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Sunday, April 18, 2010

हम भी सुधार के हामी हैं.


यहाँ बात हो रही है सुधार की.
वक़्त गुजरने के साथ मज़हब में कुछ ऐसी बातें शामिल हो जाती हैं जो वास्तव में गलत होती हैं और उनका मूल धर्म से कोई लेना देना नहीं होता. मज़हब में फैली हुई कुरीतियों (बल्कि किसी भी तरह की कुरीतियों) के खिलाफ विरोध करना बहुत अच्छी बात है. लेकिन उतना ही ज़रूरी है उसका हल पेश करना. अगर पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.) ने उस समय समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाई तो इस्लाम के रूप में उसका हल भी पेश किया. अगर आप कहते हैं की यह गलत है, तो सही क्या है और क्यों है, यह भी आप ही सिद्ध करना है. हम कब तक दूसरों पर दोषारोपण करते रहेंगे? यही काम तो आज के नेता भी कर रहे है, सब एक दूसरे को देश की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहा है. हल कोई नहीं पेश कर रहा. 

किसी भी मज़हब की कुरीतियों को मज़हब के अन्दर ही रहते हुए दूर करने की पूरी गुंजाइश है. इसलिए क्योंकि कोई भी कुरीति मज़हब को ढंग से न समझने के कारण पैदा होती है. यह ज़रूरी नहीं की हमें कहीं कोई बुराई दिख रही है तो उसके लिए सीधे मज़हब पर इलज़ाम लगा दें.  

हमारी अंजुमन ऐसा ही प्रयास कर रही है. कुछ उदाहरण :


सफात साहब ने बताया की इस्लाम में औरतों के अधिकार किस तरह के हैं, क्या वाकई वह मर्दों की गुलाम है?
कुरआन की जिस आयत को लेकर लोग औरतों को पीटने की बात करते हैं, वह आयत दरअसल औरत की प्रोटेक्टर है, बस ज़रुरत है दूसरे नजरिये से देखने की.

अगर आप किसी मज़हब के एक खरब मानने वालों से दलीलों के साथ कहते हैं की जिस कुरीति को तुम धर्म समझ रहे वह धर्म का अंग नहीं है तो एक खरब में शायद हज़ार ऐसे होंगे जो आपकी बात स्वीकार नहीं करेंगे.  लेकिन अगर आप ये कहते हैं की यह तुम्हारे धर्म की कुरीति है और इसको अलग करके बाकी बचे हुए धर्म को मानो तो एक खरब में केवल हज़ार ऐसे होंगे जो आपकी बात को स्वीकार करेंगे.



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Monday, April 5, 2010

क्‍या इस्लाम अनुसार बच्चा गोद लेना सही है?

प्रश्न: क्या इस्लाम अनुसार बच्चा गोद लेना सही नहीं है? क्या किसी को बेटा अथवा बेटी माना जा सकता है?

उत्तर: इस्लामिक अनुसार, बच्चे को गोद तो लिया जा सकता है, परन्तु सिर्फ पालन-पोषण इत्यादि के लिए. आप उसको अपना नाम नहीं दे सकते है, और बालिग़ होने पर सामान्यत: घर में प्रवेश की अनुमति भी नहीं दे सकते हैं. यही नियम चचेरे-ममेरे भाईओं के लिए भी है. अर्थात उसके घर में प्रवेश से पहले घर की औरतों को अपने शरीर को सामान्य: नियमानुसार ढकना आवश्यक है.

जहाँ तक जायदाद में हिस्से की बात है, तो कोई भी किसी को भी अपनी जायदाद में हिस्सा दे सकता है, हाँ ऐसा हिस्सा अपने-आप नहीं होता है. अर्थात पिता की मृत्यु के पश्चात् (अगर उसके नाम जायदाद नहीं की गयी है) गोद लिए बच्चा जायदाद में हिस्से की मांग नहीं कर सकता है.

इस्लाम अनुसार किसी भी महिला के लिए मर्द की स्थिति दो तरह की होती हैं: महरम और ना-महरम. सामान्यत: ना-महरम वह होते हैं जिनके सामने परदे की आवश्यकता होती है (अर्थात मुंह और हाथ को छोड़ कर शरीर के सभी अंगो को ढकना आवश्यक होता है). ना-महरम उस श्रेणी में आते हैं जिनसे विवाह जायज़ होता है.

जिनसे खून अथवा दूध का रिश्ता होता है वह महरम की श्रेणी में आते हैं, और उनसे वैवाहिक सम्बन्ध नहीं बनाए जा सकते हैं. जैसे कि माता-पिता, सास-ससुर, बेटें-बेटियां, पति के बेटें-बेटियां, भाई-बहन, भतीजे-भतीजियाँ, भांजे-भांजियां इत्यादि.

Allah says : (Interpretation of Qur'an Surah An-Noor)


"And say to the faithful women to lower their gazes, and to guard their private parts, and not to display their beauty except what is apparent of it, and to extend their headcoverings (khimars) to cover their bosoms (jaybs), and not to display their beauty except to their husbands, or their fathers, or their husband's fathers, or their sons, or their husband's sons, or their brothers, or their brothers' sons, or their sisters' sons, or their womenfolk, or what their right hands rule (slaves), or the followers from the men who do not feel sexual desire, or the small children to whom the nakedness of women is not apparent, and not to strike their feet (on the ground) so as to make known what they hide of their adornments. And turn in repentance to Allah together, O you the faithful, in order that you are successful".


अल्लाह कुरआन में फरमाता है (जिसका मतलब है):


और ईमान वाली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखे और अपनी शर्मगाहों की रक्षा करें. और अपने श्रृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है (अर्थात महरम) और अपने सीनों (वक्षस्थलों) पर दुपट्टे डाले रहे और अपना श्रृंगार किसी पर प्रकट न करे सिवाह अपने पति के या अपने पिता के या अपने पति के पिता के या अपने बेटों के अपने पति के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजो के या अपने मेल-जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिलकियत में हो उनके, या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुकें हो, जिसमें स्त्री की ज़रूरत होती है,.या उन बच्चो के जो औरतों के परदे की बातों से परिचित ना हो. ..............[सुर: अन-नूर, 24:31] 

इस्लाम के अनुसार "माना हुआ" जैसे किसी रिश्ते की क़ानूनी मान्यता नहीं है. इस शब्द के जाल में आज भी चोरी-छिपे गुनाह होते हैं, कितने ही प्रेमी-प्रेमिका अपने पाप को समाज से छुपाने के लिए एक दुसरे को राखी बांध कर, दिखावे के बहन-भाई बन जाते हैं और "राखी" जैसी पवित्र भावना को बदनाम करते हैं.

"मुंह बोले" अथवा "माने हुए" रिश्ते को अगर मान्यता मिलती तो वह घर की अन्य महिलाओं के लिए "महरम" होते परन्तु खून अथवा दूध का सीधा रिश्ता ना होने की स्थिति के कारणवश व्यभिचार को बढ़ावा मिलता. इसलिए ईश्वर ने इस रिश्ते को महरम का स्थान नहीं दिया.  ईश्वर ने "माने हुए रिश्ते" को सगे रिश्ते के बराबर मान्यता नहीं दी, और इसकी आड़ में होने वाले बुराइयों से बचाने के लिए अपने प्यारे संदेशवाहक मुहम्मद (स.) के ज़रिये इस बुराई को समाप्त किया.


अंजुम जी ने बहुत ही ज़बरदस्त बात की तरफ इशारा किया है.

@ Anjum Sheikh ने कहा…
"जब हज़रत ज़ैद (रज़ी.) को हुजुर (स.) ने गोद लिया तो अल्लाह ने कुरान के ज़रिये बताया कि गोद लिए बच्चे का दर्जा महरम का नहीं हो सकता है. इसलिए आप (स.) उसको अपना नाम नहीं दे सकते हैं."


दर-असल प्यारे नबी (स.) ने गुलामों के हक की बात उठाई और लोगो को अपने गुलामों को आज़ाद करने के लिए प्रेरित करने हेतु अपने गुलाम हज़रत ज़ैद (र.) को आज़ाद किया. इसके साथ ही उन्होंने हज़रत ज़ैद (र.) को अपने मुंहबोले बेटे का दर्जा भी दिया तो अल्लाह ने कुरआन की आयत उतार कर उनको ऐसा करने से रोक दिया. ईश्वर ने कहा कि तुम उनको (अर्थात आज़ाद किये हुए गुलामों को) उनके बाप के नाम के साथ पुकारों और अगर तुम्हे उनके बाप का नाम नहीं पता है, तो उनको अपना भाई समझो.

[सुर: अल-अहज़ाब 33:4] ..... और ना उसने तुम्हारे मुंह बोले बेटों को तुम्हारे वास्तविक बेटे बनाए. ये तो तुम्हारे मुँह की बातें हैं. किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहता है और वही मार्ग दिखता है.



[33:5] उन्हें (अर्थात मुँह बोले बेटों को) उनके बापों का बेटा कहकर पुकारो. अल्लाह के यहाँ यही अधिक न्यायसंगत बात है. और यदि तुम उनके बापों को न जानते हो, तो धर्म में वे तुम्हारे भाई तो हैं ही और तुम्हारे सहचर भी. इस सिलसिले में तुमसे जो गलती हुई हो उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं, कुन्तु जिसका संकल्प तुम्हारे दिलों ने कर लिया, उसकी बात और है. वास्तव में अल्लाह अत्यंत क्षमाशील, दयावान है.

क्योंकि दोनों में खून अथवा दूध का रिश्ता नहीं है, इसलिए मुँह बोले बेटों के घर की औरतों के लिए ना-महरम की स्तिथि होती और वहीँ उसके घर में भी गोद लेने वाले की स्तिथि ना-महरम की ही होती. इसलिए बेटों की जगह धर्म भाई मानना अधिक अच्छा है.

- शाहनवाज़ सिद्दीकी

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Wednesday, March 10, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग - 3 Understand Quran While Reading Part - 3

स लेख के पहले दो भाग आपने पढें होगें। अगर नही पढें है तो यहां पढ सकते है.....भाग-१, भाग-२

जो लोग कहते है कि आप अरबी कुरआन गैर-मुस्लमान को देगें और आपको सज़ा मिलेगीं तो मै कहता हुं की कोई हर्ज नही। अगर अल्लाह तआला मुझे ज़िम्मेदार ठहरायेगें अरबी कुरआन किसी गैर-मुस्लमान को देनें के लिये तो मैं हमारे आखिरी रसुल मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वस्ल्लम के साथ हुं क्यौंकी मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम की सिरत से हमें ये मालुम होता है की मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम ने गैर-मुस्लमान राजाओं को खत लिखवायें उन्होने सहाबा से कहा की खत लिखों और इन खतों मे कुरआन की आयत भी लिखवायीं। कई बादशाहों को लिखा यमन के बादशाह, मिस्र के बादशाह, बादशाह हरकुलिस। कई बादशाहॊं को लिखा सहाबाओं के ज़रियें की आप इस्लाम कुबुल कर करों और उन खतों के अन्दर कुरआन की आयत लिखवायी, कई बादशाहॊं ने इस्लाम कुबुल किया और कई बादशाहॊं ने खत को फ़ाडं दिया और पैर के नीचे मसला।
ऎसा एक खत मौजुद है कोप्टा के अजायबघर मे जिसके अन्दर अल्लाह के रसुल सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. ६४ लिखवातें हैं उस मे ज़िक्र है "कहों अहलेकिताब (ईसाई) से की आऒ उस बात की तरफ़ जो आप और हम मे समान है सबसे पहली बात है की अल्लाह सुब्नाह वतआला एक है, अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करें, हम आप और हम में से अल्लाह के अलावा किसी को रब ना बनायें, अगर वो फिर भी न मानें तो आप शहादत दो की हम मुस्लिम है"। इस कुरआन मजीद की आयत मे अल्लाह हमें एक तरीका बताते है की कैसे गैर-मुस्लमानॊं से बात करनी चाहियें और उन्हें इस्लाम की दावत देनी चाहियें।


मैं आप लोगों से एक सवाल पूछ्ता हू की आज की तारिख मे लगभग डेढ करोड अरब है जो कोपटिक क्रिसशन (ईसाई) है, एक करोड पचास लाख अरब हैं जो जन्म से ईसाई है। मैं आपसे पूछ्ना चाहता हू की एक अरब ईसाई को आप कौन सा तर्जुमा देंगे? अरबी तो उसकी मार्तभाषा है तो क्या आप कुरआन का फिर से अरबी में तर्जुमा करेंगे। आप उसको अरबी का कुरआन देंगे।


मारा फ़र्ज़ है की हम कुरआन को पढे, उसकों समझें, उस पर अमल करें और दुसरे लोगों तक कुरआन का पैगाम पहुचायें। अकसर कई मुस्लमान कहते है की कुरान मजीद को सिर्फ़ आलिम लोग ही समझ सकतें हैं, उन्हे ही पढना चाहिये, ये बहुत कठिन किताब है और इसको आलिम ही समझ सकते हैं। मैं आपको कुरआन मजीद की एक सुरह बताता हू जिसके अन्दर कम से कम चार बार दोहराते है, अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह कमर सु. ५४ : आ. १७, २२, ३२, ४०, में "हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया ताकि आप इसें समझ सकें, आप इसे याद रख सकें, हमनें ये कुरआन मजीद आपकें समझनें के लिये आसान बनाया, आप में से कौन शख्स इसकी बात नही मानेगा"। जब अल्लाह तआला ने कुरआन मे कई आयतों मे फ़र्माया की हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया तो आप किसकी बात मानेंगे अल्लाह की या उस मुस्लमान की जो कहतें हैं की सिर्फ़ उल्मा के लिये है। और अल्लाह तआला कई आयतों मे फ़र्मातें है सुरह बकरह सु. २ : आ. २४२ में "फ़िर आप नही समझोगें"। यानी अल्लाह तआला चाहतें है की आप कुरआन मजीद को समझ के पढॊं लेकिन अल्लाह तआला इसके साथ मे ये भी फ़र्माते है सुरह नहल सु. १६ : आ. ४३ और सुरह अम्बिया सु. २१ : आ. ७ में "अगर आप कुछ चीज़ को नही समझते है तो उनसे पूछिये जिसके पास इल्म है"। मान लिजिये कि आप कुरआन का तर्जुमा पढ रहे है और आपको कुछ आयतें समझ मे नही आती है तो कुरआन मजीद मे अल्लाह तआला ने बता दिया है की आप उनसे पूछिये जिनके पास इल्म है। अगर आप कुरआन मजीद की आयत पढते है जिसमें साइंस का ज़िक्र है तो आप किस से पूछेंगे? अपने पडोसी से जो हज्जाम है? नही आप साइंटिस्ट से पूछेंगे क्यौंकी साइंटिस्ट साइंस का आलिम है।

गर कुरआन मे बीमारी का ज़िक्र है तो किस से पूछेंगे? आप डाक्टर से पूछेंगे क्यौंकि डाक्टर दवाई के मैदान मे माहिर और आलिम है। अगर आप ये जानना चाहते है की कुरआन की ये आयत कब नाज़िल हूई तो आप उस से पूछेंगे जिसने दारुल उलुम मे सात - आठ साल पढाई की है तो कुरआन मे ये ज़िक्र आता है कि उनसे पूछिये जिनके पास इल्म हैं।

मैं आपको एक मिसाल देना चाहूगां कुछ बीस साल पहले कुछ अरब कुरआन मजीद मे जितनी भी आयतें है जो एम्रोलोजी के बारे मे ज़िक्र कर रही है। एम्रोलोजी का मतलब है मां के पेट के अंदर कैसे बच्चा बडा होता है उसकी पुरी जानकारी। तो कुरआन मे जितनी आयतों में ज़िक्र होता है की कैसे मां के पेट मे बच्चा बडा होता है उन सब आयतों का तर्जुमा लेकर वो जाते है प्रों. कीथ मूर के पास और उस वक्त प्रों. कीथ मूर सारी दुनिया के सबसे माहिर एम्रोलोजिस्ट थें, हैड आफ़ दा डिपार्ट्मेट आफ़ एनोटोमी, यूनिव्रसिटी आफ़ टोरंटो. कनाडा। वो ईसाई थे लेकिन अल्लाह तआला फ़र्माता है की उनसे पूछिये जो माहिर है चाहे वो मुस्लमान हो या गैर-मुस्लमान। तो ये अरब उन्हे कुरआन मजीद का तर्जुमा पेश करते है कि जिसके अन्दर ज़िक्र आता है कि कैसे मां के पेट के अंदर बच्चा बडा होता है। वो जब कई आयतों का तर्जुमा पढते है तो प्रो. कीथ मूर कहते है कि "अकसर जो आयतॊं मे ज़िक्र है वो आज की माडर्न एम्रोलोजी से मिलती जुलती है लेकिन चंद आयते है जिनके बारे मे ये नही कह सकता की ये सही है। मैं ये भी नही कहता हू की ये गलत है क्यौंकी मैं खुद नही जानता। उन आयतों मे दो आयतें ये थी जो सबसे पहले नाज़िल की गयी थी सुरह इकरा या सुरह अलक सु. ९६ : आ. १-२ जिसमें अल्लाह तआला फ़र्माते है "पढों अल्लाह के नाम से जिसने इन्सान को बनाया है खून के लोथडें से, लीच से, जोंक से"। प्रों. कीथ मूर ने कहा मैं नही जानता की बच्चा जब मां के पेट के अन्दर बडा होता है तो सबसे पहले लीच की तरह दिखता है, लीच का मतलब है जोंक जो खून चुसता है। तो प्रो. कीथ मूर अपनी लेबोरेट्री के अन्दर गये और एक बहुत पावरफ़ुल माइक्रोस्कोप के अन्दर देखा की जो मां के पेट के अन्दर बच्चा जब अपनी सबसे पहली स्टेज मे होता है एकदम पहली मंज़िल उसको माइक्रोस्कोप के अन्दर देखते है और उसे जोंक की तस्वीर से मिलाते है और हैरान हो जाते है की हुबहु दोनों बिल्कुल एक जैसे है।

जब उनसे एम्रोलोजी के बारे लगभग अस्सी सवाल पुछे गये तो उन्होने कहा की अगर आपने ये सवाल मुझसे तीस साल पहले पुछे होते यानी आज से पचास साल पहले तो मैं पचास प्रतिशत से ज़्यादा सवालॊं के जवाब नहीं दे सकता था क्यौंकी एम्रोलोजी साइंस का वो हिस्सा है जो अभी चंद सालॊ मे ही कुछ तरक्की किया है। प्रो. कीथ मूर को जो भी नयी चीज़ मिली कुरआन और हदीस से उन्होने अपनी नई किताब "Developing Human" की तीसरी एडीशन मे शामिल किया और उस किताब को उस वक्त का नंबर वन किताब का अवार्ड मिला सबसे बेहतरीन किताब जो एक डाक्टर ने लिखी है और इस किताब का अनुवाद कई ज़बानॊं मे किया जा चुका है।

इस किताब के ताल्लुक रखते कुछ लिन्क यहा मौजूद हैं......

http://www.geocities.com/aahem187/embryology.htm

http://www.islamic-awareness.org/Quran/Science/scientists.html

http://www.answering-islam.org/Responses/It-is-truth/chap03.htm

http://www.islamicvoice.com/january.97/scie.htm

http://www.thisistruth.org/truth.php?f=CreationOfMan

http://www.elsevier.com/wps/product/cws_home/712494


प्रो. कीथ मूर ने कहा "मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने में की कुरआन मजीद खुदा की किताब है और मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने मे की मुह्म्मद सल्लाहॊ अलैह वसल्लम खुदा के आखिरी पैगम्बर हैं"।

इस मिसाल से हमें ये मालुम होता है की जब भी आपको कुछ नही पता तो उससे पुछिये जो उस मैदान का माहिर है। जब भी आप कोई मशीन खरीदते है तो उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड आती है की किस तरह से मशीन को इस्तेमाल करना चाहिये। और आप अगर इज़ाज़त देंगे इन्सान को मशीन कहने के लिये तो ये हमें मानना पडेंगा की सबसे मुश्किल मशीन इन्सान है, सबसे पेचिदा मशीन इन्सान है। क्या इस मशीन के लिये कोई Instruction Manual युज़र गाइड की ज़रूरत नही? कोई किताब की ज़रुरत नही? इस मशीन की Instruction Manual युज़र गाइड है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन मजीद, इस कुरआन मजीद मे लिखा हुआ है की किस तरह इस मशीन की हिफ़ाज़त करनी चाहिये? किस तरह इस मशीन को चलाना चाहिये? इस मशीन के लिये क्या क्या फ़ायदे है.....हर मशीन के साथ एक किताब आती है और इस मशीन इन्सान की किताब है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन।

अगर आप कोई जापानी मशीन खरीदते है और उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड जापानी मे आपको मिलती है और जापानी आप समझतें नही हैं तो आप क्या करते हैं? आप दुकानदार से उस ज़बान की Instruction Manual युज़र गाइड मागंते है जो जिस ज़बान मे आपको महारत हासिल है ताकि आप समझ सकें की इस मशीन को कैसे इस्तेमाल करना है। तो अगर आप अरबी कुरआन मजीद को नही समझते है तो कम से कम इस कुरआन मजीद का तर्जुमा पढॊं और समझॊं और इस मशीन को सही तरह से इस्तेमाल करो।

मान लीजिये आप की कार खराब हो जाती है और कोई आप से कहता है की इसकी टंकी मे देसी घी डाल दो तो ये चलने लगेगी तो आप क्या करेंगे? उसकी बात मानेंगे नही क्यौंकी भले आप गाडीं सही करना नही जानते पर इतना जानते है की गाडी घी से नही चलती है। तो इसी तरह अगर हर मुस्लमान कुरआन को थोडा बहुत भी समझ कर पडें तो कोई भी आलिम, कोई भी मौलवी आपको बहका नही सकता, कोई भी आपकॊ गुमराह नही कर सकता है। आज के माहौल मे आप देखते है की मुस्लमान फ़िरकों मे बंटे हुए है एक आलिम ये कहता है, एक आलिम वो कहता है, अगर हम मुस्लमान कुरआन मजीद को समझ कर पढें तो कोई भी मौलाना आपको गुमराह नही कर सकता, कोई भी आलिम आपकॊ घुमा नही सकता।

ये आज मुस्लमानों की हालत जो है की सब जगह मुस्लमान पीटे जा रहे है क्यौंकी हम कुरआन मजीद समझ के नही पढते। अगर हम कुरआन मजीद समझ के पढें और इकट्ठा हो जाये तो इन्शाल्लाह हम मुस्लमानॊं के बीच कोई फ़िरका नही होगा। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. १०३ में "आप अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकडीये और आपस मे फ़िरके मत बनाइये"। अल्लाह की रस्सी क्या है कुरआन मजीद और मुह्म्मद सल्लाहो अलैह वसल्लम की सही हदीस अगर हम अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकड लेंगे और आपस मे फ़िरके नही बनायेंगे तो इन्शाल्लाह हम एक बार फिर से दुनिया की ऊचाई पर पहुचेंगें।

बाकी अगली कडीं मे...

अल्लाह आप सब कुरआन पढ कर और सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।

आमीन, सुम्मा आमीन
साभार :-  इस्लाम और कुरआन



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Saturday, March 6, 2010

दुनिया चाहे तसलीमा दीदी को वेश्या कहे लेकिन मैं उन्हें अपने घर में रखूंगा क्योंकि ... weeping crocodiles



दुनिया तसलीमा दीदी को लेडी रूश्दी कहती है उनका नाम उनके बराबर रखती है। उन्हें मक़बूल फ़िदा के समान समझती है । उन्हें अपनी यौनेच्छा का सम्मान करने के कारण वेश्या तक समझ लिया जाता है जबकि हक़ीक़त यह है कि उनका न तो इन दोनों मर्दों से कोई मुक़ाबला है और न ही उन्हें वेश्या कहा जा सकता है।

भाई उमर कैरानवी आपके दिए लिंक को देखा । http://janatantra.com/2010/02/28/taslima-on-husain-and-salman-rushdi/

तसलीमा नसरीन उन औरतों में से हैं जो ‘शोहरत पाने के लिए कपड़े तक उतार सकती हैं भले ही ये कपड़े किसी के भी हों ।

उनके द्वारा किसी के भी नंगे चित्र बनाने की बात कहा जाना खुद उनका इक़बालिया बयान है । ऐसे में उनके विचारों से कौन सहमत हो सकता है और कौन उनके विचारों का प्रसार कर सकता है ?

सिवाय उस आदमी के जो अपनी मां बहनों और आराध्यों को भी नंगा करके उनके सामने खड़ा करने के लिए तैयार हो ताकि तसलीमा जी अपने जी के अरमान पूरे कर सकें । ज़ाहिर है बंग्लादेश के लोग इस बेग़ैरती के लिए तैयार नहीं हुए और उन्हें निकाल बाहर किया । फिर उन्होंने अपनी बेग़ैरती के विषबीजों को बोने के लिए भारत को उपयुक्त समझा लेकिन उन्हें यहां से भी जाना पड़ा क्योंकि मेरे महान भारत के भी अक्सर लोगों की ग़ैरत और ज़मीर ज़िन्दा है । कुछ मुर्दा ज़मीरों ने उन्हें रोकने की भी कोशिश की लेकिन उनकी चल न सकी । वे लोग अब भी यदा कदा आवाज़ उठाते रहते हैं । इनमें बात को विचारे बिना गीदड़ों की तरह रोने वाले भी कुछ लोग ‘शामिल हो जाते हैं ।

ये वे लोग हैं जो मुसलमानों की फ़ज़ीहत का कोई भी मौक़ा गंवाना नहीं चाहते भले ही उनकी खुद की भी इज़्ज़त ( ? ) की अर्थी उठ जाए , जोकि मुर्दा तो पहले से ही है ।

तसलीमा जी सलमान रूश्दी के कमीनेपन की क़लई खोलकर उन सभी लोगों को नंगा करने में कामयाब हो गई हैं जो अतीत में अपनी कुंठाओं के चलते रूश्दी की हिमायत करते थे या अब भी करते हैं । यह अब साबित हो गया है कि स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति की छतरी का लाभ उठाने वाले रूश्दी को सबको इस अधिकार के न मिल पाने का कोई मलाल नहीं है । बल्कि उसने तो अपने स्टाफ़कर्मी की किताब को प्रकाशिज होने से रूकवाकर दूसरों से यह छीनने का ही काम किया है । प्रकाशक ने भी उनका सहयोग करके यह साबित कर दिया है कि उन्होंने भी अपना भगवान ‘ लक्ष्मी ‘ को ही बना रखा है । इसके बावजूद रूश्दी तसलीमा जी से फिर भी बेहतर है क्योंकि उनके अन्दर ग़लती करने के बाद क्षमा मांगने का भी गुण है । जबकि तसलीमा ग़लती करके उसपर अड़ने में उनसे कहीं आगे हैं ।

तसलीमा जी की आपत्ति ठीक है उनका नाम रूश्दी के साथ जोड़ना हरगिज़ इन्साफ़ नहीं है । तसलीमा जी को इस बात पर भी आपत्ति है कि सलमान रूश्दी को अपनी अमीरी के बल पर लड़कियां भोग कर छोड़ देने पर समर्थ पुरूष समझा जाता है । जबकि वे भी मर्दों की तरह कुछ कर दिखाना चाहती हैं तो उन्हें वेश्या कहा जाता है । इसमें तो समाज की मजबूरी साफ़ है । जिस काम को जिस ‘शब्द से जाना जाता है समाज वही शब्द तो इस्तेमाल करेगा । वह तसलीमा जी के लिए तो अपना ‘शब्दकोष बदलेगा नहीं।

लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें वेश्या कहना ठीक नहीं । वेश्याओं को इस पर आपत्ति हो सकती है। वेश्या इस दलदल में मजबूरीवश हैं । वे तो अनैतिक संबन्धों से कोई सच्चा सहारा मिलते ही तौबा कर लेती हैं । इसके लिए न तो वे कोई फ़लसफ़ा घड़ती हैं और न ही उनके दिल में किसी आम या ख़ास आदमी के नंगे चित्र बनाने की ख्वाहिश या हिम्मत है । अपने अपने धर्मजनों की इज़्ज़त भी वे सामान्य रीति से ही करती हैं । तसलीमा जी के विचार जानकर वे भी अपने पास बैठाना पसन्द न करेंगी ।तसलीमा जी का यह कहना भी ग़लत है कि रूश्दी के ऐब पर उसे कोई बुरा नहीं समझता । अगर उनकी उठ बैठ ज़िन्दा ज़मीरों में होती तो उन्हें पता चलता कि 153 करोड़ मुसलिमों के साथ हर वह आदमी उनके ऐब पर उन्हें बुरा ही कहता है जो किसी नैतिकता और धर्म नियम का पाबन्द है । मक़बूल फ़िदा को खदेड़ भगाने वाले भी तसलीमा की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाते देखे जा सकते हैं। यह उनकी सियार मनोवृत्ति का ही परिचायक है ।

अपने आराध्य ठहरा लिये गये देवी देवताओं के नग्न यौनांगों की मूर्तियां हर नगर के चैराहों पर स्थापित करने वाले कौन हैं? मक़बूल फ़िदा या फिर वे खुद ? आप अपने देवी देवताओं को जिस रीति से सम्मान देंगे दूसरा भी उसी का तो अनुकरण करेगा । पोस्टर कैलेंडर और सामान की पैकिंग पर उनके फ़ोटो छापने वाला कौन है ? सामान प्रयोग करके इन चित्रों को खुद इनके पुजारी इन्हें कहां फेंकते हैं । यह सभी जानते हैं। जबकि आप मुसलमानों को न तो अपने बुज़ुर्गों के नंगे चित्र बनाते पाएंगे और न ही उनके धार्मिक चिन्हों को कूड़े के ढेर पर पड़ा हुआ देख सकते ।

यही वजह है कि मक़बूल फ़िदा मुसलिम बुजुर्गों का सम्मान ठीक उसी तरह करते हैं जैसे कि मुसलिम करते हैं और वे हिन्दू देवी देवताओं के प्रति अपना अनुराग ठीक वैसे ही प्रदर्शित करते हैं जैसेकि उन्होंने खुद हिन्दुओं को करते देखा । यह एक स्वाभाविक आचरण है । जबकि लेखिका नसरीन उनकी तरह इस मर्यादा का पालन करने से भी इनकार कर रही हैं तो उनका नाम उनके साथ रखना उचित भी नहीं है । इस सबके बावजूद मक़बूल फ़िदा को हिन्दू देवी देवताओं के नग्न चित्र नहीं बनाने चाहिये थे क्योंकि इसलाम अनावश्यक चित्र बनाने व फितना फैलाने से रोकता है । उनके कृत्य की हम भतर्सना करते हैं । मज़हब के नाम पर उन्माद फैलाने वालों और क़ानून अपने हाथ में लेने वालों की भी हम निन्दा करते हैं । ये लोग धर्म के मर्म से कोरे लोग हैं । इसलाम का अर्थ है ‘ ‘शान्ति ‘। समाज की ‘शान्ति भंग करने वालों का ‘शुमार नादानों और ज़ालिमों में तो हो सकता है लेकिन उन्हें खुदा का प्यारा बन्दा नहीं माना जा सकता और न ही उनके कामों के लिए इसलाम को दोष दिया जा सकता है । इसलाम हर ‘शख्स को उसकी अच्छी या बुरी मान्यताओं के साथ जीने की गारंटी देता है । इसलाम के न मानने की वजह से उनका यह हक़ उनसे कोई नहीं छीन सकता । वो जैसी भी हों और चाहे हम उनसे सहमत न भी हों । तब भी हम चाहते हैं कि उन्हें जीने की आज़ादी और हिफ़ाज़त मिले । अगर सरकार इजाज़त दे तो मैं खुद उन्हें अपने घर में रखना चाहूंगा लेकिन एक बहन की तरह । ताकि वे कुछ दिन कुछ ज़िन्दा ज़मीर लोगों के साथ रहकर इसलाम को उसके कल्याणकारी रूप में पा सकें । इसलाम ही वह ‘शान्ति का स्रोत है जो उनकी प्यासी आत्मा को तृप्त और व्याकुल मन को ‘शांत कर सकता है । आमीन
हम सच्चे मालिक प्रभु परमेश्वर अल्लाह से उनके अपने और सभी पाठकों के लिए पूर्ण सन्मार्ग प्रेरणा और लोक परलोक में सफलता की दुआ करते हैं । वह मालिक हमें अपनी ‘शक्ति से एक और नेक बनाये। इसी के साथ हम तसलीमा जी से विनती करेंगे कि दूसरे लोग भी उनकी ही तरह इनसान हैं । उनकी ही तरह वे भी दिल और भावनाएं रखते हैं । अगर आप चाहती हैं कि कोई आपका दिल न दुखाए तो आप भी दूसरों के जज़्बात का ख़याल रखें । सामान्य शिष्टाचार के पालन मात्र से ही आपकी सारी समस्या का ख़ात्मा हो जाएगा । अगर धार्मिक कट्टरता बुरी है तो नास्तिक कट्टरता भी निन्दनीय है । बेशक आप समाज में परिवर्तन लाएं लेकिन परिवर्तन के नाम पर पतन तो न लाएं ।

’आप किसी का भी नंगा चित्र बना सकती हैं ‘ आपका ये दावा भी झूठा दावा है जिसे आप हरगिज़ पूरा नहीं कर सकतीं । चहे खुद आपको यक़ीन न आये लेकिन सच यही है ।वर्ना अगर आप अपने दावे में सच्ची हैं तो अपनी मां का नंगा चित्र बनाकर दिखायें । खूब बिकेगा । आपका दावा भी सच्चा हो जाएगा और आपकी आर्थिक तंगी भी दूर हो जाएगी । आपको इस हिम्मत के बदले में अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाज़ा जाएगा ।क्या अपने दावे को सच करने हिम्मत है आपमें ?बढ़िए आगे बढ़िए । अब आपके क़दम क्यों लड़खड़ा रहे हैं ?दूसरों के आदरणीय लोगों के साथ तो आप बेशक कुछ भी कर सकती हैं लेकिन अपनी मां के साथ ...?सोचकर ही आपके बदन के रोंगटे खड़े हो गए ?स्त्री ‘शरीर पिपासु आपको पहले से ही घेरे बैठे हैं ।

हम मुसलमानों से भी कहना चाहेंगे कि आज उनके अमल पूरी तरह उनकी धार्मिक किताब के मुताबिक़ नहीं हैं जिससे लोगों को इसलाम के समझने और मानने में भारी दिक्क़त हो रही है और इससे स्वार्थी तत्व लोगों को भारी मात्रा में आसान शिकार मिल रहे हैं । अपना इल्म बढ़ाएं और अपना आचरण सुधारें । लोगों के लिए ‘शान्ति और रहमत का ज़रिया बनें । खुद को साक्षात इसलाम बना लें । भ्रम की धुंध स्वतः समाप्त हो जाएगी । अन्यथा मुसलमान मानवता के मुजरिम ठहरेंगे और उस परम प्रधान का दण्ड उनपर लागू हो जाएगा । तबाही से खुद भी बचें और दूसरों को भी बचायें । संवाद बढ़ाएं और प्यास मिटाएं।


अब बताइये कि कौन हम से सहमत है और कौन दीदी तसलीमा

से ?

काश ! कोई हमारी सदाकांक्षा उन तक पहुंचा दे ।


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