Sunday, February 21, 2010
इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान
ईमानवालों के साथ दुश्मनी करने में यहूदियों और बहुदेववादियों को तुम सब लोगों से बढ़कर सख्त पाओग। और ईमानवालों के साथ दोस्ती के मामले में सब लोगों में उनको नजदीक पाओगे जो कहते हैं कि हम नसारा (ईसाई) हैं। यह इस वजह से है कि उनमें बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं और इस वजह से कि वे घमण्ड नहीं करते।
जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।
(सूरा:अल माइदा ८२-८३)
कुरआन की ये वे आयतें हंै जिन्हें इंग्लैण्ड में अपने स्टूडेण्ट्स को पढ़ाते वक्त इदरीस तौफीक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें इस्लाम की तरफ लाने में ये आयतें अहम साबित हुईं।
काहिरा के ब्रिटिश परिषद में दिए अपने एक लेक्चर में तौफीक ने साफ कहा कि उसे अपनी पिछली जिंदगी और वेटिकन में पादरी के रूप में गुजारे पांच साल को लेकर किसी तरह का अफसोस नहीं है। मै एक पादरी के रूप में लोगों की मदद कर खुशी महसूस करता था लेकिन फिर भी दिल में सुकून नहीं था। मुझो अहसास होता था कि मेरे साथ सब कुछ ठीकठाक नहीं है। अल्लाह की मर्जी से मेरे साथ कुछ ऐसे संयोग हुए जिन्होंने मुझो इस्लाम की तरफ बढ़ाया। ब्रिटिश परिषद के खचाखच भरे हॉल में तौफीक ने यह बात कही।
तौफीक के लिए दूसरा अच्छा संयोग यह हुआ कि उन्होंने वेटिकन को छोड़कर इजिप्ट का सफर करने का मन बनाया।
मैं इजिप्ट को लेकर अकसर सोचता था-एक ऐसा देश जिसकी पहचान पिरामिड,ऊंट,रेगिस्तान और खजूर के पेड़ों के रूप में है। मैं चार्टर उड़ान से हरगाडा पहुंचा। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि यह तो यूरोपियन देशों के दिलचस्प समुद्री तटों की तरह ही खूबसूरत था। मैं पहली बस से ही काहिरा पहुंचा जहां मैंने एक सप्ताह गुजारा। यह सप्ताहभर का समय मेरी जिंदगी का अहम और दिलचस्प समय रहा। यहीं पर पहली बार मेरा इस्लाम और मुसलमानों से परिचय हुआ। मैंने देखा कि इजिप्टियन कितने अच्छे और व्यवहारकुशल होते हैं,साथ ही साहसी भी।
ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर,आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही इमेज पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी कि इस्लाम तो उपद्रवी मजहब है।
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Friday, December 4, 2009
क्रिकेटर ब्रायन लारा मुसलमान हो गए
खबर यह है कि पाकिस्तानी क्रिकेटर सईद अनवर और पाकिस्तान के पूर्व पॉप स्टार जूनेद जमशेद के हाथों ब्रायन लारा ने इस्लाम कबूल कर लिया है।
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Monday, November 2, 2009
इस्लाम ने मुझे नयी जिंदगी दी

Wednesday, October 14, 2009
इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया
अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया।करीम अब्दुल जब्बार अमेरिका के मशहूर बास्केटबॉल खिलाड़ी
करीम अब्दुल जब्बार अमेरिकी नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन के छह बार बेशकीमती खिलाड़ी के रूप में चुने गए। उन्हें बास्केटबॉल का हर समय महान खिलाड़ी माना गया। वे अपन हरलेम के बाशिन्दे थे और फरडीनेन्ड लेविस एलसिण्डर के रूप में पैदा हुए। बास्केटबॉल में एक नया शॉट स्काई हुक ईजाद करने वाले करीम अब्दुल जब्बार ने इस शॉट के जरिए बास्केटबॉल खेल में अपनी खास पहचान बनाई।
सबसे पहले करीम अब्दुल जब्बार ने इस्लाम हम्मास अब्दुल खालिस नामक एक मुस्लिम व्यक्ति से सीखा। खालिस ने उन्हें बताया कि हर एक को चाहे वह नन हो,संन्यासी,अध्यापक,खिलाड़ी अथवा टीचर,सभी को संजीदगी से ईश्वरीय आदेश पर गौर करना चाहिए। इस बात पर ध्यान देने के बाद वे खालिस क ी इस्लामिक बातों पर चिंतन करने लगे,साथ ही उन्होने कुरआन का अध्ययन करना शुरू कर दिया। कुरआन अच्छी तरह समझने के लिए उन्होने बेसिक अरबी सीखी। उन्होने इस्लाम को अच्छी तरह सीखने के मकसद से १९७३ में सऊदी अरब और लीबिया का सफर किया। वे सर्वशक्तिमान ईश्वर में अटूट भरोसा करते हैं और साथ ही उनका पुख्ता यकीन है कि कुरआन अल्लाह का आखरी आदेश है और मुहम्मद सल्ललाहो अलैहेवसल्लम अल्लाह के आखरी पैगम्बर हंै। करीम अब्दुल जब्बार स्वीकार करते हैं कि जितना उनसे मुमकिन होगा वे इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने की कोशिश करेंगे।
ये अंश अब्दुल करीम की किताब करीम से लिए गए हैं जो १९९० में प्रकाशित हुई थी। इस किताब में उन्होने अपने इस्लाम कबूल करने के कारणों पर प्रकाश डाला है।।
़अमेरिका में बड़ा होकर आखिरकार मैंने पाया कि जज्बाती और रूहानी तौर पर मैं जातिवादी विचारधारा की संकीर्णता में नहीं बंध सकता। जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ तो मुझे यही समझ आया कि काले लोग या तो बहुत अच्छे हैं या फिर बहुत खराब। मेरे इर्द गिर्द ऐसा ही कुछ था। वह काला आदमी जिसका मेरे जीवन पर गहरा असर पड़ा मैलकम एक्स था। मैं रोज काले मुस्लिमों का अखबार मुहम्मद स्पीक्स पढ़ता था। लेकिन साठ के शुरूआत में काले मुस्लिमों की जातिवाद की संकीर्ण सोच मुझे मंजूर नहीं थी। इस सोच में गौरे लोगों के प्रति उनकी उसी तरह की दुश्मनी दिखाई पड़ती थी,जैसी कि गौरों की कालों के प्रति थी। यही वजह है कि मैं इस विचाधारा के खिलाफ था। मेरा मानना था कि क्रोध और नफरत से आप किसी चीज को थोड़ा ही बदल सकते हैं।--- लेकिन मैलकम एक्स एक अलग ही व्यक्तित्व था। इस्लाम कबूल करने के बाद वह मक्का हज करने गया और उसने वहां जाना कि इस्लाम तो सभी रंगों के लोगों को सीने से लगाता है। बदकिस्मती से १९६५ में उसक ी हत्या कर दी गई। हालांकि तब मैं उसके बारे मे ज्यादा नहीं जानता था लेकिन मुझे बाद में मालूम हुआ कि वह कालों की उन्नति और खुद की मदद खुद करने की बात करता था। मैं उसक ी सबके साथ समान व्यवहार करने की सोच को पसंद करता था।
़१९६६ में मैलकम एक्स की जीवनी पर किताब छपकर आई जिसे मैंने पूरी पढ़ डाली। उस वक्त मै उन्नीस साल का हुआ ही था। इस किताब ने मेरे जीवन पर ऐसी छाप छोड़ी जो अब तक कोई किताब नहीं छोड़ पाई थी। इस किताब ने मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। मैं सब चीजों को अलग ही नजरिए से देखने लगा। मैलकम ने गौरों और काले लोगों के बीच आपसी सहयोग का माहौल बनाया। वह सच्ची बात करता था। इस्लाम की बात करता था। मैं भी उसकी राह चल पड़ा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
टाल्क एशिया से साक्षात्कार
यह साक्षात्कार २जुलाई २००५ को टाल्क एशिया के स्टेन ग्रान्ट ने लिया था।
आप लेविस एलसिण्डर से करीम अब्दुल जब्बार हो गए। आप लेविस एलसिण्डर से करीम अब्दुल जब्बार होने के सफर के बारे में बताएं? क्या अब भी आपके अन्दर कुछ लेविस एलसिण्डर बाकी है?
मैंने लेविस एलसिण्डर से बाहर निकलकर ही अपना जीवन शुरू किया है। मैं अब भी अपने माता-पिता का बच्चा हूं। मेरे लिए मेरे चचेरे भाई वैसे ही हैं लेकिन मैंने एक नया रास्ता चुना। मैं सोचता हूं कि यह रास्ता मेरी बेहतरी के लिए है। मैं करीम अब्दुल जब्बार के रूप में बेहतर इंसान बना हूं। मुझे इसका अफसोस नहीं है कि मैं क्या था और क्या हो गया।
इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने पर आपको कैसा महसूस हुआ?
अगर मैं इस्लाम ना अपनाता तो एक खिलाड़ी के रूप में इतना कामयाब ना होता। इस्लाम ने मुझे नैतिक सम्बल दिया। इस्लाम ने मुझे पूरी तरह भौतिकवादी बनने से बचाया और साथ ही मुझे दुनिया क ो देखने का एक खास नजरिया दिया। मेरे लिए यह आसान इसलिए भी हुआ कि मेरे नजदीकी लोगों ने मेरा साथ दिया। मेरे माता-पिता,मेरे कोच जॉन वूडन मेरे साथ थे। इस्लाम स्वीकार करने पर क्या लोगों ने आपसे दूरी बना ली या आपके साथ उनके व्यवहार में किसी तरह का बदलाव आया?
मैं लोगों से नरमी के साथ पेश आया। मैंने अपने कंधे पर पहचान का कोई पट्टी नहीं बांध रखी थी। मैं तो लोगों को सिर्फ यह समझाता था कि मैं मुस्लिम हूं और जैसा कि मैंने महसूस किया मेरे हक में यह रास्ता सबसे बेहतर था।मेरी सोच यह नहीं रही कि दूसरे मुझे स्वीकार करे तो ही मैं उनको स्वीकार करूं। और ना ही ऐसा था कि अगर आप मेरे दोस्त हैं तो आपको भी मुस्लिम बनना पड़ेगा। मैंने लोगों की भावनाओं का सम्मान किया,जैसा कि मैं भी उम्मीद करता था कि लोग मेरी भावनाओं का भी सम्मान करें।
उस व्यक्ति को कैसा महसूस होता होगा जब उसको पुराने नाम के बजाय एक नए नाम से पुकारा जाए? आप में कितना बदलाव आया?
इस्लाम ने मुझे बहुत सहनशील बना दिया। मैंने कई बातों में अन्तर पाया। जैसा कि आप जानते हंै मैं अलग हूं लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते कि मैं कहां से जुड़ा रहा हूं। यही वजह है कि अमेरिका में ११सितम्बर के हमले के बाद मुझे अपने बारे में लोगों क ो काफी समझाने की जरूरत पड़ी।
क्या इस्लाम कबूल करने वाले आप जैसे लोगों के लिए कोई बंदिश या इसमें रोड़ा बनने वाला कोई नियम या प्रावधान है? क्या आप ऐसा महसूस करते हंै? नहीं, मैं ऐसा महसूस नहीं करता,लेकिन हां,मुझे दुख हुआ कि बहुत से लोगों ने मेरी वफादारी पर सवाल उठाए। लेकिन मैं तो शुरू से ही एक देशभक्त अमेरिकन रहा हूं।
बहुत से काले अमेरिकी इस्लाम कबूल कर रहे हैं जो कि एक तरह से सियासत से जुड़ा मामला नजर आता है। क्या आपका मामला भी ऐसा ही कुछ रहा?इस्लाम का चुनाव मेरा राजनैतिक फैसला नहीं था। यह आत्मा से लिया फैसला था। बाइबिल और कुरआन पढऩे के बाद मैं यह समझने काबिल हुआ कि कुरआन बाइबिल के बाद आया हुआ ईश्वरीय संदेश है। मैंने कुरआन की शिक्षा पर चिंतन किया और इसका अनुसरण किया। मैं नहीं मानता कि जिसको जो तालीम अच्छी लगती हो उस पर अमल करने से कोई उसे रोकता हो। कुरआन हमें बताता है कि सभी इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए और यहूदी,ईसाई और मुस्लिम एक से पैगम्बरों को मानते हैं।
आपके लेखन में भी इस तरह का प्रभाव देखने को मिलता है।
हां,इसमें है। जातीय बराबरी न होने का कड़वा अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं अमेरिका में बच्चा ही था। मुझ पर सिविल राइट्स मूवमेंट का गहरा असर पड़ा। मैंने देखा लोग अपना जीवन खतरे में डाल रहे थे। वे पिटते थे। उन पर कुत्तों से हमला किया जा रहा था। उन पर गोलियां बरसाईं जा रही थी फिर भी वे अंहिसात्मक तरीके से मुकाबला कर रहे थे। इसने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला।
Sunday, October 11, 2009
एक पत्रकार का इस्लाम कबूल करना
सारी दुनिया निकट भविष्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस्लाम को अपना लेगी।
अब्दुल्लाह अडियार, तमिलनाडु के प्रसिद्ध कवि, उपन्यासकार और पत्रकार
इस्लाम कबूल करने के पहले अब्दुल्लाह अडियार डी।एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की।जनाब अब्दुल्लाह अडियार महरहूम तमिल भाषा के प्रसिद्ध कवि, प्रत्रकार, उपन्यासकार और पटकथा लेखक थे।
उनका जन्म 16 मई 1935 को त्रिरूप्पूर (तमिलनाडु) में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा कोयम्बटूर में हुई। वे नास्तिक थे, लेकिन विभिन्न धर्मों की पुस्तकें पढ़ते रहते थे। किसी पत्रकार और साहित्यकार को विभिन्न धर्मों के बारे में भी जानकारी रखनी पड़ती है। जनाब अब्दुल्लाह अडियार अध्ययन के दौरान इस परिणाम पर पहुंचे कि इस्लाम ही सच्चा धर्म है और मनुष्य के कल्याण की शिक्षा देता है। आखिरकार 6 जून 1987 ई. को वे मद्रास स्थित मामूर मस्जिद गए और इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने के पहले वे डी.एम.के. के प्रसिद्ध समाचार-पत्र 'मुरासोलीÓ के 17 वर्षो तक संपादक रहे। डी.एम.के. नेता सी.एन. अन्नादुराई जो बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी रहे, ने जनाब अडियार को संपादक पद पर नियुक्त किया था। जनाब अडियार ने 120 उपन्यास, 13 नाटक और इस्लाम पर 12 पुस्तकों की रचनाएं की। इमरजेंसी के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और काफी प्रताडि़त किया गया। जेल में उन्होंने जनाब यूसुफ अली का कुरआन मजीद का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा और उससे काफी प्रभावित हुए। इस्लाम (इस्लाम जिससे मुझे प्यार है) पुस्तिका लिखी, जिसका बाद में हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, सिन्धी, मलयालम और उर्दू में अनुवाद हुआ। उनकी पत्नी थयम्मल जो ईसाई थीं, इस पुस्तक को पढ़कर मुसलमान हो गयीं। इसे पढ़कर उ.प्र. के एक जमीदार 1987 ई. में मुसलमान हो गए। जनाब अब्दुल्लाह अडियार को पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान आमंत्रित किया और विशेष अतिथि के रूप में उनका स्वागत किया। वे प्रखर वक्ता भी थे और इस्लाम पर धाराप्रवाह बोलते थे। उनके ब्रिटेन में अनेक संभाषण हुए, जिनका विषय था हजरत मुहम्मद (सल्ल.) का पवित्र जीवन। इनके कैसेट उपलब्ध हैं। वे तमिलभाषियों के आमंत्रण पर श्रीलंका और सिंगापुर भी गए। 1932 में तमिलनाडु सरकार ने तमिल साहित्य के विशिष्ट पुरस्कार 'कलाईमम्मानीÓ से उन्हें पुरस्कृत किया। इमरजेंसी के बाद उन्होंने 'नीरोतमÓ (पत्रिका) का प्रकाशन किया, जो बहुत लोकप्रिय हुआ। उन्होने नीरोतम प्रकाशन से ही 'तंगागुरूदुनÓ(पत्रिका) भी प्रकाशित की। जनाब अडियार इस्लाम को एकमात्र मुक्ति मार्ग के रूप में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने मद्रास में इस्लामिक दावा सेन्टर कायम किया। वे 6 करोड़ तमिल जनता को इस्लाम का संदेश पहुंचाने के लिए एक इस्लामी टी.वी. चैनल की स्थापना हेतु प्रयासरत रहे। 20 सितम्बर 1996 (जुमा के दिन) को कोडम्बकम में उनकी मृत्यु हो गयी।
Friday, October 9, 2009
हम ईश्वर की शरण में आना चाहते थे

Thursday, October 8, 2009
'दुनिया सुन ले कि मैंने इस्लाम क़बूल कर लिया है' -- कमला
कमलादास) उपन्यासकार , कवयित्री हैं और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध् लेखिका और शोधकर्ता हैं। उन्होंने 12 दिसम्बर 1999 ई. को इस्लाम स्वीकार किया तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के धार्मिक और शैक्षिक क्षेत्रों में तहलका मच गया। नीचे उनके इस्लाम क़बूल करने की घटना ब्यान की जा रही है। यह लेख कई अलग-अलग लेखों की सहायता से तैयार किया गया है।........डाक्टर कमला सुरैया 1934 ई. में दक्षिणी भारत के केरल राज्य के एक इलाक़े पन्ना पूरकलम (जनपद थ्रेसर) में पैदा हुईं। उनका सम्बन्ध नायर जाति के एक अमीर हिन्दू घराने से है। उनकी माँ निलापत बिलामनी मलयालम भाषा की कवयित्री थीं, जबकि पिता बी. एम. नायर प्रसिद्ध पत्रकार थे और एक ही समय में दो पत्रिकाओं के सम्पादक थे। उनके पति स्वर्गीय मध्वादास इण्टरनेशनल मानीटरी फण्ड (IMF) के सीनियर कंसलटेंट थे।
मुहम्मद सल्ल. के साथ हुआ कि जन्म और निधन की तारीख भी एक थी (महीना भी) एक हों, अल्लाह जन्नत नसीब करे इस बेबाक लेखिका को, आमीन--- मुहम्मद उमर कैरानवी
Sunday, September 27, 2009
एक इसाई पादरी जो मुसलमान हो गया
मैं १३जनवरी १९१९को अलेक्जेन्डेरिया में पैदा हुआ था। मैंने सैकण्डरी तक की शिाक्षा अमेरिकन मिशन स्कूल से हासिल की। १९४२ में डिप्लोमा हासिल करने के बाद मैंने धर्मशास्र में स्पेशलाइजेशन के लिए यूनिवर्सिटी में एडमिशान लिया। धर्मशास्र में प्रवेश लेना आसान नहीं था। चर्च की खास सिफारिश पर ही इस विभाग में एडमिशन लिया जा सकता था और इसके लिए एक मुशिकल परीक्षा से भी गुजरना पडता था। मेरे लिए अलेक्जेन्डेरिया अलअटारिन चर्च ने सिफारिश की और लॉअर इजिप्ट की चर्च असेम्बली ने भी मेरा इम्तिहान लिया। असेम्बली ने धर्म के क्षेत्र में मेरी योग्यता का अंकन किया। नोडस चर्च असेम्बली ने भी मेरी सिफारिश की। इस असेम्बली में सूडान और इजिप्ट के पादरी थे। कुल मिलाकर मुझे धर्मशास्र विभाग में एडमिशान के लिए कडे इम्तिहानों से गुजरना पडा।१९४४ में बोर्डिंग स्टूडेंट के रूप में धर्मशास्र विभाग में एडमिशान के बाद मैंने १९४८ तक ग्रेजुएशन के दौरान अमेरिकन और इजिप्टियन टीचर्स से अध्ययन किया।
शिक्षा पूरी होने पर मुझे यरूशलम में नियुक्त किया जाना था लेकिन इस्राइल और फिलीस्तीन के बीच युध्द छिड़ जाने के कारण में वहां नहीं गया और मुझे उसी साल इजिप्ट के आसना में भेज दिया गया। इसी साल मैंने अमेरिकन यूनिवर्सिटी से थिसिस के लिए अपना पंजीयन कराया। मेरे थिसिस का सब्जेक्ट था-‘मुसलमानों के बीच ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां।’ इस्लाम से मेरा परिचय तब हुआ था जब मैंने धर्मशस्र का अध्ययन शुरू किया था। वहां मैंने इस्लाम और मुसलमानों के विशवास और विचारधारा को डगमगाने और भ्रमित करने व उनके धर्म से संबंधित उनके बीच गलतफहमियां पैदा करने के तरीकों का अध्ययन किया।मैंने अमेरिका की प्रिंसटोन यूनिवर्सिटी से १९५२ में एम ए किया। फिर मैं एसूट में धर्मशास्र विभाग में टीचर नियुक्त हुआ। मैं स्टूडेंट को इस्लाम से जुड़ी वे बातें ही पढ़ाता था जो ईसाई मिशनरी मुसलमानों के खिलाफ आम लोगों के बीच बताती थींं। इस्लाम विरोधी ताकतों की ओर से फैलाई जाने वाली झूठी भा्रंतियों को बताकर इस्लाम का गलत रुप स्टूडेंट के सामने पेश करता था। इस्लाम संबंधी अपनी इस क्लास के दौरान मुझे महसूस होने लगा कि मुझे इस्लाम संबंधी अपनी जानकारी को बढाना चाहिए।
मैंने तय किया कि मुझे ईसाई मिशनरियों की इस्लाम के खिलाफ लिखी किताबों के अलावा मुस्लिम लेखकों की किताबें भी पढनी चाहिए। मैंने कुरआन को समझकर पढने का भी निर्णय किया। ज्यादा से ज्यादा इस्लाम की जानकारी हासिल करने के पीछे मेरा मकसद इस्लाम में और खामियां निकालना था। इस अध्ययन का नतीजा मेरी सोच के बिल्कुल उलट निकला। मैं अजीब कशमकश में फंस गया। मेरे मन में अंतरव्ंदव्द चलने लगा क्योंकि अब तक जो कुछ मैं इस्लाम की कमियां लोगों को बताता था ऐसा मैंने कुरआन के अध्ययन में नहीं पाया। मेरे आरोप मुझे निराधार लगने लगे। मैं इस सच्चाई का सामना करने से कतराता रहा और मैंने इस्लाम का नेगेटिव अध्ययन कराना जारी रखा।
१९५४ में मैं जर्मन स्विस मिशन के महासचिव के रूप में आसवान गया। वहां भी मुझे इस्लाम संबंधी भ्रांतियां पैदा करनी थी जो मेरे मिशन का हिस्सा थी। एक होटल में मिशनरी की ओर से कॉन्फ्रेस का आयोजन किया गया। इस मौके पर मैंने इस्लाम को लेकर कई भा्रंतियां पैदा की। अपने लेक्चर के अंत में मेरे मन में अंतव्र्दव्द शुरू हो गया। मैं अपनी इस भूमिका के बारे में सोचने लगा। मैं अपने आपसे सवाल करने लगा कि सच्चाई जानने के बावजूद मैं आखिर झूठ क्यों बोल रहा हूं? आखिर मैं सच्चाई से मुंह क्यों मोड़ रहा हूं? इसी कशमकश के बीच मैं कॉन्फ्रेस खत्म होने से पहले ही वहां से अपने घर के लिए रवाना हो गया। मैं मंथन करने लगा। इस बीच जब मैं एक पार्क की तरफ जा रहा था तो मैंने रेडियो में कुरआन की यह आयत सुनी- कह दो-मेरी ओर ईवर ने ज्ञान भेजा है कि जिन्नों के एक गिरोह ने कुरआन सुना, फिर जिन्नों ने कहा कि हमने एक मनभाता कुरआन सुना जो भलाई और सूझबूझ का मार्ग दिखाता है; इसलिए हम उस पर ईमान ले आए और अब हम कभी किसी को अपने रब का साझी नहीं ठहराएंगे। कुरआन ७२ :१-२
और यह कि जब हमने हिदायत की बात सुनी तो उस पर ईमान ले आए। अब जो कोई अपने रब पर ईमान लाएगा,उसे न तो किसी हक के मारे जाने का भय होगा और न किसी जुल्म ज्यादती का। कुरआन ७२ :१३
कुरआन की यह आयत सुनने के बाद उस रात मुझे सुकून का एहसास हुआ। घर पहंुचने के बाद मंै पूरी रात लाइब्रेरी में बेठकर कुरआन पढ़ता रहा। मेरी पत्नी ने मुझसे पूरी रात बैठे रहने का कारण पूछा लेकिन मैंने उससे मुझे अकेले छोड़ देने को कहा। मैं काफी देर तक कुरआन की इस आयत पर गौर व फिक्र करता रहा- यदि हमने इस कुरआन को किसी पर्वत पर भी उतार दिया होता तो तुम अवश्य देखते अल्लाह के भय से वह दबा हुआ और फटा जाता है। ये मिसालें हम लोगों के लिए इसलिए पेश करते हैं कि वे सोच विचार करें। कुरआन ५९:२१मैंने इन आयतों पर भी चिंतन किया-तुम ईमान वालों का दुशमन सब लोगों से बढकर यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमान वालों के लिए मित्रता में सबसे निकट उन लोगों को पाओगे जिन्होने कहा कि -हम ईसाई हैं। यह इस कारण कि ईसाईयों में बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं। और इस कारण कि वे अहंकार नहीं करते। जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आखें आंसुओं से छलकने लगती हंै । इसका कारण यह है कि उन्होने सच्चाई को पहचान लिया है । वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। इसलिए तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुंचा है उस पर ईमान क्यों नहीं लाएं,जबकि हमें उम्मीद है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ हमें जन्नत में दाखिल करेगा। कुरआन ५:८२-८४मैंने इन आयात पर भी गौर किया- तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग हैं जो उस रसूल उम्मी का अनुसरण करते हैं,जिसके बारे में वे अपने यहां तौरात और इंजील में लिखा पाते हैंं। और जो उन्हे भलाई का हुक्म देता है और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी स्वच्छ चीजों को हलाल और बुरी अस्वच्छ चीजों को हराम ठहराता है और उन पर से उनके वह बोझ उतारता है,जो अब तक उन पर लदे हुए थे। उन बन्धनों को खोलता है,जिनमें वे जकड़े हुए थे। अत जो लोग उस पर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस हिदायत के मार्ग पर चले जो वो लेकर आए,तो ऐसे ही लोग सफलता प्राप्त करने वाले हैं।
कहो-ऐ लोगो! मैं तुम सबकी ओर उस अल्लाह का रसूल हूं जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं,वही जीवन देता है और वही मौत देता है। अत अल्लाह और उसके रसूल,उस उम्मी नबी पर ईमान लाओ जो खुद अल्लाह और उसके कलाम पर ईमान रखता है। उसका अनुसरण करो,ताकि तुम सही राह पा लो। कुरआन ७:१५७-१५८
उस रात मैंने सच्चाई जान ली और फिर इस्लाम कबूल करने का फैसला कर लिया। सुबह मैंने अपने इस फैसले के बारे में अपनी पत्नी को बताया। मेरे तीन बेटे और एक बेटी हैं। मेरी पत्नी को यह एहसास होने पर कि मैं जल्दी ही इस्लाम कबूल करने जा रहा हूं तो उसने बिना देरी किए ईसाई मिशनरी के मुखिया से मदद मांगी और मुझे रोकने कोे कहा। मिशनरी के मुखिया स्विटजरलेंड के मॉन्सियोर शोविटस बहुत चतुर व्यक्ति थे। मॉन्सियोर के पूछने पर मैंने उनको साफ साफ बता दिया कि मैं अब इस्लाम अपनाना चाहता हूं, यह जानकर उन्होने मुझसे कहा कि ऐसा करने पर तुम्हे नौकरी से निकाल दिया जाएगा और इसके लिए तुम खुद जिम्मेदार बनोगे। मैंने तुरंत अपना इस्तीफा उनको पकड़ा दिया। उन्होने मुझ पर अपना फैसला वापस लेने का दबाव बनाया और मेरी मानसिकता बदलने की काफी कोशिश की लेकिन मैं अपने फैसले पर अटल था। मुझे अपने फैसले पर अडिग देख मॉन्सियोर ने मेरे बारे में अफवाह उड़ा दी कि मैं पागल हो गया हूं। फिर तो मुझे बेहद मुशिकलों का सामना करना पड़ा। मुसीबतों से परेशान होकर मैं आसवान छोड़कर वापस केअरो आ गया। केअरो में मेरा परिचय एक सम्मानीय और अच्छे प्रोफेसर से हुआ। उन्होने मेरे बारे में बिना कुछ जाने मुसीबतों और परेशानियों के दौर में मेरा साथ दिया। मैंने उनके सामने अपना परिचय एक मुस्लिम के रूप में दिया था हालांकि तब तक मैंने आफिसियल रूप से इस्लाम कबूल नहीं किया था। डॉ मुहम्मद अब्दुल मोनेम अल जमाल नाम के यह व्यक्ति कोसागार में सचिव थे। उनकी इस्लामिक अध्ययन में जबरदस्त दिलचस्पी थी और वे कुरआन का अमेरिकी अंगे्रजी में अनुवाद कराने के इच्छुक थे। उन्होने कुरआन के अनुवाद के लिए मुझसे मदद चाही क्योंकि मेरी अंग्रेजी अच्छी थी और मैं अमेरिकन यूनिवर्सिटी से एम ए कर चुका था। वे यह भी जानते थे कि मैं कुरआन,तोरात और बाइबिल का तुलनात्मक अध्ययन कर रहा हूंं। मैंने उनकी कुरआन के अनुवाद में मदद की।इस बीच जब डॉ जमाल को पता चला कि मैंने नौकरी छोड़ दी है और इन दिनों मैं बेरोजगार हूं तो उन्होने मुझे केअरो में ही नौकरी दिलाने में मेरी मदद की। और इस तरह मेरी गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई। इस दौरान पत्नी से दूर रहने पर उसको लगा कि मैंने उसको भुला दिया है जबकि उससे दूरी इस बीच की उथल पुथल के कारण हुई थी। इस्लाम ग्रहण करने के ऐलान का इरादा मैंने कुछ वक्त के लिए टाल दिया क्योंकि मैं इससे उत्पन्न होने वाली स्थितियों से निपटने के लिए खुद को और मजबूत बनाना चाहता था। १९५५ में मैंने अपना इस्लामिक अध्ययन और विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन पूरा कर लिया। इस बीच मेरा जीवन सहज हो गया था। मैंने नौकरी छोड़कर स्टेशनरी निर्यात का बिजनेस शुरू कर दिया था। बिजनेस में मैंने अपनी जरूरत के मुताबिक अच्छा पैसा कमाया। इस तरह सैट होने के बाद मैंने इस्लाम कबूल करने और इसका ऐलान करने का निशचय किया। और फिर २५ दिसंबर १९५९ को मैंने इजिप्ट में अमेरिकन मिशान के मुखिया डॉ थॉमसन को टेलीग्राम के जरिए इस्लाम कबूल करने की जानकारी दी। मैंने डॉ जमाल को अपनी वास्तविक दास्तां बताई तो वे आशचर्यचकित हुए क्योंकि वे अब तक इससे अनजान थे। इस्लाम कबूल करने के ऐलान के साथ ही मेरे सामने नई तरह की परेशानियां आनी शाुरू हो गई। मिशानरी में मेरे साथ काम करने वाले मेरे पूर्व सात साथियों ने मुझ पर इस्लाम कबूल न करने का दबाव बनाया। मैं अपने इरादे पर अंिडग था। उन्होने मुझे मेरी पत्नी से अलग करने की धमकी दी। मैंने साफ कह दिया- वह अपना फैसला लेने के लिए आजाद है। मुझे मारने की धमकी दी गई।जब उनकी बातों का मुझ पर असर नहीं हुआ तो उन्होने मेरे पास मेरे एक पुराने खास दोस्त और मेरे साथ काम कर चुके सहकर्मी को भेजा। वह मेरे पास आकर रोने लगा। मैंने उसके सामने कुरआन की यह आयत पढ़ी- जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें छलकने लगती हंै । इसका कारण यह है कि उन्होने सत्य को पहचान लिया है । वे कहते हैं -हमारे रब हम ईमान लाए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले। और हम अल्लाह पर और जो सत्य हमारे पास पहुंचा है उस पर ईमान क्यों नहीं लाएं,जबकि हमें उम्मीद है कि हमारा रब हमें अच्छे लोगों के साथ जन्नत में दाखिल करेगा। कुरआन ५:८३-८४ मैंने उससे कहा- कुरआन सुनने के बाद तुम्हे विनम्र होकर ई’वर के सामने झुक जाना चाहिए और सच्चे धर्म को तुम्हे भी अपना लेना चाहिए। अपनी बातों का असर न होता देख वह मुझे अकेला छोड़ चला गया। और फिर मैंने जनवरी १९६० में आधिकारिक रूप से इस्लाम कबूल करने का ऐलान कर कर दिया।
इस्लाम कबूल करने के ऐलान के करते ही मेरी पत्नी मुझे छोड़ गई और अपने साथ घर का सारा फर्नीचर ले गई। मेरे तीन बेटे और एक बेटी मेरे साथ रहे और उन्होने भी इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम कबूल करने में सबसे ज्यादा उत्साहित मेरा बड़ा बेटा इसाक था जिसने अपना इस्लामिक नाम ओसामा रख लिया। ओसामा ने फिलोसोफी में डॉक्टरेट की और वह पेरिस की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गया।घर छोड़ने के छह साल बाद मेरी पत्नी वापस लौट आई इस शार्त पर कि वह अपना धर्म नहीं छोड़ेगी। मैंने उसे अपना लिया क्योंकि इस्लाम में इसकी इजाजत थी। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हे दबाव डालकर मुस्लिम नहीं बनाना चाहता, बल्कि चाहता हूं कि इस्लाम को समझने के बाद तुम ही इस मामले मेंं फैसला लो। कुछ वक्त बाद वह भी इस्लाम के मूल्यों में भरोसा करने लगी लेकिन अपने घर वालों के डर से इस्लाम अपनाने का ऐलान नहीं कर पाई। लेकिन हमारा व्यवहार उसके साथ मुस्लिम औरत की तरह है। वह रमजान के महीने के रोजे रखती है। मेरे सभी बच्चे भी रोजे रखते हैं और नमाज पढते हैं। मेरी बेटी नाजवा कWामर्स की स्टूडेंट है,बेटा जोसेफ डॉक्टर और जमाल इंजिनियर है। १९६१ से अब तक मैं इस्लाम पर और ईसाई मिशानरियों की इस्लाम के खिलाफ मुहिम पर कई किताबें लिख चुका हूं। १९७३ में मैंने हज किया। मैं इस्लाम पर तकरीर करता हूं। मैंने कई यूनिवर्सिटी और समाजसेवी संस्थाओं में सेमिनार का आयोजन किया। मैं अपना पूरा वक्त इस्लाम के लिए खर्च कर रहा हूं। कुरआन और पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवस्सलम की जीवनी का अध्ययन करने पर इस्लाम के प्रति मेरा यकीन पुख्ता बनता गया। इस्लाम से जुड़ी सारी गलतफहमियां दूर हो गईंं। इस्लाम में एक ईश्वर की अवधारणा से मैं बेहद प्रभावित हुआ और मुझे इस्लाम की यह सबसे बड़ी खूबी लगी। अल्लाह एक है। उसका कोई साझी नहीं है। इस्लाम की इस अवधारणा से मैं उस एक ईश्वर का बन्दा बन गया जिसका कोई हमसर नहीं। एक ईश्वर में भरोसा व्यक्ति को खुद्दार बनाता है और समस्त मानव जाति को हर तरह की दासता से मुक्ति देता है और यही सही मायनों में आजादी है। मैं इस्लाम में माफी देने के नियम और ई’वर और बन्दे के बीच सीधे संबंध से बेहद प्रभावित हुआ। अल्लाह कहता है -कह दो - ऐ मेरे बन्दो जिन्होने अपने आप पर ज्यादती की है अल्लाह की दयालुता से निराशा न हो। निसंदेह अल्लाह सारे ही गुनाहों को माफ कर देता है। निशचय ही वह बड़ा क्षमाशील,अत्यन्त दयावान है। ३९: ५३
Friday, September 25, 2009
खुदा ने मेरे लिए इस्लाम को चुना

आपने इस्लाम को ही क्यों चुना?
मैं पक्का नहीं जानता। खुदा ने मेरे लिए इसे चुना। लेकिन भारत में मेरे साथ एक अद्भुत घटना घटित हुई। एक सुबह मैं स्टेशन पर रेल का इंतजार कर रहा था। स्टेशन खचाखच लोगों से भरा था। भीड़ के बीच एक महिला ने अचानक मेरे बगल में अपनी जाजम बिछा ली और नमाज पढऩे लगी। मेरे लिए यह घटना चौंकाने वाली थी। ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैंने एक व्यक्ति से पूछा-यह सब क्या है? उसने जवाब दिया-यह मेरी दादी है। यह मुस्लिम है और प्रार्थना कर रही है। संभव है यही कारण रहा हो। अल्लाह ने वह क्षण एक तस्वीर की तरह मुझे दिया जो आज भी मेरी स्मृतियों में है। जब मैं ब्रिटेन लौटा तो मेरे कई साथी नशे के लती हो चुके थे और कुछ इस्लाम धर्म अपनाकर इससे बचे हुए थे, तब मुझे लगा कि यही मेरा रास्ता है। इसके तीन महीने बाद मेरी जिंदगी में निर्णायक मोड़ आया। मैं हज करने मक्का गया और फिर मैंने चालीस विभिन्न मुस्लिम देशों की एक अंतहीन यात्रा शुरू कर दी।
Wednesday, September 23, 2009
इस्लाम- जिंदगी गुजारने का एक खास तरीका
दिली सुकून इस्लाम में ही मिलेगा। इस्लाम सच्चा धर्म है। यही वजह है कि मैं इस्लाम में आया। यूसुफ योहान्ना अब मुहम्मद यूसुफ,पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर
पाकिस्तान के मशहूर क्रिकेटर यूसुफ योहान्ना ने सितम्बर २००५ में इस्लाम कबूल किया। उन्होंने अपना नाम मुहम्मद यूसुफ रखा। मुहम्मद यूसुफ का कहना है कि उन्होंने इस्लाम अपनाने के ऐलान से तीन साल पहले ही इस्लाम अपना लिया था लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते उन्होंने इसका ऐलान नहीं किया था। यूसुफ की बीवी ने भी यूसुफ के साथ ही इस्लाम अपना लिया और अपना नाम तानिया से फातिमा रख लिया। यहां पेश है मोहम्मद यूसुफ का इन्टरव्यू जिसमें उन्होंने इस्लाम कबूल करने से जुड़े विभिन्न सवालों के जवाब दिए है।
आपका बचपन कहां और कैसे गुजरा?
मेरा बचपन कराची की रेलवे कालोनी में गुजरा। मुझे बचपन से ही क्रिकेट खेलने का शौक था। बचपन में धर्म आपके जीवन में क्या अहमियत रखता था। आपने बचपन में अपने धर्म की शिक्षा ली?मैं बचपन में सण्डे को चर्च जाता था। हालांकि मैं चर्च नियमित नहीं जाता था। समझदार होने के बाद मैं हर सण्डे चर्च जाने लगा था।आपका इस्लाम की तरफ रुझान कैसे हुआ?मैं मुस्लिम माहौल के बीच ही पला-बढ़ा। मेरे बचपन के सारे दोस्त मुस्लिम थे और मैं मुस्लिम इलाके में ही रहता था। लेकिन सच्चाई यह है कि मुझे इनका अमल इस्लाम के मुताबिक नजर नहीं आता था। अमल के मामले में वे बाकी लोगों की तरह ही थे, इस वजह से उनका कोई खास असर मुझ पर नहीं हुआ।
आखिर आप में ऐसा बदलाव कैसे आया?
मेरे में अचानक ही बदलाव नहीं आया। जब मैंने तब्लीगी जमात के लोगों का व्यवहार और जिंदगी के प्रति उनका नजरिया देखा तो उनसे बेहद प्रभावित हुआ। हालांकि उन्होने मुझे कभी यह नहीं कहा कि आप मुसलमान बन जाइए। दरअसल मैं उनसे बेहद प्रभावित हुआ और उनको देखकर ही मैं मुस्लिम हो गया। मैं ही क्या तब्लीगी जमात अमेरिका के कैलीफोर्निया गई हुई थी तो वहां का एक यहूदी इनके अमल से बेहद प्रभावित हुआ और वह मुस्लिम हो गया।
इस्लाम के खिलाफ जबरदस्त दुष्प्रचार के बावजूद लोग इस्लाम कबूल कर रहे हैं।
दरअसल यह हमारा ही कसूर है। हम मुसलमान इसके लिए जिम्मेदार हैं। कहने को पाकिस्तान इस्लामिक देश है लेकिन बाहर से आने वाले व्यक्ति को यहां का माहौल देखकर कतई नहीं लगे कि यहां के लोग इस्लामिक उसूलों क ो अपनाए हुए हंै। अगर हम पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहो अलेहेवसल्लम की जिंदगी को फोलो करें तो मुसलमानों पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।
इस्लाम में आपको ऐसा क्या खास लगा कि आपने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया?
जिन बाअमल मुसलमानों से प्रभावित होकर मैं मुसलमान बना उनमें मैंने पाया कि इस्लाम जिंदगी गुजारने का एक खास तरीका है। इस्लाम में पीस है,सुकून है,हर एक के साथ अच्छा व्यवहार,लोगों की भलाई की सोच आदि ऐसी बातें हैं जिनसे मैं बेहद प्रभावित हुआ।
आपके लिए यह फै सला लेना कितना मुश्किल था। इस्लाम कबूल करने पर आपके परिवार वालों की किस तरह की प्रतिक्रिया हुई।
परिवार वालों ने मेरे इस फैसले का विरोध किया। मुझे अहसास था मेरे घर वाले मुझसे नाराज होंगे लेकिन सच तो यह है कि दुनिया की कामयाबी ही कामयाबी नहीं है। क्योंकि एक दिन सब को मरना है और अपने कर्मों का हिसाब देना है। दुनिया का सबसे बड़ा सच मौत है और सबसे बड़ा झूठ-जिंदगी।
आपने अपनी पत्नी को मुसलमान होने के बारे में बताया तो उनकी शुरूआती प्रतिक्रिया क्या रही?
मैंने उसको यह नहीं बताया था कि मैं मुसलमान हो गया हूं। मैंने उसको बताया कि आजकल मैं ऐसा कुछ कर रहा हूं जिससे मुझे सुकून हासिल हो रहा है,अच्छा महसूस हो रहा है। तुम भी इस्लामिक तालीम को समझो और तुम्हेे अगर यह अच्छी लगती है तो इन बातों को अपना लो। क्योंकि इस्लाम में जबरदस्ती नहीं है। इस्लाम जबरदस्ती से नहीं फै लाया गया है। इस्लाम प्यार से फैला है,भलाई से फैला है। इस्लाम मन को पवित्र करता है जिससे लोग खुद को ईश्वर के करीब महसूस करते हैं।
आपको इस राह पर लाने में सबसे बड़ा हाथ किसका है?
अल्लाह के हुक्म और पैगम्बर के तरीके के मुताबिक जिंदगी गुजारने वालों से मैं बेहद प्रभावित हुआ। ऐसे लोगों की जिंदगी मेरे लिए अनुकरणीय बनी। इनमें से एक है पाकिस्तानी क्रिकेटर सईद अनवर।
पाकिस्तानी क्रिकेट टीम का रुझान भी अब इस्लाम की तरफ देखने को मिलता है। टीम में यह बदलाव कैसे आया?
मैं काफी समय से टीम में रहा लेकिन पहले मैंने टीम के लोगों में ऐसी अच्छी बातें नहीं पाईं। इस बदलाव का कारण टीम के लोगों का इस्लामिक मूल्यों को अपनी जिंदगी में लागू करना है। सईद अनवर जैसे लोग दुनिया भर में इस्लामिक उसूलों को फैला रहे हैं।
आप उन लोगों को क्या मैसेज देना चाहते हैं जो इस्लाम की हकीकत को जानना चाहते हैं लेकिन किसी दबाव की वजह से घबराते हैं। झिझकते हैं। क्या वास्तव में इस्लाम अपनाना बेहद मुस्लिम है?
देखिए मैंने महसूस किया है कि गैर मुस्लिम का मुस्लिम होना इतना मुश्किल नहीं है जितना एक पैदाइशी मुसलमान का इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारना। मुसलमानों के बीच इस्लामिक शिक्षा के प्रचार प्रसार की ज्यादा जरूरत है। मैं तो दूसरे धर्म से आया हूं, मुझे पता है दूसरे धर्मों में सुकून और आत्मिक शंाति नहीं है । दिली सुकून इस्लाम में ही मिलेगा। इस्लाम सच्चा धर्म है। यही वजह है कि मैं इस्लाम में आया। मेरा तो मुस्लिम भाइयों से यही गुजारिश है कि वे अल्लाह के हुक्म और पैगम्बर मुहम्मद साहब की जिंदगी को अपनाएं।
आप जब ईसाई थे तो मुसलमानों को देखकर क्या महसूस करते थे?
इस्लाम के मुताबिक जिंदगी गुजारने वाले मुसलमानों को देखकर मुझे लगता था कि वास्तव में यह अलग हटकर मजहब है। अल्लाह के हुक्म और पैगम्बर की सुन्नतों के मुताबिक जिंदगी गुजारने वाले लोगों को देखकर ही तो मैं मुस्लिम हुआ हूं। मुझे लगता था सच्चे ईश्वर की तरफ से ही यह मजहब है।
Thursday, September 17, 2009
कुरआन ने मुझ पर जादुई असर डाला
मैंने इस्लामिक प्रार्थना में विनम्रता और आत्मीयता महसूस की है। दूसरी तरफ इंग्लैण्ड के लोग भौतिकवादी और उथले हैं। वे खुश होने का दिखावा करते हैं लेकिन खुशी उनसे दूर है।अब्दुर्रहीम ग्रीन ब्रिटेन, पहले ईसाई
अब इस्लाम के माने हुए स्कॉलर
तंजानिया में जन्में और ब्रिटेन में पले बढ़े ४५ वर्षीय ग्रीन का इस्लाम से परिचय मिस्र में हुआ जहां वे अक्सर अपनी छुट्टियां बिताते थे।
अक्टूबर १९९७ में उन्होंने गॉड्स फाइनल रिवेलेशन विषय पर बंगलौर में लेक्चर दिया। इस दौरान बंगलौर से अंगे्रजी में प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका इस्लामिक वॉइस ने उनका इन्टरव्यू लिया। यहां पेश है उस वक्त लिया गया अब्दुर्रहीम ग्रीन के इन्टरव्यू का हिन्दी अनुवाद।
अब्दुर्रहीम ग्रीन इस्लामिक दुनिया में एक जाना पहचाना नाम है। वे पिछले बीस सालों से ब्रिटेन में इस्लामिक मूल्यों के प्रचार प्रसार में जुटे हैं। वे इस्लामिक चैनल पीस टीवी और अन्य इस्लामिक चैनल्स के जरिए भी इस्लाम को बेहतर तरीके से दुनिया के सामने रख रहे हैं। वे पहले ईसाई थे लेकिन ईसाई आस्था से उनका जल्दी ही मोह भंग हो गया। सुकून की तलाश में अब्दुर्रहीम ग्रीन ने कई धर्मों का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने कुरआन पढऩा करना शुरू किया। वे कुरआन से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने कुरआन में अपने हर सवाल का जवाब पाया। वे इस नतीजे पर पहुंचे की कुरआन ईश्वरीय ग्रन्थ और फिर अब्दुर्रहीम ग्रीन ने १९८८ में इस्लाम कबूल कर लिया। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि बताएं?
मैं १९६४ में तंजानिया के दारुस्सलाम में पैदा हुआ। मेरे माता-पिता दोनों ब्रिटेन के थे। मेरे पिता गेविन ग्रीन ब्रिटेन उपनिवेशवाद में एडमिनिस्ट्रेटर थे। बाद मे उन्होंने १९७६ में बारक्लेज बैंक जॉइन कर लिया और उन्हें इजिप्टियन बारक्लेज बैंक को जमाने के लिए इजिप्ट भेजा गया। मैंने मशहूर रोमन कैथोलिक मोनेस्टिक स्कूल एम्पलेफोर्थ में पढ़ाई की और बाद में इतिहास का अध्ययन करने लन्दन यूनिवर्सिटी चला गया। हालंाकि मैंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी।अभी मैं इंग्लैण्ड की एक इस्लामिक मीडिया कम्पनी के साथ काम कर रहा हूं। इस्लाम के मैसेज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में जुटा हूं।
आपने बीच में ही पढ़ाई क्यों छोड़ दी?
मेरा ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली से मोहभंग हो गया था। दरअसल ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में विश्व इतिहास को प्रायोजित तरीके से पेश किया गया था। उन्होंने अपनी सभ्यता को महिमामण्डित करके यूरोप पर थोपा है। इजिप्ट में रहने के दौरान कुछ आलीशान खण्डहर देखकर मुझे लगा कि यह तो अच्छे पुरातत्ववेत्ताओं का काम था। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि पश्चिम ने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। मैंने दुनिया के विभिन्न लोगों और सभ्यताओं के इतिहास का अपने स्तर पर अध्ययन करना शुरू किया। मैंने विभिन्न धर्मग्रंथों और दर्शनशास्त्र को भी पढ़ा। मैंने तीन साल तक गहराई से बोध धर्म का भी अध्ययन किया। इस दौरान मैंने जब कुरआन पढ़ा तो मैं इससे बेहद प्रभावित हुआ। कुरआन की शिक्षा ने मुझ पर जादुई असर डाला और मुझे पूरी तरह यकीन हो गया कि कुरआन सच्चे ईश्वर की तरफ से भेजा गया धर्मग्रन्थ है। मैं नहीं जानता कि मैं किस तरह इस्लाम की छांव में आ पहुंचा। मेरा भरोसा है कि ईश्वर ही ने मुझे सही राह दिखाई।
आपको इस्लाम में ऐसा क्या खास लगा जिससे आप सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?
दरअसल आठ साल की उम्र में ही मेरा ईसाईयत से मोहभंग होने लगा था। मैरी की जय जैसे गीतों के जरिए जो कु छ हमें पढ़ाया जाता था, वो मेरे गले नहीं उतरता था। जहां एक तरफ ईसाई ईश्वर को अनन्त और अपार बताते थे,वहीं गॉड को मैरी की कोख से पैदा होना बताने में भी उन्हें कोई झिझक नहीं थी। मुझे लगता था इस हिसाब से तो मैरी गॉड से भी बड़ी हुई। दूसरा ईश्वर का तीन रूपों में होने का ईसाई मत भी मुझे समझ नहीं आता था। ईश्वर का तीन रूपों में बंटे होना और फिर भी एक होने को मैं पचा नहीं पाता था। मेरे लिए मुश्किल तब हो गई जब एक इजिप्टियन ने मेरे से ईसाई धर्म संबंधी कई तीखे सवाल कर डाले। ईसाई मत को लेकर कन्फ्यूज्ड होने के बावजूद मैंने उसके सामने एक सिध्दांतवादी ईसाई होने की कोशिश की जैसे कि अधिकतर गौरे मध्यमवर्गीय ईसाई करते हैं। मैं तब चकरा गया जब उसने मुझसे यह मनवा ही लिया कि ईश्वर जब सूली पर चढ़ाने से मर गया है तो फिर ईश्वर का अनन्त और अपार होने का ईसाई मत खोखला साबित हो जाता है। इस पर मुझे महसूस हुआ कि मैं ऐसी बेतुकी अवधारणा पर भरोसा कर रहा हूं जिसके मुताबिक दो और दो पंाच होते हैं। यह दौर मेरी किशोर अवस्था का था। धीरे-धीरे पश्चिम की बंधी बंधाई और मशीनी जिंदगी से मुझे नफरत सी होने लगी। मैंने पाया कि यूरोपियन लोगों की जिंदगी के संघर्ष का मकसद सिर्फ जिंदगी का लुत्फ उठाना और एंजोय करना है। वे अपने जीवन को किसी अच्छे और बड़े मकसद के लिए नहीं जीते।मैंने जब फिलीस्तीन के मुद्दे पर इजिप्ट और फिलीस्तीन के लोगों से बात की तो समझ आया कि कैसे पश्चिमी देश अपने लोगों को इस मुद्दे पर बरगलाते रहते है। यहूदियों ने कई ऐतिहासिक,राजनैतिक और आर्थिक भ्रान्तियां गढ़कर मीडिया के द्वारा जबरदस्त तरीके से प्रचारित की है। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है कि २००० साल पहले यह उनका देश था जिसे छोड़कर वे चले गए थे। मैंने यह भी जाना कि अभी के यहूदी वास्तविक रूप में गुलाम थे जो बाद में यहूदी बने और फिलीस्तीनी सरजमीन शुरु से हरी-भरी रही है। यह तो इजराइल ने गढ़ा है कि जादुई तरीके से यह रेगिस्तान से ग्रीनलैण्ड में तब्दील हो गई। मैंने जब लैटिन अमेरिका और सोवियत ब्लॉक में अमरीका क ी भूमिका का अध्ययन किया तो अमेरिका का दोगला चरित्र देखने को मिला।
आपने इजिप्ट और इंग्लैण्ड के लोगों में किस तरह का फर्क महसूस किया?
मैंने पाया कि इजिप्ट के बाशिंदे गरीब और मेहनतकश होने के बावजूद खुशमिजाज हैं। वे अपनी सारी बातें अल्लाह पर छोड़ देते हैं और अपना गम भूल जाते हैं। वे इबादत में अल्लाह के सामने अपनी परेशानियां रखते हैं और अल्लाह उनकी मदद करता है। मैंने उनकी इस्लामिक प्रार्थना में विनम्रता और आत्मीयता महसूस की है।दूसरी तरफ इंग्लैण्ड के लोग भौतिकवादी और उथले हैं। वे खुश होने का दिखावा करते हैं लेकिन खुशी उनसे दूर है। उनकी प्रार्थना में गाने हैं,डांस है,तालियंा पीटना है लेकिन गॉड के प्रति विनम्रता और आत्मीयता उनकी प्रार्थनाओं में नजर नहीं आएंगी। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि पश्चिमी लोगों की मानसिकता यहूदी नियंत्रित मीडिया की देन है। इन्हीं में एक है फिलीस्तीन को लेकर पश्चिम के लोगों की सोच। मीडिया वहां के लोगों पर एक ही तरह की मानसिकता थोपता है। देखा गया है कि अमेरिका तीसरी दुनिया के देशों को प्रताडि़त करने के लिए मानवाधिकार का बहाना तलाशता रहता है जबकि खुद उन लैटिन अमेरिकी देशों के नेताओं को प्रताडि़त करता रहता है जो उसकी बात नहीं मानते। अमेरिकी मीडिया इन बातों की कभी आलोचना नहीं करता। क्या इंग्लैण्ड में एक मुस्लिम के रूप में जिंदगी गुजारना मुश्किल है। पश्चिमी मानसिकता व्यक्तिवादी है यानी दूसरों के बजाय हर कोई खुद की सोचता है। इस्लामिक जिंदगी के लिए यह परेशानी का कारण बनती है। नेक मुस्लिम इस तरह के माहोल से परेशानी महसूस करते हैं। हद से ज्यादा खुलापन और सैक्स के चलते उन्हें दिक्कतें होती हैं। इंग्लैण्ड की अधिकतर लड़कियां १३ साल की उम्र तक अपना कोमार्य खो चुकी होती है और सामान्यत एक लड़की के तीन-चार ब्वॉय फै्रण्ड होते हैं। पश्चिम के मुसलमानों के साथ दिक्कत यह है कि वे उस पाश्चात्य सोसायटी के साथ कै से घुले-मिले जहंा स्वच्छंदता,सैक्स और नशा आम है। वे खुद को इन सबसे कैसे बचाए रखें? इंग्लैण्ड में इस्लाम के प्रचार के अच्छे नतीजे सामने आए हैं? इंग्लैण्ड में इस्लामिक मूल्यों का धीरे धीरे प्रचार प्रसार हो रहा है। नव मुस्लिम्स में उत्साह है। वे जानते हैं कि आम आदमी का जीवन किस तरह अंधेरे में है।आपके परिवार के बारे में बताएं? मेरे दो बीवियां और छह बच्चे हैं। क्या ब्रिटेन में बहू विवाह पर पाबंदी नहीं है? यंू तो ब्रिटेन में दूसरे विवाह पर पाबंदी है लेकिन ब्रिटेन के कई लोगों ने दो विवाह कर रखे हैं। दूसरी शादी कॉमन लॉ वाइव्ज के तहत उचित है जिसमें दूसरी बीवी और उसके बच्चे विरासत के हकदार होते हैं।
Monday, September 14, 2009
कुरआन में मिला,मेरे हर सवाल का जवाब
मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि इस्लाम कबूल करने से पहले मैं किसी भी मुसलमान से नहीं मिला था। मैंने पहले कुरआन पढ़ा और जाना कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है जबकि इस्लाम हर मामले में पूर्णता लिए हुए है। केट स्टीवन्स अब-यूसुफ इस्लाम इंग्लैण्ड के माने हुए पॉप स्टार
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Thursday, September 10, 2009
जर्मनी के राजदूत जो इसलाम कबूल कर बन गए मुसलमान
जर्मन के डॉ विलफराइड हॉफमेन ने १९८० में जब इस्लाम कबूल किया तो जर्मनी में हलचल मच गई। उनके इस फैसले का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ। उन्होने अपना नाम मुराद हॉफमेन रखा। जर्मनी के दूत और नाटो के सूचना निदेशक रह चुके डॉ मुराद हॉफमेन ने इस्लाम पर कई किताबें लिखी हैं।१९८० में इस्लाम ग्रहण करने वाले डॉ हॉफमेन १९३१ में जर्मनी कैथोलिक ईसाई परिवार में पैदा हुए। उन्होने न्यूयार्क के यूनियन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और म्यूनिख यूनिवर्सिटी से कानूनी शिक्षा हासिल की। १९५७ में धर्मशास्र में डॉक्टरेट की। १९६० में हार्वर्ड लॉ स्कूल से उन्होने एलएलएम की डिग्री हासिल की। १९८३ से १९८७ तक ब्रूसेल्स में उन्होने नाटो के सूचना निदेशक के रूप में काम किया। वे १९८७ में अल्जीरिया में जर्मनी के दूत बने और फिर १९९० में मोरक्को में चार साल तक जर्मनी एम्बेसेडर के रूप में काम किया।
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