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Wednesday, March 10, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग - 3 Understand Quran While Reading Part - 3

इस लेख के पहले दो भाग आपने पढें होगें। अगर नही पढें है तो यहां पढ सकते है.....भाग-१, भाग-२।

जो लोग कहते है कि आप अरबी कुरआन गैर-मुस्लमान को देगें और आपको सज़ा मिलेगीं तो मै कहता हुं की कोई हर्ज नही। अगर अल्लाह तआला मुझे ज़िम्मेदार ठहरायेगें अरबी कुरआन किसी गैर-मुस्लमान को देनें के लिये तो मैं हमारे आखिरी रसुल मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वस्ल्लम के साथ हुं क्यौंकी मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम की सिरत से हमें ये मालुम होता है की मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम ने गैर-मुस्लमान राजाओं को खत लिखवायें उन्होने सहाबा से कहा की खत लिखों और इन खतों मे कुरआन की आयत भी लिखवायीं। कई बादशाहों को लिखा यमन के बादशाह, मिस्र के बादशाह, बादशाह हरकुलिस। कई बादशाहॊं को लिखा सहाबाओं के ज़रियें की आप इस्लाम कुबुल कर करों और उन खतों के अन्दर कुरआन की आयत लिखवायी, कई बादशाहॊं ने इस्लाम कुबुल किया और कई बादशाहॊं ने खत को फ़ाडं दिया और पैर के नीचे मसला।
ऎसा एक खत मौजुद है कोप्टा के अजायबघर मे जिसके अन्दर अल्लाह के रसुल सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. ६४ लिखवातें हैं उस मे ज़िक्र है "कहों अहलेकिताब (ईसाई) से की आऒ उस बात की तरफ़ जो आप और हम मे समान है सबसे पहली बात है की अल्लाह सुब्नाह वतआला एक है, अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करें, हम आप और हम में से अल्लाह के अलावा किसी को रब ना बनायें, अगर वो फिर भी न मानें तो आप शहादत दो की हम मुस्लिम है"। इस कुरआन मजीद की आयत मे अल्लाह हमें एक तरीका बताते है की कैसे गैर-मुस्लमानॊं से बात करनी चाहियें और उन्हें इस्लाम की दावत देनी चाहियें।


मैं आप लोगों से एक सवाल पूछ्ता हू की आज की तारिख मे लगभग डेढ करोड अरब है जो कोपटिक क्रिसशन (ईसाई) है, एक करोड पचास लाख अरब हैं जो जन्म से ईसाई है। मैं आपसे पूछ्ना चाहता हू की एक अरब ईसाई को आप कौन सा तर्जुमा देंगे? अरबी तो उसकी मार्तभाषा है तो क्या आप कुरआन का फिर से अरबी में तर्जुमा करेंगे। आप उसको अरबी का कुरआन देंगे।


हमारा फ़र्ज़ है की हम कुरआन को पढे, उसकों समझें, उस पर अमल करें और दुसरे लोगों तक कुरआन का पैगाम पहुचायें। अकसर कई मुस्लमान कहते है की कुरान मजीद को सिर्फ़ आलिम लोग ही समझ सकतें हैं, उन्हे ही पढना चाहिये, ये बहुत कठिन किताब है और इसको आलिम ही समझ सकते हैं। मैं आपको कुरआन मजीद की एक सुरह बताता हू जिसके अन्दर कम से कम चार बार दोहराते है, अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह कमर सु. ५४ : आ. १७, २२, ३२, ४०, में "हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया ताकि आप इसें समझ सकें, आप इसे याद रख सकें, हमनें ये कुरआन मजीद आपकें समझनें के लिये आसान बनाया, आप में से कौन शख्स इसकी बात नही मानेगा"। जब अल्लाह तआला ने कुरआन मे कई आयतों मे फ़र्माया की हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया तो आप किसकी बात मानेंगे अल्लाह की या उस मुस्लमान की जो कहतें हैं की सिर्फ़ उल्मा के लिये है। और अल्लाह तआला कई आयतों मे फ़र्मातें है सुरह बकरह सु. २ : आ. २४२ में "फ़िर आप नही समझोगें"। यानी अल्लाह तआला चाहतें है की आप कुरआन मजीद को समझ के पढॊं लेकिन अल्लाह तआला इसके साथ मे ये भी फ़र्माते है सुरह नहल सु. १६ : आ. ४३ और सुरह अम्बिया सु. २१ : आ. ७ में "अगर आप कुछ चीज़ को नही समझते है तो उनसे पूछिये जिसके पास इल्म है"। मान लिजिये कि आप कुरआन का तर्जुमा पढ रहे है और आपको कुछ आयतें समझ मे नही आती है तो कुरआन मजीद मे अल्लाह तआला ने बता दिया है की आप उनसे पूछिये जिनके पास इल्म है। अगर आप कुरआन मजीद की आयत पढते है जिसमें साइंस का ज़िक्र है तो आप किस से पूछेंगे? अपने पडोसी से जो हज्जाम है? नही आप साइंटिस्ट से पूछेंगे क्यौंकी साइंटिस्ट साइंस का आलिम है।

अगर कुरआन मे बीमारी का ज़िक्र है तो किस से पूछेंगे? आप डाक्टर से पूछेंगे क्यौंकि डाक्टर दवाई के मैदान मे माहिर और आलिम है। अगर आप ये जानना चाहते है की कुरआन की ये आयत कब नाज़िल हूई तो आप उस से पूछेंगे जिसने दारुल उलुम मे सात - आठ साल पढाई की है तो कुरआन मे ये ज़िक्र आता है कि उनसे पूछिये जिनके पास इल्म हैं।

मैं आपको एक मिसाल देना चाहूगां कुछ बीस साल पहले कुछ अरब कुरआन मजीद मे जितनी भी आयतें है जो एम्रोलोजी के बारे मे ज़िक्र कर रही है। एम्रोलोजी का मतलब है मां के पेट के अंदर कैसे बच्चा बडा होता है उसकी पुरी जानकारी। तो कुरआन मे जितनी आयतों में ज़िक्र होता है की कैसे मां के पेट मे बच्चा बडा होता है उन सब आयतों का तर्जुमा लेकर वो जाते है प्रों. कीथ मूर के पास और उस वक्त प्रों. कीथ मूर सारी दुनिया के सबसे माहिर एम्रोलोजिस्ट थें, हैड आफ़ दा डिपार्ट्मेट आफ़ एनोटोमी, यूनिव्रसिटी आफ़ टोरंटो. कनाडा। वो ईसाई थे लेकिन अल्लाह तआला फ़र्माता है की उनसे पूछिये जो माहिर है चाहे वो मुस्लमान हो या गैर-मुस्लमान। तो ये अरब उन्हे कुरआन मजीद का तर्जुमा पेश करते है कि जिसके अन्दर ज़िक्र आता है कि कैसे मां के पेट के अंदर बच्चा बडा होता है। वो जब कई आयतों का तर्जुमा पढते है तो प्रो. कीथ मूर कहते है कि "अकसर जो आयतॊं मे ज़िक्र है वो आज की माडर्न एम्रोलोजी से मिलती जुलती है लेकिन चंद आयते है जिनके बारे मे ये नही कह सकता की ये सही है। मैं ये भी नही कहता हू की ये गलत है क्यौंकी मैं खुद नही जानता। उन आयतों मे दो आयतें ये थी जो सबसे पहले नाज़िल की गयी थी सुरह इकरा या सुरह अलक सु. ९६ : आ. १-२ जिसमें अल्लाह तआला फ़र्माते है "पढों अल्लाह के नाम से जिसने इन्सान को बनाया है खून के लोथडें से, लीच से, जोंक से"। प्रों. कीथ मूर ने कहा मैं नही जानता की बच्चा जब मां के पेट के अन्दर बडा होता है तो सबसे पहले लीच की तरह दिखता है, लीच का मतलब है जोंक जो खून चुसता है। तो प्रो. कीथ मूर अपनी लेबोरेट्री के अन्दर गये और एक बहुत पावरफ़ुल माइक्रोस्कोप के अन्दर देखा की जो मां के पेट के अन्दर बच्चा जब अपनी सबसे पहली स्टेज मे होता है एकदम पहली मंज़िल उसको माइक्रोस्कोप के अन्दर देखते है और उसे जोंक की तस्वीर से मिलाते है और हैरान हो जाते है की हुबहु दोनों बिल्कुल एक जैसे है।

जब उनसे एम्रोलोजी के बारे लगभग अस्सी सवाल पुछे गये तो उन्होने कहा की अगर आपने ये सवाल मुझसे तीस साल पहले पुछे होते यानी आज से पचास साल पहले तो मैं पचास प्रतिशत से ज़्यादा सवालॊं के जवाब नहीं दे सकता था क्यौंकी एम्रोलोजी साइंस का वो हिस्सा है जो अभी चंद सालॊ मे ही कुछ तरक्की किया है। प्रो. कीथ मूर को जो भी नयी चीज़ मिली कुरआन और हदीस से उन्होने अपनी नई किताब "Developing Human" की तीसरी एडीशन मे शामिल किया और उस किताब को उस वक्त का नंबर वन किताब का अवार्ड मिला सबसे बेहतरीन किताब जो एक डाक्टर ने लिखी है और इस किताब का अनुवाद कई ज़बानॊं मे किया जा चुका है।

इस किताब के ताल्लुक रखते कुछ लिन्क यहा मौजूद हैं......

http://www.geocities.com/aahem187/embryology.htm

http://www.islamic-awareness.org/Quran/Science/scientists.html

http://www.answering-islam.org/Responses/It-is-truth/chap03.htm

http://www.islamicvoice.com/january.97/scie.htm

http://www.thisistruth.org/truth.php?f=CreationOfMan

http://www.elsevier.com/wps/product/cws_home/712494


प्रो. कीथ मूर ने कहा "मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने में की कुरआन मजीद खुदा की किताब है और मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने मे की मुह्म्मद सल्लाहॊ अलैह वसल्लम खुदा के आखिरी पैगम्बर हैं"।

इस मिसाल से हमें ये मालुम होता है की जब भी आपको कुछ नही पता तो उससे पुछिये जो उस मैदान का माहिर है। जब भी आप कोई मशीन खरीदते है तो उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड आती है की किस तरह से मशीन को इस्तेमाल करना चाहिये। और आप अगर इज़ाज़त देंगे इन्सान को मशीन कहने के लिये तो ये हमें मानना पडेंगा की सबसे मुश्किल मशीन इन्सान है, सबसे पेचिदा मशीन इन्सान है। क्या इस मशीन के लिये कोई Instruction Manual युज़र गाइड की ज़रूरत नही? कोई किताब की ज़रुरत नही? इस मशीन की Instruction Manual युज़र गाइड है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन मजीद, इस कुरआन मजीद मे लिखा हुआ है की किस तरह इस मशीन की हिफ़ाज़त करनी चाहिये? किस तरह इस मशीन को चलाना चाहिये? इस मशीन के लिये क्या क्या फ़ायदे है.....हर मशीन के साथ एक किताब आती है और इस मशीन इन्सान की किताब है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन।

अगर आप कोई जापानी मशीन खरीदते है और उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड जापानी मे आपको मिलती है और जापानी आप समझतें नही हैं तो आप क्या करते हैं? आप दुकानदार से उस ज़बान की Instruction Manual युज़र गाइड मागंते है जो जिस ज़बान मे आपको महारत हासिल है ताकि आप समझ सकें की इस मशीन को कैसे इस्तेमाल करना है। तो अगर आप अरबी कुरआन मजीद को नही समझते है तो कम से कम इस कुरआन मजीद का तर्जुमा पढॊं और समझॊं और इस मशीन को सही तरह से इस्तेमाल करो।

मान लीजिये आप की कार खराब हो जाती है और कोई आप से कहता है की इसकी टंकी मे देसी घी डाल दो तो ये चलने लगेगी तो आप क्या करेंगे? उसकी बात मानेंगे नही क्यौंकी भले आप गाडीं सही करना नही जानते पर इतना जानते है की गाडी घी से नही चलती है। तो इसी तरह अगर हर मुस्लमान कुरआन को थोडा बहुत भी समझ कर पडें तो कोई भी आलिम, कोई भी मौलवी आपको बहका नही सकता, कोई भी आपकॊ गुमराह नही कर सकता है। आज के माहौल मे आप देखते है की मुस्लमान फ़िरकों मे बंटे हुए है एक आलिम ये कहता है, एक आलिम वो कहता है, अगर हम मुस्लमान कुरआन मजीद को समझ कर पढें तो कोई भी मौलाना आपको गुमराह नही कर सकता, कोई भी आलिम आपकॊ घुमा नही सकता।

ये आज मुस्लमानों की हालत जो है की सब जगह मुस्लमान पीटे जा रहे है क्यौंकी हम कुरआन मजीद समझ के नही पढते। अगर हम कुरआन मजीद समझ के पढें और इकट्ठा हो जाये तो इन्शाल्लाह हम मुस्लमानॊं के बीच कोई फ़िरका नही होगा। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. १०३ में "आप अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकडीये और आपस मे फ़िरके मत बनाइये"। अल्लाह की रस्सी क्या है कुरआन मजीद और मुह्म्मद सल्लाहो अलैह वसल्लम की सही हदीस अगर हम अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकड लेंगे और आपस मे फ़िरके नही बनायेंगे तो इन्शाल्लाह हम एक बार फिर से दुनिया की ऊचाई पर पहुचेंगें।

बाकी अगली कडीं मे...

अल्लाह आप सब कुरआन पढ कर और सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।

आमीन, सुम्मा आमीन
साभार :-  इस्लाम और कुरआन



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Monday, February 22, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी हैं? भाग - 2 Understand The Quran While Reading

आप लोगो ने मेरे इस लेख का पहला भाग पढा होगा। अगर नही पढा है तो यहां पढ सकते है।


हम मुस्लमान अक्सर बहाने बनाते है की हमारे पास कुरआन मजीद का तर्जुमा पढने का टाइम नही है। हम अपने रोज़-मर्रा के कामों मे मसरुफ़ है, अपनी पढाई मे, अपने कारोबार मे, वगैरह वगैरह। हम सब ये जानते है की जो भी वक्त हम स्कुल-कालेज मे लगाते है और कई किताबें हिफ़्ज़ (मुहं ज़बानी याद) कर लेते है, क्या हमारे पास कुरआन मजीद पढने का टाइम नही हैं? अगर आप कुरआन मजीद का तर्जुमा पढेंगे, चन्द दिनॊं मे पढ सकते है। लेकिन मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम फ़र्माते है :- "कि जो कोई तीन दिन से कम वक्त मे कुरआन मजीद को पुरा पढता है तो वो कुरआन मजीद को समझ कर नही पढता है" (२९४९, तिर्मिधी)। अगर आप सुकुन से पढेंगें तो इन्शाल्लाह आप सात दिन मे कुरआन मजीद के तर्जुमें को पुरा पढ लेंगे, अगर आप रोज़ कुरआन का एक पारा पढेगें तो एक महीने मे आप कुरआन को पुरा पढ लेंगें। जो डिगरी आप हासिल करते है स्कुल और कालेज जाकर वो आप को इस दुनिया मे फ़ायदा पहुचां सकती है और नही भी पहुचां सकती है क्यौंकी हम जानते है की कई डिग्री वाले बेकाम घुम रहे हैं लेकिन अल्लाह सुब्नाह व तआला वादा देते है की अगर आप इस कुरान मजीद को अच्छी तरह समझ कर पढेंगे तो आप को आखिरत मे ही नहीं इस दुनिया मे भी इन्शाल्लाह फ़ायदा होगा।


अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह बकरह सु. २ : आ. १-२ में "ये वो किताब है जिसमे कोई शक नही जो तकवा (अल्लाह से डरनें वाले) रखते है"। मिसाल के तौर पर आपका कोई करीबी दोस्त फ़्रांस से हिन्दुस्तान घुमने के लिये आता है वो हिन्दुस्तान घुमता है और आपके घर पर एक हफ़्ता रुकता है और फिर वापस चला जाता है, अपने घर पहुचने के बाद आपकॊ वो एक खत लिखता है लेकिन उसको हिन्दी या उर्दु नही आती है उसे फ़्रेंच मे महारत हासिल है तो वो आपको खत भी फ़्रेंच मे लिख्ता है। आपको फ़्रेंच आती नही है तो फिर आप क्या करेंगे? उस आदमी को ढुढंगे जिसे फ़्रेंच आती है और जो आपकॊ आपके करीबी दोस्त के खत का तर्जुमा करके बताये की आपके दोस्त ने आपको क्या लिख कर भेजा है। क्या आपका फ़र्ज़ नही होता की आप जानें की आपके रब, आपके खालिक, अल्लाह सुब्नाह व तआला ने अपने आखिरी पैगाम कुरआन मजीद मे आपके लिये क्या लिखा है? हमें कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा करने की ज़रुरत नही है अल्हम्दुलिल्लाह कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा हर अहम ज़ुबान मे हो चुका है आपको सिर्फ़ उसको मार्कट से जाकर खरीदने की ज़रुरत है। हमें कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा पढना चाहिये उस ज़बान मे जिसमें हमें महारत हासिल है।

अकसर मुस्लमान समझते है कि ये कुरआन शरीफ़ सिर्फ़ मुसलमानॊं के लिये है और इसे गैर-मुसलमानॊं को नही देना चाहिये ये हमारी गलतफ़हमी है हमारा वहम क्यौंकी अल्लाह सुब्नाह व तआला फ़र्माते है कुरआन शरीफ़ मे सुरह: इब्राहिम सु. १४ : आ. १ में "ये किताब नाज़िल कि गयी थी मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ताकि वो सारी इन्सानियत को अंधेरे से रोशनी मे ले आयें"। कुरआन मजीद मे ये कहीं नही लिखा हुआ है की कुरआन मजीद सिर्फ़ मुसलमान या अरबों के लिये है। यहां आपने पढा की अल्लाह तआला फ़रमाते है की कुरआन मजीद मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर इसलिये नाज़िल कि गयी थी कि वो सारी इन्सानियत को अंधेरे से रोशनी मे लेकर आयें। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: इब्राहिम सु. १४ : आ. ५२ में " ये कुरआन मजीद सारी इन्सानियत के लिये पैगाम है और उनके लिये जो समझते है और उनसे कह दो कि अल्लाह एक है और समझने वाले अल्लाह के कलाम को समझेंगे"। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: बकरह सु. २ : आ. १८५ में "रमज़ान वो महीना है जिसमें कुरआन शरीफ़ नाज़िल हो चुका था और ये सारी इन्सानियत के लिये हिदायत की किताब है ताकि लोग समझ सकें की गलत क्या और सही क्या है"। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: अल ज़ुम्र सु. ३९ : आ. ४१ में "के हमनें ये किताब नाज़िल कि मौहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ताकि वो हिदायत दे इंसानों को"। कुरआन मे ये कही नही लिखा है की ये कुरआन सिर्फ़ मुसलमानों या अरबों के लियें नाज़िल कि गयी है और कुरआन मे ये कहीं नहीं लिखा है की मुसलमानॊं को हिदायत दें और हमारे आखिरी पैगम्बर मौहम्मद सल्लाहोअलैह वस्सलम सिर्फ़ अरबों या मुसलमानॊं के लिये नही भेजे गये थें अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: अम्बिया सु. २१ : आ. १०७ में "के हमने तुम्हे भेजा है एक रहमत सारी इन्सानियत, सारे जहां के लिये"। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह: सबा सु. ३४ : आ. २८ मे "के हमने तुम्हें भेजा एक पैगम्बर सारी इन्सानियत के लिये ताकि आप लोगो को अच्छाई की तरफ़ बुलायें और बुराई से रोकें"। लेकिन अकसर लोग ये नही जानते है। कुरआन की इन आयतॊं से समझ मे आता है की कुरआन मजीद और मौहम्मद सल्लाहोअलैह वस्सलम सारी इन्सानियत के लिये भेजे गये थे मुसलमानॊ के लिये भी और गैर-मुसलमानों के लिये भी।

हम मुसलमान लोग कुरआन मजीद को समझ के तो पढते नहीं लेकिन उसकी इतनी हिफ़ाज़त करते है की दूसरों को भी नही पढनें देते। कह्ते है कुरआन मजीद को जो लोग नजीज़ (नापाक/अपवित्र) है वो हाथ नही लगा सकते हैं और कुरआन मजीद की एक आयत का हवाला देते है सुरह: वाकिया सु. ५६ : आ. ७७-८२ "कि ये वो कुरआन अल्लाह तआला ने नाज़िल किया और इसको कोई भी हाथ नही लगायेंगा सिर्फ़ वो जो मुताहिरीन हैं"। अगर इस आयत के ये मायने होते की इस कुरआन शरीफ़ को जो मुसफ़ (कापी) है को कोई भी हाथ नही लगा सकता है सिर्फ़ उसके जो जो पाक है, वुज़ु मे हैं, तो कोई भी शख्स, कोई भी गैर-मुस्लिम बाज़ार से सौ या दो सौ रुपये में कुरआन खरीद कर उसे हाथ लगा सकता है और कुरआन मजीद गलत साबित हो जायेगा। कुरआन इस आयत के मायने इस कुरआन मजीद, इस किताब जो मुसह्फ़ है, के नही है बल्कि उस कुरआन मजीद जो लौहे-महफ़ुज़ (सातवें आसमान) में है जिसका ज़िक्र सुरह: बुरुज सु. ८५ : आ. २२ में है अगर आप देखेगें कि इस आयत के मुताबिक कि कुरआन क्यों नाज़िल हुआ कि कुछ लोग गैर-मुस्लिम वगैरह ये कहते थे कि मौहम्मद सल्लाहोअलैह वस्सलम पर ये "वही" (पैगाम) शैतान के पास से आती थी तो अल्लाह तआला फ़र्माते है की "ये "लौह-महफ़ुज़" के नज़दीक कोई भी नही आ सकता है सिवाय उसके जो मुताहिरीन हैं।" मुताहिरीन के मायने है वो जिसने कोई भी गुनाह नही किया, वो बिल्कुल पाक है सिर्फ़ जिस्म से ही नही सारे तरीके से। अगर आप तबरिगी तफ़्सील के अन्दर वो कह्ते है की जिस कुरआन का ज़िक्र हो रहा है उस कुरआन का जो सातवें आसमान मे लौहे-महफ़ुज़ के अन्दर जिसको कोई हाथ नही लगा सकता सिवाय फ़रिश्तों के"। तो शैतान के करीब आने का तो सवाल ही नही उठता इसके माईने ये नही कोई इन्सान जो पाक नही है वो हाथ नही लगा सकता है। पाक होना, वुज़ु मे होना अच्छी बात है लेकिन इसका मतलब ये नही है की ये फ़र्ज़ है।

कुछ लोग ये भी कह्ते है की हम गैर-मुस्लिम को कुरआन का सिर्फ़ तर्जुमा देंगे अरबी मतन नही देंगे, कुरआन शरीफ़ का तर्जुमा और अरबी मे साथ-साथ नही देंगे। लेकिन मै अगर किसी गैर-मुस्लिम को कुरआन देता हू तो मैं तर्जुमें के साथ अरबी का कुरआन भी देता हु क्यौंकी अगर तर्जुमें मे गलती हो तो वो इन्सान की तरफ़ है अल्लाह की तरफ़ से नही है, और तर्जुमें तो इन्सान करते है और गलती तो कहीं न कहीं करेंगे। मिसाल के तौर पे आप पढेंगे सुरह: लुकमान सु. ३१ : आ. ३४ उसमें अल्लाह तआला फ़र्माते है की "अल्लाह के अलावा कोई भी नही जानता के मां के पेट मे जो बच्चा है वो कैसा होगा"। लेकिन आप उर्दु का तर्जुमा पढेंगे तो उसमें अकसर ये लिखा मिलेगा कि "कोई भी नही जानता कि मां के पेट मे जो बच्चा है उसका जिन्स (लिंग) कैसा होगा"। और जो शख्स थोडा बहुत साइंस के बारे मे जानता होगा वो बता सकता की आज के दौर में ये जानना बहुत आसान काम है की मां के पेट मे बच्चा लडंका है या लडकी। जबकी अरबी मे जिन्स लफ़्ज़ है ही नही। कुरआन मजीद मे लिखा है कि "कोई भी नही जानता सिर्फ़ अल्लाह के सिवा की मां के पेट के अन्दर बच्चा कैसा होगां। कैसा होगा के माईने की पैदा होने के बाद वो अच्छा होगा या बुरा, दुनिया के फ़ायदेमन्द होगा या नुक्सानदायक, वो जन्नत जायेगा या जह्न्नम कोई भी नही जानता सिवाय अल्लाह के।"

बाकी अगली कडीं मे....

अल्लाह आप सब कुरआन पढ कर और सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।

आमीन, सुम्मा आमीन


साभार :- इस्लाम और कुरआन

Saturday, January 23, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग- १

कुरआन मजीद अल्लाह तआला की आखिरी वही (पैगाम) अपने आखिरी पैगम्बर मुहम्मद रसुल अल्लाह सल्लाहोअलैह वस्सलम पर नाज़िल की थी। कुरआन मजीद सारी दुनिया मे सबसे बेहतरीन किताब है, वो इन्सानियत के लिये हिदायत है, कुरआन मजीद हिकमत का झरना है और जो लोग नही मानते उन्के लिये चेतावनी है, उन्के लिये सख्ती है और जो लोग भटके हुए है उन्हे सीधी राह दिखाती है कुरआन मजीद। जिन लोगो को शक है कुरआन मजीद उन्के लिये यकीन है और जो मुश्किलात मे है उन्के लिये राहत है लेकिन ये कुरआन मजीद की सारी खुबियां कोई इन्सान तब तक हासिल नही कर सकता है जब की वो कुरआन मजीद को नही पढे, कुरआन मजीद को नही समझे, और कुरआन मजीद पर अमल न करे। कुरआन मजीद की ये सारी खुबियां हम तब ही हासिल कर सकते है जब कुरआन मजीद को पढे, उसकॊ समझें और उस पर अमल करें। कुरआन मजीद सारे जहां मे सबसे ज़्यादा पढी जाने वाली किताब है लेकिन अफ़्सोस की बात है की कुरआन मजीद वो ही किताब है जो सबसे ज़्यादा बिना समझे पढी जाती है, ये वो किताब है जो लोग बिना समझे पढते है यही वजह की हम मुस्लमानॊं और कुरआन के बीच जो रिश्ता है, जो बंधन है वो कमज़ोर होता जा रहा है।


कितने अफ़्सोस की बात है की एक शख्स कुरआन के करीब आता है, कुरआन पढता है, लेकिन उसके ज़िन्दगी जीने का तरीका बिल्कुल भी नही बदलता, उसका रहन-सहन ज़रा भी नही बदलता, उसका दिल ज़रा भी नही पिघलता, बहुत अफ़्सोस की बात है। अल्लाह तआला फ़र्माते है कुरआन मजीद में सुरह: अल इमरान सु. ३ : आ. ११० मे अल्लाह तआला सारे मुसलामानॊं से फ़र्माते है "की आप सारे जहां मे सबसे बेहतरीन उम्मा (उम्मत) है"। जब भी कोई तारिफ़ की जाती है या ओहदा दिया जाता है तो उसके साथ ज़िम्मेदारी होना ज़रुरी है कोई भी ओहदे के साथ ज़िम्मेदारी होना ज़रुरी है। जब अल्लाह तआला हमे सारे जहां मे सबसे बेहतरीन उम्मा कहते है तो क्या हमारे उपर कोई ज़िम्मेदारी नही है? इसी आयत मे अल्लाह तआला हमें हमारी ज़िम्मेदारी भी बताते है "अल्लाह तआला फ़र्माते है क्यौंकी हम लोगों को अच्छाई की तरफ़ बुलाते है और बुराई से रोकते है"। अगर हम लोगो को अच्छाई की तरफ़ बुलाना चाहते है और बुराई से बचाना चाहते है तो ज़रुरी है की हम कुरआन को समझ कर पढे। अगर हम कुरआन को समझ कर नही पढेंगें तो लोगो को अच्छाई की तरफ़ कैसे बुलायेंगें? और अगर हम लोगो को अच्छाई की तरफ़ नही बुलायेंगे तो हम "खैरा-उम्मा" (सबसे बेह्तरीन उम्मा) कहलाने के लायक नही है। हम मुसलमान कहलाने के लायक नही है।

आज हम गौर करते हैं की हम मुसलमान कुरआन को समझ कर क्यौं नही पढतें? हम मुस्लमान क्यौं बहाने बनाते है कुरआन मजीद को समझ कर नही पढने के?

सबसे पहला जो बहाना है वो है की हम अरबी ज़बान नही जानते। ये हकीकत है की सारी दुनिया मे बीस प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान है, सारी दुनिया मे १२५ करोडं से ज़्यादा मुसलमान है लेकिन इसमे से लगभग १५ प्रतिशत मुसलमान अरब है जिनकी मार्त भाषा अरबी है और इन्के अलावा चन्द मुस्लमान अरबी ज़बान जानते है इसका मतलब है की ८० प्रतिशत मुसलमान अरबी ज़बान नही जानते है। जब भी कोई बच्चा पैदा होता है और इस दुनिया मे आता है तो वो कोई ज़बान नही जानता है वो सबसे पहले अपनी मां की ज़बान सीखता है ताकि वो घरवालॊं से बात कर सके, उसके बाद वो अपने मुह्ल्ले की ज़बान सीखता है ताकि मुह्ल्लेवालों से बातचीत कर सके, फिर वो तालिम हासिल करता है जिस स्कुल या कांलेज मे जिस ज़बान मे तालिम हासिल करता है उस ज़बान को सीखता है। हर इन्सान कम से कम दो या तीन ज़बान समझ सकता है, कुछ लोग चार या पांच ज़बान समझ सकते है और लोगो को बहुत सी ज़बानॊ मे महारत हासिल होती है लेकिन आम तौर से एक इन्सान दो या तीन ज़बान समझ सकता है। क्या हमे ज़रुरी नही की हम वो ज़बान समझे जिस ज़बान मे अल्लाह तआला ने आखिरी पैगाम इंसानियत के लिये पेश किया? क्या हमे ज़रुरी नही की हम अरबी ज़बान को जानें और सीखें? और उम्र कभी भी, कोई भी अच्छे काम के लिये रुकावट नही है।

मैं आपकॊं मिसाल पेश करना चाहता हु डां. मौरिस बुकेल की, डां. मौरिस बुकेल एक ईसाई थे, उन्हे फ़्रैचं अक्डेमी अवार्ड मिला था मेडिसिन के श्रेत्र मे, और उनको चुना गया था की "फ़िरौन की लाश" जो बच गयी थी, जिसे लोगों ने ढुढां था १९वीं सदी में, उसे मिस्त्र के अजायबघर रखा गया है। उन्हे चुना गया था की आप इस लाश पर तह्कीक (रिसर्च) करने को और डां. मौरिस बुकेल क्यौंकी ईसाई थे इसलिये जानते थे की "बाईबिल" मे लिखा हुआ था "की जब फ़िरौन मुसा अलैह्स्सलाम का पिछा कर रहा था तो वो दरिया मे डुब जाता है, ये उन्हे पता था। लेकिन डां. मौरिस बुकेल जब अरब का दौरा कर रहे थे तो एक अरब के आदमी ने कहा की कोई नयी बात नही है की आपने "फ़िरौन" कि लाश को ढुढं निकाला क्यौंकी कुरआन मजीद मे सुरह: युनुस सु. १० : आ. ९२ :- "अल्लाह तआला फ़र्माते है की हम फ़िरौन की लाश को हिफ़ाज़त से रखेंगें, महफुज़ रखेंगें ताकि सारी दुनिया के लिये वो एक निशानी बनें"। डां. मौरिस बुकेल हैरान हुए की ये जो किताब आज से १४०० साल पुरानी है उसमे कैसे लिखा गया है की "फ़िरौन की लाश को हिफ़ाज़त से रखा जायेगा"। इसीलिये डां. मौरिस बुकेल ने कुरआन मजीद का तर्जुमा पढां और तर्जुमा पढने के बाद इतने मुतासिर हुए की कुरआन को और अच्छी तरह समझने के पचास साल की उम्र मे उन्होने अरबी ज़बान सीखी और कुरआन का मुताला (समझ कर पढा) किया। और उसके बाद एक किताब लिखी " Bible. Quran And Science" और ये किताब काफ़ी मशहुर है और काफ़ी ज़बानॊ मे इसका तर्जुमा हो चुका है।

मैनें ये मिसाल आपकॊ दी ये समझाने के लिये की एक गैर-मुसलमान, एक ईसाई, कुरआन को अच्छी तरह समझने के लिये पचास साल की उम्र मे अरबी ज़बान सीखता है। मै जानता है की हम सब डां. मौरिस बुकेल की तरह जज़्बा नही रखते है लेकिन कम से कम हम कुरआन का तर्जुमा तो पढ सकते है। मौलाना अब्दुल मजीद दरियाबादी फ़र्माते है की सारी दुनिया मे सबसे मुश्किल किताब जिस्का तर्जुमा हो सकता है वो है कुरआन मजीद। क्यौंकी कुरआन मजीद की ज़बान अल्लाह तआला की तरह से है और एक बेहतरीन ज़बान है, एक करिश्मा है। कुरआन की एक आयत एक ज़हीन और पढे - लिखे आदमी को मुत्तासिर (Impress) करती है और वही आयत एक आम आदमी कॊ मुत्तासिर करती है यह खुबी है कुरआन मजीद की और कई अरबी अल्फ़ाज़ (शब्द) उसके पचास से ज़्यादा माईने (मतलब/अर्थ) होते हैं और कुरआन मजीद की एक आयत के कई माईने होते है इसीलिये ये अल्लाह तआला की आखिरी किताब सबसे मुश्किल किताब है जिस्का तर्जुमा (अनुवाद) हो सकता है लेकिन इसके बावजुद कई उलमा ने कुरआन मजीद का तर्जुमा दुनिया की कई ज़बानॊ मे किया, जितनी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली ज़बानें (भाषायें) है उसके अंदर कुरआन मजीद का तर्जुमा (अनुवाद) हो चुका है तो अगर आपकॊ अरबी ज़बान मे महारत हासिल नही है तो आप कुरआन का तर्जुमा उस ज़बान (भाषा) मे पढे जिसमे आपको महारत हासिल है।

भाग -२ में जारी

साभार :- इस्लाम और कुरआन

Tuesday, December 22, 2009

अल्लाह के चमत्कार...हर तरफ...!!! Miracle's Of Allah Everywhere

अल्लाह तआला के सिवा कोई पुज्य नही है और अल्लाह तआला को जो करिश्मा दिखाना था वो १४०० साल पहले कुरआन के रुप में सबको दिखा चुकें है लेकिन कुछ लोग है जो अब भी यकीन नहीं करते है ऐसे लोगो की आखें खोलने के लिये अल्लाह तआला ने इस दुनिया के लोगो को बहुत से चमत्कार दिखायें। ऐसी ही कुछ तस्वीरें और एक वीडियो मेरे पास काफ़ी दिनो से मौजुद थी तो मैने सोचा आप लोगो को भी दिखा दूं। अल्लाह तआला चाहे हर चीज़ पर और हर चीज़ से अपना नाम लिख सकता है चाहे वो बाद्ल में, समुंद्र में, आसमान में, पेड से,....

रुकु की हालत में पेड

ये पेड सिडनी, आस्ट्रेलिया के जंगल में पाया गया था। ये रुकु की हालत में है और इसका रुख काबे की तरह है जिस तरफ़ रुख करकें हर मुसलमान नमाज़ पडता है।















Lule के फूल पर अल्लाह का नाम

















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Saturday, November 28, 2009

ईदुल अज़हा, बकरीद और कुरबानी के अहकाम व मसलें.. Matters & Compulsory Works Of Bakrid, Eid-Ul-Azha

आज ईदुल जुहा है.....  ईदुल ज़ुहा जिसे पुरे भारतीय उपमहाद्विप में "बकरीद" के नाम से जाना जाता है। बकरीद क्यौं मनाई जाती इसका लगभग सबको है तो इसलिये आज हम उन बातों पर गौर करेंगे जो करना ज़रुरी है लेकिन वो अकसर छुट जाती है और उन बातों पर गौर करेंगे जो बेवजह इस मुकद्द्स त्यौहार से जुड गयीं है।

तकबीरात :-  तकबीर, तहलील और तहमीद, यानि अल्लाह तआला की बडाई व बुजुर्गी ब्यान करना, उसको
                       एक मानना और उसकी तारीफ़ ब्यान करने को कहते हैं।
अश्रह ज़िलहिज़्जा में "अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर लाइलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर वलिल्लाहिल हम्द" (दार कुतनी) पढने की खास ताकीद की गई है। (मुसनद अहमद) इन तकबीरों को ज़िलहिज़्जा (बकरीद) का चांद नज़र आने के बाद से 13 जिलहिज़्जा के सूरज छुपने तक चलते-फ़िरते, उठते-बैठते और नमाज़ों के बाद पढते रहना चाहिये। (बुखारी, मिरआत शरह मिश्कात)

                          कुछ उलमा ने लिखा है की तकरीबात 9 जिलहिज़्जा की फ़ज़्र से 13 जिलहिज़्जा की नमाज़ अस्र तक पढनी चाहिये, इस बारे सहाबा किराम (रज़ि.) के तौर-तरीके हदीस की किताबों में मिलते हैं मगर बेहतर और अफ़ज़ल सूरत यही है कि ज़िलहिज़्जा का चांद नज़र आने के बाद से 13 ज़िलहिज़्जा के सूरज छुपने तक तकरीबात पढें क्यौंकि ज़्यादातर सहाबा किराम (रज़ि.) का अमल यही मिलता है और इस सूरत पर अमल करने में तमाम बातों और तरीकों पर अमल भी हो जाता है।

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Sunday, November 15, 2009

इस मिट्टी और इस ज़मीन को पुजते हो तो इसमें दफ़न क्यौं नही हो जातें..!!!! If You Worship This Country This Soil So Why You Not Graved In This Soil???

मैनें अपने पिछ्ले लेख "एक भी भारतीय मुस्लमान देशभक्त नही है" में मुस्लमानों के "वन्दे मातरम" ना गाने की वजह बताई थी मेरे उस लेख को पढकर मेरा एक बहुत करीबी दोस्त जो  "आगरा की शिवसेना ईकाई का सदस्य" है ये लोग अपने आप को देशभक्त और देशप्रेमी कहते है जबकि (मुझे आज तक इनमें कोई देशभक्त और देशप्रेमी नही मिला बल्कि शहर के सारे गुण्डे-बदमाश शिवसेना और बंजरग दल के सदस्य होते है)

बरहाल मेरा दोस्त जिसका मेरा साथ पिछले नौ सालों से है मुझसे झगडने लगा....कहने लगा की तेरी हिम्मत कैसे हुई ये सब लिखने की? जो "वन्दे मातरम" नही गा सकता वो अपने देश से प्यार नही करता। अगर इस देश में रहना है तो वन्दे मातरम गाना पडेगा वर्ना तुम गद्दार कह लाओगे और गद्दारों के लिये इस देश में जगह नही है तुम ये देश छोडकर जा सकते हों.......वगैरह वगैरह... (वही बातें जो इनके जैसे "कथित देशभक्त" लोग अकसर कहते है)



मैनें उसकी सब बातें सुनने के बाद उससे कुछ सवाल किये जो सुनने के बाद वो बगले झांकने लगा....उसके पास कोई जवाब नही था तो वो बात को अधुरा छॊडकर बगैर कोई जवाब दिये वहां से निकल गया....

वही सवाल मैं आप लोगों से पुछता हूं देखें आप लोगों में से शालीन तरीके से इसका जवाब कौन देता है...(इस्लाम और कुरआन को गाली दे वाले इससे दुर रहें)

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Thursday, November 12, 2009

एक भी भारतीय मुस्लमान देशभक्त नही है..!! No Indian Muslim Is Patriostic..!!!


पिछ्ले कुछ दिनों से जब से जमाते इस्लामी ने "वन्दे मातरम" के फ़तवे के मसले पर अपनी राय रखी है तब से पुरे देश में बवाल मचा हुआ कोई मुसलमानों को गाली दे रहा है,  कोई चेतावनी दे रहा है की हम काटने को बैठे है,             

कोई इस्लाम के "सच्चे" फ़ालोवर्स से परिचय करा रहा है,        कोई मुसलमानों को बता रहा है की उन्हे "वन्दे मातरम" गाना चाहिये, कोई गद्दार कह रहा है, कोई हमें देश से बाहर निकालने को तैयार बैठा है।

वन्दे मातरम का अर्थ क्या है?? वो मुह्म्मद उमर कैरानवी बता चुके है..!!!

इसलिये सीधे मुद्दे की बात करते है...

जो लोग इस फ़तवे पर इतना बवाल मचा रहे है उन सब लोगों से मैं सवाल करना चाहता हूं   "क्या वन्देमातरम गाना देशप्रेम का सर्टिफ़िकेट है?"  "क्या वन्देमातरम को ना गाने वाला देशद्रोही है?" "अगर कोई मुस्लमान फ़ौजी "वन्देमातरम" नही गायेगा तो क्या वो भी देशद्रोही कहलायेगा?"



जो लोग वन्दे मातरम को लेकर इतना शोर कर रहे है उनमें से किसको "वन्दे मातरम" मुंह ज़बानी याद है??? किसको उसका अर्थ याद है??? भारत के किस शख्स ने "वन्दे मातरम" के अर्थ को अपनी ज़िन्दगी मे उतारा है??? "वन्देमातरम" हो, "जन गण मन" हो, या "सारे जहां से अच्छा" कौन इनके ऊपर अमल कर रहा है??? सबको बस हराम का पैसा चाहिये एक छोटा सा डाकिया भी कोई ज़रुरी कागज़ देने के लिये बीस से तीस रुपये मांगता है और जब भी कोई बेवकुफ़ उलेमा कोई फ़तवा देता है तो यही लोग देशभक्त और देशप्रेमी बनकर खडे हो जाते है गाली देने के लिये!


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Wednesday, September 16, 2009

शबे-बारात क्या है? शबे- बारात की हकीकत?? What Is Shabe-Baarat?? Reality Of Shabe-Baaraat??

(अपडेट 17 सितम्बर  2009 02 : 00 PM :- इस लेख में मैनें उर्दु अलफ़ाज़ों का बहुत इस्तेमाल किया था तो दिनेशराय जी ने इसको ना समझ पाने की शिकायत की इसलिये मैं आम हिन्दी अफ़ाज़ों का इस्तेमाल कर रहा हूं)

अभी कुछ दिनों पहले पन्द्रह शअबान को पुरे हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बडे ज़ोर शोर से शबे-बारात मनायी गयी थी। ये त्योहार सारे मुसलमान बहुत धुम-धाम से मनाते है। इस त्योहार को कुछ हिन्दु शिव की बारात से मिलाते हैं पढें सुरेश चिपलूनकर द्वारा लिखा गया ये लेख।


आज मैं आप लोगो को शबे-बारात की हकीकत बताने जा रहा हूं।


"शबे-बारात की हकीकत"
 "पन्द्र्ह शअबान की हकीकत"

 (याद रहे बिदअत गुनाहे कबीरा (सबसे बडा गुनाह) है। बिदअत से शैतान खुश होता है और अल्लाह की नाराज़गी हासिल होती है। बिदअत का रास्ता जहन्नुम की तरफ़ जाता है। लिहाज़ा तमाम मुसलमानों को बिदआत से बचना चाहिये।)

१) पन्द्र्ह शाबान को लोग "शबे-बारात" मान कर जगह-जगह, चौराहों, गली-कूचों में मजलिसें जमातें और झूठी रिवायात ब्यान करके पन्द्र्ह शअबान की बडी अहमियत और फ़ज़ीलत बताते हैं।

२) मस्जिदों, खानकाहों वगैरा में जमा होकर या आमतौर से सलातुल उमरी सौ रकआत (उमरी सौ रकआत), नमाज़ सलाते रगाइब (रगाइब की नमाज़), सलातुल अलफ़िआ (हज़ारी नमाज़) सलते गोसिया (शेख अब्दुल कादिर जिलानी रह०) के नाम की नमाज़ अदा करते हैं।

३) पन्द्रह शअबान की रात को "ईदुल अम्वात" (मुर्दों की ईद) समझ कर मुर्दों की रुहों का ज़मीन पर आने का इन्तिज़ार करते हैं।



४) शबे-बारात के दिन मकानों की सफ़ाई, बर्तनों की धुलाई, नये-नये कपडों को पहनते हैं, औरतें तरह-तरह के पकवान मसलन हलवा, पूडी, मसूर की दाल पकाती और नगमें गा-गा कर रात भर जागती हैं।

५) नियाज़ फ़ातिहा, कुरआन ख्वानी(कुरआन पढना), मज़ारों की धुलाई, कब्रों पर फ़ूल चढाना, गुलगुलों से मस्जिदों की ताकों को भरना, ये सारी बिदअतें व खुराफ़ातें पन्द्र्ह शअबान को आज का मोमिन करता है जिसका दावा था कि....


"तौहिद की अमानत सीनों में  है हमारें
आसां नहीं मिटाना नामो निशां हमारा"

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