Friday, October 16, 2009
हज़रत मुहम्मद मानव-जाति के उद्धारक
अमीना जनां
मेरे माता-पिता प्रोटेस्टेन्ट ईसाई थे। ननिहाल और ददिहाल दोनों ओर धर्म की बड़ी चर्चा थी। हाई स्कूल की शिक्षा समाप्त हुई तो मेरा विवाह हो गया। और शादी होते ही मैं मॉडलिंग के पेशे से जुड़ गयी। अल्लाह ने मुझे सुन्दर बनाया था। फिर मैं मेहनत भी खूब करती थी। जल्द ही कारोबार चल निकला। पैसे की रेल-पेल हो गयी। गाड़ी, बंगला आदि सुख-सुविधाओं की सभी चीज़ें उपलब्ध हो गयीं। स्थिति यह हो गयी थी कि अपनी पसन्द का जूता खरीदने के लिए मैं हवाई जहाज़ से दूसरे शहर जाती थी। इसी बीच मैं एक बेटे और एक बेटी की मां भी बन गयी। परन्तु यह भी एक सच्चाई है कि नाना प्रकार की सुख सुविधाओं के बावजूद भी मैं संतुष्ट नहीं थी। कोई कसक थी जो मन को व्याकुल किये रखती थी। जीवन में शून्य का आभास बढ़ता जा रहा था। इसी बेचैनी में मैंने मॉडलिंग का पेशा त्याग दिया। और ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार में लग गयी। अब मैं विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जाने लगी। वहां पहुंचकर अपनी शिक्षा पूरी करने का विचार आया। मैंने विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। उस समय मेरी आयु 30 वर्ष थी। अब मेरा सोभाग्य कहिए कि मुझे एक ऐसी क्लास में दाखिला मिला जिसमें कालों और एशियाई मूल के छात्रों की संख्या अच्छी-खासी थी। यह देखकर मैं बहुत परेशान हुई, परन्तु अब क्या हो सकता था। मेरी उलझन उस समय और अधिक बढ़ गयी जब मुझे पता चला कि उनमें कई छात्र मुसलमान भी हैं। मुझे मुसलमानों से अत्यधिक घृणा थी। आम यूरोपीय सोच के अनुसार मेरा भी यही विचार था कि इस्लाम बर्बरता एवं जिहालत वाला धर्म है और मुसलमान असभ्य, अय्याश, महिलाओं पर अत्याचार करने वाले लोग होते हैं। अमेरिका और यूरोप के इतिहासकार एवं लेखकगण मुसलमानों के बारे में आमतौर पर यही कुछ लिखते हैं। बहरहाल मैंने अनेक उलझनों के साथ अपनी शिक्षा शुरू की। उस समय मैंने अपने आपको समझाया कि मैं एक मिशनरी हूं। क्या पता कि अल्लाह ने मुझे इनके सुधार के लिए यहां भेजा हो। इसलिए मुझे परेशान नहीं होना चाहिए। अतएव मैंने उस दृष्टि से परिस्थितियों का आकलन करना शुरू किया, लेकिन परिस्थितियों के आकलन के बाद मैं आश्चर्यचकित रह गयी। मुस्लिम छात्रों का रवैया अन्य छात्रों से बिल्कुल भिन्न था। वे सुलझे हुए थे और सभ्य एवं सम्मानजनक तरीके से रहते थे। वे आम अमेरिकी युवकों के विपरीत युवतियों से मेल-जोल को पसन्द नहीं करते थे। न वे आवारा थे, न ऐशपसन्दी के रसिया। मैं मिशनरी भावनाओं से उनसे बात करती। उनके सामने ईसाइयत के गुण-गान करती, तो वे बड़े सम्मानजनक ढंग से मिलते और बहस में उलझने के बदले मुस्कुराकर चुप हो जाते। मैंने अपने प्रयासों को विफल होते देखा तो सोचा कि इस्लाम का अध्ययन करना चाहिए ताकि उस की कमियों को जान सकूं और उन मुस्लिम छात्रों को नीचा दिखा सकूं। मगर दिल के किसी कोने में यह एहसास भी था कि ईसाई पादरी, लेखक और इतिहासकार तो मुसलमानों को वहशी, गंवार, जाहिल और न जाने किन-किन बुराइयों में लिप्त बताते हैं लेकिन अमेरिकी समाज में पले-बढ़े इन काले मुस्लिम नवजवानों में तो मुझे कोई विशेष बुराई दिखायी नहीं देती। बल्कि यह तो अन्य छात्रों से अधिक सुलझे हुए एवं श्रेष्ठ दिखायी देते हैं। फिर क्यों न स्वयं इस्लाम का अध्ययन करूं। और वास्तविकता तक पहुंचू। अतएव मैंने सबसे पहले कुरआन मजीद का अंग्रेजी अनुवाद पढऩा शुरू किया। और मैं आश्चर्यचकित रह गयी कि यह किताब दिल के साथ-साथ दिमाग को भी अपील करती है। ईसाइयत पर सोच-विचार के दौरान और बाइबल का अध्ययन करते समय मन में न जाने कितने विचार पैदाहोते थे, परन्तु किसी पादरी या किसी धार्मिक विद्वान के पास उन प्रश्रों का कोई जवाब न था। और यही प्यास आत्मा को तृप्त नहीं होने देती थी। परन्तु जब मैंने कुरआन पढ़ा तो उन सारे प्रश्रों के ऐसे जवाब मिल गये जो बुद्धि और विवेक से मेल खाते थे। और अधिक संतुष्टि के लिए अपने मुस्लिम सहपाठियों से बातचीत की । इस्लाम के इतिहास का अध्ययन किया, तो ऐसा आभास हुआ कि अब तक मैं अंधेरों में भटक रही थी। इस्लाम और मुसलमानों के बारे में मेरा दृष्टिकोण अन्याय और अज्ञानता पर आधारित था। और अधिक जानकारी के लिए मैंने हज़रत मुहम्मद सल्ल० की पाक जीवनी और उनकी शिक्षाओं का अध्ययन किया। और यह देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गयी कि अमेरिकी लेखकों के दुष्प्रचार के विपरीत अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्ल० मानव-जाति के महान उद्धारक और सच्चे शुभ-चिन्तक हैं। विशेष रूप से उन्होंने महिलाओं को जो सम्मान दिया है, उसकी पहले या बाद में कोई मिसाल नहीं मिलती। माहौल की मजबूरियों की बात दूसरी है, वरना मैं स्वभाव से बहुत शर्मीली हूं। और पति के सिवा किसी और से घनिष्ठता मुझे पसन्द नहीं है। अतएव जब मैंने पढा कि अल्लाह के रसूल सल्ल स्वयं भी बहुत शर्मीले थे और महिलाओं के लिए विशेष रूप से पाकीज़गी और हया की ताकीद किया करते थे, तो मैं बहुत प्रभावित हुई। और उसे महिलाओं के स्वभाव एवं प्रकृति के अनुरूप पाया। अल्लाह के रसूल हजऱत मुहम्मद सल्ल० ने महिलाओं को कितना ऊंचा मुका़म दिया है। इसका अनुमान निम्रलिखित हदीसों से होता है। जन्नत मां के कदमों में है। तुममें सबसे अच्छा व्यक्ति वह है, जो अपनी पत्नी और घर वालों से अच्छा सलूक करता है। मैं कुरआन मजीद और अल्लाह के रसूल सल्ल० की शिक्षाओं से संतुष्ट हो गयी। इस्लामी इतिहास के किरदारों ने मुसलमानों के बारे में मेरी सारी ग़लतफहमियों दूर कर दी। और मेरी अन्तरात्मा के सभी प्रश्रों के उत्तर मिल गये, तो मैंने इस्लाम स्वीकार करने का फैसला कर लिया और अपने मुस्लिम सहपाठियों को अपने फैसले से अवगत करा दिया। उन मुस्लिम छात्रों ने 21 मई 1977 ई० को इलाके के चार जि़म्मेदार मुसलमानों को बुला लिया। उसमें से एक नूर मस्जिद के इमाम थे। मैंने उनसे कुछ प्रश्र किये और कलिमा शहादत पढ़कर इस्लाम के आग़ोश में आ गयी। मेरे इस्लाम स्वीकार करने पर मेरे परिवार वालों पर तो मानो बिजली गिर पड़ी। मेरा पति मुझे बेहद प्यार करता था। मेरे इस्लाम स्वीकार करने की खबर से उसे दिली सदमा पहुंचा। मैं उसे पहले भी इस्लाम में लाने की कोशिश करती थी। अब भी मैंने उसे बहुत समझाने की कोशिश की। परन्तु उसका गुस्सा किसी तरह ठंडा नहीं हुआ। और उसने मुझसे अलग रहने का फैसला कर लिया। और मेरे विरूद्ध अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। अदालत ने अस्थायी तौर पर बच्चों के लालन-पालन की जि़म्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी। मेरे पिता भी मुझे बहुत चाहते थे, परन्तु इस सूचना ने उन्हें आपे से बाहर कर दिया। और गुस्से में मुझे शूट करने अपनी दो नाली बन्दूक लेकर मेरे घर चढ़ दौड़े। किसी तरह मैं बच तो गयी। लेकिन वे हमेशा के लिए मुझसे नाता तोड़कर चले गये। मेरी बड़ी बहन मनौवेज्ञानिक थी। उसने यह घोषणा कर दी कि मैं किसी दिमाग़ी बीमारी से पीडि़त हूं। और गंभीरतापूर्वक मुझे साइको इंस्टीटयूट में दाखिला कराने के लिए दौड़-धूप शुरू कर दी। मेरी शिक्षा पूरी हो चुकी थी। मैंने एक ऑफिस में नौकरी कर ली। एक दिन मेरी गाड़ी रास्ते में खराब हो गयी। और मैं देर से ऑफिस पहुंची। इसी आरोप से मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। मुझे यह समझते देर न लगी कि मुझे नौकरी से निकाले जाने का असल कारण ऑफिस देर से पहुंचना नहीं, बल्कि इस्लाम स्वीकार करना था। मेरे साथ एक परिस्थिति यह भी थी कि मेरा एक बच्चा जन्म से ही अपंग था। वह मानसिक रूप से विकसित नहीं था। अमेरिका के कानून के अनुसार तलाक का मुकदमा लंबित होने से मेरा बैंक खाता सील कर दिया गया था। नौकरी भी छूट गयी तो मैं बहुत घबराई और रोते हुए अल्लाह के सामने सजदे में गिर गयी। अल्लाह ने मेरी दुआ सुन ली और मेरी जानने वाली एक दयालु महिला के सहयोग से मुझे इस्टर सेल मे एक मुनासिब नौकरी मिल गयी। कम्पनी की ओर से मेरे अपंग बच्चे का इलाज भी होने लगा। कुछ दिनों के इलाज के बाद डॉक्टरों ने उसके दिमाग का ऑपरेशन करने का फैसला किया। और अल्लाह के फ़जल से ऑपरेशन सफल रहा और बच्चा ठीक हो गया। इसी तरह दो साल बीत गये। दो वर्ष बाद दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की एक आज़ाद अदालत ने मेरे मामले में फैसला दिया कि यदि बच्चों को अपने साथ रखना चाहती हो तो इस्लाम त्यागना होगा। अदालत का यह फैसला मुझ पर पहाड़ की तरह टूट पड़ा लेकिन फिर भी अपने को संभाल लिया। एक समय था कि मैं रविवार को आराम करने के बजाय संडे स्कूल में बच्चों को ईसाइयत के पाठ पढ़ाया करती थी। आज अल्लाह की कृपा से रविवार इस्लामिक सेन्ट्रों में गुजारती हूं और मुस्लिम बच्चों को दीनी शिक्षा के अलावा अन्य विषय भी पढ़ाती हूं। यह भी अल्लाह की ही तौफीक है कि मैंने विभिन्न जगहों पर मुस्लिम वीमेन स्टडी सर्किल कायम किए हैं। जिनमें गैर-मुस्लिम महिलएं भी आती हैं। मैं उन्हें बताती हूं कि इसी अमेरिका में सौ-सवा सौ साल पहले औरतों की खरीद-फरोख्त होती थी। एक औरत को घोड़ी से भी कम मूल्य यानी 150 डॉलर में खरीदा जा सकता था। जब मैं यह तुलनात्मक आंकड़े पेश करती हूं तो अमेरिकी महिलाओं के मुंह अश्चर्य से खुले रह जाते हैं। वह इस सिलसिले में शोध करती हैं, अध्ययन करती हैं और वे इस्लाम स्वीकार कर लेती हैं। अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है कि मेरी बातों से प्रभावित होकर अब तक लगभग 600 अमेरिकी महिलाएं इस्लाम के दायरे में दाखिल हो चुकी हैं।
Wednesday, October 14, 2009
इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया
अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया।करीम अब्दुल जब्बार अमेरिका के मशहूर बास्केटबॉल खिलाड़ी
करीम अब्दुल जब्बार अमेरिकी नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन के छह बार बेशकीमती खिलाड़ी के रूप में चुने गए। उन्हें बास्केटबॉल का हर समय महान खिलाड़ी माना गया। वे अपन हरलेम के बाशिन्दे थे और फरडीनेन्ड लेविस एलसिण्डर के रूप में पैदा हुए। बास्केटबॉल में एक नया शॉट स्काई हुक ईजाद करने वाले करीम अब्दुल जब्बार ने इस शॉट के जरिए बास्केटबॉल खेल में अपनी खास पहचान बनाई।
सबसे पहले करीम अब्दुल जब्बार ने इस्लाम हम्मास अब्दुल खालिस नामक एक मुस्लिम व्यक्ति से सीखा। खालिस ने उन्हें बताया कि हर एक को चाहे वह नन हो,संन्यासी,अध्यापक,खिलाड़ी अथवा टीचर,सभी को संजीदगी से ईश्वरीय आदेश पर गौर करना चाहिए। इस बात पर ध्यान देने के बाद वे खालिस क ी इस्लामिक बातों पर चिंतन करने लगे,साथ ही उन्होने कुरआन का अध्ययन करना शुरू कर दिया। कुरआन अच्छी तरह समझने के लिए उन्होने बेसिक अरबी सीखी। उन्होने इस्लाम को अच्छी तरह सीखने के मकसद से १९७३ में सऊदी अरब और लीबिया का सफर किया। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर में अटूट भरोसा करते हैं और साथ ही उनका पुख्ता यकीन है कि कुरआन अल्लाह का आखरी आदेश है और मुहम्मद सल्ललाहो अलैहेवसल्लम अल्लाह के आखरी पैगम्बर हंै। करीम अब्दुल जब्बार स्वीकार करते हैं कि जितना उनसे मुमकिन होगा वे इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने की कोशिश करेंगे।
ये अंश अब्दुल करीम की किताब करीम से लिए गए हैं जो १९९० में प्रकाशित हुई थी। इस किताब में उन्होने अपने इस्लाम कबूल करने के कारणों पर प्रकाश डाला है।।
़अमेरिका में बड़ा होकर आखिरकार मैंने पाया कि जज्बाती और रूहानी तौर पर मैं जातिवादी विचारधारा की संकीर्णता में नहीं बंध सकता। जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ तो मुझे यही समझ आया कि काले लोग या तो बहुत अच्छे हैं या फिर बहुत खराब। मेरे इर्द गिर्द ऐसा ही कुछ था। वह काला आदमी जिसका मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ा मैलकम एक्स था। मैं रोज काले मुस्लिमों का अखबार मुहम्मद स्पीक्स पढ़ता था। लेकिन साठ के शुरूआत में काले मुस्लिमों की जातिवाद की संकीर्ण सोच मुझे मंजूर नहीं थी। इस सोच में गौरे लोगों के प्रति उनकी उसी तरह की दुश्मनी दिखाई पड़ती थी,जैसी कि गौरों की कालों के प्रति थी। यही वजह है कि मैं इस विचाधारा के खिलाफ था। मेरा मानना था कि क्रोध और नफरत से आप किसी चीज को थोड़ा ही बदल सकते हैं।--- लेकिन मैलकम एक्स एक अलग ही व्यक्तित्व था। इस्लाम कबूल करने के बाद वह मक्का हज करने गया और उसने वहां जाना कि इस्लाम तो सभी रंगों के लोगों को सीने से लगाता है। बदकिस्मती से १९६५ में उसक ी हत्या कर दी गई। हालांकि तब मैं उसके बारे मे ज्यादा नहीं जानता था लेकिन मुझे बाद में मालूम हुआ कि वह कालों की उन्नति और खुद की मदद खुद करने की बात करता था। मैं उसक ी सबके साथ समान व्यवहार करने की सोच को पसंद करता था।
़१९६६ में मैलकम एक्स की जीवनी पर किताब छपकर आई जिसे मैंने पूरी पढ़ डाली। उस वक्त मै उन्नीस साल का हुआ ही था। इस किताब ने मेरे जीवन पर ऐसी छाप छोड़ी जो अब तक कोई किताब नहीं छोड़ पाई थी। इस किताब ने मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। मैं सब चीजों को अलग ही नजरिए से देखने लगा। मैलकम ने गौरों और काले लोगों के बीच आपसी सहयोग का माहौल बनाया। वह सच्ची बात करता था। इस्लाम की बात करता था। मैं भी उसकी राह चल पड़ा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
टाल्क एशिया से साक्षात्कार
यह साक्षात्कार २जुलाई २००५ को टाल्क एशिया के स्टेन ग्रान्ट ने लिया था।
आप लेविस एलसिण्डर से करीम अब्दुल जब्बार हो गए। आप लेविस एलसिण्डर से करीम अब्दुल जब्बार होने के सफर के बारे में बताएं? क्या अब भी आपके अन्दर कुछ लेविस एलसिण्डर बाकी है?
मैंने लेविस एलसिण्डर से बाहर निकलकर ही अपना जीवन शुरू किया है। मैं अब भी अपने माता-पिता का बच्चा हूं। मेरे लिए मेरे चचेरे भाई वैसे ही हैं लेकिन मैंने एक नया रास्ता चुना। मैं सोचता हूं कि यह रास्ता मेरी बेहतरी के लिए है। मैं करीम अब्दुल जब्बार के रूप में बेहतर इंसान बना हूं। मुझे इसका अफसोस नहीं है कि मैं क्या था और क्या हो गया।
इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने पर आपको कैसा महसूस हुआ?
अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया। इस्लाम ने मुझे पूरी तरह भौतिकवादी बनने से बचाया और साथ ही मुझे दुनिया क ो देखने का एक खास नजरिया दिया। मेरे लिए यह आसान इसलिए भी हुआ कि मेरे नजदीकी लोगों ने मेरा साथ दिया। मेरे माता-पिता,मेरे कोच जॉन वूडन मेरे साथ थे। इस्लाम स्वीकार करने पर क्या लोगों ने आपसे दूरी बना ली या आपके साथ उनके व्यवहार में किसी तरह का बदलाव आया?
मैं लोगों से नरमी के साथ पेश आया। मैंने अपने कंधे पर पहचान का कोई पट्टी नहीं बांध रखी थी। मैं तो लोगों को सिर्फ यह समझाता था कि मैं मुस्लिम हूं और जैसा कि मैंने महसूस किया मेरे हक में यह रास्ता सबसे बेहतर था।मेरी सोच यह नहीं रही कि दूसरे मुझे स्वीकार करे तो ही मैं उनको स्वीकार करूं। और ना ही ऐसा था कि अगर आप मेरे दोस्त हैं तो आपको भी मुस्लिम बनना पड़ेगा। मैंने लोगों की भावनाओं का सम्मान किया,जैसा कि मैं भी उम्मीद करता था कि लोग मेरी भावनाओं का भी सम्मान करें।
उस व्यक्ति को कैसा महसूस होता होगा जब उसको पुराने नाम के बजाय एक नए नाम से पुकारा जाए? आप में कितना बदलाव आया?
इस्लाम ने मुझे बहुत सहनशील बना दिया। मैंने कई बातों में अन्तर पाया। जैसा कि आप जानते हंै मैं अलग हूं लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते कि मैं कहां से जुड़ा रहा हूं। यही वजह है कि अमेरिका में ११सितम्बर के हमले के बाद मुझे अपने बारे में लोगों क ो काफी समझाने की जरूरत पड़ी।
क्या इस्लाम कबूल करने वाले आप जैसे लोगों के लिए कोई बंदिश या इसमें रोड़ा बनने वाला कोई नियम या प्रावधान है? क्या आप ऐसा महसूस करते हंै? नहीं, मैं ऐसा महसूस नहीं करता,लेकिन हां,मुझे दुख हुआ कि बहुत से लोगों ने मेरी वफादारी पर सवाल उठाए। लेकिन मैं तो शुरू से ही एक देशभक्त अमेरिकन रहा हूं।
बहुत से काले अमेरिकी इस्लाम कबूल कर रहे हैं जो कि एक तरह से सियासत से जुड़ा मामला नजर आता है। क्या आपका मामला भी ऐसा ही कुछ रहा?इस्लाम का चुनाव मेरा राजनैतिक फैसला नहीं था। यह आत्मा से लिया फैसला था। बाइबिल और कुरआन पढऩे के बाद मैं यह समझने काबिल हुआ कि कुरआन बाइबिल के बाद आया हुआ ईश्वरीय संदेश है। मैंने कुरआन की शिक्षा पर चिंतन किया और इसका अनुसरण किया। मैं नहीं मानता कि जिसको जो तालीम अच्छी लगती हो उस पर अमल करने से कोई उसे रोकता हो। कुरआन हमें बताता है कि सभी इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए और यहूदी,ईसाई और मुस्लिम एक से पैगम्बरों को मानते हैं।
आपके लेखन में भी इस तरह का प्रभाव देखने को मिलता है।
हां,इसमें है। जातीय बराबरी न होने का कड़वा अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं अमेरिका में बच्चा ही था। मुझ पर सिविल राइट्स मूवमेंट का गहरा असर पड़ा। मैंने देखा लोग अपना जीवन खतरे में डाल रहे थे। वे पिटते थे। उन पर कुत्तों से हमला किया जा रहा था। उन पर गोलियां बरसाईं जा रही थी फिर भी वे अंहिसात्मक तरीके से मुकाबला कर रहे थे। इसने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला।
Sunday, October 11, 2009
एक पत्रकार का इस्लाम कबूल करना
सारी दुनिया निकट भविष्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस्लाम को अपना लेगी।
अब्दुल्लाह अडियार, तमिलनाडु के प्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार और पत्रकार
इस्लाम कबूल करने के पहले अब्दुल्लाह अडियार डी।एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की।जनाब अब्दुल्लाह अडियार महरहूम तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि, प्रत्रकार, उपन्यासकार और पटकथा लेखक थे।
उनका जन्म 16 मई 1935 को त्रिरूप्पूर (तमिलनाडु) में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कोयम्बटूर में हुई। वे नास्तिक थे, लेकिन विभिन्न धर्मों की पुस्तकें पढ़ते रहते थे। किसी पत्रकार और साहित्यकार को विभिन्न धर्मों के बारे में भी जानकारी रखनी पड़ती है। जनाब अब्दुल्लाह अडियार अध्ययन के दौरान इस परिणाम पर पहुंचे कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है और मनुष्य के कल्याण की शिक्षा देता है। आखिरकार 6 जून 1987 ई. को वे मद्रास स्थित मामूर मस्जिद गए और इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने के पहले वे डी.एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की। इमरजेंसी के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और काफी प्रताडि़त किया गया। जेल में उन्होंने जनाब यूसुफ अली का कुरआन मजीद का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा और उससे काफी प्रभावित हुए। इस्लाम (इस्लाम जिससे मुझे प्यार है) पुस्तिका लिखी, जिसका बाद में हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, सिन्धी, मलयालम और उर्दू में अनुवाद हुआ। उनकी पत्नी थयम्मल जो ईसाई थीं, इस पुस्तक को पढ़कर मुसलमान हो गयीं। इसे पढ़कर उ.प्र. के एक जमीदार 1987 ई. में मुसलमान हो गए। जनाब अब्दुल्लाह अडियार को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान आमंत्रित किया और विशेष अतिथि के रूप में उनका स्वागत किया। वे प्रखर वक्ता भी थे और इस्लाम पर धाराप्रवाह बोलते थे। उनके ब्रिटेन में अनेक संभाषण हुए, जिनका विषय था हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का पवित्र जीवन। इनके कैसेट उपलब्ध हैं। वे तमिलभाषियों के आमंत्रण पर श्रीलंका और सिंगापुर भी गए। 1932 में तमिलनाडु सरकार ने तमिल साहित्य के विशिष्ट पुरस्कार 'कलाईमम्मानीÓ से उन्हें पुरस्कृत किया। इमरजेंसी के बाद उन्होंने 'नीरोतमÓ (पत्रिका) का प्रकाशन किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। उन्होने नीरोतम प्रकाशन से ही 'तंगागुरूदुनÓ(पत्रिका) भी प्रकाशित की। जनाब अडियार इस्लाम को एकमात्र मुक्ति मार्ग के रूप में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने मद्रास में इस्लामिक दावा सेन्टर कायम किया। वे 6 करोड़ तमिल जनता को इस्लाम का संदेश पहुंचाने के लिए एक इस्लामी टी.वी. चैनल की स्थापना हेतु प्रयासरत रहे। 20 सितम्बर 1996 (जुमा के दिन) को कोडम्बकम में उनकी मृत्यु हो गयी।
Friday, October 9, 2009
हम ईश्वर की शरण में आना चाहते थे

Thursday, October 8, 2009
'दुनिया सुन ले कि मैंने इस्लाम क़बूल कर लिया है' -- कमला
कमलादास) उपन्यासकार , कवयित्री हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध् लेखिका और शोधकर्ता हैं। उन्होंने 12 दिसम्बर 1999 ई. को इस्लाम स्वीकार किया तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के धार्मिक और शैक्षिक क्षेत्रों में तहलका मच गया। नीचे उनके इस्लाम क़बूल करने की घटना ब्यान की जा रही है। यह लेख कई अलग-अलग लेखों की सहायता से तैयार किया गया है।........डाक्टर कमला सुरैया 1934 ई. में दक्षिणी भारत के केरल राज्य के एक इलाक़े पन्ना पूरकलम (जनपद थ्रेसर) में पैदा हुईं। उनका सम्बन्ध नायर जाति के एक अमीर हिन्दू घराने से है। उनकी माँ निलापत बिलामनी मलयालम भाषा की कवयित्री थीं, जबकि पिता बी. एम. नायर प्रसिद्ध पत्रकार थे और एक ही समय में दो पत्रिकाओं के सम्पादक थे। उनके पति स्वर्गीय मध्वादास इण्टरनेशनल मानीटरी फण्ड (IMF) के सीनियर कंसलटेंट थे।
मुहम्मद सल्ल. के साथ हुआ कि जन्म और निधन की तारीख भी एक थी (महीना भी) एक हों, अल्लाह जन्नत नसीब करे इस बेबाक लेखिका को, आमीन--- मुहम्मद उमर कैरानवी
Saturday, October 3, 2009
एक लाख चौवीस हज़ार ?

आज एक सज्जन ने बड़ा अच्छा प्रश्न किया कि क्यों ईश्वर ने एक लाख चौबीस हज़ार संदाष्टाओं को भेजा? शायद प्रमात्मा पहली बार सही धर्म न भेज पाया, क्यों नबियों का संदेश अधोरा रहा ? यह एक संदेह है जिसका निवारण होना चाहिए ताकि सत्य खुल कर सामने आ सके। इसी उद्देश्य के अन्तर्गत आपकी सेवा में हम यह लेख प्रस्तुत कर रहे हैं।यह सत्य है कि इस्लाम उसी समय से है जिस समय से मानव है। प्रथम मानव को इस्लाम ही की शिक्षा दी गई थी। औऱ इसी शिक्षा को मानव तक पहुचाने के लिए हर युग में संदेष्टा आते रहे। शुरु में हर एक जाति में अलग-अलग संदेशवहाक आते थे,उनकी शिक्षायें उनकी जाति तक ही सीमित रहती थीं। और उन्हें एक पूर्ण जीवन व्यवस्था भी नही दिया जाता था। उसका कारण यह था कि उस समय प्रत्येक जातियाँ एक दूसरे से अलग थीं। उनके बीच अधिक मेल जूल न था। भाषायें विभिन्न होती थीं, जिन्हें सीखने की ओर लेग बहुत कम ध्यान देते थे। मानव बुद्धि भी बहुत सीमित थी, ऐसी स्थिती में एक ही शिक्षा का प्रत्येक जातियो में फैलाना अत्यन्त कठिन था, क्यों कि मानव जाति की प्रगति उसी प्रकार हुई है जिस प्रकार एक बच्चे की प्रगति होती है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था फिर युवावस्था। इस प्रकार ईश्वरीय संदेश का भी उसी युग के अनुसार होना आवश्यक था। अतएवं ईश्वर ने रोगी की सामर्थ्य के अनुकुल औषधि का भी चयन किया और मानव जाति को इतने ही आदेश दिए जिसकी वह शक्ति रखती हो।इसी लिए उनको पूर्ण-जीवन व्यवस्था नहीं दिया गया। यह उस तत्वदर्शी ईश्वर की तत्वदर्शीता थी।
जबकि हम देखते हैं कि सातवीं शताब्दि ई0 मे ऐसी स्थिती नहीं थी। यातयात के साधन बहुत हद तक ठीक हो गए थे। व्यापार, कला-कौशल, की उन्नति के साथ साथ जातियों में परस्पर सम्बन्ध का़यम हो गये थे। चीन और जापान से लेकर यूरोप और अफ्रीक़ा के देशों तक जलीय तथा स्थलीय यात्राओं की शुरुआत हो गई थी बड़े बडे़ विजेताओ ने कई कई देशो को एक राजनीतिक व्यवस्था से जोड़ दिया था। इस प्रकार वह दूरी और जुदाई जो पहले मानव जाति के बीच पाई जाती थी धीरे धीरे कम होती गई और यह सम्भव हो गया कि इस्लाम की एक ही शिक्षा और एक ही धर्म विधान प्रत्येक संसार के लिए भेजा जाय़े। इस संक्षिप्त विवरण से शायद संदेह का निवारण हो गया होगा ।
विश्व संदेश मक्का में क्यों?
(1) यह देश एशिया और अफ्रीका के ठीक मध्य में स्थित है और यूरोप भी यहां से बहुत निकट है। अन्य अधिक लोगों ने भौगोलिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि थल भाग में मक्का भूतल के बीचोबीच स्थित है। इस प्रकार विश्व नायक का संसार के मध्य में आना अधिक उचित था।
(2) अरब हर प्रकार की बुराइयों में लतपथ होने के बावजूद भी वीर थे ,निडर थे,दानशील और उदार थे, स्वतन्त्र विचार रखने वाले थे, अपनी प्रतिष्ठा के लिए प्राण निछावर कर देना उसके लिए सरल था।
(3) इस देश में कोई शासक भी नहीं था,जो ईश्वरीय आदेश के विरोद्ध में खडा़ होता। क्यों कि इतिहास साक्षी है कि जिस दश एवं जाति में भी ईश्दूत भेजे गए सर्वप्रथम उस देश के राजाओं एवं प्रजाओं ने उन का विरोध किया कि कहीं हमारी हुकुमत न छिन जाये। यहाँ तक कि किसी की हत्या की गई,किसी को देश निकाला कर दिया गया।
इस्लाम ही क्यो?
अब प्रश्न यह उठता है कि इंसान के लिए वह कौन सी प्रकाशना है जिस का वह पालना करके स्वर्ग का अधिकार बन सकता है तो उस का उत्तर बिल्कुल आसान है कि बाद के लोगों के लिए वही प्रकाशना पालना करने योग्य हो सकती है जो सब के बाद आई हो।
सरकार एक देश में किसी व्यक्ति को अपना राजदूत बनाकर भेजती है स्प्रष्ट है कि उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व उसी समय तक के लिए है जब तक वह अपने पद पर आसीन है, जब उसकी अवधि समाप्त हो जाये और दूसरे व्यक्ति को उस पद पर नियुक्त कर दिया जाये तो उसके बाद वही व्यक्ति सरकार का प्रतिनिधि समझा जाएगा। इस एतबार से मुहम्मद सल्ल० ही वह अन्तिम संदेष्टा हैं जो आज और आगे प्रलय के दिन तक मानवता के पथप्रदर्शक और नायक हैं। आपका प्रत्येक संदेष्टाओं के बाद आना इस बात का पर्याप्त कारण है कि आपको और केवल आपको वर्तमान और भविष्य के लिए ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाये।
हो सकता है कि मानव इतिहास की सब से आरंभिंक और प्रचीन धार्मिक पुस्तक ऋवग्वेद हो जो ईश्वर के आदेसानुसार संपादित की गई हो जैसा कि बाईबल भी ईश्वरीय ग्रन्थ था परन्तु यह सब अब निरस्त हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त इस में से कोई ग्रन्थ भी अपने आपको अन्तिम और स्थाई ग्रन्थ के रुप में प्रस्तुत नहीं करता, यदि रामचन्द्र जी की शिक्षा शुद्ध रुप में मौजूद होती तो श्रीकृष्ण जी की आवश्कता न पड़ती, अतः केवल यह बात कि कुरआन अन्तिम ग्रन्थ है उस से पूर्व आने वाले प्रत्येक ग्रन्थों को निरस्त करता है।
Friday, October 2, 2009
इस्लाम में पडोसी के अधिकार

इस्लाम में पडोसी का पूरा खयाल रखने,उसके सुख दुख में भागीदार बनने और किसी भी तरह उसको दुख न पहुचाने की सख्त ताकीद की गई है। पडोस से बेपरवाह व्यक्ति को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराकर बताया गया है कि एक पडोसी के रूप में उसकी क्या-क्या जिम्मेदारियां हैं। पडोसी चाहे किसी भी मजहब का मानने वाला हो ,उसके प्रति ये पूरे हक अदा किए जाने चाहिए।
कुरआन और हदीस में पडोसियों के साथ अच्छे बर्ताव के हुक्म दिए गए हैं। इस्लाम के आखरी पैगम्बर मुहम्मद सल्लललाहो अलैहेवसल्लम ने फरमाया-जिसकी तकलीफों और शरारतों से पडोसी सुरक्षित नहीं,वह ईमानवाला नहीं है।पडोसी के साथ जुडाव लगाव और उसका हमदर्द बनने पर कितना जोर दिया गया है,इसका अंदाजा पैगम्बर की इस बात से होता है-पैगम्बर कहते हैं-’अल्लाह जिबी्रल फरिशते के जरिए मुझे पडोसी के बारे में बराबर ताकीद करते रहे,यहां तक कि मुझे खयाल होने लगा कि पडोसी को सम्पति का वारिस बना देंगे।‘ पडोसी का हर मामले में खयाल रखने पर जोर दिया गया है।खाने-पीने की चीजों में भी पडोसी को शामिल करने का हुक्म दिया गया है। हुजूर ने फरमाया-जो शख्स खुद पेट भरकर सोया और उसका पडोसी उसके पडोस में भूखा पडा रहा वह मुझ पर ईमान नहीं लाया।
इस्लाम में नमाज,रोजा,जकात आदि इबादतों के जरिए कर्मों को सुधारकर इंसानी भाईचारे,इंसानियत और इंसाफ पर जोर दिया गया है। नमाज,रोजा ,जकात को साधन और इनके असर से होने वाले अच्छे अमल को साध्य माना गया हैै। पडोसी के साथ अच्छे अमल के इस उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है- एक आदमी ने पैगम्बर मुहम्मद साहब से कहा कि फलां औरत नमाज पढती है,रोजे उपवास रखती है, खैरात गरीबों को मदद देती है लेकिन पडोसियों को गलत जुबानी से सताती रहती है। पैगम्बर ने कहा ऐसी औरत जहन्नुम में जाएगी। इसी तरह एक दूसरी औरत के बारे में उनसे कहा गया उसकी नमाज,रोजा कम है,खैरात भी कम देती है लेकिन उसके पडोसी इससे महफूज है। पैगम्बर ने कहा-वह औरत जन्नत में जाएगी। एक मौके पर मुहम्मद साहब ने कहा-पडोसी का बच्चा घर आ जाए तो उसके हाथ में कुछ न कुछ दो कि इससे मोहब्बत बढेगी। पडोसी का पडोसी से रिश्ता अच्छा और मजबूत बनाने के मकसद से कई हिदायतें दी गईं। हिदायत दी गई है कि पडोसी किसी भी तरह अपने पडोसी पर जुल्म न करे।
पैगम्बर साहब ने फरमाया-जिसने पडोसी को सताया उसने मेरे को सताया और जिसने मेरे को सताया उसने खुदा को सताया। इन सब बातों से जाहिर है कि कैसे पडोसी से पडोसी के रिश्ता को मजबूत करने की कोशिश की गई है । इसके पीछे मकसद है विशव बन्धुत्व की भावना को बढावा देना। क्योंकि भौगोलिक आधार पर देखा जाए तो सबसे छोटी इकाई पडोस ही है। पडोसों में भाईचारा होगा तो बस्ती या इलाके में भाईचारा होगा और फिर यह भाईचारा कस्बे,शहर,राज्य,देश से बढते-बढते बढेगा विशव बन्धुत्व की ओर।