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Sunday, March 7, 2010

क्या कुरआन में औरत को पीटने का हुक्म है?


महिला दिवस ८ मार्च पर विशेष 
कुरआन 4:34: "मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ आदमियों को बाज़ अदमियों पर फ़ज़ीलत दी है और चूंकि मर्दो ने अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो. पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाऐं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग है."


सुरः निसा की ये आयत पढ़कर अक्सर औरतें घबरा जाती हैं क्योंकि इसमें तो मर्दों को खुले तौर पर मारने की छूट दे दी है. गैर इस्लामी इस आयत को पढ़कर इस्लाम के औरत विरोधी होने का फतवा दे देते हैं. देखा जाए तो पूरी दुनिया में इस आयत को हथियार बनाकर इस्लाम में औरत के दोयम दर्जे की बात कही जा रही है. लेकिन क्या वास्तव में ये आयत यही मतलब बयान कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं की हमसे इस आयत का मतलब समझने में कोई भूल हो रही है?

एक मिसाल से अपनी बात की शुरुआत करते हैं. 


मान लिया एक मजदूर दिन भर अपनी मजदूरी की तलाश में जाने के बाद शाम को खाली हाथ घर लौटता है. उसकी औरत इस इन्तिज़ार में बैठी है की उसका शौहर कुछ कमाकर लाएगा तो दोनों के पेट में कुछ जाएगा. लेकिन उसे खाली हाथ देखकर उसका सब्र जवाब दे देता है. और वह शौहर को बुरा भला कहने लगती है. शौहर भी थका हुआ आया है और भूखा भी है. बीवी के ताने सुनकर उसे गुस्सा आता है और वह उसे मारने के लिए हाथ उठा देता है.

लेकिन उसी वक़्त उसे कुरआन की ये आयत याद आ जाती है और उसका उठा हुआ हाथ नीचे गिर जाता है. वह उसे समझाने लगता है और उनका गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो जाता है. थोड़ी कसर रह जाती है, जिसकी वजह से दोनों रात को अलग अलग सोते हैं और सुकून से अपने और साथी के बारे में सोचते हैं. लिहाज़ा अगले दिन जब सोकर उठते हैं तो दोनों का गुस्सा ठंडा हो चुका होता है. बीवी ख़ुशी ख़ुशी अपने शौहर को विदा करती है और वह नए जोश के साथ काम की तलाश में निकल जाता है. दो जनाब देखा आपने, जो आयत आपको औरत विरोधी दिख रही थी उसने एक जाहिल औरत को जाहिल मर्द से पीटने से बचा लिया.

ये आयत हरगिज़ औरत विरोधी नहीं है बल्कि मनोविज्ञान (Psychology) की निहायत अच्छी मिसाल है. बहुत खूबसूरती के साथ इसमें मर्द और औरत दोनों को समझाया गया है. पहले मर्द से कहा गया की तुम चूंकि औरत से जिस्मानी तौर पर ताक़तवर होते हो इसलिए अपने पर काबू रखो. हो सकता है वह तुमसे ज्यादा फजीलत रखती हो (बाज़ को बाज़ पर फजीलत है से यही मतलब निकलता है.) इसके बाद औरत को समझाया गया चूंकि मर्द तुम्हारे लिए दिनभर मेहनत करता है कुछ कमाकर लाता है तो तुम्हारा भी फ़र्ज़ बनता है की अपनी इज्ज़त व शौहर के माल की हिफाज़त करो. इसके बाद फिर मर्द को सलाह दी गई है की अगर अपनी बीवी की किसी बात पर तुम्हें गुस्सा आ जाए तो उसे कजोर और अपने को ताक़तवर समझकर उसे पीटना न शुरू कर दो बल्कि जो कुरआन कह रहा है उसपर अमल करो, तुम्हारा गुस्सा अपने आप ठंडा हो जाएगा.


ये आयत उस वक़्त नाजिल हुई थी जब एक नव-मुसलमान ने अपनी बीवी को तमांचा मार दिया था. और उससे पहले अरब में बीवियों को पीटना आम था. आगे कोई शख्स ऐसा क़दम न उठाये इसीलिये अल्लाह ने ऐसा हुक्म फरमाया. 

अब ये सवाल उठ सकता है की अल्लाह ने सीधे सीधे बीवी की पिटाई से क्यों नहीं मना किया? तो इसका जवाब ये है की अल्लाह बेइंसाफ नहीं है की एक को तो पूरी तरह पाबन्द कर दे और दूसरे को खुली छूट दे दे. बीवी को भी तो डर रहना चाहिए की वह हद से ज्यादा सरकश न हो जाए.

Monday, February 22, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी हैं? भाग - 2 Understand The Quran While Reading

आप लोगो ने मेरे इस लेख का पहला भाग पढा होगा। अगर नही पढा है तो यहां पढ सकते है।


हम मुस्लमान अक्सर बहाने बनाते है की हमारे पास कुरआन मजीद का तर्जुमा पढने का टाइम नही है। हम अपने रोज़-मर्रा के कामों मे मसरुफ़ है, अपनी पढाई मे, अपने कारोबार मे, वगैरह वगैरह। हम सब ये जानते है की जो भी वक्त हम स्कुल-कालेज मे लगाते है और कई किताबें हिफ़्ज़ (मुहं ज़बानी याद) कर लेते है, क्या हमारे पास कुरआन मजीद पढने का टाइम नही हैं? अगर आप कुरआन मजीद का तर्जुमा पढेंगे, चन्द दिनॊं मे पढ सकते है। लेकिन मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम फ़र्माते है :- "कि जो कोई तीन दिन से कम वक्त मे कुरआन मजीद को पुरा पढता है तो वो कुरआन मजीद को समझ कर नही पढता है" (२९४९, तिर्मिधी)। अगर आप सुकुन से पढेंगें तो इन्शाल्लाह आप सात दिन मे कुरआन मजीद के तर्जुमें को पुरा पढ लेंगे, अगर आप रोज़ कुरआन का एक पारा पढेगें तो एक महीने मे आप कुरआन को पुरा पढ लेंगें। जो डिगरी आप हासिल करते है स्कुल और कालेज जाकर वो आप को इस दुनिया मे फ़ायदा पहुचां सकती है और नही भी पहुचां सकती है क्यौंकी हम जानते है की कई डिग्री वाले बेकाम घुम रहे हैं लेकिन अल्लाह सुब्नाह व तआला वादा देते है की अगर आप इस कुरान मजीद को अच्छी तरह समझ कर पढेंगे तो आप को आखिरत मे ही नहीं इस दुनिया मे भी इन्शाल्लाह फ़ायदा होगा।


अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह बकरह सु. २ : आ. १-२ में "ये वो किताब है जिसमे कोई शक नही जो तकवा (अल्लाह से डरनें वाले) रखते है"। मिसाल के तौर पर आपका कोई करीबी दोस्त फ़्रांस से हिन्दुस्तान घुमने के लिये आता है वो हिन्दुस्तान घुमता है और आपके घर पर एक हफ़्ता रुकता है और फिर वापस चला जाता है, अपने घर पहुचने के बाद आपकॊ वो एक खत लिखता है लेकिन उसको हिन्दी या उर्दु नही आती है उसे फ़्रेंच मे महारत हासिल है तो वो आपको खत भी फ़्रेंच मे लिख्ता है। आपको फ़्रेंच आती नही है तो फिर आप क्या करेंगे? उस आदमी को ढुढंगे जिसे फ़्रेंच आती है और जो आपकॊ आपके करीबी दोस्त के खत का तर्जुमा करके बताये की आपके दोस्त ने आपको क्या लिख कर भेजा है। क्या आपका फ़र्ज़ नही होता की आप जानें की आपके रब, आपके खालिक, अल्लाह सुब्नाह व तआला ने अपने आखिरी पैगाम कुरआन मजीद मे आपके लिये क्या लिखा है? हमें कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा करने की ज़रुरत नही है अल्हम्दुलिल्लाह कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा हर अहम ज़ुबान मे हो चुका है आपको सिर्फ़ उसको मार्कट से जाकर खरीदने की ज़रुरत है। हमें कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा पढना चाहिये उस ज़बान मे जिसमें हमें महारत हासिल है।

अकसर मुस्लमान समझते है कि ये कुरआन शरीफ़ सिर्फ़ मुसलमानॊं के लिये है और इसे गैर-मुसलमानॊं को नही देना चाहिये ये हमारी गलतफ़हमी है हमारा वहम क्यौंकी अल्लाह सुब्नाह व तआला फ़र्माते है कुरआन शरीफ़ मे सुरह: इब्राहिम सु. १४ : आ. १ में "ये किताब नाज़िल कि गयी थी मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ताकि वो सारी इन्सानियत को अंधेरे से रोशनी मे ले आयें"। कुरआन मजीद मे ये कहीं नही लिखा हुआ है की कुरआन मजीद सिर्फ़ मुसलमान या अरबों के लिये है। यहां आपने पढा की अल्लाह तआला फ़रमाते है की कुरआन मजीद मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर इसलिये नाज़िल कि गयी थी कि वो सारी इन्सानियत को अंधेरे से रोशनी मे लेकर आयें। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: इब्राहिम सु. १४ : आ. ५२ में " ये कुरआन मजीद सारी इन्सानियत के लिये पैगाम है और उनके लिये जो समझते है और उनसे कह दो कि अल्लाह एक है और समझने वाले अल्लाह के कलाम को समझेंगे"। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: बकरह सु. २ : आ. १८५ में "रमज़ान वो महीना है जिसमें कुरआन शरीफ़ नाज़िल हो चुका था और ये सारी इन्सानियत के लिये हिदायत की किताब है ताकि लोग समझ सकें की गलत क्या और सही क्या है"। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: अल ज़ुम्र सु. ३९ : आ. ४१ में "के हमनें ये किताब नाज़िल कि मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ताकि वो हिदायत दे इंसानों को"। कुरआन मे ये कही नही लिखा है की ये कुरआन सिर्फ़ मुसलमानों या अरबों के लियें नाज़िल कि गयी है और कुरआन मे ये कहीं नहीं लिखा है की मुसलमानॊं को हिदायत दें और हमारे आखिरी पैगम्बर मौहम्मद सल्लाहोअलैह वस्सलम सिर्फ़ अरबों या मुसलमानॊं के लिये नही भेजे गये थें अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: अम्बिया सु. २१ : आ. १०७ में "के हमने तुम्हे भेजा है एक रहमत सारी इन्सानियत, सारे जहां के लिये"। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: सबा सु. ३४ : आ. २८ मे "के हमने तुम्हें भेजा एक पैगम्बर सारी इन्सानियत के लिये ताकि आप लोगो को अच्छाई की तरफ़ बुलायें और बुराई से रोकें"। लेकिन अकसर लोग ये नही जानते है। कुरआन की इन आयतॊं से समझ मे आता है की कुरआन मजीद और मौहम्मद सल्लाहोअलैह वस्सलम सारी इन्सानियत के लिये भेजे गये थे मुसलमानॊ के लिये भी और गैर-मुसलमानों के लिये भी।

हम मुसलमान लोग कुरआन मजीद को समझ के तो पढते नहीं लेकिन उसकी इतनी हिफ़ाज़त करते है की दूसरों को भी नही पढनें देते। कह्ते है कुरआन मजीद को जो लोग नजीज़ (नापाक/अपवित्र) है वो हाथ नही लगा सकते हैं और कुरआन मजीद की एक आयत का हवाला देते है सुरह: वाकिया सु. ५६ : आ. ७७-८२ "कि ये वो कुरआन अल्लाह तआला ने नाज़िल किया और इसको कोई भी हाथ नही लगायेंगा सिर्फ़ वो जो मुताहिरीन हैं"। अगर इस आयत के ये मायने होते की इस कुरआन शरीफ़ को जो मुसफ़ (कापी) है को कोई भी हाथ नही लगा सकता है सिर्फ़ उसके जो जो पाक है, वुज़ु मे हैं, तो कोई भी शख्स, कोई भी गैर-मुस्लिम बाज़ार से सौ या दो सौ रुपये में कुरआन खरीद कर उसे हाथ लगा सकता है और कुरआन मजीद गलत साबित हो जायेगा। कुरआन इस आयत के मायने इस कुरआन मजीद, इस किताब जो मुसह्फ़ है, के नही है बल्कि उस कुरआन मजीद जो लौहे-महफ़ुज़ (सातवें आसमान) में है जिसका ज़िक्र सुरह: बुरुज सु. ८५ : आ. २२ में है अगर आप देखेगें कि इस आयत के मुताबिक कि कुरआन क्यों नाज़िल हुआ कि कुछ लोग गैर-मुस्लिम वगैरह ये कहते थे कि मौहम्मद सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ये "वही" (पैगाम) शैतान के पास से आती थी तो अल्लाह तआला फ़र्माते है की "ये "लौह-महफ़ुज़" के नज़दीक कोई भी नही आ सकता है सिवाय उसके जो मुताहिरीन हैं।" मुताहिरीन के मायने है वो जिसने कोई भी गुनाह नही किया, वो बिल्कुल पाक है सिर्फ़ जिस्म से ही नही सारे तरीके से। अगर आप तबरिगी तफ़्सील के अन्दर वो कह्ते है की जिस कुरआन का ज़िक्र हो रहा है उस कुरआन का जो सातवें आसमान मे लौहे-महफ़ुज़ के अन्दर जिसको कोई हाथ नही लगा सकता सिवाय फ़रिश्तों के"। तो शैतान के करीब आने का तो सवाल ही नही उठता इसके माईने ये नही कोई इन्सान जो पाक नही है वो हाथ नही लगा सकता है। पाक होना, वुज़ु मे होना अच्छी बात है लेकिन इसका मतलब ये नही है की ये फ़र्ज़ है।

कुछ लोग ये भी कह्ते है की हम गैर-मुस्लिम को कुरआन का सिर्फ़ तर्जुमा देंगे अरबी मतन नही देंगे, कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा और अरबी मे साथ-साथ नही देंगे। लेकिन मै अगर किसी गैर-मुस्लिम को कुरआन देता हू तो मैं तर्जुमें के साथ अरबी का कुरआन भी देता हु क्यौंकी अगर तर्जुमें मे गलती हो तो वो इन्सान की तरफ़ है अल्लाह की तरफ़ से नही है, और तर्जुमें तो इन्सान करते है और गलती तो कहीं न कहीं करेंगे। मिसाल के तौर पे आप पढेंगे सुरह: लुकमान सु. ३१ : आ. ३४ उसमें अल्लाह तआला फ़र्माते है की "अल्लाह के अलावा कोई भी नही जानता के मां के पेट मे जो बच्चा है वो कैसा होगा"। लेकिन आप उर्दु का तर्जुमा पढेंगे तो उसमें अकसर ये लिखा मिलेगा कि "कोई भी नही जानता कि मां के पेट मे जो बच्चा है उसका जिन्स (लिंग) कैसा होगा"। और जो शख्स थोडा बहुत साइंस के बारे मे जानता होगा वो बता सकता की आज के दौर में ये जानना बहुत आसान काम है की मां के पेट मे बच्चा लडंका है या लडकी। जबकी अरबी मे जिन्स लफ़्ज़ है ही नही। कुरआन मजीद मे लिखा है कि "कोई भी नही जानता सिर्फ़ अल्लाह के सिवा की मां के पेट के अन्दर बच्चा कैसा होगां। कैसा होगा के माईने की पैदा होने के बाद वो अच्छा होगा या बुरा, दुनिया के फ़ायदेमन्द होगा या नुक्सानदायक, वो जन्नत जायेगा या जह्न्नम कोई भी नही जानता सिवाय अल्लाह के।"

बाकी अगली कडीं मे....

अल्लाह आप सब कुरआन पढ कर और सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।

आमीन, सुम्मा आमीन


साभार :- इस्लाम और कुरआन

Wednesday, February 3, 2010

''पवित्र कुरआन में गणितीय चमत्कार'' quran-math-II

पिछली पोस्‍ट ''पवित्र कुरआन में गणितीय चमत्कार'' की सफलता को देखते हुये, पुस्‍तक ''दयानन्‍द जी ने क्‍या खोजा, क्‍या पाया'' के लेखक श्री डाक्‍टर अनवर जमाल साहब से मैं ने फरमाईश की थी कि इस सिलसिले को आगे बढाया जाये, ज‍बकि जमाल साहब चाहते थे ''वन्‍दे ईश्‍वरम" मासिक पत्रिका में, अगली कडी छप जाये तब इधर ब्लागस में दी जाये, परन्‍तु इधर ''हमारी अन्‍जुमन'' में पोस्ट की अपार सफलता को देखते हुये आपने निर्णय बदला और इस विषय पर ''हमारी अन्‍जुमन'' के लिये यह पोस्‍ट तैयार कर दी , धन्‍यवाद
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‘बिस्मिल्लाह’ के अक्षरों में छिपा रहस्य
पवित्र कुरआन का आरम्भ जिस आयत से होता है वह खुद इतना बड़ा गणितीय चमत्कार अपने अन्दर समाये हुए है जिसे देखकर हरेक आदमी जान सकता है कि ऐसी वाणी बना लेना किसी मुनष्य के बस का काम नहीं है। एकल संख्याओं में 1 सबसे छोटा अंक है तो 9 सबसे बड़ा अंक है और इन दोनों से मिलकर बना 19 का अंक जो किसी भी संख्या से विभाजित नहीं होता।
पवित्र कुरआन का आरम्भ ‘बिस्मिल्लाहिर-रहमानिर रहीम’ से होता है। इसमें कुल 19 अक्षर हैं। इसमें चार शब्द ‘इस्म’(नाम), अल्लाह,अलरहमान व अलरहीम मौजूद हैं। परमेश्वर के इन पवित्र नामों को पूरे कुरआन में गिना जाये तो इनकी संख्या इस प्रकार है-
इस्म-19,
अल्लाह- 2698,
अलरहमान -57,
अलरहीम -114

अब अगर इन नामों की हरेक संख्या को ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम’ के अक्षरों की संख्या 19 से भाग दिया जाये तो हरेक संख्या 19, 2698, 57 व 114 पूरी विभाजित होती है कुछ शेष नहीं बचता।
है न पवित्र कुरआन का अद्भुत गणितीय चमत्कार-

# 19 ÷ 19 =1 शेष = 0
# 2698 ÷ 19 = 142 शेष = 0
# 57 ÷ 19 = 3 शेष = 0
# 114 ÷ 19 = 6 शेष = 0

पवित्र कुरआन में कुल 114 सूरतें हैं यह संख्या भी 19 से पूर्ण विभाजित है।
पवित्र कुरआन की 113 सूरतों के शुरू में ‘बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्ररहीम’ मौजूद है, लेकिन सूरा-ए-तौबा के शुरू में नहीं है। जबकि सूरा-ए-नम्ल में एक जगह सूरः के अन्दर, 30वीं आयत में बिस्मिल्लाहिर्रमानिर्रहीम आती है। इस तरह खुद ‘बिस्मिल्ला- हर्रहमानिर्रहीम’ की संख्या भी पूरे कुरआन में 114 ही बनी रहती है जो कि 19 से पूर्ण विभाजित है। अगर हरेक सूरत की तरह सूरा-ए-तौबा भी ‘बिस्मिल्लाह’ से शुरू होती तो ‘बिस्मिल्लाह’ की संख्या पूरे कुरआन में 115 बार हो जाती और तब 19 से भाग देने पर शेष 1 बचता।
क्या यह सब एक मनुष्य के लिए सम्भव है कि वह विषय को भी सार्थकता से बयान करे और अलग-अलग सैंकड़ों जगह आ रहे शब्दों की गिनती और सन्तुलन को भी बनाये रखे, जबकि यह गिनती हजारों से भी ऊपर पहुँच रही हो?


पहली प्रकाशना में 19 का चमत्कार

पवित्र कुरआन का एक और चमत्कार देखिये-
अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (स.) के अन्तःकरण पर परमेश्वर की ओर से सबसे पहली प्रकाशना (वह्या) में ‘सूरा-ए-अलक़’ की पहली पांच आयतें अवतरित हुईं। इसमें भी 19 शब्द और 76 अक्षर हैं।
76÷19=4 यह संख्या भी पूरी तरह विभाजित है। इस सूरत की आयतों की संख्या भी 19 है।
कुरआन शरीफ़ की कुल 114 सूरतों में यह 96 वें नम्बर पर स्थित है। यदि पीछे से गिना जाये तो यह ठीक 19वें नम्बर पर मिलेगी क्या यह एक कुशल गणितज्ञ की योजना का प्रमाण नहीं है?

कुल संख्याओं का योग और विभाजन

पवित्र कुरआन की आयातों में कुछ संख्याएं आयी हैं। उदाहरणार्थ-
कह दीजिए,“ वह अल्लाह एक है” (कुरआन 112:1)

और वे अपनी गुफा में तीन सौ साल और नौ साल ज़्यादा रहे। (कुरआन 18:25)

इन सारी संख्याओं को इकटठा किया जाए तो वे इस प्रकार होंगी-1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 19,20, 30, 40, 50, 60, 70, 80, 99, 100, 200, 300, 1,000, 2,000, 3,000, 5,000, 50,000, 100,000

इन सारी संख्याओं का कुल योग है 16,21,46
यह योग भी 19 से पूरी तरह विभाजित है 162146÷19=8534

क्या अब भी कोई आदमी कह सकता है कि यह कुरआन तो मुहम्मद साहब की रचना है? ध्यान रहे कि उन्हें ईश्वर ने ‘अनपढ़’ (उम्मी) रखा था।

क्या आज का कोई भी पढ़ा लिखा आदमी पवित्र कुरआन जैसा ग्रन्थ बना सकता है।?
क्या अब भी शक-शुबहे और इनकार की कोई गंन्‍जाइश बाक़ी बचती है?
नर्क पर भी नियुक्त हैं 19 रखवाले
पवित्र कुरआन के इस गणितीय चमत्कार को देखकर आस्तिकों का ईमान बढ़ता है और आचरण सुधरता है जबकि अपने निहित स्वार्थ और अहंकार के वशीभूत होकर जो लोग पवित्र कुरआन को ईश्वरकृत नहीं मानते और उसके बताये मार्ग को ग्रहण नहीं करते। वे मार्ग से भटककर दुनिया में भी कष्ट भोगते हैं और मरने के बाद भी आग के गडढ़े में जा गिरेंगे। उस आग पर नियुक्त देवदूतों की संख्या भी 19 ही होगी।
19 की संख्या विश्वास बढ़ाने का ज़रिया
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है-
फिर उसने (कुरआन को) देखा। फिर (घृणा से) मुँह मोड़ा और फिर अहंकार किया। फिर बोला,“ यह एक जादू है जो पहले से चला आ रहा है, यह मनुष्य का वचन (वाणी है)”
‘मैं, शीघ्र ही उसे ‘सक़र’ (नर्क) में झोंक दूँगा, और तुम्हें क्या मालूम कि सक़र क्या है?
वह न बाक़ी रखेगी, और न छोड़ेगी। वह शरीर को बिगाड़ देने वाली है। उस पर 19 (देवदूत) नियुक्त हैं। और ‘हमने’ उस अग्नि के रखवाले केवल देवदूत (फरिश्ते) बनाए हैं, और ‘हमने’ उनकी संख्या को इनकार करने वालों के लिए मुसीबत और आज़माइश बनाकर रखा है। ताकि पूर्व ग्रन्थ वालों को (कुरआन की सत्यता का) विश्वास हो जाए और आस्तिक किसी शक में न पडें। (पवित्र कुरआन 29:21:31)

मनुष्य का मार्ग और धर्म
पालनहार प्रभु ने मनुष्य की रचना दुख भोगने के लिए नहीं की है। दुख तो मनुष्य तब भोगता है जब वह ‘मार्ग’ से विचलित हो जाता है। मार्ग पर चलना ही मनुष्य का कत्र्तव्य और धर्म है। मार्ग से हटना अज्ञान और अधर्म है जो सारे दूखों का मूल है।
पालनहार प्रभु ने अपनी दया से मनुष्य की रचना की उसे ‘मार्ग’ दिखाया ताकि वह निरन्तर ज्ञान के द्वारा विकास और आनन्द के सोपान तय करता हुआ उस पद को प्राप्त कर ले जहाँ रोग,शोक, भय और मृत्यु की परछाइयाँ तक उसे न छू सकें। मार्ग सरल है, धर्म स्वाभाविक है। इसके लिए अप्राकृतिक और कष्टदायक साधनाओं को करने की नहीं बल्कि उन्हें छोड़ने की ज़रूरत है।
ईश्वर प्राप्ति सरल है

ईश्वर सबको सर्वत्र उपलब्ध है। केवल उसके बोध और स्मृति की ज़रूरत है। पवित्र कुरआन इनसान की हर ज़रूरत को पूरा करता है। इसकी शिक्षाएं स्पष्ट,सरल हैं और वर्तमान काल में आसानी से उनका पालन हो सकता है। पवित्र कुरआन की रचना किसी मनुष्य के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इसके विषयों की व्यापकता और प्रामाणिकता देखकर कोई भी व्यक्ति आसानी से यह जान सकता है कि इसका एक-एक शब्द सत्य है।
आधुनिक वैज्ञानिक खोजों के बाद भी पवित्र कुरआन में वर्णित कोई भी तथ्य गलत नहीं पाया गया बल्कि उनकी सत्यता ही प्रमाणित हुई है। कुरआन की शब्द योजना में छिपी गणितीय योजना भी उसकी सत्यता का एक ऐसा अकाट्य प्रमाण है जिसे कोई भी व्यक्ति जाँच परख सकता है।

प्राचीन धर्म का सीधा मार्ग
ईश्वर का नाम लेने मात्र से ही कोई व्यक्ति दुखों से मुक्ति नहीं पा सकता जब तक कि वह ईश्वर के निश्चित किये हुए मार्ग पर न चले। पवित्र कुरआन किसी नये ईश्वर,नये धर्म और नये मार्ग की शिक्षा नहीं देता। बल्कि प्राचीन ऋषियों के लुप्त हो गए मार्ग की ही शिक्षा देता है और उसी मार्ग पर चलने हेतु प्रार्थना करना सिखाता है।
‘हमें सीधे मार्ग पर चला, उन लोगों का मार्ग जिन पर तूने कृपा की।’ (पवित्र कुरआन 1:5-6)

ईश्वर की उपासना की सही रीति
मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन यह इस पर निर्भर है कि वह ईश्वर को अपना मार्गदर्शक स्वीकार करना कब सीखेगा? वह पवित्र कुरआन की सत्यता को कब मानेगा? और सामाजिक कुरीतियों और धर्मिक पाखण्डों का व्यवहारतः उन्मूलन करने वाले अन्तिम सन्देष्टा हज़रत मुहम्मद (स.) को अपना आदर्श मानकर जीवन गुज़ारना कब सीखेगा?

सर्मपण से होता है दुखों का अन्त

ईश्वर सर्वशक्तिमान है वह आपके दुखों का अन्त करने की शक्ति रखता है। अपने जीवन की बागडोर उसे सौंपकर तो देखिये। पूर्वाग्रह,द्वेष और संकीर्णता के कारण सत्य का इनकार करके कष्ट भोगना उचित नहीं है। उठिये,जागिये और ईश्वर का वरदान पाने के लिए उसकी सुरक्षित वाणी पवित्र कुरआन का स्वागत कीजिए।

भारत को शान्त समृद्ध और विश्व गुरू बनाने का उपाय भी यही है।

क्या कोई भी आदमी दुःख, पाप और निराशा से मुक्ति के लिये इससे ज़्यादा बेहतर, सरल और ईश्वर की ओर से अवतरित किसी मार्ग या ग्रन्थ के बारे में मानवता को बता सकता है? (...जारी)

Wednesday, January 27, 2010

पवित्र कुरआन में गणितीय चमत्कार - quran-math

"और जो 'हमने' अपने बन्दे 'मुहम्मद' पर 'कुरआन' उतारा है, अगर तुमको इसमें शक हो तो इस जैसी तुम एक 'ही' सूरः बनाकर ले आओ और अल्लाह के सिवा जो तुम्हारे सहायक हों' उन सबको बुला लाओ' अगर तुम सच्चे हो। फिर अगर तुम ऐसा न कर सको और तुम हरगिज़ नहीं कर सकते तो डरो उस आग से जिसका ईंधन इनसान और पत्थर हैं] जो इनकारियों के लिए तैयार की गई है" -('पवित्र कुरआन' 2 : 23-24) विस्‍तार से जानने के लिये देखें

दुःख दर्द का इतिहास
मनुष्य जाति का इतिहास दुख-दर्द और जुल्म की दास्ताना है। उसका वर्तमान भी दुख दर्द और ज़ुल्म से भरा हुआ गुज़र रहा है और भविष्य में आने वाला विनाश भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
ऐसा नहीं है कि इनसान इस हालत से नावाक़िफ़ है या उसने दुख का कारण जानने और दुख से मुक्ति पाने की कोशिश ही नहीं की। इनसान का इतिहास दुखों से मुक्ति पाने की कोशिशों का बयान भी है। वर्तमान जगत की सारी तरक्‍की और तबाही के पीछे यही कोशिशें कारफ़रमा हैं।
सोचने वालों ने सोचा कि दुख का मूल कारण अज्ञान है। अज्ञान से मुक्ति के लिए इनसानों ने ज्ञान की तरफ़ कदम बढ़ाए। कुछ ने नज़र आने वाली चीज़ों पर एक्सपेरिमेन्ट्स शुरू किए तो कुछ लोगों ने अपने मन और सूक्ष्म शरीर को अपने अध्ययन का विषय बना लिया। वैज्ञानिकों ने आग, पानी, हवा, मिट्टी और अतंरिक्ष को जाना समझा, मनुष्य के शरीर को जाना समझा और अपनी ताक़त के मुताबि़क उन पर कंट्रोल करके उनसे काम भी लिया। हठयोगियों ने शरीर को अपने ढंग से वश में किया और राजयोगियों ने मन जैसी चीज़ का पता लगाया और उसे साधने जैसे दुष्कर कार्य को संभव कर दिखाया।

दुख का कारण
कुछ लोगों ने तृष्णा और वासना को दुखों का मूल कारण समझा और उन्हें त्याग दिया और कुछ लोगों ने सोचा कि शायद उनकी तृप्ति से ही शांति मिले। यह सोचकर वे उनकी पूर्ति में ही जुट गए। इनसानों ने योगी भोगी और नैतिक-अनैतिक सब कुछ बनकर देखा और सारे तरीके़ आज़माए बल्कि आज भी इन्हीं सब तरीकों को आज़मा रहे हैं लेकिन फिर भी मानव जाति को दुखों से मुक्ति और सुख-शांति नसीब नहीं हुई बल्कि उसके दुखों की लिस्ट में एड्स, दहेज, कन्या, भ्रूण हत्या, ग्लोबल वॉर्मिग और सुपरनोवा जैसे नये दुखों के नाम और बढ़ गए। आखि़र क्या वजह रही कि सारे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक लोग मिलकर मानवजाति को किसी एक दुख से भी मुक्ति न दिला सके?
कहीं कोई कमी तो ज़रूर है कि साधनों और प्रयासों के बावजूद सफलता नहीं मिल रही है। विचार करते हैं तो पाते हैं कि ये सारी कोशिशें सिर्फ़ इसलिए बेनतीजा रहीं क्योंकि ये सारी कोशिशें इनसानों ने अपने मन के अनुमान और बुद्धि की अटकल के बल पर कीं और ईश्वर को और उसके ज्ञान को उसका वाजिब हक़ नहीं दिया।

सच्चा राजा एक है
सारी सृष्टि का सच्चा स्वामी केवल एक प्रभु परमेश्वर है। उसी ने हरेक चीज़ को उत्पन्न किया। उनका मक़सद और काम निश्चित किया। उनमें परस्पर निर्भरता और संतुलन क़ायम किया। उनकी मर्यादा और सीमाएं ठहराईं। परमेश्वर ही स्वाभाविक रूप से मार्गदर्शक है। उसने प्रखर चेतना और उच्च मानवीय मूल्यों से युक्त मनुष्यों के अन्तःकरण में अपनी वाणी का अवतरण किया। उन्हें परमज्ञान और दिव्य अनुभूतियों से युक्त करके व्यक्ति और राष्ट्र के लिए आदर्श बना दिया। उन्होंने हर चीज़ खोलकर बता दी और करने लायक सारे काम करके दिखा दिए। इन्हीं लोगों को ऋषि और पैग़म्बर कहा जाता है।

पैग़म्बर (स.) मानवता का आदर्श
इतिहास के जिस कालखण्ड में इन लोगों की शिक्षाओं का पालन किया गया बुरी परम्पराओं और बुरी आदतों का खात्मा हो गया। इनसान की जिन्दगी संतुलित और सहज स्वाभाविक होकर दुखों से मुक्त हो गयी। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स.) के द्वारा अरब की बिखरी हुई युद्धप्रिय और अनपढ़ आबादी में आ चुका बदलाव एक ऐतिहासिक साक्ष्य है। यह युगांतरकारी परिवर्तन केवल तभी सम्भव हो पाया जबकि लोगों ने ईश्वर को उसका स्वाभाविक और वाजिब हक़ देना स्वीकार कर लिया। उसे अपना मार्गदर्शक मान लिया। ईश्वर ही वास्तविक राजा और सच्चा बादशाह है यह हमें मानना होगा। उसके नियम-क़ानून ही पालनीय हैं। ऐसा हमें आचरण से दिखाना होगा। यही वह मार्ग है जिसकी प्रार्थना गायत्री मंत्र और सूरा-ए-फ़ातिहा पढ़कर हिन्दू-मुस्लिम करते हैं। सबका रचयिता एक है तो सबके लिए उसकी नीति और व्यवस्था भी एक होना स्वाभाविक है।

कुरआन का इनकार कौन करता है?
पवित्र कुरआन इसी स्वाभाविक सच्चाई का बयान है। इस सत्य को केवल वे लोग नहीं मानते जो पवित्र कुरआन के तथ्यों पर ग़ौर नहीं करते या ग़ुज़रे हुए दौर की राजनीतिक उथल-पुथल की कुंठाएं पाले हुए हैं। ये लोग रहन-सहन,खान-पान और भौतिक ज्ञान में, हर चीज़ में विदेशी भाषा-संस्कृति के नक्क़ाल बने हुए हैं लेकिन जब बात ईश्वरीय ज्ञान पवित्र कुरआन की आती है तो उसे यह कहकर मानने से इनकार कर देते हैं कि यह तो विदेशियों का धर्मग्रंथ है। जबकि देखना यह चाहिए कि यह ग्रंथ ईश्वरीय है या नहीं?

बदलता हुआ समाज
पवित्र क़ुरआन से पहले भी ईश्वर की ओर से महर्षि मनु और हज़रत इब्राहिम आदि ऋषियों-पैग़म्बरों पर हज़ारों बार वाणी का अवतरण हुआ, लेकिन आज उनमें से कोई भी अपने मूलरूप में सुरक्षित नहीं है और जिस रूप में आज वे हमें मिलती हैं तो न तो उनके अन्दर इस तरह का कोई दावा है कि वे ईश्वर की वाणी हैं औन न ही एक आधुनिक समतावादी समाज की राजनीतिक,सामाजिक, आध्यात्मिक व अन्य ज़रूरतों की पूर्ति उनसे हो पाती है। यही वजह है कि उन ग्रन्थों के जानकारों ने उनके द्वारा प्रतिपादित सामाजिक नियम,दण्ड-व्यवस्था और पूजा विधियाँ तक या तो निरस्त कर दी हैं या फिर उनका रूप बदल दिया है। बदलना तो पड़ेगा। लेकिन यह बदलाव भी ईश्वर के मार्गदर्शन में ही होना चाहिए अन्यथा अपनी मर्जी से बदलेंगे तो ऐसा भी हो सकता है कि हाथ में केवल भाषा-संस्कृति ही शेष बचें और धर्म का मर्म जाता रहे, क्योंकि धर्म की गति बड़ी सूक्षम होती है।

पवित्र कुरआन : कसौटी भी, चुनौती भी
पवित्र कुरआन बदलते हुए युग में आवश्यक बदलाव की ज़रूरतों को पूरा करता है। यह स्वयं दावा करता है कि यह ईश्वर की ओर से है। यह स्वयं अपने ईश्वरीय होने का सुबूत देता है और अपने प्रति सन्देह रखने वालों को अपनी सच्चाई की कसौटी और चुनौती एक साथ पेश करता है कि अगर तुम मुझे मनुष्यकृत मानते हो तो मुझ जैसा ग्रंथ बनाकर दिखाओ या कम से कम एक सूरः जैसी ही बनाकर दिखाओ और अगर न बना सको तो मान लो कि मैं तुम्हारे पालनहार की ओर से हूँ जिसका तुम दिन रात गुणगान करते हो। मैं तुम्हारे लिए वही मार्गदर्शन हूँ जिसकी तुम अपने प्रभु से कामना करते हो। मैं दुखों से मुक्ति का वह एकमात्र साधन हूँ जो तुम ढूँढ रहे हो।

पवित्र कुरआन अपनी बातों में ही नहीं बल्कि उन्हें कहने की शैली तक में इतना अनूठा है कि तत्कालीन समाज में अपनी धार्मिक-आर्थिक चैधराहट की ख़ातिर हज़रत मुहम्मद (स.) का विरोध करने वाले भी अरबी के श्रेष्ठ कवियों की मदद लेकर भी पवित्र कुरआन जैसा नहीं बना पाये। जबकि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स.) के जीवन की योजना ही ईश्वर ने ऐसी बनायी थी कि वे किसी आदमी से कुछ पढ़ाई-लिखाई नहीं सीख सके थे।

पवित्र कुरआन का चमत्कार
हज़रत मुहम्मद (स.) आज हमारी आँखों के सामने नहीं हैं लेकिन जिस ईश्वरीय ज्ञान पवित्र कुरआन के ज़रिये उन्होंने लोगों को दुख निराशा और पाप से मुक्ति दिलाई वह आज भी हमें विस्मित कर रहा हैै।

एक साल में 12 माह और 365 दिन होते हैं। पूरे कुरआन शरीफ में हज़ारों आयतें हैं लेकिन पूरे कुरआन शरीफ में शब्द शह् र (महीना) 12 बार आया है और शब्द ‘यौम’ (दिन) 365 बार आया है। जबकि अलग-अलग जगहों पर महीने और दिन की बातें अलग-अलग संदर्भ में आयी हैं। क्या एक इनसान के लिए यह संभव है कि वह विषयानुसार वार्तालाप भी करे और गणितीय योजना का भी ध्यान रखे? ‘मुहम्मद’ नाम पूरे कुरआन शरीफ़ में 4 बार आया है तो ‘शरीअत’ भी 4 ही बार आया है। दोनों का ज़िक्र अलग-अलग सूरतों में आया है।‘मलाइका’ (फरिश्ते) 88 बार और ठीक इसी संख्या में ‘शयातीन’ (शैतानों) का बयान है। ‘दुनिया’ का ज़िक्र भी ठीक उतनी ही बार किया गया है जितना कि ‘आखि़रत’ (परलोक) का यानि प्रत्येक का 115 बार। इसी तरह पवित्र कुरआन में ईश्वर ने न केवल स्त्री-पुरूष के मानवधिकारों को बराबर घोषित किया है बल्कि शब्द ‘रजुल’ (मर्द) व शब्द ‘इमरात’ (औरत) को भी बराबर अर्थात् 24-24 बार ही प्रयुक्त किया है।

ज़कात (2.5 प्रतिशत अनिवार्य दान) में बरकत है यह बात मालिक ने जहाँ खोलकर बता दी है। वही उसका गणितीय संकेत उसने ऐसे दिया है कि पवित्र कुरआन में ‘ज़कात’ और ‘बरकात’ दोनों शब्द 32-32 मर्तबा आये हैं। जबकि दोनांे अलग-अलग संदर्भ प्रसंग और स्थानों में प्रयुक्त हुए हैं।

पवित्र कुरआन में जल-थल का अनुपात
एक इनसान और भी ज़्यादा अचम्भित हो जाता है जब वह देखता है कि ‘बर’ (सूखी भूमि) और ‘बह्र’ (समुद्र) दोनांे शब्द क्रमशः 12 और 33 मर्तबा आये हैं और इन शब्दों का आपस में वही अनुपात है जो कि सूखी भूमि और समुद्र का आपसी अनुपात वास्तव में पाया जाता है।

सूखी भूमि का प्रतिशत- 12/45 x 100 = 26.67 %
समुद्र का प्रतिशत- 33/45 x 100 = 73.33 %

सूखी जमीन और समुद्र का आपसी अनुपात क्या है? यह बात आधुनिक खोजों के बाद मनुष्य आज जान पाया है लेकिन आज से 1400 साल पहले कोई भी आदमी यह नहीं जानता था तब यह अनुपात पवित्र कुरआन में कैसे मिलता है? और वह भी एक जटिल गणितीय संरचना के रूप में।

क्या वाकई कोई मनुष्य ऐसा ग्रंथ कभी रच सकता है?

क्या अब भी पवित्र कुरआन को ईश्वरकृत मानने में कोई दुविधा है? (...जारी)
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साभार ''वन्‍दे ईश्‍वरम'' मासिक पत्रीका, प़ष्‍ठ 5 से 9, डा. अनवर जमाल eshvani@gmail.com

Saturday, January 23, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग- १

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की आखिरी वही (पैगाम) अपने आखिरी पैगम्बर मुहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर नाज़िल की थी। कुरआन मजीद सारी दुनिया मे सबसे बेहतरीन किताब है, वो इन्सानियत के लिये हिदायत है, कुरआन मजीद हिकमत का झरना है और जो लोग नही मानते उन्के लिये चेतावनी है, उन्के लिये सख्ती है और जो लोग भटके हुए है उन्हे सीधी राह दिखाती है कुरआन मजीद। जिन लोगो को शक है कुरआन मजीद उन्के लिये यकीन है और जो मुश्किलात मे है उन्के लिये राहत है लेकिन ये कुरआन मजीद की सारी खुबियां कोई इन्सान तब तक हासिल नही कर सकता है जब की वो कुरआन मजीद को नही पढे, कुरआन मजीद को नही समझे, और कुरआन मजीद पर अमल न करे। कुरआन मजीद की ये सारी खुबियां हम तब ही हासिल कर सकते है जब कुरआन मजीद को पढे, उसकॊ समझें और उस पर अमल करें। कुरआन मजीद सारे जहां मे सबसे ज़्यादा पढी जाने वाली किताब है लेकिन अफ़्सोस की बात है की कुरआन मजीद वो ही किताब है जो सबसे ज़्यादा बिना समझे पढी जाती है, ये वो किताब है जो लोग बिना समझे पढते है यही वजह की हम मुस्लमानॊं और कुरआन के बीच जो रिश्ता है, जो बंधन है वो कमज़ोर होता जा रहा है।


कितने अफ़्सोस की बात है की एक शख्स कुरआन के करीब आता है, कुरआन पढता है, लेकिन उसके ज़िन्दगी जीने का तरीका बिल्कुल भी नही बदलता, उसका रहन-सहन ज़रा भी नही बदलता, उसका दिल ज़रा भी नही पिघलता, बहुत अफ़्सोस की बात है। अल्लाह तआला फ़र्माते है कुरआन मजीद में सुरह: अल इमरान सु. ३ : आ. ११० मे अल्लाह तआला सारे मुसलामानॊं से फ़र्माते है "की आप सारे जहां मे सबसे बेहतरीन उम्मा (उम्मत) है"। जब भी कोई तारिफ़ की जाती है या ओहदा दिया जाता है तो उसके साथ ज़िम्मेदारी होना ज़रुरी है कोई भी ओहदे के साथ ज़िम्मेदारी होना ज़रुरी है। जब अल्लाह तआला हमे सारे जहां मे सबसे बेहतरीन उम्मा कहते है तो क्या हमारे उपर कोई ज़िम्मेदारी नही है? इसी आयत मे अल्लाह तआला हमें हमारी ज़िम्मेदारी भी बताते है "अल्लाह तआला फ़र्माते है क्यौंकी हम लोगों को अच्छाई की तरफ़ बुलाते है और बुराई से रोकते है"। अगर हम लोगो को अच्छाई की तरफ़ बुलाना चाहते है और बुराई से बचाना चाहते है तो ज़रुरी है की हम कुरआन को समझ कर पढे। अगर हम कुरआन को समझ कर नही पढेंगें तो लोगो को अच्छाई की तरफ़ कैसे बुलायेंगें? और अगर हम लोगो को अच्छाई की तरफ़ नही बुलायेंगे तो हम "खैरा-उम्मा" (सबसे बेह्तरीन उम्मा) कहलाने के लायक नही है। हम मुसलमान कहलाने के लायक नही है।

आज हम गौर करते हैं की हम मुसलमान कुरआन को समझ कर क्यौं नही पढतें? हम मुस्लमान क्यौं बहाने बनाते है कुरआन मजीद को समझ कर नही पढने के?

सबसे पहला जो बहाना है वो है की हम अरबी ज़बान नही जानते। ये हकीकत है की सारी दुनिया मे बीस प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान है, सारी दुनिया मे १२५ करोडं से ज़्यादा मुसलमान है लेकिन इसमे से लगभग १५ प्रतिशत मुसलमान अरब है जिनकी मार्त भाषा अरबी है और इन्के अलावा चन्द मुस्लमान अरबी ज़बान जानते है इसका मतलब है की ८० प्रतिशत मुसलमान अरबी ज़बान नही जानते है। जब भी कोई बच्चा पैदा होता है और इस दुनिया मे आता है तो वो कोई ज़बान नही जानता है वो सबसे पहले अपनी मां की ज़बान सीखता है ताकि वो घरवालॊं से बात कर सके, उसके बाद वो अपने मुह्ल्ले की ज़बान सीखता है ताकि मुह्ल्लेवालों से बातचीत कर सके, फिर वो तालिम हासिल करता है जिस स्कुल या कांलेज मे जिस ज़बान मे तालिम हासिल करता है उस ज़बान को सीखता है। हर इन्सान कम से कम दो या तीन ज़बान समझ सकता है, कुछ लोग चार या पांच ज़बान समझ सकते है और लोगो को बहुत सी ज़बानॊ मे महारत हासिल होती है लेकिन आम तौर से एक इन्सान दो या तीन ज़बान समझ सकता है। क्या हमे ज़रुरी नही की हम वो ज़बान समझे जिस ज़बान मे अल्लाह तआला ने आखिरी पैगाम इंसानियत के लिये पेश किया? क्या हमे ज़रुरी नही की हम अरबी ज़बान को जानें और सीखें? और उम्र कभी भी, कोई भी अच्छे काम के लिये रुकावट नही है।

मैं आपकॊं मिसाल पेश करना चाहता हु डां. मौरिस बुकेल की, डां. मौरिस बुकेल एक ईसाई थे, उन्हे फ़्रैचं अक्डेमी अवार्ड मिला था मेडिसिन के श्रेत्र मे, और उनको चुना गया था की "फ़िरौन की लाश" जो बच गयी थी, जिसे लोगों ने ढुढां था १९वीं सदी में, उसे मिस्त्र के अजायबघर रखा गया है। उन्हे चुना गया था की आप इस लाश पर तह्कीक (रिसर्च) करने को और डां. मौरिस बुकेल क्यौंकी ईसाई थे इसलिये जानते थे की "बाईबिल" मे लिखा हुआ था "की जब फ़िरौन मुसा अलैह्स्सलाम का पिछा कर रहा था तो वो दरिया मे डुब जाता है, ये उन्हे पता था। लेकिन डां. मौरिस बुकेल जब अरब का दौरा कर रहे थे तो एक अरब के आदमी ने कहा की कोई नयी बात नही है की आपने "फ़िरौन" कि लाश को ढुढं निकाला क्यौंकी कुरआन मजीद मे सुरह: युनुस सु. १० : आ. ९२ :- "अल्लाह तआला फ़र्माते है की हम फ़िरौन की लाश को हिफ़ाज़त से रखेंगें, महफुज़ रखेंगें ताकि सारी दुनिया के लिये वो एक निशानी बनें"। डां. मौरिस बुकेल हैरान हुए की ये जो किताब आज से १४०० साल पुरानी है उसमे कैसे लिखा गया है की "फ़िरौन की लाश को हिफ़ाज़त से रखा जायेगा"। इसीलिये डां. मौरिस बुकेल ने कुरआन मजीद का तर्जुमा पढां और तर्जुमा पढने के बाद इतने मुतासिर हुए की कुरआन को और अच्छी तरह समझने के पचास साल की उम्र मे उन्होने अरबी ज़बान सीखी और कुरआन का मुताला (समझ कर पढा) किया। और उसके बाद एक किताब लिखी " Bible. Quran And Science" और ये किताब काफ़ी मशहुर है और काफ़ी ज़बानॊ मे इसका तर्जुमा हो चुका है।

मैनें ये मिसाल आपकॊ दी ये समझाने के लिये की एक गैर-मुसलमान, एक ईसाई, कुरआन को अच्छी तरह समझने के लिये पचास साल की उम्र मे अरबी ज़बान सीखता है। मै जानता है की हम सब डां. मौरिस बुकेल की तरह जज़्बा नही रखते है लेकिन कम से कम हम कुरआन का तर्जुमा तो पढ सकते है। मौलाना अब्दुल मजीद दरियाबादी फ़र्माते है की सारी दुनिया मे सबसे मुश्किल किताब जिस्का तर्जुमा हो सकता है वो है कुरआन मजीद। क्यौंकी कुरआन मजीद की ज़बान अल्लाह तआला की तरह से है और एक बेहतरीन ज़बान है, एक करिश्मा है। कुरआन की एक आयत एक ज़हीन और पढे - लिखे आदमी को मुत्तासिर (Impress) करती है और वही आयत एक आम आदमी कॊ मुत्तासिर करती है यह खुबी है कुरआन मजीद की और कई अरबी अल्फ़ाज़ (शब्द) उसके पचास से ज़्यादा माईने (मतलब/अर्थ) होते हैं और कुरआन मजीद की एक आयत के कई माईने होते है इसीलिये ये अल्लाह तआला की आखिरी किताब सबसे मुश्किल किताब है जिस्का तर्जुमा (अनुवाद) हो सकता है लेकिन इसके बावजुद कई उलमा ने कुरआन मजीद का तर्जुमा दुनिया की कई ज़बानॊ मे किया, जितनी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली ज़बानें (भाषायें) है उसके अंदर कुरआन मजीद का तर्जुमा (अनुवाद) हो चुका है तो अगर आपकॊ अरबी ज़बान मे महारत हासिल नही है तो आप कुरआन का तर्जुमा उस ज़बान (भाषा) मे पढे जिसमे आपको महारत हासिल है।

भाग -२ में जारी

साभार :- इस्लाम और कुरआन

Thursday, September 17, 2009

कुरआन ने मुझ पर जादुई असर डाला

मैंने इस्लामिक प्रार्थना में विनम्रता और आत्मीयता महसूस की है। दूसरी तरफ इंग्लैण्ड के लोग भौतिकवादी और उथले हैं। वे खुश होने का दिखावा करते हैं लेकिन खुशी उनसे दूर है।
अब्दुर्रहीम ग्रीन ब्रिटेन, पहले ईसाई
अब इस्लाम के माने हुए स्कॉलर
तंजानिया में जन्में और ब्रिटेन में पले बढ़े ४५ वर्षीय ग्रीन का इस्लाम से परिचय मिस्र में हुआ जहां वे अक्सर अपनी छुट्टियां बिताते थे।
अक्टूबर १९९७ में उन्होंने गॉड्स फाइनल रिवेलेशन विषय पर बंगलौर में लेक्चर दिया। इस दौरान बंगलौर से अंगे्रजी में प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका इस्लामिक वॉइस ने उनका इन्टरव्यू लिया। यहां पेश है उस वक्त लिया गया अब्दुर्रहीम ग्रीन के इन्टरव्यू का हिन्दी अनुवाद।
अब्दुर्रहीम ग्रीन इस्लामिक दुनिया में एक जाना पहचाना नाम है। वे पिछले बीस सालों से ब्रिटेन में इस्लामिक मूल्यों के प्रचार प्रसार में जुटे हैं। वे इस्लामिक चैनल पीस टीवी और अन्य इस्लामिक चैनल्स के जरिए भी इस्लाम को बेहतर तरीके से दुनिया के सामने रख रहे हैं। वे पहले ईसाई थे लेकिन ईसाई आस्था से उनका जल्दी ही मोह भंग हो गया। सुकून की तलाश में अब्दुर्रहीम ग्रीन ने कई धर्मों का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने कुरआन पढऩा करना शुरू किया। वे कुरआन से बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने कुरआन में अपने हर सवाल का जवाब पाया। वे इस नतीजे पर पहुंचे की कुरआन ईश्वरीय ग्रन्थ और फिर अब्दुर्रहीम ग्रीन ने १९८८ में इस्लाम कबूल कर लिया। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि बताएं?
मैं १९६४ में तंजानिया के दारुस्सलाम में पैदा हुआ। मेरे माता-पिता दोनों ब्रिटेन के थे। मेरे पिता गेविन ग्रीन ब्रिटेन उपनिवेशवाद में एडमिनिस्ट्रेटर थे। बाद मे उन्होंने १९७६ में बारक्लेज बैंक जॉइन कर लिया और उन्हें इजिप्टियन बारक्लेज बैंक को जमाने के लिए इजिप्ट भेजा गया। मैंने मशहूर रोमन कैथोलिक मोनेस्टिक स्कूल एम्पलेफोर्थ में पढ़ाई की और बाद में इतिहास का अध्ययन करने लन्दन यूनिवर्सिटी चला गया। हालंाकि मैंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी।अभी मैं इंग्लैण्ड की एक इस्लामिक मीडिया कम्पनी के साथ काम कर रहा हूं। इस्लाम के मैसेज को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने में जुटा हूं।
आपने बीच में ही पढ़ाई क्यों छोड़ दी?
मेरा ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली से मोहभंग हो गया था। दरअसल ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में विश्व इतिहास को प्रायोजित तरीके से पेश किया गया था। उन्होंने अपनी सभ्यता को महिमामण्डित करके यूरोप पर थोपा है। इजिप्ट में रहने के दौरान कुछ आलीशान खण्डहर देखकर मुझे लगा कि यह तो अच्छे पुरातत्ववेत्ताओं का काम था। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि पश्चिम ने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। मैंने दुनिया के विभिन्न लोगों और सभ्यताओं के इतिहास का अपने स्तर पर अध्ययन करना शुरू किया। मैंने विभिन्न धर्मग्रंथों और दर्शनशास्त्र को भी पढ़ा। मैंने तीन साल तक गहराई से बोध धर्म का भी अध्ययन किया। इस दौरान मैंने जब कुरआन पढ़ा तो मैं इससे बेहद प्रभावित हुआ। कुरआन की शिक्षा ने मुझ पर जादुई असर डाला और मुझे पूरी तरह यकीन हो गया कि कुरआन सच्चे ईश्वर की तरफ से भेजा गया धर्मग्रन्थ है। मैं नहीं जानता कि मैं किस तरह इस्लाम की छांव में आ पहुंचा। मेरा भरोसा है कि ईश्वर ही ने मुझे सही राह दिखाई।
आपको इस्लाम में ऐसा क्या खास लगा जिससे आप सबसे ज्यादा प्रभावित हुए?
दरअसल आठ साल की उम्र में ही मेरा ईसाईयत से मोहभंग होने लगा था। मैरी की जय जैसे गीतों के जरिए जो कु छ हमें पढ़ाया जाता था, वो मेरे गले नहीं उतरता था। जहां एक तरफ ईसाई ईश्वर को अनन्त और अपार बताते थे,वहीं गॉड को मैरी की कोख से पैदा होना बताने में भी उन्हें कोई झिझक नहीं थी। मुझे लगता था इस हिसाब से तो मैरी गॉड से भी बड़ी हुई। दूसरा ईश्वर का तीन रूपों में होने का ईसाई मत भी मुझे समझ नहीं आता था। ईश्वर का तीन रूपों में बंटे होना और फिर भी एक होने को मैं पचा नहीं पाता था। मेरे लिए मुश्किल तब हो गई जब एक इजिप्टियन ने मेरे से ईसाई धर्म संबंधी कई तीखे सवाल कर डाले। ईसाई मत को लेकर कन्फ्यूज्ड होने के बावजूद मैंने उसके सामने एक सिध्दांतवादी ईसाई होने की कोशिश की जैसे कि अधिकतर गौरे मध्यमवर्गीय ईसाई करते हैं। मैं तब चकरा गया जब उसने मुझसे यह मनवा ही लिया कि ईश्वर जब सूली पर चढ़ाने से मर गया है तो फिर ईश्वर का अनन्त और अपार होने का ईसाई मत खोखला साबित हो जाता है। इस पर मुझे महसूस हुआ कि मैं ऐसी बेतुकी अवधारणा पर भरोसा कर रहा हूं जिसके मुताबिक दो और दो पंाच होते हैं। यह दौर मेरी किशोर अवस्था का था। धीरे-धीरे पश्चिम की बंधी बंधाई और मशीनी जिंदगी से मुझे नफरत सी होने लगी। मैंने पाया कि यूरोपियन लोगों की जिंदगी के संघर्ष का मकसद सिर्फ जिंदगी का लुत्फ उठाना और एंजोय करना है। वे अपने जीवन को किसी अच्छे और बड़े मकसद के लिए नहीं जीते।मैंने जब फिलीस्तीन के मुद्दे पर इजिप्ट और फिलीस्तीन के लोगों से बात की तो समझ आया कि कैसे पश्चिमी देश अपने लोगों को इस मुद्दे पर बरगलाते रहते है। यहूदियों ने कई ऐतिहासिक,राजनैतिक और आर्थिक भ्रान्तियां गढ़कर मीडिया के द्वारा जबरदस्त तरीके से प्रचारित की है। आखिर ऐसे कैसे हो सकता है कि २००० साल पहले यह उनका देश था जिसे छोड़कर वे चले गए थे। मैंने यह भी जाना कि अभी के यहूदी वास्तविक रूप में गुलाम थे जो बाद में यहूदी बने और फिलीस्तीनी सरजमीन शुरु से हरी-भरी रही है। यह तो इजराइल ने गढ़ा है कि जादुई तरीके से यह रेगिस्तान से ग्रीनलैण्ड में तब्दील हो गई। मैंने जब लैटिन अमेरिका और सोवियत ब्लॉक में अमरीका क ी भूमिका का अध्ययन किया तो अमेरिका का दोगला चरित्र देखने को मिला।
आपने इजिप्ट और इंग्लैण्ड के लोगों में किस तरह का फर्क महसूस किया?
मैंने पाया कि इजिप्ट के बाशिंदे गरीब और मेहनतकश होने के बावजूद खुशमिजाज हैं। वे अपनी सारी बातें अल्लाह पर छोड़ देते हैं और अपना गम भूल जाते हैं। वे इबादत में अल्लाह के सामने अपनी परेशानियां रखते हैं और अल्लाह उनकी मदद करता है। मैंने उनकी इस्लामिक प्रार्थना में विनम्रता और आत्मीयता महसूस की है।दूसरी तरफ इंग्लैण्ड के लोग भौतिकवादी और उथले हैं। वे खुश होने का दिखावा करते हैं लेकिन खुशी उनसे दूर है। उनकी प्रार्थना में गाने हैं,डांस है,तालियंा पीटना है लेकिन गॉड के प्रति विनम्रता और आत्मीयता उनकी प्रार्थनाओं में नजर नहीं आएंगी। मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि पश्चिमी लोगों की मानसिकता यहूदी नियंत्रित मीडिया की देन है। इन्हीं में एक है फिलीस्तीन को लेकर पश्चिम के लोगों की सोच। मीडिया वहां के लोगों पर एक ही तरह की मानसिकता थोपता है। देखा गया है कि अमेरिका तीसरी दुनिया के देशों को प्रताडि़त करने के लिए मानवाधिकार का बहाना तलाशता रहता है जबकि खुद उन लैटिन अमेरिकी देशों के नेताओं को प्रताडि़त करता रहता है जो उसकी बात नहीं मानते। अमेरिकी मीडिया इन बातों की कभी आलोचना नहीं करता। क्या इंग्लैण्ड में एक मुस्लिम के रूप में जिंदगी गुजारना मुश्किल है। पश्चिमी मानसिकता व्यक्तिवादी है यानी दूसरों के बजाय हर कोई खुद की सोचता है। इस्लामिक जिंदगी के लिए यह परेशानी का कारण बनती है। नेक मुस्लिम इस तरह के माहोल से परेशानी महसूस करते हैं। हद से ज्यादा खुलापन और सैक्स के चलते उन्हें दिक्कतें होती हैं। इंग्लैण्ड की अधिकतर लड़कियां १३ साल की उम्र तक अपना कोमार्य खो चुकी होती है और सामान्यत एक लड़की के तीन-चार ब्वॉय फै्रण्ड होते हैं। पश्चिम के मुसलमानों के साथ दिक्कत यह है कि वे उस पाश्चात्य सोसायटी के साथ कै से घुले-मिले जहंा स्वच्छंदता,सैक्स और नशा आम है। वे खुद को इन सबसे कैसे बचाए रखें? इंग्लैण्ड में इस्लाम के प्रचार के अच्छे नतीजे सामने आए हैं? इंग्लैण्ड में इस्लामिक मूल्यों का धीरे धीरे प्रचार प्रसार हो रहा है। नव मुस्लिम्स में उत्साह है। वे जानते हैं कि आम आदमी का जीवन किस तरह अंधेरे में है।आपके परिवार के बारे में बताएं? मेरे दो बीवियां और छह बच्चे हैं। क्या ब्रिटेन में बहू विवाह पर पाबंदी नहीं है? यंू तो ब्रिटेन में दूसरे विवाह पर पाबंदी है लेकिन ब्रिटेन के कई लोगों ने दो विवाह कर रखे हैं। दूसरी शादी कॉमन लॉ वाइव्ज के तहत उचित है जिसमें दूसरी बीवी और उसके बच्चे विरासत के हकदार होते हैं।

Wednesday, September 16, 2009

मस्तिष्क के बारे में कुरआन का नजरिया

सिर का सामने का हिस्सा योजना बनाने और अच्छे व बुरे व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। मस्तिष्क का यही पार्ट सच और झूठ बोलने के लिए जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों को पिछले साठ सालों में इस बात का पता चला है जबकि कुरआन तो चौदह सौ साल पहले ही यह बता चुका है।
अल्लाह ने कुरआन में पैगम्बर मुहम्मद सल्ललाहो अलेहेवस्सल्लम को काबा में इबादत करने से रोकने वाले विरोधियों की एक बुराई का जिक्र कुछ इस तरह किया है-
कदापि नहीं,यदि वह बाज नहीं आया तो हम उसके नासिया (सिर के सामने के हिस्से) को पकड़कर घसीटेंगे। झूठे, खताकार नासिया। (कुरआन ९६:१५-१६)
सवाल उठता है कि कुरआन ने मस्तिष्क के सामने के हिस्से को ही झूठा और गुनाहगार क्यों कहा है?कुरआन ने उस व्यक्ति को गुनाहगार और झूठा कहने के बजाय उस हिस्से को दोषी क्यों माना? पेशानी और झूठ व गुनाह में आखिर ऐसा क्या संबंध है कि कुरआन ने व्यक्ति के बजाय पेशानी को झूठ और गुनाह के लिए जिम्मेदार माना?
अगर हम सामने के सिर के ढांचे पर गौर करें तो मस्तिष्क के सामने की ओर एक हिस्सा पाएंगे। शरीर विज्ञान का मस्तिष्क के इस हिस्से के बारे में क्या कहना है? एसेन्शियल्स ऑफ एनाटॉमी एण्ड फिजियोलोजी नामक किताब मस्तिष्क के इस भाग के बारे में बताती है-योजनाएं बनाने और इसकी क्रियान्वयन संबंधी गतिविधियों का केन्द्र मस्तिष्क का यह सामने वाला हिस्सा ही होता है। मस्तिष्क का यह भाग प्रेरित करने में ही शामिल नहीं होता बल्कि आक्रामकता का केन्द्र बिन्दु भी यही होता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सिर का सामने का हिस्सा ही योजना बनाने और अच्छे व बुरे व्यवहार के लिए प्रेरित करता है। मस्तिष्क का यही पार्ट सच और झूठ बोलने के लिए जिम्मेदार है। यही वजह है कि जब कोई झूठ और गुनाह करता है तो झूठा और गुनाहगार उसके सिर का सामने का हिस्सा होता है,जैसा कि कुरआन ने गुनाह करने पर उस व्यक्ति के बजाय उस हिस्से केलिए कहा है-ए झूठे, खताकार नासिया (सिर के सामने के हिस्से )
प्रोफेसर कीथ एल मूर के मुताबिक पिछले साठ वर्षों में ही वैज्ञानिकों को मस्तिष्क के इस हिस्से की कार्यप्रणाली का पता चला है।

Monday, September 14, 2009

कुरआन में मिला,मेरे हर सवाल का जवाब

मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि इस्लाम कबूल करने से पहले मैं किसी भी मुसलमान से नहीं मिला था। मैंने पहले कुरआन पढ़ा और जाना कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है जबकि इस्लाम हर मामले में पूर्णता लिए हुए है।
केट स्टीवन्स अब-यूसुफ इस्लाम इंग्लैण्ड के माने हुए पॉप स्टार
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