारे ऊपर से कोई अज़ाब भेजने में सक्षम है" में मुजाहिद से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : चींख, पत्थर और तेज़ हवा (का अज़ाब)। या "तुम्हारे पैरों के नीचे से" मुजाहिद ने कहा : भूकंप और पृथ्वी का धंसा दिया जाना।

इस में कोई शक नहीं कि इन दिनों बहुत सारे छेत्रों में जो भूकंप आ रहे हैं वे उन निशानियों में से हैं जिन के द्वारा अल्लाह सुब्हानहु व तआला अपने बन्दों को डराता और धमकाता है, तथा इस जगत में जो भी भूकंप और प्राकृतिक आपदायें इत्यादि आती हैं जिन के द्वारा मानव को हानि पहुँचती है और उन के लिए कई प्रकार के कष्ट का कारण बनती है, सब के सब शिर्क और गुनाहों के कारण हैं, जैसाकि सर्वशक्तिमान अल्लाह का फरमान है : "और जो कुछ भी कष्ट तुम्हें पहुँचता है वह तुम्हारे अपने हाथों के करतूत का (बदला) है। और वह बहुत सी बातों को माफ कर देता है।" (सूरतुश्शूरा : 30)

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया : "आप को जो भलाई पहुँचती है वह अल्लाह तआला की तरफ से है और जो बुराई पहुँचती है वह स्वयं आप के अपनी तरफ से है।" (सूरतुन निसा : 79)

और अल्लाह तआला ने पिछले समुदायों के बारे में फरमाया : "फिर तो हम ने हर एक को उस के पाप की सज़ा में धर लिया, उन में से कुछ पर हम ने पत्थरों की बारिश की, उन में से कुछ को तेज़ चींख ने दबोच लिया, उन में से कुछ को हम ने धरती में धंसा दिया और उन में से कुछ को हम ने पानी में डुबो दिया। अल्लाह तआला ऐसा नहीं कि उन पर ज़ुल्म करे बल्कि वही लोग अपनी जानों पर जु़ल्म करते थे।" (सूरतुल अनकबूत : 40)

अत: मुकल्लफ (वह व्यक्ति जिस पर शरीअत के आदेश का पालन करना अनिवार्य हो गया हो) मुसलमानों और अन्य लोगों पर अनिवार्य है कि वे अल्लाह के सामने तौबा करें, उस के धर्म पर स्थिरता के साथ जम जायें, और जिस शिर्क और अवज्ञा से उस ने रोका है उस से बचाव करें, ताकि उन्हें दुनिया और आखिरत में सभी बुराईयों से मोक्ष और छुटकारा प्राप्त हो, और ताकि अल्लाह तआला उन से हर आपदा को हटा दे और उन्हें हर प्रकार की भलाई प्रदान करे, जैसाकि अल्लाह सुब्हानहु व तआला का फरमान है : "और यदि उन नगरों के निवासी ईमान ले आते तथा तक़्वा (संयम) अपनाते तो हम उन पर आकाश एवं धरती की बरकतें (विभूतियाँ) खोल देते, किन्तु उन्हों ने झुठलाया तो हम ने उनके (कु)कर्मो के कारण उन्हें पकड़ लिया।" (सूरतुल आराफ: 96)

तथा अल्लाह तआला ने अह्ले किताब (यहूदियों और ईसाईयों) के बारे में फरमाया : "और अगर वे तौरात और इंजील और उन धर्म शास्त्रों की पाबन्दी करते जो उन की तरफ उन के रब की ओर से उतारी गई है तो अपने ऊपर और पैरों के नीचे से खाते।" (सूरतुल माइदा : 66)

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया : "क्या फिर भी इन बस्तियों के निवासी इस बात से निश्चिन्त हो गए हैं कि उन पर हमारा प्रकोप रात के समय आ पड़े जिस समय वह नीन्द में हों। तथा क्या इन बस्तियों के निवासी इस बात से निश्चिन्त हो गये हैं कि उन पर हमारा प्रकोप दिन चढ़े आ पड़े जिस समय वह अपने खेलों में व्यस्त हों। क्या वह अल्लाह की पकड़ से निश्चिन्त (निर्भय) हो गये, सो अल्लाह की पकड़ से वही लोग निश्चिन्त होते हैं जो छति ग्रस्त (घाटा उठाने वाले) हैं।" (सूरतुल आराफ: 97-99)

अल्लामा इब्नुल क़ैयिम रहिमहुल्लाह फरमाते हैं : "कभी कभी अल्लाह सुब्हानहु व तआला धरती को सांस लेने की अनुमति देता है तो उस में बड़े बड़े भूकंप पैदा होते हैं, और इस से वह अपने बन्दों के अन्दर भय और डर, अल्लाह की तरफ एकाग्रता, गुनाहों का परित्याग, अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाना, और पछतावा पैदा करता है, जैसाकि किसी सलफ (पूर्वज) ने धरती पर भूकंप आने के समय कहा थ कि : तुम्हारा पालनहार तुम से क्षमा याचना करवा (गुनाहों की माफी मंगवा) रहा है। तथा उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने जब मदीना में भूकंप आया तो लोगों को सम्बोधित किया और उन्हें सदुपदेश किया, और कहा : यदि इस में दुबारा भूकंप आया तो मैं तुम्हारे साथ इस में निवास नहीं करूंगा।" (इब्नुल क़ैयिम की बात समाप्त हुई)

सलफ सालेहीन (पूर्वजों) से इस विषय में बहुत सारे कथन वर्णित हैं ..

अत: भूकंप और उस के अलावा अन्य निशानियों, तेज़ हवा, और बाढ़ आने के समय अल्लाह सुब्हानहु व तआला से तौबा करने में जल्दी करना, उस के सामने रोना गिड़गिड़ाना, उस से सुरक्षा और शान्ति का प्रश्न करना, अधिक से अधिक उस का ज़िक्र करना और क्षमा याचना करना अनिवार्य है, जैसाकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ग्रहण के समय फरमाया : "जब तुम इसे देखो तो अल्लाह तआला के ज़िक्र व अज़कार (स्मरण), उस से दुआ करने और उस से क्षमा याचना करने (गुनाहों की माफी मांगने) की तरफ जल्दी करो।" यह सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम की हदीस का एक अंश है। (सहीह बुखारी 2/30, सहीह मुस्लिम 2/628).

तथा गरीबों और मिस्कीनों पर दया करना और उन पर दान करना भी मुस्तहब है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "तुम (दूसरों पर) दया करो, तुम पर (भी) दया की जाये गी।" इसे इमाम अहमद ने रिवायत किया है (2/165)

"दया करने वालों पर अति दयालू (अल्लाह तआला) दया करता है, तुम धरती वालों पर दया करो, आकाश वाला तुम पर दया करे गा।" इसे अबू दाऊद (13/285) और तिर्मिज़ी (6/43) ने रिवायत किया है।

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "जो दया नहीं करता उस पर दया नहीं की जाती।" (सहीह बुखारी 5/75, सहीह मुस्लिम 4/1809)

तथा उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहिमहुल्लाह से वर्णित है कि वह अपने गवर्नरों के पास भूकंप आने के समय खैरात करने के लिए पत्र लिखते थे।

तथा हर बुराई से बचाव और आफियत के कारणों में से अधिकारियों का मूर्खों के हाथ को पकड़ने, उन्हें हक़ को अपनाने पर मजबूर करने, उन के बारे में अल्लाह की शरीअत के अनुसार फैसला करने, भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने में शीघ्रता से काम लेना भी है, जैसाकि सर्वशक्तिमान अल्लाह का फरमान है : "मोमिन पुरूष और महिलाएं आपस में एक दूसरे के दोस्त हैं, वे भलाई का आदेश देते हैं और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ क़ाईम करते हैं और ज़कात देते हैं, तथा अल्लाह और उसके रसूल की इताअत (फरमांबरदारी) करते हैं, यही लोग हैं जिन पर अल्लाह तआला दया करेगा, अल्लाह तआला शक्तिवान और ग़ल्बे वाला और हिक्तम वाला है।" (सूरतुत्तौबा : 71)

तथा सर्वशक्तिमान अल्लाह ने फरमाया कि : "जो अल्लाह की मदद करेगा अल्लाह भी उस की ज़रूर मदद करेगा, बेशक अल्लाह तआला बहुत ताक़तवर और प्रभुत्ता वाला (गालिब) है। ये वे लोग हैं कि अगर हम इन के पैर धरती पर मज़बूत कर दें तो ये पाबन्दी से नमाज़ अदा करेंगे और ज़कात देंगे और अच्छे कामों का हुक्म देंगे और बुरे कामों से मना करेंगे, और सभी कामों का परिणाम अल्लाह के हाथ में है।" (सूरतुल हज्ज : 40 – 41)

तथा अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने फरमाया : "और जो इंसान अल्लाह से डरता है अल्लाह उस के लिए छुटकारे का रास्ता निकाल देता है। और उसे ऐसी जगह से रोज़ी देता है जिस का उसे अन्दाज़ा भी न हो। और जो व्यक्ति अल्लाह पर भरोसा करेगा तो अल्लाह तआला उस के लिये पर्याप्त है।" (सूरतुत्तलाक़ : 2-3)
इस अर्थ की आयतें और भी हैं।

तथा पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जो आदमी अपने भाई की आवश्यकता में लगा रहता है, अल्लाह तआला उसकी आवश्यकता में होता है।" (सहीह बुखारी 3/98, सहीह मुस्लिम 4/1996).

तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस ने किसी मोमिन से दुनिया की परेशानियों में से कोई परेशानी (संकट) को दूर कर दिया तो (उसके बदले) अल्लाह तआला उस से क़ियामत के दिन की परेशानियों में से एक परेशानी को दूर कर देगा, और जिस ने किसी तंगदस्त (कठिनाई पीड़ित) पर आसानी की तो अल्लाह तआला दुनिया और आख़िरत में उस पर आसानी फरमायेगा, और जिस ने किसी मुसलमान पर पर्दा डाला तो अल्लाह तआला उस पर दुनिया व आखिरत दोनों मे पर्दा डालेगा, तथा अल्लाह तआला बन्दे की मदद में रहता है जब तक कि बन्दा अपने भाई की मदद में होता है।" (सहीह मुस्लिम 4/2074) इस अर्थ की हदीसें और भी हैं।

तथा अल्लाह तआला ही से इस बात का प्रश्न है कि समस्त मुसलमानों के मामलों को सुधार (संवार) दे, उन्हें दीन की समझ प्रदान करे, और उन्हें उस पर स्थिरता और सभी गुनाहों से अल्लाह से तौबा करने की तौफीक़ दे, तथा मुसलमानों के शासकों और उन के मामलों के ज़िम्मेदारों का सुधार करे, उन के द्वारा हक़ की मदद करे, और उन के द्वारा बातिल को असहाय कर दे, और उन्हें अपने बन्दों में अल्लाह की शरीअत को लागू करने की तौफीक़ दे, और उन्हें तथा समस्त मुसलमानों को पथ भ्रष्ट करने वाले फित्नों (उपद्रवों) और शैतान के वस्वसों (प्रलोभन) से सुरक्षित रखे, यक़ीनन वह इस का स्वामी और इस पर शक्तिमान है।

तथा अल्लाह तआला हमारे सन्देष्टा मुहम्मद, आप के परिवार और साथियों, तथा क़ियामत के दिन तक भलाई के साथ उन का अनुसरण करने वालों पर दया और शान्ति अवतरित करे।

प्रस्तुतकर्ता: सलीम ख़ान
मूल लेख: अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ -रहिमहुल्लाह- मजल्ला अल बुहूसुल इस्लामिय्या रक़म: 51, वर्ष 1418 हिज्री
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Sunday, March 28, 2010

क्या सूद का कारोबार करने वाले को ज़कात का माल देना वैध है ?

हमारी अन्जुमन में आप लोग पिछले दिनों आपने जाना कि: 

समलैंगिकता (Homosexuality/Lesbianism) को इस्लाम में हराम (वर्जित) क्यूँ समझा जाता है?
मैं सुअर के मांस के निषिध होने का कारण जानना चाहता हूँ! Why Pork is Prohibited
मुसलमानों को कुत्ता रखने, उसे छूने और उसे चूमने के बारे में क्या हुक्म है?


और इसी श्रृंखला को आगे बढाते हुए हम आज जानेंगे कि:



क्या सूद का कारोबार करने वाले को ज़कात का माल देना वैध है ?


अथवा क्या धन के ज़कात को क्रेडिट कार्ड के ऋण का भुगतान करने में देना जाइज़ है ?

ऐसे "क्रेडिट कार्ड" से लेन देन करना जो ऋण का भुगतान करने में देरी करने की अवस्था में आर्थिक जुर्माना लगाने पर आधारित हो हराम (वर्जित) है, क्योंकि यह एक हराम सूद पर आधारित शर्त है।


ज़कात के हक़दार लोगों में से जिनका उल्लेख अल्लाह तआला ने अपनी किताब में किया है उन में से एक "अल-ग़ारेमीन" हैं, अर्थात क़र्ज़दार (ऋणी) लोग, अत: जिस व्यक्ति ने अपनी आवश्यकता को पूरी करने और अपने हित को साकार करने के लिए उधार (ऋण) लिया, फिर ऋण को चुकाने में विफल रहा, तो उसे ज़कात के पैसे से इतनी राशि दी जायेगी जिस से वह अपने क़र्ज़ का भुगतान कर सके, और इतनी मात्रा में दिया जायेगा जिस का भुगतान करने में वह असक्षम रहा है।

तथा क़र्ज़ में डूबे हुये व्यक्ति को ज़कात का पैसा देने के लिए यह शर्त है कि :

उस का क़र्ज़ किसी पाप के काम में न हो, अत: जो व्यक्ति किसी पाप में क़र्ज़दार हो गया है जैसेकि शराब, जुआ, सूदखोरी, तो उसे ज़कात के पैसे से देना वैध नहीं है। हाँ, अगर वह उस पाप से तौबा कर ले, उस को तुरन्त त्याग कर दे और उस पर पछतावा करे, और इस बात का पक्का संकल्प करे कि पुन: उस पाप को नहीं करेगा ; तो ऐसी स्थिति में उसे ज़कात का पैसा देने और तौबा करने पर उस की मदद करने में कोई आपत्ति नहीं है।

अल्लामा मर्दावी कहते हैं : "यदि वह किसी अवज्ञा (गुनाह के काम) में क़र्ज़ दार हुआ है तो बिना किसी मतभेद के उसे ज़कात के माल से नहीं दिया जायेगा।" (किताब "अल इंसाफ" 3/247)

और अल्लामा शैकानी कहते हैं : "जहाँ तक उस के अन्दर यह शर्त लगाने का संबंध है कि वह पाप के काम में न हो तो यह सहीह है, क्योंकि ज़कात को अल्लाह सुब्हानहु व तआला की अवज्ञा के कामों में नहीं दिया जायेगा, और न ही उन कामों में दिया जायेगा जिन के द्वारा सर्वशक्तिमान अल्लाह की हुर्मतों का उल्लंघन करने पर शक्ति प्राप्त की जाती है।" (किताब "अस्सैलुल जर्रार" 2/59).

और चूंकि "क्रेडिट कार्ड" के द्वारा क़र्ज़ लेना हराम (निषिद्ध) है, इसलिए उस के ऋण को ज़कात के पैसे से चुकाना जाइज़ नहीं है। हाँ, यदि वह इस से तौबा कर ले, उस पर पछतावा करे और इस पाप की ओर दुबारा न लौटने का पक्का संकल्प कर ले, तो ऐसी स्थिति में उसे अपने क़र्ज़ को चुकाने के लिए ज़कात के पैसे से दिया जा सकता है।

अल्लामा मर्दावी कहते हैं : "अगर वह इस से तौबा न करे, और उस पाप (अवज्ञा) पर अटल हो तो उसे क़र्ज़ दारों के हिस्से से देना जाइज़ नहीं है, क्योंकि उस के लिए अवज्ञा और पाप करना निषिद्ध है, इसलिए गुनाह के काम में उसके ऋण को उठा कर उस पर उसकी सहायता नही की जाये गी।" (किताब "अल-ह़ावी" 8/508)

शैख मुहम्मद बिन उसैमीन रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

"प्रश्न : जो आदमी किसी हराम चीज़ के अन्दर क़र्ज दार हो गया है, तो क्या हम उसे ज़कात का पैसा दे सकते हैं ?
उत्तर : अगर वह उस (हराम) काम से तौबा कर ले तो हम उसे देंगे, अन्यथा हम उसे ज़कात का पैसा नहीं देंगे, क्योंकि यह हराम काम पर मदद करना है, यही कारण है कि अगर हम उसे देंगे तो वह दुबारा ऋण लेगा।"
"अश्शर्हुल मुम्ते" (6/235)

तथा डॉ. सुलैमान अल अश्क़र कहते हैं : "जो आदमी सूद पर क़र्ज़ लेता है, तो उस के क़र्ज़ को ज़कात के अध्याय में क़र्ज़ दारों के हिस्से से नहीं दिया जायेगा, सिवाय इस के कि वह सूद के लेन देन से तौबा कर ले और उस से पलट आये।"

और अल्लाह तआला ही सब से श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है।


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Thursday, March 25, 2010

मुसलमानों को कुत्ता रखने, उसे छूने और उसे चूमने के बारे में क्या हुक्म है?

सवाल को कुछ इस तरह से भी कहा जा सकता है जैसे:  
कुत्ता रखना नापाकियों में से समझा जाता है, किन्तु यदि मुसलमान केवल घर की रखावाली के लिए कोई कुत्ता रखे, और उसे घर के बाहर रखे और उसके परिसर के अंतिम भाग में किसी जगह रखे, तो वह अपने आप को किस प्रकार पाक (पवित्र) रखेगा ? और जब वह अपने आप को साफ-सुथरा रखने के लिए मिट्टी (धूल) या कीचड़ न पाये तो इस का क्या हुक्म है ? और क्या मुसलमान के लिए अपने आप को पाक साफ रखने के लिये कोई विकल्प उपलब्ध है ? और कभी कभार वह आदमी दौड़ने के लिए कुत्ते को अपने साथ लेकर जाता है, और उसे थपकता और चूमता है ... 
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हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह के लिए योग्य है।

सर्व प्रथम :
पवित्र इस्लामी शरीअत (धर्म शास्त्र) ने कुत्ता रखना मुसलमान पर हराम (निषिद्ध) कर दिया है, और इस का उल्लंघन करने वाले को इस प्रकार दंडित किया है कि प्रत्येक दिन उसकी नेकियों में से एक क़ीरात या दो क़ीरात की कमी कर दी जाती है, किन्तु इस दण्ड से वह कुत्ता अलग कर दिया है जिसे शिकार के लिए, या मवेशियों की रखवाली के लिए या खेती (फसल) की रखवाली के लिए रखा जाता है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस ने मवेशियों, या शिकार, या खेती के कुत्ते के अलावा कोई कुत्ता रखा, उसके अज्र (पुण्य) से हर दिन एक क़ीरात कम कर दिया जाता है।" (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है हदीस संख्या : 1575).

तथा अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है कि उन्हों ने कहा कि अल्ला के पैग़ंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस आदमी ने पशुधन की रक्षा के लिए, या शिकार के अलावा कोई कुत्ता रखा उसके अमल से हर दिन दो क़ीरात कम कर दिया जायेगा।" (बुखारी हदीस संख्या : 5163, मुस्लिम : 1574).

क्या घर की रखवाली के लिए कुत्ता रखना जाइज़ है ?

इमाम नववी कहते हैं :
"ऊपर उल्लिखित तीन कामों के अलावा किसी और उद्देश्य जैसे कि घरों और रास्तों की रक्षा के लिए कुत्ता रखने के जाइज़ होने के बारे में मतभेद है, और राजेह (उचित) बात यह है कि हदीस से समझी जाने वाली इल्लत (कारण) अर्थात् ज़रूरत पर अमल करते हुये और उपर्युक्त तीनों चीज़ों पर क़ियास करते हुये वह जाइज़ है।"

"शरह सहीह मुस्लिम" (10/236)

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"इस आधार पर जो घर शहर के बीच में है उस की चौकीदारी के लिए कुत्ता रखना जाइज़ नहीं है, अत: इस तरह की स्थितियों में इस उद्देश्य के लिए कुत्ता रखना हराम है वैध नहीं है, और उसके रखने वाले के अज्र व सवाब से प्रति दिन एक या दो क़ीरात कम कर दिया जायेगा। इसलिए उन लोगों पर अनिवार्य है कि वे इस कुत्ते को भगा दें और उसे अपने पास न रखें। किन्तु अगर यह घर बाहर एकांत मैदान में है, उस के आस पास कोई नहीं है तो उस के लिए घर की चौकीदारी और उस में रहने वालों की रखवाली के लिए कुत्ता रखना जाइज़ है, तथा घर वालों की रखवाली और रक्षा करना पशुधन और खेती की रक्षा करने से अधिक महत्वपूर्ण है।" (मज्मूअ़ फतावा इब्ने उसैमीन 4/246)

शब्द "अल-क़ीरात" (अर्थात् एक क़ीरात) और शब्द "अल-क़ीरातैन" (अर्थात् दो क़ीरात) की हदीस के बीच मिलान के बारे में कई कथन हैं :

हाफिज़ ऐनी रहिमहुल्लाह कहते हैं :

1- ऐसा भी हो सकता है कि यह दोनों दो प्रकार के कुत्तों के बारे में हों, जिन में से एक दूसरे से अधिक हानिकारक हो।
2- एक कथन यह है कि : दो क़ीरात शहरों और गांवों के बारे में है, और एक क़ीरात दीहात के बारे में है।
3- एक कथन यह है कि : यह दोनों रिवायतें दो ज़मानों (समय) के बारे में हैं, पहले एक क़ीरात का उल्लेख किया गया, फिर सख्ती को बढ़ाते हुये दो क़ीरात कर दिया गया।
"उमदतुल क़ारी" (12/158)

दूसरा :

प्रश्न करने वाले का यह कहना कि "कुत्ता रखना नापाकियों में से समझा जाता है" तो यह सामान्य रूप् से सहीह नहीं है, क्योंकि नापाकी (अशुद्धता) स्वयं कुत्ते में नहीं है बल्कि उस के थूक (लार) में है जब वह किसी बर्तन से पानी पीता है, अत: जिस ने किसी कुत्ते को छू लिया, या उसे कुत्ते ने छू लिया तो उस के लिए अपने आप को पानी या मिट्टी से पवित्र करना अनिवार्य नहीं है, अगर कुत्ता किसी बर्तन से पानी पी ले तो उस पर पानी को फेंक (उंडेल) देना और उसे सात बार पानी से और आठवीं बार मिट्टी से धोना अनिवार्य है यदि वह उस बर्तन को इस्तेमाल करना चाहता है, अगर उस ने उस बर्तन को कुत्ते के लिए विशिष्ट कर दिया है तो उस के लिए उसे पवित्र करना आवश्यक नहीं है।

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "तुम में से किसी व्यक्ति के बर्तन की पाकी (शुद्धता) जब कि कुत्ता उस में मुँह डाल दे, यह है कि वह उसे सात बार धोये उन में से पहली बार मिट्टी के द्वारा हो।" (इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है हदीस संख्या : 279)

और मुस्लिम की एक रिवायत (हदीस संख्या : 280) के शब्द यह हैं कि : "जब कुत्ता बर्तन में मुँह डाल दे तो उसे सात बार धुलो, और आठवीं बार उसे मिट्टी से साफ करो।"

शैखुल इस्लाम इब्ने तैमिय्या रहिमहुल्लाह कहते हैं :

"कुत्ते के बारे में विद्वानों ने तीन कथनों पर मतभेद किया है :

पहला : वह पवित्र है यहाँ तक कि उस का थूक (लार) भी पाक है, यह इमाम मालिक का मत है।

दूसरा : वह अशुद्ध (नापाक) है यहाँ तक कि उसका बाल भी अपवित्र है, यह इमाम शाफेई का मत है, और एक रिवायत के अनुसार इमाम अहमद का भी यही कथन है।

तीसरा : उस का बाल पाक है, और उस का थूक (लार) अशुद्ध (नापाक) है, यह इमाम अबू हनीफा का मत है और एक रिवायत के अनुसार इमाम अहमद का भी यही कथन है।

और यही सब से शुद्ध कथन है, अत: जब कपड़े या शरीर पर उस के बाल की नमी (गीलापन) लग जाये तो वह इस से नापाक नहीं होगा।"
"मजमूउल फतावा" (21/530).

तथा एक दूसरे स्थान पर फरमाया :

"इसका कारण यह है कि वस्तुओं में असल पवित्रता का होना है, इसलिए किसी चीज़ को अशुद्ध (नापाक) और निषिद्ध ठहराना वैध नहीं है जब तक कि कोई सबूत न हो, जैसाकि अल्लाह तआला का फरमान है :

"और उस (अल्लाह तआला) ने तुम्हारे लिए उन सभी चीज़ों की तफसील बयान कर दी है जो तुम पर हराम किया गया है।" (सूरतुल अनआम : 119)

तथा अल्लाह तआला का फरमान है : "और अल्लाह ऐसा नहीं करता कि किसी क़ौम को हिदायत देने के बाद भटका दे जब तक उन बातों को साफ-साफ न बता दे जिन से वे बचें।" (सूरतुत्तौबा : 115)

और जब ऐसी बात है तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है : "तुम में से किसी व्यक्ति के बर्तन की पाकी (शुद्धता) जब कि कुत्ता उस में मुँह डाल दे, यह है कि वह उसे सात बार धोये उन में से पहली बार मिट्टी के द्वारा हो।"
और एक दूसरी हदीस में है कि : "जब कुत्ता बर्तन में मुँह डाल दे तो उसे सात बार धुलो, और आठवीं बार उसे मिट्टी से साफ करो।"

सभी हदीसों में केवल बर्तन में मुँह डालने का उल्लेख किया गया है, उस के अन्य भागों का उल्लेख नहीं किया गया है, अत: उन्हें (अर्थात् अन्य भागों को) अपवित्र ठहराना मात्र क़ियास करना है ...

तथा यह बात भी है कि : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शिकार, तथा पशुधन और फसल की रखवाली के लिए कुत्ता रखने की अनुमति दी है, और उसे रखने वाले को उसके बालों की नमी का लगना आवश्यक है जैसाकि खच्चर, गधे इत्यादि पशुओं की नमी उसे लग जाया करती है, इसलिए उसके बालों को अशुद्ध ठहराने की बात जबकि स्थिति यह है, उस हरज (तंगी) में से है जो इस उम्मत (समुदाय) से समाप्त कर दी गयी है।"
"मजमूउल फतावा" (21/617, 619)

सावधानी का पक्ष यह है कि : जिस ने इस हालत में कुत्ते को छुवा कि उसके हाथ में नमी थी, या कुत्ते के शरीर पर नमी थी तो वह उसे सात बारे धोये जिन में एक बार मिट्टी से होना चाहिये।

शैख इब्ने उसैमीन रहिमहुल्लाह फरमाते हैं :

"जहाँ तक इस कुत्ते को छूने का प्रश्न है तो अगर उस ने बिना नमी के छुआ है तो उस का हाथ नापाक नहीं होगा, और अगर नमी के साथ छुआ है तो इसके कारण अधिकांश विद्वानों के मतानुसार उसका हाथ नापाक हो जायेगा, और उसके बाद हाथ को सात बार धोना अनिवार्य है, जिस में एक बार मिट्टी से होना चाहिये।"
"मजमूअ़ फतावा इब्ने उसैमीन" (11/246)

तीसरा :
तथा अनिवार्य यह है कि कुत्ते की अशुद्धता को सात बार धोया जाये जिन में एक बार मिट्टी से होना चाहिए, और मिट्टी उपलब्ध होने की अवस्था में उसी को इस्तेमाल करना अनिवार्य है, और उसके अलावा कोई अन्य चीज़ पर्याप्त नहीं होगी, परन्तु जब मिट्टी न मिले, तो उस के अतिरिक्त अन्य डिटर्जेन्ट जैसे साबुन के इस्तेमाल करने में कोइ बात नहीं है।

चौथा :
प्रश्न करने वाले ने कुत्तों को चूमने की बात का जो उल्लेख किया है तो यह बहुत सारी बीमारियों का कारण है, और वो बीमारियाँ जो मनुष्य को कुत्तों को चूमने या उसके मुँह डाले हुये बर्तन से उस को पाक करने से पहले ही पी कर के शरीअत की अवहेलना करने के कारण लगती हैं, बहुत अधिक हैं।

उन्हीं में से एक "पास्चरलोसिस" का रोग है, वह एक जीवाणु का रोग है, जिस के रोग का कारण स्वभाविक रूप से मनुष्यों और पशुओं के ऊपरी श्वसन प्रणाली में मौजूद होता है, और विशेष परिस्थितियों के तहत यह जीवाणु शरीर पर आक्रमण करता है और रोग को जन्म देता है।

और उन्हीं में से एक "पानी की थैलियाँ" है, वह परजीवी रोगों में सै है जो मुष्यों और पशुओं के आंतरिक अंगों (आँतों) को प्रभावि करता है, और सब से अधिक जिगर और फेफड़ों को प्रभावित करता है, उसके बाद उदर गुहा और शरीर के बाक़ी अंगों को प्रभावित करता है।

इस बीमारी का कारण एक टेप कृमि (tapeworm) है जिसे एकायनिकोस क्रानिलेसिस कहा जाता है, यह एक छोटा कीड़ा है जिसके व्यस्क की लंबाई (2-9) मिमी होती है, जो तीन वर्गों और सिर और गर्दन से मिलकर बनता है और सिर में चार चूसक होते हैं।

व्यस्क कीड़े उनके मेज़बानों जैसे कुत्तों, बिल्लियों, लोमड़ियों और भेड़ियों की आँतों में रहते हैं।

यह रोग कुत्तों को पालने के शौक़ीन मनुष्य को उस समय स्थानांतरित होता है जब वह उसे चुंबन करता है, या उसके बर्तन से पानी पीता है।

देखिये : किताब "अमराज़ुल हैवानातिल अलीफा अल्लती तुसीबुल इंसान" (पालतु पशु रोग जो मनुष्य को प्रभावित करते हैं) लेखक : डॉ. अली इसमाईल उबैद अस्सनाफी

सारांश:

यह कि शिकार या पशुधन और फसलों की रखवाली के अलावा के लिए कुत्तों को रखना जाइज़ नहीं है, तथा घरों की रखवाली के लिए कुत्तों को रखना इस शर्त पर जाइज़ है कि वे (घर) शहर से बाहर हों तथा यह शर्त भी कि (घर की रखवाली का) कोई अन्य साधन उपलब्ध न हो। और मुसलमान के लिए कुत्तों के साथ दौड़ने में ग़ैर-मुस्लिम की छवि अपनाना उचित नहीं है, तथा उस के मुँह को छूना और उसे चुंबन करना ढेर सारे रोगों का कारण है।

इस पवित्र और परिपूर्ण शरीअत पर हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति अल्लाह के लिए है, जो कि लोगों के दीन और दुनिया (आध्यात्मिक और सांसारिक मामलों ) का सुधार करने के लिए आई है, किन्तु अधिकतर लोग जानते ही नहीं ।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ जानता है।

मैं सुअर के मांस के निषिध होने का कारण जानना चाहता हूँ! Why Pork is Prohibited ?



हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान अल्लाह तआला के लिए योग्य है ।

मूल रूप से एक मुसलमान अल्लाह के आदेश का पालन करता है और उसकी मना की हुई बातों से बचाव करता है, चाहे उस चीज़ के अन्दर अल्लाह सुब्हानहु व तआला की हिकमत (तत्वदर्शिता) का उसे बोध हा या न हो।

मुसलमान के लिए वैध नहीं है कि वह शरीयत के आदेश को नकार दे, या उसको लागू करने में संकोच करे यदि उसे उसकी हिक्मत का बोध न हो, बल्कि किसी चीज़ के हलाल (वैध) और हराम (अवैध) ठहराये जाने के बारे में शरीयत के हुक्म को स्वीकार करना अनिवार्य है जब भी वह प्रमाण सिद्ध हो जाये ; चाहे उसे उसकी हिकमत की समझ हो या न हो। अल्लाह तआला का फरमान है :

"और (देखो) किसी मुसलमान मर्द और औरत को अल्लाह और उसके रसूल के फैसले के बाद अपनी किसी बात का कोई अधिकार बाक़ी नहीं रह जाता। (याद रखो!) अल्लाह तआला और उसके रसूल की जो भी नाफरमानी करेगा वह खुली गुमराही में पड़ेगा।" (सूरतुल अहज़ाब : 33)

तथा अल्लाह तआला का फरमान है :

"ईमान वालों का कहना तो यह है कि जब उन्हें इसलिए बुलाया जाता है कि अल्लाह और उसके रसूल उन में फैसला कर दें, तो वे कहते हैं कि हम ने सुना और मान लिया, यही लोग कामयाब होने वाले हैं।" (सूरतुन नूर : 51)

इस्लाम में सुअर का मांस क़ुर्आन के स्पष्ट प्रमाण के द्वारा हराम (निषिद्ध) किया गया है, और वह अल्लाह तआला का यह कथन है : 

"तुम पर मुर्दा, (बहा हुआ) खून और सुअर का मांस हराम है।" (सूरतुल बक़रा : 173)

किसी भी परिस्थिति में मुसलमान के लिए उसको खाना वैध नहीं है सिवाय इसके कि उसे ऐसी ज़रूरत पेश आ जाये जिस में उसका जीवन उसे खाने पर ही निर्भर करता हो, उदाहरण के तौर पर उसे ऐसी सख्त भूख लगी हो कि उसे अपनी जान जाने का भय हो, और उसके अतिरिक्त कोई दूसरा भोजन न हो, तो शरीयत के नियम : "आवश्यकतायें, अवैध चीज़ों को वैध बना देती हैं" के अंतर्गत उसके लिए यह वैध होगा।

शरीयत के ग्रंथों में सुअर के मांस के हराम किए जाने के किसी विशिष्ट कारण का उल्लेख नहीं किया गया है, इस के बारे में केवल अल्लाह तआला का यह कथन है कि : "यह निश्चित रूप से गंदा -अशुद्ध और अपवित्र- है।"

"रिज्स" (अर्थात् अपवित्र) का शब्द उस चीज़ पर बोला जाता है जो शरीयत में तथा शुद्ध मानव प्रकृति वाले लोगों की निगाह में घृणित, घिनावनी और अशुद्ध हो। और मात्र यही कारण उस के हराम होने के लिए पर्याप्त है। इसी तरह एक सामान्य कारण भी वर्णित हुआ है, और वह खाने और पीने इत्यादि में हराम चीज़ों की निषिद्धता के बारे में वर्णित कारण है, और वह पोर्क के निषेद्ध की हिक्मत की ओर संकेत करता है, वह सामान्य कारण अल्लाह तआला का यह फरमान है :

"और वह (अर्थात् पैग़म्बर) पाक (शुद्ध) चीज़ों को हलाल (वैध) बताते हैं और नापाक (अशुद्ध) चीज़ों को हराम (अवैध) बताते हैं।" (सूरतुल आराफ : 157)

इस आयत का सामान्य अर्थ सुअर के मांस के निषिद्ध होने के कारण को भी सम्मिलत है, और इस से ज्ञात होता है कि पोर्क इस्लामी शरीयत के दृष्टिकोण में अशुद्ध और अपवित्र चीज़ों में से गिना जाता है।

इस स्थान पर "अपवित्र चीज़ों" (खबाइस) से अभिप्राय वह सब कुछ़ है जो मानव के स्वास्थ्य, धन और नैतिकता के लिए हानिकारक हो, अत: हर व चीज़ जिस का मानव जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं में से किसी एक पर भी नकारात्मक परिणाम और दुष्टप्रभाव हो वह अपवित्र (खबाइस) के अतंर्गत आता है।

वैज्ञानिक और चिकित्सा अनुसंधानों ने भी यह सिद्ध किया है कि सुअर, अन्य सभी जानवरों के बीच मानव शरीर के लिए हानिकारक रोगाणुओं का एक भण्डार है, इन हानिकारक तत्वों और रोगों का विस्तार लंबा है, संछिप्त रूप से वे इस प्रकार हैं : परजीवी रोग, जीवाणु रोग, वायरल रोग, बैक्टीरियल बीमारियां, और अन्य।

ये और अन्य हानिकारक प्रभाव इस बात का प्रमाण हैं कि बुद्धिमान शास्त्रकार ने सुअर का मांस खाना किसी व्यापक हिक्मत के लिए ही हराम ठहराया है, और वह मानव के जान (स्वास्थ्य) की रक्षा है, जो कि इस्लामी शरीयत के द्वारा संरक्षित पाँच बुनियादी ज़रूरतों में से एक है।

और अल्लाह तआला ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान रखने वाला है।

Wednesday, March 17, 2010

समलैंगिकता (Homosexuality/Lesbianism) को इस्लाम में हराम (वर्जित) क्यूँ समझा जाता है?









बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम 
(मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरम्भ करता हूँ)

हर प्रकार की हम्द व सना (प्रशंसा व गुणगान) अल्लाह के लिए योग्य है, हम उसी की प्रशंसा करते हैं उसी से मदद मांगते हैं और उसी से क्षमा याचना करते हैं तथा हम अपने नफस की बुराई और अपने बुरे कामों से अल्लाह की पनाह में आते हैं, जिसे अल्लाह तआला हिदायत दे दे उसे कोई पथ्भ्स्थ करनेवाला नहीं, और जिसे गुमराह करदे उसे कोई हिदायत देने वाला नहीं. हम्द व सना के बाद: 

हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए ही योग्य है.
१. मुसलमान के लिए एक पल के लिए भी यह संदेह करना उचित नहीं कि अल्लाह त-आला के क़ानून तत्वदर्शी व बुद्धिपूर्ण हैं, और इस बात को जान लेना उचित है कि अल्लाह तआला ने जिस चीज़ का आदेश दिया है और जिस चीज़ से मना किया है उसके अन्दर सम्पूर्ण और व्यापक हिकमत (तत्वदर्शिता) है और वही सीधा पथ और एक मात्र रास्ता है कि मनुष्य सुरक्षा और संतुष्टि के साथ जीवन यापन करे और उसकी इज्ज़त और आबरू (सतीत्व), बुद्धि और स्वास्थ्य की सुरक्षा हो और वह उस प्रकृति के अनुरूप हो जिस पर अल्लाह तआला ने पैदा किया है.
कुछ विधर्मी और स्वधर्मभ्रष्ट लोगों ने इस्लाम और उसके प्रावधानों और नियमों पर हमला करने का प्रयास किया है:::अतः उन्होंने तलाक़ और बहु विवाह की निंदा की है और शराब की अनुमति दी है, और जो आदमी उनके समाज की स्तिथि को देखेगा तो उसे उस दयनीय स्तिथि और दुर्दशा का पता चल जायेगा जहाँ वे समाज पहुँच चुके है. 
जब उन्होंने तलाक़ को अविकार किया तो उनका स्थान हत्या ने ले लिया. 
जब उन्होंने ने बहु-विवाह को अस्वीकार किया तो उसके बदले में रखैल (मिस्ट्रेस) रखने की प्रथा चल पड़ी. 
और जब उन्होंने शराब को वैध ठहरा लिया तो सभी रंग रूप की बुराइयां और अनैतिक कार्यों का फैलाव हुआ.
वे दोनों यानि पुरुष समलैंगिकता और स्त्री समलैंगिकता अल्लाह त-आला के उस प्राकृतिक स्वभाव के विरुद्ध है जिस पर अल्लाह त-आला ने मनुष्यों को - बल्कि पशुवों को भी पैदा किया है कि पुरुष स्त्री का और स्त्री पुरुष की इछ्हुक होती है और जिसने इसका विरोध किया उसने फ़ितरत (प्राकृतिक स्वभाव) का विरोध किया.
पुरुष और स्त्री समलैंगिकता के फैलाव ने ढेर सारी ने बीमारियों को जन्म दिया है जिनके अस्तित्व का पूरब और पश्चिम के लोग इन्कार नहीं कर सकते, यदि इस विषमता के परिणामों में से केवल 'एड्स' की बीमारी ही होती जो मनुष्य के अन्दर प्रतिरक्षा प्रणाली को धरम-भरम (नष्ट) कर देती है, तो बहुत काफी है.  
इसी प्रकार यह परिवारों के विघटन और उनके टुकड़े-टुकड़े हो जाने और काम-काज और पढाई-लिखाई को त्याग कर इस प्रकार के अप्राकृतिक कृत्यों में व्यस्त हो जाने का कारण बनता है.
चूँकि इसका निषेध उसके पालनहार की ओर से आया है अतः मुसलमान को इस बात की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि चिकित्सा विज्ञान अल्लाह त-आला के के वर्जित किये हुए अपराध से होने वाली क्षति और नुक्सान को सिद्ध करे, बल्कि उसे इस बात का डरीं विश्वास होना चाहिए कि अल्लाह त-आला उसी चीज़ हो वैध करता है जिसमें लोगों का हित और कल्याण हो और यह आधुनिक खोज अल्लाह त-आला की महान हिकमत और तत्वदर्शिता के प्रति उसके संतोष को बढ़ाते हैं.
२. स्त्री की समलैंगिकता (Lesbianism) का अर्थ यह है कि एक महिला दुसरे महिला के साथ ऐसा ही सम्बन्ध स्थापित करे जिस तरह एक पुरुष महिला के साथ करता है.
पुरुष समलैंगिकता (Homosexuality) का अर्थ यह है कि पुरुष का पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाना, जो कि अल्लाह के ईश-दूत लूत अलैहिस्सलाम के समुदाय के शापित लोगों की करवाई है.
अल्लाह त-आला कुरआन में फरमाता है कि:
(وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُمْ بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِنَ الْعَالَمِينَ. إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِنْ دُونِ النِّسَاءِ بَلْ أَنْتُمْ قَوْمٌ مُسْرِفُونَ )الأعراف)
अर्थात
"और हमने लूत (अ.) को भेजा जबकि उन्होंने अपनी काम से कहा कि क्या तुम ऐसा बुरा काम करते हो जिसे तुमसे पहले सारी दुनिया में किसी ने नहीं किया? तुम महिलाओं को छोड़ कर पुरुषों के साथ सम्भोग करते हो. बल्कि तुम तो हद से गुज़र गए हो." (सूरतुल आराफ 80-81)
और फ़रमाया:
(إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّا آلَ لُوطٍ نَجَّيْنَاهُمْ بِسَحَرٍ (القمر:34 )
अर्थात
"बेशक हमने उन पर पत्थर की बारिश करने वाली हवा भेजी, सिवाय लूत (अ) के परिवार वालों के, उन्हें सुबह के वक़्त हमने मुक्ति प्रदान कर दी." (सूरतुल क़मर 34)
इसी तरह अल्लाह त-आला अपनी किताब कुरआन में कई जगह फरमाता है. अल्लाह त-आला फरमाता है सूरतुल अनकबूत:२८, सूरतुल अम्बिया ७४, सूरतुल नम्ल ५४-५८ और सुरतुन्निसा १६ में.
यही नहीं वेदों में भी समलैंगिकता का निषेध है...
आपके विचार का स्वागत है.

Wednesday, March 10, 2010

इस्लाम एक से अधिक विवाह की अनुमति क्यों देता है ?

आज कल हर तरफ़ नारे बाज़ी चल रही है नारी नारी की. इसी माहौल में एक सवाल भी उठता है कि क्यूँ इस्लाम में एक से अधिक विवाह की अनुमति है ? आईये इस विषय पर बिन्दुवार चर्चा करते हैं-






बहु-विवाह की परिभाषा-इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसके अनुसार व्यक्ति के एक से अधिक पत्नी या पति हों। बहु-विवाह दो प्रकार के होते हैं-
१. एक पुरूष द्वारा एक से अधिक पत्नी रखना।

२. एक स्त्री द्वारा एक से अधिक पति रखना । 

इस्लाम में इस बात की इजाजत है कि एक पुरूष एक सीमा तक एक से अधिक पत्नी रख सकता है जबकि स्त्री के लिए इसकी इजाजत नहीं है कि वह एक से अधिक पति रखे।




अब इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि इस्लाम में एक आदमी को एक से अधि· पत्नी रखने की इजाजत क्यों है?

१. पवित्र कुरआन ही संसार की धार्मिक पुस्तकों में एकमात्र पुस्तक है जो कहती है 'केवल एक औरत से विवाह करो।




संसार में कुरआन ही ऐसी एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जिसमें यह बात कही गई है कि 'केवल एक (औरत) से विवाह करो।' दूसरी कोई धार्मिक पुस्तक ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती हो। किसी भी धार्मिक पुस्तक में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे 'वेद, 'रामायण, 'गीता, हो या 'तलमुद व 'बाइबल। इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है। 

बाद में हिन्दुओं और ईसाई पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके केवल एक कर दी। हम देखते हैं कि बहुत से हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में वर्णन है, अनेक पत्नियाँ थीं। राम के पिता राजा दशरथ के एक से अधिक पत्नियाँ थीं, इसी प्रकार कृष्ण जी के भी अनेक पत्नियाँ थीं। प्राचीन काल में ईसाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। मात्र कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी। यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाजत है। तलमूद कानून के अनुसार इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और सुलैमान की सैकड़ों पत्नियाँ थीं। इनमें बहु-विवाह का रिवाज चलता रहा और उस समय बंद हुआ जब रब्बी गर्शोम बिन यहूदा (९६० ई.-१०३० ई.) ने इसके खिलाफ हुक्म जारी किया। मुसलमान देशों में रहने वाले यहूदियों के पुर्तगाल समुदाय में यह रिवाज १९५० ई. तक प्रचलित रहा और अन्तत: इसराईल के चीफ रब्बी ने एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगा दी।




२. मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक पत्नियाँ रखते हैं सन १९७५ र्ई. में प्रकाशित 'इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या ६६, ६७ में बताया गया है कि १९५१ ई. और १९६१ ई. के मध्य हिन्दुओं में बहु-विवाह ५.०६ प्रतिशत था जबकि मुसलमानों में केवल ४.३१ प्रतिशत था। 

भारतीय कानून में केवल मुसलमानों को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और गैर-मुस्लिमों के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गैर कानूनी है। इसके बावजूद हिन्दुओं के पास मुसलमानों की तुलना में अधिक पत्नियां होती हैं। भूतकाल में हिन्दुओं पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियां रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन १९५४ ई. में हुआ जब हिन्दू विवाह कानून लागू किया गया जिसके अंतर्गत हिन्दुओं को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको गैर-कानूनी करार दिया गया। यह भारतीय कानून है जो हिन्दुओं पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथ। 


अब आइए इस पर चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरूष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?



३. पवित्र कुरआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है कि पवित्र कुरआन ही एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जो निर्देश देती है कि 'केवल एक (औरत) से विवाह करो' कुरआन में है- ''अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन अथवा चार, परन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके मध्य समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से विवाह करो''(·कुरआन, ४:३)


कुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नही थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ करने में समर्थ हो। कुरआन के इसी अध्याय अर्थात सूरा निसा आयत १२९ में कहा गया है : ''तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे।'' (कुरआन, ४:१२९)


कुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरूष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है।


आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा नहीं करने की दृष्टि से पाँच भागों में बांटा है-

(A) फ़र्ज़ अर्थात अनिवार्य।
(B) मुस्तहब अर्थात पसन्दीदा।
(C) मुबाह अर्थात जिसकी अनुमति हो।
(D) मकरूह अर्थात घृणित, नापसन्दीदा।
(E) 'हराम अर्थात निषेध।


बहु-विवाह मुबाह के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुसलमान जिसकी दो, तीन अथवा चार पत्नियाँ हों, वह उस मुसलमान से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो।

४. औरतों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरूष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज्य़ादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरूष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है इसीलिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है।


५. भारत में पुरूषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और भ्रूण हत्या भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबदी पुरूषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष दस लाख मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक होगी।

६. पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक हैअमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अठत्तर लाख ज्य़ादा है। केवल न्यूयार्क में ही उनकी संख्या पुरूषों से दस लाख बढ़ी हुई है और जहाँ पुरूषों की एक तिहाई संख्या सोडोमीज (पुरूषमैथुन) है ओर पूरे अमेरिका राज्य में उनकी कुल संख्या दो करोड़ पचास लाख है। इससे प्रकट होता है कि ये लोग औरतों से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों की आबादी पुरूषों से चालीस लाख ज्य़ादा है। जर्मनी में पचास लाख और रूस में नब्बे लाख से आगे है। केवल खुदा ही जानता है कि पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कितनी अधिक है।


७. प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक पत्नी रखने की सीमा व्यावहारिक नहीं है यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिकी राज्य में तीन करोड़ औरतें अविवाहित रह जाएंगी (यह मानते हुए कि इस देश में सोडोमीज की संख्या ढाई करोड़ है)। इसी प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में चालीस लाख से अधिक औरतें अविवाहित रह जाएंगी। औरतों की यह संख्या पचास लाख जर्मनी में और नब्बे लाख रूस में होगी, जो पति पाने से वंचित रहेंगी। यदि मान लिया जाए कि अमेरिका की उन अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यत: उस·के सामने केवल दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरूष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह गलत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे।

पश्चिमी समाज में यह रिवाज आम है कि एक व्यक्ति पत्नी तो एक रखता है और साथ-साथ उसके बहुत-सी औरतों से यौन संबंध होते हैं। जिसके कारण औरत एक असुरक्षित और अपमानित जीवन व्यतीत करती है। वही समाज किसी व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी के साथ स्वीकार नहीं कर सकता, जिससे औरत समाज में सम्मान और आदर के साथ एक सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सके। और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते इस्लाम सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है परन्तु मूल कारण यह है कि इस्लाम एक औरत का सम्मान और उसकी इ़ज्ज़त बाकी रखना चाहता है।

साभार: इस्लामिक वेबदुनिया

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