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Friday, April 30, 2010

इस्लाम में मजदूर और मजदूरी की अहमियत


अन्तराष्ट्रीय कामगार दिवस (1 मई) पर विशेष 
मज़दूरों के बारे में कार्ल मार्क्स जैसे अनेक विचारकों ने खूबसूरत विचार दिये हैं। मज़दूर किसी भी देश या व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग होता है। अत: उनके वेलफेयर के बारे में सोचना व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस्लाम जो कि दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्था है, मज़दूर को खास अहमियत देता है। 
जिस वक्त नबी व रसूल मोहम्मद(स-अ-) ने इस्लाम का पैगाम दिया उस वक्त अरब में मेहनत मज़दूरी का काम गुलामों से करवाया जाता था। गुलामी की प्रथा जोरों पर थी। दूर दराज के इलाकों से लोग पकड़ कर लाये जाते थे उन्हें खरीद कर जिंदगी भर के लिए गुलाम बना लिया जाता था। और फिर उन्हें हमेशा के लिये बस रोटी और कपड़े पर बेगार करनी पड़ती थी। गुलामो की हालत बहुत ही दयनीय होती थी उनपर तरंह तरंह के जुल्म होते थे और निहायत सख्त काम के बदले उन्हें भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता था। इस्लाम ने इन गुलामों की आजादी के लिये निहायत खूबसूरत तरीके से काम किया मुसलमानों को गुलाम को आजाद करने पर जन्नत की बशारत दी गयी। हज़रत बिलाल जो कि एक हब्शी गुलाम थे उन्हें खरीदकर आजाद किया गया और बाद में वे ईमान के ऊंचे दर्जे पर फायज़ हुए। 
कुरआन गुलामों से अच्छा सुलूक करने व उन्हें आजाद करने के लिये कई आयतों में हुक्म दे रहा है मिसाल के तौर पर
(कुरआन : 24-32) और अपनी बेशौहर औरतों और अपने नेकबख्त गुलामों व कनीजों का निकाह कर दिया करो। अगर ये लोग मोहताज होंगे तो अल्लाह अपने फजल व करम से उन्हें मालदार बना देगा और अल्लाह तो बड़ा गुंजाइश वाला व वाकिफकार है।
(कुरआन : 24-33) और तुम्हारे कनीजों व गुलामों में से जो मकातबत (किसी एग्रीमेन्ट के जरिये आजाद होना) होने की ख्वाहिश करें तो तुम उनमें कुछ सलाहियत देखो तो उनको मकातिब कर दो और अल्लाह के माल में से जो उसने तुम्हें अता किया है उनका भी दो। और तुम्हारी कनीजें जो पाकदामन ही रहना चाहती हैं उन्हें दुनियावी फायदे हासिल करने की गरज से हरामकारी पर मजबूर न करो। और जो शख्स उनको मजबूर करेगा तो इसमें शक नहीं कि अल्लाह उनकी मजबूरी के बाद बड़ा बख्शने वाला व मेहरबान है।
इन आयतों से यह साफ हो जाता है कि अल्लाह हर शख्स को आजाद देखना चाहता है। और चाहता है कि सबको अपनी जिंदगी गुजारने का हक मिले।
इस्लाम में मेहनत मजदूरी करके अपने व अपने परिवार का जायज़ तरीके से पेट पालने को निहायत अहमियत दी गयी है। अपनी रोजी को खुद हासिल करने पर जोर दिया गया है। 
(कुरआन : 53-39) और यह कि इंसान को वही मिलता है जिसकी वह कोशिश करता है।
नबी (स-अ-) ने फरमाया ‘अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो काम करते हैं और अपने परिवार का पेट पालने के लिये कड़ी मेहनत करते हैं।’
नबी (स-अ-) ने फरमाया ‘सबसे अच्छा खाना वह होता है जो इंसान अपनी मेहनत मह्स्क्कत से कमाकर खाता है।’ (तिरमिजी) 
हज़रत अली (अ-स-) ने अपने बेटे इमाम हसन (अ-स-) से फरमाया, ‘रोजी कमाने में दौड़ धूप करो और दूसरों के खजांची न बनो।’ (नहजुल बलागाह) 
मज़दूरों से कैसा सुलूक करना चाहिए इसके लिये हज़रत अली (अ-स-) का मशहूर जुमला है, ‘मज़दूरों का पसीना सूखने से पहले उनकी मज़दूरी दे दो।’
इस्लामी खलीफा हज़रत अली (अ-स-) ने जब हज़रत मालिके अश्तर को मिस्र का गवर्नर बनाया तो उन्हें इस तरंह के आदेश दिये ‘लगान (टैक्स) के मामले में लगान अदा करने वालों का फायदा नजर में रखना क्योंकि बाज और बाजगुजारों (टैक्स और टैक्सपेयर्स) की बदौलत ही दूसरो के हालात दुरुस्त किये जा सकते हैं। सब इसी खिराज और खिराज देने वालों (टैक्स और टैक्सपेयर्स) के सहारे पर जीते हैं। और खिराज को जमा करने से ज्यादा जमीन की आबादी का ख्याल रखना क्योंकि खिराज भी जमीन की आबादी ही से हासिल हो सकता है और जो आबाद किये बिना खिराज (रिवार्ड) चाहता है वह मुल्क की बरबादी और बंदगाने खुदा की तबाही का सामान करता है। और उस की हुकूमत थोड़े दिनों से ज्यादा नहीं रह सकती। (नहजुल बलागाह, खत नं - 53)
मुसीबत में लगान की कमी या माफी, व्यापारियों और उद्योगपतियों का ख्याल व उनके साथ अच्छा बर्ताव, लेकिन जमाखोरों और मुनाफाखोरों के साथ सख्त कारवाई की बात इस खत में मौजूद है। यह लम्बा खत इस्लामी संविधान का पूरा नमूना पेश करता है। यू-एन- सेक्रेटरी कोफी अन्नान के सुझाव पर इस खत को यू-एन- के विश्व संविधान में सन्दर्भ के तौर पर शामिल किया गया है।
इस्लाम में शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरंह के कामों को अहमियत दी गयी है। कुरआन में शारीरिक श्रम के रूप में हज़रत नूह का कश्ती बनाना, हज़रत दाऊद का लोहार के रूप में काम करना, हजरत जुल्करनैन का लोहे की दीवार का निर्माण वगैरा शामिल हैं। इसी तरंह दिमागी काम करने में हज़रत लुक़मान की हिकमत, हज़रत यूसुफ का मिस्र के बादशाह के खज़ांची रूप में काम करना वगैरा शामिल हैं।
अल्लाह किसी काम को मेहनत व खूबसूरती के साथ पूरा करने को पसंद करता है, जिसका कुरआन की आयत इस तरह इशारा कर रही है।
(कुरआन : 34-11) (पैगम्बर हजरत दाऊद से मुखातिब करके) कि फराख और कुशादा जिरह बनाओ और कड़ियों को जोड़ने में अन्दाजे का ख्याल रखो और तुम सब के सब अच्छे काम करो। जो कुछ तुम करते हो मैं देख रहा हूं। 
इस्लाम में जुआ व सूद जैसे गलत तरीकों से पैसा कमाने को सख्ती से मना किया गया है। 
नबी (स-अ-) ने फरमाया कि छोटे से छोटा काम भी अगर जायज हो तो उसे करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। नबी (स-अ-) खुद बकरिया चराते थे। अपने कपड़ों में खुद पेबंद लगाते थे और मजदूरी करते थे। (तिरमिज़ी) 
हजरत अली (अ-स-) यहूदी के बाग में मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट पालते थे। यहाँ तक कि जब उन्होंने इस्लामी खलीफा का ओहदा संभाला तो बागों व खेतों में मजदूरी करने का उनका अमल जारी रहा। उन्होंने अपने दम पर अनेक रेगिस्तानी इलाकों को नख्लिस्तान में बदल दिया था।



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Thursday, April 22, 2010

सलीम भाई आप क्यों अलविदा कह रहे हैं?


आपने किसी को अपनी बहन समझकर कुछ बताने की कोशिश की, लेकिन आपके खुलूस में उसे नफरत नज़र आयी। लेकिन इससे आपको फर्क क्या पड़ता है? आपका मकसद है इस्लामी पैगाम दुनिया तक पहुंचाना। कोई माने या न माने ये उसकी मर्जी। मैं नहीं समझता किसी बात को दिल पर लेने की जरूरत है। और वह भी उन् औरतों की बात जो दावा तो करती हैं मर्दों की बराबरी का लेकिन हकीकत ये है कि  जिस्मानी और जहनी दोनों ही तौर से मर्दों से कमतर हैं।

अगर बात की जाये दिमागी ताकतों की तो मर्द बेनामियों की गालियां सुनकर भी मुस्कुराता रहता है और गाली देने वाले को प्यार से भाई कहकर बुलाता है। जबकि औरत अपने मिजाज के खिलाफ टिप्पणी देखकर पूरी दुनिया में तहलका मचा देती है। (हालांकि ये टिप्पणियां कुछ बेनामियों के द्वारा दूसरों को लड़ाने के लिये लिखी गयी होती हैं।) ब्लाग्स को बन्द करवाने की धमकियां देने लगती है। मर्द का अगर ओबामा से भी ताल्लुक होता है तो वो उसे हल्के अंदाज में लेता है। जबकि औरत की किसी छोटे मोटे थाने में पहचान निकल आती है तो वह पूरी दुनिया को बन्द करवाने की धमकियां देने लगती है।

मर्द किसी की सिफारिश करके उसकी जिंदगी बना देता है और फिर भूल जाता है लेकिन औरत किसी को पुलिस से बचाती है तो जिंदगी भर उसकी कहानी बताती है।
औरत लूडो का भी गेम जीतकर पूरी दुनिया में इतराती है जबकि मर्द पोरस को हराने के बाद भी उसे अपने बराबर बिठाता है। 

हजार नावेल लिखने के बाद भी मर्द अपने को शब्दों का राजकुमार नहीं लिखता जबकि औरत दो गजलें लिखने के बाद अपने को शब्दों की रानी लिखने लगती है। मर्द को अगर कोई पानी पर चढ़ाने की कोशिश करता है तो वह पहले नाव बनाता है फिर पानी पर चढ़ाई करता है जबकि औरत तुरन्त पानी पर चढ़ जाती है।
मर्द कभी औरतों का लिबास पहनने की ख्वाहिश नहीं करता लेकिन औरत मर्दों का लिबास पहनकर अपने को खुश और आजाद महसूस करती है। इसका मतलब यही निकलता है कि वह मानसिक तौर पर हीन भावना की शिकार है।

एक तरफ तो वह उन सरकारों से खुश होती है जो औरतों को पर्दे से आजाद होने का फरमान सुनाती हैं तो दूसरी तरफ वह अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबन्ध लगाने की भी वकालत करती है। सिर्फ इसलिये क्योंकि कोई उसपर कमेण्ट पास कर रहा है। हालांकि हो सकता है वह कमेण्ट उस का हो जो किसी दूसरे नाम से उसे पानी पर चढ़ा रहा हो।
एक तरफ वह तालिबानियों को बुरा भला कहती है जो लोगों का आजादी से अपनी बात कहने का अधिकार छीन रहे हैं तो दूसरी तरफ वह अपने खिलाफ कुछ भी कहने वालों को जेल की सलाखों के पीछे करने के लिये चीख पुकार मचा देती है।

अगर औरत को कोई छेड़ता है तो उसके सम्मान पर चोट लगती है और अगर नहीं छेड़ता तो वह एहसास कमतरी की शिकार हो जाती है।
तो आप गौर करें कि आप किसके चक्कर में पड़कर एक फलाही काम से हाथ खींच रहे हैं। शुक्रिया।

नोट : यहाँ 'औरत' से तात्पर्य वह 'औरतें' हैं जिनपर मर्दों से आगे निकलने का तो भूत सवार है लेकिन क्षमता नहीं है.

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Sunday, April 18, 2010

हम भी सुधार के हामी हैं.


यहाँ बात हो रही है सुधार की.
वक़्त गुजरने के साथ मज़हब में कुछ ऐसी बातें शामिल हो जाती हैं जो वास्तव में गलत होती हैं और उनका मूल धर्म से कोई लेना देना नहीं होता. मज़हब में फैली हुई कुरीतियों (बल्कि किसी भी तरह की कुरीतियों) के खिलाफ विरोध करना बहुत अच्छी बात है. लेकिन उतना ही ज़रूरी है उसका हल पेश करना. अगर पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.) ने उस समय समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई तो इस्लाम के रूप में उसका हल भी पेश किया. अगर आप कहते हैं की यह गलत है, तो सही क्या है और क्यों है, यह भी आप ही सिद्ध करना है. हम कब तक दूसरों पर दोषारोपण करते रहेंगे? यही काम तो आज के नेता भी कर रहे है, सब एक दूसरे को देश की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहा है. हल कोई नहीं पेश कर रहा. 

किसी भी मज़हब की कुरीतियों को मज़हब के अन्दर ही रहते हुए दूर करने की पूरी गुंजाइश है. इसलिए क्योंकि कोई भी कुरीति मज़हब को ढंग से न समझने के कारण पैदा होती है. यह ज़रूरी नहीं की हमें कहीं कोई बुराई दिख रही है तो उसके लिए सीधे मज़हब पर इलज़ाम लगा दें.  

हमारी अंजुमन ऐसा ही प्रयास कर रही है. कुछ उदाहरण :


सफात साहब ने बताया की इस्लाम में औरतों के अधिकार किस तरह के हैं, क्या वाकई वह मर्दों की गुलाम है?
कुरआन की जिस आयत को लेकर लोग औरतों को पीटने की बात करते हैं, वह आयत दरअसल औरत की प्रोटेक्टर है, बस ज़रुरत है दूसरे नजरिये से देखने की.

अगर आप किसी मज़हब के एक खरब मानने वालों से दलीलों के साथ कहते हैं की जिस कुरीति को तुम धर्म समझ रहे वह धर्म का अंग नहीं है तो एक खरब में शायद हज़ार ऐसे होंगे जो आपकी बात स्वीकार नहीं करेंगे.  लेकिन अगर आप ये कहते हैं की यह तुम्हारे धर्म की कुरीति है और इसको अलग करके बाकी बचे हुए धर्म को मानो तो एक खरब में केवल हज़ार ऐसे होंगे जो आपकी बात को स्वीकार करेंगे.



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Thursday, April 1, 2010

परदा : क्या कुप्रथा है?

इधर कई ब्लाग्स पर परदे के विरोध में जोर शोर से प्रचार हो रहा है। बिना किसी मजबूत तर्क के इसे कुप्रथा साबित करने का प्रयास हो रहा है। और यह कहा जा रहा है कि आज के जमाने में इस तरंह की प्रथाओं का कोई औचित्य नहीं। तो क्या वाकई परदे की रस्म को मिटा देना चाहिए? 

पर्दे के विरोध में जो तर्क सबसे ज्यादा दिया जाता है वह यह कि परदा औरतों की गुलामी की प्रतीक है। तो जनाब मैंने पूरा इतिहास खँगाल डाला, कहीं नहीं मिला कि गुलामों को परदे में रखने का रिवाज रहा हो। हाँ यह जरूर मिला कि पुराने जमाने में गुलाम औरतें बाजार में बिकने के लिए सजा सँवार कर खड़ी की जाती थीं। लोग आँखें फाड़ फाड़कर उनकी खूबसूरती के दाम लगाते थे और दुकानदार उन औरतों को खरीददार को बेचकर अपने पैसे सीधे करता था। क्या आज के फैशन शो , मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड जैसे शो यही काम नहीं कर रहे हैं। तो फिर औरतों की गुलामी के प्रतीक इस तरह के शो हुए न कि परदा?

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि बुर्के में दिखाई देना कम हो जाता है और औरतें एक्सीडेंट का शिकार हो जाती है। अगर ऐसा है तो पहले हेलमेट पर रोक लगनी चाहिए, क्योंकि हेलमेट के साथ भी यही कहानी है।

अगर इलाही कानून ने परदे का सिस्टम बनाया है तो निस्संदेह वह इंसान के फायदे के लिए ही होगा। रूहानी फायदे तो अपनी जगंह लेकिन आईए एक नज़र करते हैं इसके दुनियावी फायदों पर। 

किसी भी औरत के लिए जाहिरी तौर पर सबसे कीमती चीज़ उसका हुस्न होती है। और वह अपने हुस्न को बरकरार रखने के लिए तरह तरह की तरकीबें करती है। तरह तरह के केमिकल और हर्बल इस्तेमाल करती है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में कास्मेटिक्स का कारोबार सात बिलियन डालर सालाना है। लेकिन ये केमिकल वक्ती फायदा देकर उसके चेहरा का कुदरती भोलापन और नर्मी छीन लेते हैं। बालीवुड की हीरोईनों को अगर कोई सुबह उठकर देख ले तो उसे डराउनी ड्रामों  से उसे बिल्कुल डर नहीं लगेगा।

इन कास्मेटिक्स के दाम इतने ऊंचे होते हैं कि गरीब घर की लड़कियां उनका इस्तेमाल सोच भी नहीं सकतीं। लेकिन परदा औरतों की खूबसूरती का ऐसा प्रोटेक्टर है जो आसानी से हर जगह उपलब्ध है, सस्ता है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं। सूरज से आने वाली अल्ट्रावायलेट रेज़ स्किन की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं। ये स्किन की नमी सोख लेती हैं और उसे खुरदुरा बना देती हैं। स्किन में झुर्रियां पड़नी शुरू हो जाती हैं और इंसान वक्त से पहले बूढ़ा दिखाई देने लगता है। नर्म स्किन की ये रेज़ खास तौर से दुश्मन होती हैं। अगर चमड़ी गोरी है तो ये रेज़ उसके मेलानिन से रिएक्शन कर चमड़ी का रंग गहरा कर देती हैं। ये रेज़ स्किन कैंसर की भी वजह होती हैं। गोरी और नर्म चमड़ी में स्किन कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है.

लेकिन अगर इंसान का जिस्म अच्छी तरंह ढंका हुआ है तो वह इन खतरनाक रेज़ से काफी हद तक बचा रहता है। अरब जैसे इलाकों में जहाँ सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेरता है वहां लोग इसीलिए अपने जिस्म को पूरी तरंह ढंककर चलते हैं। मर्दों की सख्त स्किन तो कुछ हद तक इन किरणों को बर्दाश्त कर लेती है लेकिन औरतों की नर्म खाल तो इन्हें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती।

गर्मियों में हल्के रंग का परदा और जाड़ों में गहरे रंग का परदा जिस्म का सर्दी और गर्मी से बचाव भी करता है। साथ ही अगर नाक ढंकी हुई है तो हवा में मौजूद धूल, मिट्‌टी, धुवां और नुकसानदायक बैक्टीरिया इंसानी जिस्म से दूर रहते हैं और इंसान सेहतमन्द रहता है। साथ ही स्किन की नरमी भी बरकरार रहती है।

औरतों में सजने संवरने की ख्वाहिश मर्दों से ज्यादा होती है। और वे अपनी अपनी हैसियत के अनुसार श्रृंगार करती हैं। लेकिन सोसाइटी में अमीर लड़कियों का सजना गरीब लड़कियों के लिए दिलआज़ारी का सबब बन जाता है। परदे की प्रथा सबको एक रंग में रंग देती है और कोई दूसरे से ज्यादा अमीर नहीं दिखाई देता। परदा कमसूरत औरत की बदसूरती को भी छुपाता है और उसे हीन भावना का शिकार नहीं होने देता। 

आज के दौर में परदे के उठते चलन ने तलाक के केसेज बढ़ा दिये हैं क्योंकि पहले परदे की वजह से मर्द परायी औरतो को देखने से महरूम रहता था और उसे अपनी बीवी ही खूबसूरत मालूम होती थी। लेकिन अब शादी से पहले ही मर्दों के सामने से बहुत सी खूबसूरत लड़कियां गुजर चुकी होती हैं नतीजे में उसे अपनी बीवी पसंद नहीं आती।  

शायद शहर में रहने वाली लड़कियों ने इन सच्चाईयों को पहचान लिया है इसलिए वे बाइक या स्कूटी चलाती हुई अपने हाथों में पूरे दस्ताने पहने हुए और चेहरे को पूरी तरह ढंके हुए नज़र आती हैं। ये परदा नहीं तो और क्या है? अल्लाह ने औरत को फूल (Not Fool) की तरंह बनाया है। और इस फूल की हिफाजत के लिए उसने परदे का इंतिजाम किया है।

लेकिन आखिर में मेरा ये भी विचार है कि औरतों के परदे का मामला औरतों पर ही छोड़ देना चाहिए। और इस बारे में उनपर किसी तरह की जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। क्योंकि बहरहाल यह उन्हीं की भलाई के लिए है।



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Sunday, March 21, 2010

पानी को इस्तेमाल करो मगर इस्लामी तरीके से


विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर विशेष 
पानी की अहमियत बच्चे बच्चे को मालूम है। तपती दोपहर में पसीने से तरबतर जब कोई शख्स घर पहुंचता है तो उसकी सबसे पहली ख्वाहिश होती है कि थोड़ा सा ठंडा पानी मिल जाये जो उसकी प्यास को फौरन बुझा दे। पानी अल्लाह की बेमिसाल रहमत है। पानी के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता। अभी तक साइंस कोई ऐसी जिंदगी दरियाफ्त नहीं कर पायी है जो पानी के बगैर हो। 
प्यास बुझाने के अलावा पानी में कुछ और भी ऐसी साइंसी खुसूसियात पायी जाती हैं जिससे साबित होता है कि अल्लाह ने इसे ज़मीन पर जिंदगी पैदा करने के लिए ही खल्क किया है। और इसकी तरफ कुरआन हकीम की 21 वीं सूरे अंबिया की 30 वीं आयत में इरशाद हुआ है, ‘‘क्या वह लोग जो मुनकिर हैं गौर नहीं करते कि ये सब आसमान व जमीन आपस में मिले हुए थे। फिर हम ने उन्हें जुदा किया और पानी के जरिये हर जिन्दा चीज़ पैदा की। क्या वह अब भी यकीन नहीं करते?’’
पानी की एक अहम क्वालिटी इसका लिक्विड फार्म में होना है। लिक्विड होने की वजह से यह जानदारों के पूरे जिस्म में आसानी से फैल जाता है और जिस्म के लिए जरूरी चीज़ों को अंदर फैला देता है। जानदारों के लिए जरूरी ज्यादातर चीज़ें पानी में आसानी से घुल जाती हैं। जैसे कि नमक, ग्लूकोज और चीनी। पानी महीन से महीन चीज़ों के भीतर पहुंच सकता है। इसीलिए वह हाथी से लेकर निहायत बारीक बैक्टीरिया तक तमाम जानदारों के जिस्म में जरूरियात पहुंचाने का जरिया है।
पानी में एक ऐसी क्वालिटी होती है जो और किसी लिक्विड में नहीं होती। कोई भी लिक्विड ठंड बढ़ने पर सिकुड़ता है। लेकिन पानी चार डिग्री सेण्डीग्रेड टेम्प्रेचर होने तक सिकुड़ता है, उससे कम टेम्प्रेचर पर फिर फैलने लगता है। इसलिए जाड़ों में ठन्डे मुल्कों में तालाब का पानी जब बर्फ में बदलता है तो वह हलका होकर पूरे तालाब को ढंक लेता है और नीचे फ्रेश वाटर में मछलियां आराम से तैरती रहती हैं। बर्फ में गर्मी रोकने की भी खासियत होती है। जो पानी को हद से ज्यादा ठण्डा होने से रोक देती हैं। और इसमें रहने वाले जानदार एक आरामदेय माहौल में अपना गुज़र बसर करते रहते हैं।
पानी हाईड्रोजन और आक्सीजन के बीच जोड़ से बनता है। केमिस्ट्री के नजरिये से यह जोड़ सबसे मजबूत बांड होता है। बांड मजबूत होने की वजह से उसका ब्वायलिंग प्वाइंट बढ़ जाता है। उसका माल्क्यूल ज्य़ादातर केमिकल रिएक्शन में ब्रेक नहीं होता और वह पानी की ही हालत में चीज़ों का हिस्सा बन जाता है। इंसानी जिस्म का लगभग साठ-सत्तर फीसद हिस्सा पानी होता है। ज़मीन का इकहत्तर फीसद हिस्सा पानी है। कुछ पौधों में नब्बे फीसद तक पानी होता है।
पानी अगर लाखों साल तक भी किसी बरतन में रख दिया जाये तो भी उसकी बनावट पर कोई असर नहीं होता। जो कुछ भी उसकी जाहिरी हालत में तब्दीली आती है वह दरअसल उसमें दूसरे मैटीरियल के मिक्स होने से आती है। और अगर उस मैटीरियल को अलग कर दिया जाये तो पानी वापस अपनी असली हालत में आ जाता है।
पानी को वापस अपनी असली हालत में लाने के लिए अल्लाह ने इंतिजाम भी कर रखा है। इंसान और दूसरे जानदार जब पानी का इस्तेमाल करते हैं तो वह गंदी चीज़ों के मिक्स हो जाने से पीने लायक नहीं रहता। यह पानी नदियों के जरिये समुन्द्र में जाता है। सूरज की गर्मी समुन्द्र के इस गंदगी मिले पानी को भाप में बदल कर बादलों की शक्ल दे देती है। इस दौरान पानी की गंदगी समुन्द्र में ही छूट जाती है और बारिश के जरिये साफ पानी वापस ज़मीन पर आ जाता है।
पानी अल्लाह की बेमिसाल रहमत है। ‘रहमान’ अल्लाह के उन नामों में से है जिसको खुद अल्लाह ने पसंद फरमाया है। हालांकि अल्लाह की रहमतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते। अगर सिर्फ पानी की क्वालिटीज़ को ही देखा जाये तो उसमें खालिके कायनात की रहमतों के बेशुमार पहलू निकलकर सामने आ जाते हैं।
कुरआन ने पानी की अहमियत बार बार बतायी है।
‘‘तो क्या तुमने पानी पर भी नज़र डाली जिसे तुम पीते हो?’’ (56-68)
‘‘और अल्लाह ही ने जमीन पर चलने वाले तमाम जानवरों को पानी से पैदा किया।-----’’ (24-45)
‘‘और उसी की निशानियों में से एक ये भी है कि वह तुमको डराने व उम्मीद लाने के वास्ते बिजली दिखाता है और आसमान से पानी बरसाता है और उसके जरिये से मुर्दा ज़मीन को आबाद करता है।---’’ (30-24)
कुरआन में जब भी जन्नत का जिक्र आया है तो पानी और नहरों का जिक्र जरूर आया है।
‘‘उन दोनों बागों में दो चश्मे (तालाब या झीलें) जोश मारते होंगे।’’ (55-66)
लेकिन अफसोस आज के दौर में हम अल्लाह की इस बेमिसाल रहमत को बरबाद कर रहे हैं। नदियों को गंदा कर रहे हैं। एक तरफ पाश कालोनियों में रोजाना पानी से सड़के धुली जाती हैं तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी हिस्से हैं जहां लोग बूंद बूंद को तरसते हैं। जबकि रसूल (स-अ-) ने फरमाया है कि अगर तुम्हारे पास सिर्फ वुजू करने के लिए पानी है और तुम सामने एक कुत्ते को प्यासा देखते हो तो वह पानी उसे पिला दो।
अगर नहाने के लिए हमारा एक बाल्टी पानी से काम चल सकता है तो वहां चार बाल्टी खर्च कर देते हैं। जबकि रसूल (स-अ-) की एक और हदीस है कि अगर तुम नदी के किनारे बैठे हो और तुम्हें प्यास लगी है तो नदी से सिर्फ इतना पानी लो कि तुम्हारी प्यास बुझ जाये।
किसी व्यक्ति को पानी जरूरत से ज्यादा इकट्‌ठा करने और दूसरों को उससे वंचित करने से सख्ती से मना किया गया है। एक हदीस कहती है, ‘‘अल्लाह कयामत के दिन उन लोगों से सख्ती से पेश आयेगा जो पानी को सड़कों पर बहा देते हैं और मुसाफिरों (जरूरतमन्दों) को तरसाते हैं।’’ (बुखारी 3-838)
पानी पीने से जानवरों को भी रोकना इस्लाम में सख्ती से मना है, हदीस के अनुसार ‘‘अगर कोई व्यक्ति रेगिस्तान में कुआँ खोदता है तो उसे इसका अधिकार हरगिज नहीं कि वह उस कुएं से किसी जानवर को पानी पीने से रोक दे।’’ (बुखारी -5550)
रसूल (स-अ-) ने नदियों या साफ पानी के ज़खीरों में गंदगी बहाने से सख्ती से मना किया है। (मुस्लिम-553)
रसूल (स-अ-) ने पानी को बेचने के लिए भी सख्ती से मना किया है। (मुस्लिम - 3798)
गर्ज ये कि इस तरंह की बेशुमार कुरानी आयतें व रसूल की हदीसें इस्लाम में मौजूद हैं जो न सिर्फ हमें पानी की अहमियत बताती हैं बल्कि उसका सही इस्तेमाल कैसे किया जाये इसके तरीके भी बताती हैं। अगर इन पर सही तरंह से अमल किया जाये तो पानी के लिए न तो किसी को तरसना पड़ेगा और न ही जल संरक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत होगी। 
वरना फिर यही पानी अज़ाब बनकर दुनिया को खत्म भी कर सकता है। जैसा कि तूफाने नूह में हुआ था.

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Sunday, March 7, 2010

क्या कुरआन में औरत को पीटने का हुक्म है?


महिला दिवस ८ मार्च पर विशेष 
कुरआन 4:34: "मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ आदमियों को बाज़ अदमियों पर फ़ज़ीलत दी है और चूंकि मर्दो ने अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो. पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाऐं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग है."


सुरः निसा की ये आयत पढ़कर अक्सर औरतें घबरा जाती हैं क्योंकि इसमें तो मर्दों को खुले तौर पर मारने की छूट दे दी है. गैर इस्लामी इस आयत को पढ़कर इस्लाम के औरत विरोधी होने का फतवा दे देते हैं. देखा जाए तो पूरी दुनिया में इस आयत को हथियार बनाकर इस्लाम में औरत के दोयम दर्जे की बात कही जा रही है. लेकिन क्या वास्तव में ये आयत यही मतलब बयान कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं की हमसे इस आयत का मतलब समझने में कोई भूल हो रही है?

एक मिसाल से अपनी बात की शुरुआत करते हैं. 


मान लिया एक मजदूर दिन भर अपनी मजदूरी की तलाश में जाने के बाद शाम को खाली हाथ घर लौटता है. उसकी औरत इस इन्तिज़ार में बैठी है की उसका शौहर कुछ कमाकर लाएगा तो दोनों के पेट में कुछ जाएगा. लेकिन उसे खाली हाथ देखकर उसका सब्र जवाब दे देता है. और वह शौहर को बुरा भला कहने लगती है. शौहर भी थका हुआ आया है और भूखा भी है. बीवी के ताने सुनकर उसे गुस्सा आता है और वह उसे मारने के लिए हाथ उठा देता है.

लेकिन उसी वक़्त उसे कुरआन की ये आयत याद आ जाती है और उसका उठा हुआ हाथ नीचे गिर जाता है. वह उसे समझाने लगता है और उनका गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो जाता है. थोड़ी कसर रह जाती है, जिसकी वजह से दोनों रात को अलग अलग सोते हैं और सुकून से अपने और साथी के बारे में सोचते हैं. लिहाज़ा अगले दिन जब सोकर उठते हैं तो दोनों का गुस्सा ठंडा हो चुका होता है. बीवी ख़ुशी ख़ुशी अपने शौहर को विदा करती है और वह नए जोश के साथ काम की तलाश में निकल जाता है. दो जनाब देखा आपने, जो आयत आपको औरत विरोधी दिख रही थी उसने एक जाहिल औरत को जाहिल मर्द से पीटने से बचा लिया.

ये आयत हरगिज़ औरत विरोधी नहीं है बल्कि मनोविज्ञान (Psychology) की निहायत अच्छी मिसाल है. बहुत खूबसूरती के साथ इसमें मर्द और औरत दोनों को समझाया गया है. पहले मर्द से कहा गया की तुम चूंकि औरत से जिस्मानी तौर पर ताक़तवर होते हो इसलिए अपने पर काबू रखो. हो सकता है वह तुमसे ज्यादा फजीलत रखती हो (बाज़ को बाज़ पर फजीलत है से यही मतलब निकलता है.) इसके बाद औरत को समझाया गया चूंकि मर्द तुम्हारे लिए दिनभर मेहनत करता है कुछ कमाकर लाता है तो तुम्हारा भी फ़र्ज़ बनता है की अपनी इज्ज़त व शौहर के माल की हिफाज़त करो. इसके बाद फिर मर्द को सलाह दी गई है की अगर अपनी बीवी की किसी बात पर तुम्हें गुस्सा आ जाए तो उसे कजोर और अपने को ताक़तवर समझकर उसे पीटना न शुरू कर दो बल्कि जो कुरआन कह रहा है उसपर अमल करो, तुम्हारा गुस्सा अपने आप ठंडा हो जाएगा.


ये आयत उस वक़्त नाजिल हुई थी जब एक नव-मुसलमान ने अपनी बीवी को तमांचा मार दिया था. और उससे पहले अरब में बीवियों को पीटना आम था. आगे कोई शख्स ऐसा क़दम न उठाये इसीलिये अल्लाह ने ऐसा हुक्म फरमाया. 

अब ये सवाल उठ सकता है की अल्लाह ने सीधे सीधे बीवी की पिटाई से क्यों नहीं मना किया? तो इसका जवाब ये है की अल्लाह बेइंसाफ नहीं है की एक को तो पूरी तरह पाबन्द कर दे और दूसरे को खुली छूट दे दे. बीवी को भी तो डर रहना चाहिए की वह हद से ज्यादा सरकश न हो जाए.