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Friday, April 30, 2010

इस्लाम में मजदूर और मजदूरी की अहमियत


अन्तराष्ट्रीय कामगार दिवस (1 मई) पर विशेष 
मज़दूरों के बारे में कार्ल मार्क्स जैसे अनेक विचारकों ने खूबसूरत विचार दिये हैं। मज़दूर किसी भी देश या व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग होता है। अत: उनके वेलफेयर के बारे में सोचना व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इस्लाम जो कि दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्था है, मज़दूर को खास अहमियत देता है। 
जिस वक्त नबी व रसूल मोहम्मद(स-अ-) ने इस्लाम का पैगाम दिया उस वक्त अरब में मेहनत मज़दूरी का काम गुलामों से करवाया जाता था। गुलामी की प्रथा जोरों पर थी। दूर दराज के इलाकों से लोग पकड़ कर लाये जाते थे उन्हें खरीद कर जिंदगी भर के लिए गुलाम बना लिया जाता था। और फिर उन्हें हमेशा के लिये बस रोटी और कपड़े पर बेगार करनी पड़ती थी। गुलामो की हालत बहुत ही दयनीय होती थी उनपर तरंह तरंह के जुल्म होते थे और निहायत सख्त काम के बदले उन्हें भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता था। इस्लाम ने इन गुलामों की आजादी के लिये निहायत खूबसूरत तरीके से काम किया मुसलमानों को गुलाम को आजाद करने पर जन्नत की बशारत दी गयी। हज़रत बिलाल जो कि एक हब्शी गुलाम थे उन्हें खरीदकर आजाद किया गया और बाद में वे ईमान के ऊंचे दर्जे पर फायज़ हुए। 
कुरआन गुलामों से अच्छा सुलूक करने व उन्हें आजाद करने के लिये कई आयतों में हुक्म दे रहा है मिसाल के तौर पर
(कुरआन : 24-32) और अपनी बेशौहर औरतों और अपने नेकबख्त गुलामों व कनीजों का निकाह कर दिया करो। अगर ये लोग मोहताज होंगे तो अल्लाह अपने फजल व करम से उन्हें मालदार बना देगा और अल्लाह तो बड़ा गुंजाइश वाला व वाकिफकार है।
(कुरआन : 24-33) और तुम्हारे कनीजों व गुलामों में से जो मकातबत (किसी एग्रीमेन्ट के जरिये आजाद होना) होने की ख्वाहिश करें तो तुम उनमें कुछ सलाहियत देखो तो उनको मकातिब कर दो और अल्लाह के माल में से जो उसने तुम्हें अता किया है उनका भी दो। और तुम्हारी कनीजें जो पाकदामन ही रहना चाहती हैं उन्हें दुनियावी फायदे हासिल करने की गरज से हरामकारी पर मजबूर न करो। और जो शख्स उनको मजबूर करेगा तो इसमें शक नहीं कि अल्लाह उनकी मजबूरी के बाद बड़ा बख्शने वाला व मेहरबान है।
इन आयतों से यह साफ हो जाता है कि अल्लाह हर शख्स को आजाद देखना चाहता है। और चाहता है कि सबको अपनी जिंदगी गुजारने का हक मिले।
इस्लाम में मेहनत मजदूरी करके अपने व अपने परिवार का जायज़ तरीके से पेट पालने को निहायत अहमियत दी गयी है। अपनी रोजी को खुद हासिल करने पर जोर दिया गया है। 
(कुरआन : 53-39) और यह कि इंसान को वही मिलता है जिसकी वह कोशिश करता है।
नबी (स-अ-) ने फरमाया ‘अल्लाह उन्हें पसंद करता है जो काम करते हैं और अपने परिवार का पेट पालने के लिये कड़ी मेहनत करते हैं।’
नबी (स-अ-) ने फरमाया ‘सबसे अच्छा खाना वह होता है जो इंसान अपनी मेहनत मह्स्क्कत से कमाकर खाता है।’ (तिरमिजी) 
हज़रत अली (अ-स-) ने अपने बेटे इमाम हसन (अ-स-) से फरमाया, ‘रोजी कमाने में दौड़ धूप करो और दूसरों के खजांची न बनो।’ (नहजुल बलागाह) 
मज़दूरों से कैसा सुलूक करना चाहिए इसके लिये हज़रत अली (अ-स-) का मशहूर जुमला है, ‘मज़दूरों का पसीना सूखने से पहले उनकी मज़दूरी दे दो।’
इस्लामी खलीफा हज़रत अली (अ-स-) ने जब हज़रत मालिके अश्तर को मिस्र का गवर्नर बनाया तो उन्हें इस तरंह के आदेश दिये ‘लगान (टैक्स) के मामले में लगान अदा करने वालों का फायदा नजर में रखना क्योंकि बाज और बाजगुजारों (टैक्स और टैक्सपेयर्स) की बदौलत ही दूसरो के हालात दुरुस्त किये जा सकते हैं। सब इसी खिराज और खिराज देने वालों (टैक्स और टैक्सपेयर्स) के सहारे पर जीते हैं। और खिराज को जमा करने से ज्यादा जमीन की आबादी का ख्याल रखना क्योंकि खिराज भी जमीन की आबादी ही से हासिल हो सकता है और जो आबाद किये बिना खिराज (रिवार्ड) चाहता है वह मुल्क की बरबादी और बंदगाने खुदा की तबाही का सामान करता है। और उस की हुकूमत थोड़े दिनों से ज्यादा नहीं रह सकती। (नहजुल बलागाह, खत नं - 53)
मुसीबत में लगान की कमी या माफी, व्यापारियों और उद्योगपतियों का ख्याल व उनके साथ अच्छा बर्ताव, लेकिन जमाखोरों और मुनाफाखोरों के साथ सख्त कारवाई की बात इस खत में मौजूद है। यह लम्बा खत इस्लामी संविधान का पूरा नमूना पेश करता है। यू-एन- सेक्रेटरी कोफी अन्नान के सुझाव पर इस खत को यू-एन- के विश्व संविधान में सन्दर्भ के तौर पर शामिल किया गया है।
इस्लाम में शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरंह के कामों को अहमियत दी गयी है। कुरआन में शारीरिक श्रम के रूप में हज़रत नूह का कश्ती बनाना, हज़रत दाऊद का लोहार के रूप में काम करना, हजरत जुल्करनैन का लोहे की दीवार का निर्माण वगैरा शामिल हैं। इसी तरंह दिमागी काम करने में हज़रत लुक़मान की हिकमत, हज़रत यूसुफ का मिस्र के बादशाह के खज़ांची रूप में काम करना वगैरा शामिल हैं।
अल्लाह किसी काम को मेहनत व खूबसूरती के साथ पूरा करने को पसंद करता है, जिसका कुरआन की आयत इस तरह इशारा कर रही है।
(कुरआन : 34-11) (पैगम्बर हजरत दाऊद से मुखातिब करके) कि फराख और कुशादा जिरह बनाओ और कड़ियों को जोड़ने में अन्दाजे का ख्याल रखो और तुम सब के सब अच्छे काम करो। जो कुछ तुम करते हो मैं देख रहा हूं। 
इस्लाम में जुआ व सूद जैसे गलत तरीकों से पैसा कमाने को सख्ती से मना किया गया है। 
नबी (स-अ-) ने फरमाया कि छोटे से छोटा काम भी अगर जायज हो तो उसे करने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। नबी (स-अ-) खुद बकरिया चराते थे। अपने कपड़ों में खुद पेबंद लगाते थे और मजदूरी करते थे। (तिरमिज़ी) 
हजरत अली (अ-स-) यहूदी के बाग में मजदूरी करके अपने बच्चों का पेट पालते थे। यहाँ तक कि जब उन्होंने इस्लामी खलीफा का ओहदा संभाला तो बागों व खेतों में मजदूरी करने का उनका अमल जारी रहा। उन्होंने अपने दम पर अनेक रेगिस्तानी इलाकों को नख्लिस्तान में बदल दिया था।



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Thursday, April 1, 2010

परदा : क्या कुप्रथा है?

इधर कई ब्लाग्स पर परदे के विरोध में जोर शोर से प्रचार हो रहा है। बिना किसी मजबूत तर्क के इसे कुप्रथा साबित करने का प्रयास हो रहा है। और यह कहा जा रहा है कि आज के जमाने में इस तरंह की प्रथाओं का कोई औचित्य नहीं। तो क्या वाकई परदे की रस्म को मिटा देना चाहिए? 

पर्दे के विरोध में जो तर्क सबसे ज्यादा दिया जाता है वह यह कि परदा औरतों की गुलामी की प्रतीक है। तो जनाब मैंने पूरा इतिहास खँगाल डाला, कहीं नहीं मिला कि गुलामों को परदे में रखने का रिवाज रहा हो। हाँ यह जरूर मिला कि पुराने जमाने में गुलाम औरतें बाजार में बिकने के लिए सजा सँवार कर खड़ी की जाती थीं। लोग आँखें फाड़ फाड़कर उनकी खूबसूरती के दाम लगाते थे और दुकानदार उन औरतों को खरीददार को बेचकर अपने पैसे सीधे करता था। क्या आज के फैशन शो , मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड जैसे शो यही काम नहीं कर रहे हैं। तो फिर औरतों की गुलामी के प्रतीक इस तरह के शो हुए न कि परदा?

कुछ लोगों का ये भी कहना है कि बुर्के में दिखाई देना कम हो जाता है और औरतें एक्सीडेंट का शिकार हो जाती है। अगर ऐसा है तो पहले हेलमेट पर रोक लगनी चाहिए, क्योंकि हेलमेट के साथ भी यही कहानी है।

अगर इलाही कानून ने परदे का सिस्टम बनाया है तो निस्संदेह वह इंसान के फायदे के लिए ही होगा। रूहानी फायदे तो अपनी जगंह लेकिन आईए एक नज़र करते हैं इसके दुनियावी फायदों पर। 

किसी भी औरत के लिए जाहिरी तौर पर सबसे कीमती चीज़ उसका हुस्न होती है। और वह अपने हुस्न को बरकरार रखने के लिए तरह तरह की तरकीबें करती है। तरह तरह के केमिकल और हर्बल इस्तेमाल करती है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में कास्मेटिक्स का कारोबार सात बिलियन डालर सालाना है। लेकिन ये केमिकल वक्ती फायदा देकर उसके चेहरा का कुदरती भोलापन और नर्मी छीन लेते हैं। बालीवुड की हीरोईनों को अगर कोई सुबह उठकर देख ले तो उसे डराउनी ड्रामों  से उसे बिल्कुल डर नहीं लगेगा।

इन कास्मेटिक्स के दाम इतने ऊंचे होते हैं कि गरीब घर की लड़कियां उनका इस्तेमाल सोच भी नहीं सकतीं। लेकिन परदा औरतों की खूबसूरती का ऐसा प्रोटेक्टर है जो आसानी से हर जगह उपलब्ध है, सस्ता है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं। सूरज से आने वाली अल्ट्रावायलेट रेज़ स्किन की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं। ये स्किन की नमी सोख लेती हैं और उसे खुरदुरा बना देती हैं। स्किन में झुर्रियां पड़नी शुरू हो जाती हैं और इंसान वक्त से पहले बूढ़ा दिखाई देने लगता है। नर्म स्किन की ये रेज़ खास तौर से दुश्मन होती हैं। अगर चमड़ी गोरी है तो ये रेज़ उसके मेलानिन से रिएक्शन कर चमड़ी का रंग गहरा कर देती हैं। ये रेज़ स्किन कैंसर की भी वजह होती हैं। गोरी और नर्म चमड़ी में स्किन कैंसर होने की संभावना ज्यादा होती है.

लेकिन अगर इंसान का जिस्म अच्छी तरंह ढंका हुआ है तो वह इन खतरनाक रेज़ से काफी हद तक बचा रहता है। अरब जैसे इलाकों में जहाँ सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेरता है वहां लोग इसीलिए अपने जिस्म को पूरी तरंह ढंककर चलते हैं। मर्दों की सख्त स्किन तो कुछ हद तक इन किरणों को बर्दाश्त कर लेती है लेकिन औरतों की नर्म खाल तो इन्हें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती।

गर्मियों में हल्के रंग का परदा और जाड़ों में गहरे रंग का परदा जिस्म का सर्दी और गर्मी से बचाव भी करता है। साथ ही अगर नाक ढंकी हुई है तो हवा में मौजूद धूल, मिट्‌टी, धुवां और नुकसानदायक बैक्टीरिया इंसानी जिस्म से दूर रहते हैं और इंसान सेहतमन्द रहता है। साथ ही स्किन की नरमी भी बरकरार रहती है।

औरतों में सजने संवरने की ख्वाहिश मर्दों से ज्यादा होती है। और वे अपनी अपनी हैसियत के अनुसार श्रृंगार करती हैं। लेकिन सोसाइटी में अमीर लड़कियों का सजना गरीब लड़कियों के लिए दिलआज़ारी का सबब बन जाता है। परदे की प्रथा सबको एक रंग में रंग देती है और कोई दूसरे से ज्यादा अमीर नहीं दिखाई देता। परदा कमसूरत औरत की बदसूरती को भी छुपाता है और उसे हीन भावना का शिकार नहीं होने देता। 

आज के दौर में परदे के उठते चलन ने तलाक के केसेज बढ़ा दिये हैं क्योंकि पहले परदे की वजह से मर्द परायी औरतो को देखने से महरूम रहता था और उसे अपनी बीवी ही खूबसूरत मालूम होती थी। लेकिन अब शादी से पहले ही मर्दों के सामने से बहुत सी खूबसूरत लड़कियां गुजर चुकी होती हैं नतीजे में उसे अपनी बीवी पसंद नहीं आती।  

शायद शहर में रहने वाली लड़कियों ने इन सच्चाईयों को पहचान लिया है इसलिए वे बाइक या स्कूटी चलाती हुई अपने हाथों में पूरे दस्ताने पहने हुए और चेहरे को पूरी तरह ढंके हुए नज़र आती हैं। ये परदा नहीं तो और क्या है? अल्लाह ने औरत को फूल (Not Fool) की तरंह बनाया है। और इस फूल की हिफाजत के लिए उसने परदे का इंतिजाम किया है।

लेकिन आखिर में मेरा ये भी विचार है कि औरतों के परदे का मामला औरतों पर ही छोड़ देना चाहिए। और इस बारे में उनपर किसी तरह की जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। क्योंकि बहरहाल यह उन्हीं की भलाई के लिए है।



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Sunday, March 21, 2010

पानी को इस्तेमाल करो मगर इस्लामी तरीके से


विश्व जल दिवस (22 मार्च) पर विशेष 
पानी की अहमियत बच्चे बच्चे को मालूम है। तपती दोपहर में पसीने से तरबतर जब कोई शख्स घर पहुंचता है तो उसकी सबसे पहली ख्वाहिश होती है कि थोड़ा सा ठंडा पानी मिल जाये जो उसकी प्यास को फौरन बुझा दे। पानी अल्लाह की बेमिसाल रहमत है। पानी के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता। अभी तक साइंस कोई ऐसी जिंदगी दरियाफ्त नहीं कर पायी है जो पानी के बगैर हो। 
प्यास बुझाने के अलावा पानी में कुछ और भी ऐसी साइंसी खुसूसियात पायी जाती हैं जिससे साबित होता है कि अल्लाह ने इसे ज़मीन पर जिंदगी पैदा करने के लिए ही खल्क किया है। और इसकी तरफ कुरआन हकीम की 21 वीं सूरे अंबिया की 30 वीं आयत में इरशाद हुआ है, ‘‘क्या वह लोग जो मुनकिर हैं गौर नहीं करते कि ये सब आसमान व जमीन आपस में मिले हुए थे। फिर हम ने उन्हें जुदा किया और पानी के जरिये हर जिन्दा चीज़ पैदा की। क्या वह अब भी यकीन नहीं करते?’
पानी की एक अहम क्वालिटी इसका लिक्विड फार्म में होना है। लिक्विड होने की वजह से यह जानदारों के पूरे जिस्म में आसानी से फैल जाता है और जिस्म के लिए जरूरी चीज़ों को अंदर फैला देता है। जानदारों के लिए जरूरी ज्यादातर चीज़ें पानी में आसानी से घुल जाती हैं। जैसे कि नमक, ग्लूकोज और चीनी। पानी महीन से महीन चीज़ों के भीतर पहुंच सकता है। इसीलिए वह हाथी से लेकर निहायत बारीक बैक्टीरिया तक तमाम जानदारों के जिस्म में जरूरियात पहुंचाने का जरिया है।
पानी में एक ऐसी क्वालिटी होती है जो और किसी लिक्विड में नहीं होती। कोई भी लिक्विड ठंड बढ़ने पर सिकुड़ता है। लेकिन पानी चार डिग्री सेण्डीग्रेड टेम्प्रेचर होने तक सिकुड़ता है, उससे कम टेम्प्रेचर पर फिर फैलने लगता है। इसलिए जाड़ों में ठन्डे मुल्कों में तालाब का पानी जब बर्फ में बदलता है तो वह हलका होकर पूरे तालाब को ढंक लेता है और नीचे फ्रेश वाटर में मछलियां आराम से तैरती रहती हैं। बर्फ में गर्मी रोकने की भी खासियत होती है। जो पानी को हद से ज्यादा ठण्डा होने से रोक देती हैं। और इसमें रहने वाले जानदार एक आरामदेय माहौल में अपना गुज़र बसर करते रहते हैं।
पानी हाईड्रोजन और आक्सीजन के बीच जोड़ से बनता है। केमिस्ट्री के नजरिये से यह जोड़ सबसे मजबूत बांड होता है। बांड मजबूत होने की वजह से उसका ब्वायलिंग प्वाइंट बढ़ जाता है। उसका माल्क्यूल ज्य़ादातर केमिकल रिएक्शन में ब्रेक नहीं होता और वह पानी की ही हालत में चीज़ों का हिस्सा बन जाता है। इंसानी जिस्म का लगभग साठ-सत्तर फीसद हिस्सा पानी होता है। ज़मीन का इकहत्तर फीसद हिस्सा पानी है। कुछ पौधों में नब्बे फीसद तक पानी होता है।
पानी अगर लाखों साल तक भी किसी बरतन में रख दिया जाये तो भी उसकी बनावट पर कोई असर नहीं होता। जो कुछ भी उसकी जाहिरी हालत में तब्दीली आती है वह दरअसल उसमें दूसरे मैटीरियल के मिक्स होने से आती है। और अगर उस मैटीरियल को अलग कर दिया जाये तो पानी वापस अपनी असली हालत में आ जाता है।
पानी को वापस अपनी असली हालत में लाने के लिए अल्लाह ने इंतिजाम भी कर रखा है। इंसान और दूसरे जानदार जब पानी का इस्तेमाल करते हैं तो वह गंदी चीज़ों के मिक्स हो जाने से पीने लायक नहीं रहता। यह पानी नदियों के जरिये समुन्द्र में जाता है। सूरज की गर्मी समुन्द्र के इस गंदगी मिले पानी को भाप में बदल कर बादलों की शक्ल दे देती है। इस दौरान पानी की गंदगी समुन्द्र में ही छूट जाती है और बारिश के जरिये साफ पानी वापस ज़मीन पर आ जाता है।
पानी अल्लाह की बेमिसाल रहमत है। ‘रहमान’ अल्लाह के उन नामों में से है जिसको खुद अल्लाह ने पसंद फरमाया है। हालांकि अल्लाह की रहमतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते। अगर सिर्फ पानी की क्वालिटीज़ को ही देखा जाये तो उसमें खालिके कायनात की रहमतों के बेशुमार पहलू निकलकर सामने आ जाते हैं।
कुरआन ने पानी की अहमियत बार बार बतायी है।
तो क्या तुमने पानी पर भी नज़र डाली जिसे तुम पीते हो?’’ (56-68)
‘‘और अल्लाह ही ने जमीन पर चलने वाले तमाम जानवरों को पानी से पैदा किया।-----’’ (24-45)
‘‘और उसी की निशानियों में से एक ये भी है कि वह तुमको डराने व उम्मीद लाने के वास्ते बिजली दिखाता है और आसमान से पानी बरसाता है और उसके जरिये से मुर्दा ज़मीन को आबाद करता है।---’’ (30-24)
कुरआन में जब भी जन्नत का जिक्र आया है तो पानी और नहरों का जिक्र जरूर आया है।
‘उन दोनों बागों में दो चश्मे (तालाब या झीलें) जोश मारते होंगे।’’ (55-66)
लेकिन अफसोस आज के दौर में हम अल्लाह की इस बेमिसाल रहमत को बरबाद कर रहे हैं। नदियों को गंदा कर रहे हैं। एक तरफ पाश कालोनियों में रोजाना पानी से सड़के धुली जाती हैं तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी हिस्से हैं जहां लोग बूंद बूंद को तरसते हैं। जबकि रसूल (स-अ-) ने फरमाया है कि अगर तुम्हारे पास सिर्फ वुजू करने के लिए पानी है और तुम सामने एक कुत्ते को प्यासा देखते हो तो वह पानी उसे पिला दो।
अगर नहाने के लिए हमारा एक बाल्टी पानी से काम चल सकता है तो वहां चार बाल्टी खर्च कर देते हैं। जबकि रसूल (स-अ-) की एक और हदीस है कि अगर तुम नदी के किनारे बैठे हो और तुम्हें प्यास लगी है तो नदी से सिर्फ इतना पानी लो कि तुम्हारी प्यास बुझ जाये।
किसी व्यक्ति को पानी जरूरत से ज्यादा इकट्‌ठा करने और दूसरों को उससे वंचित करने से सख्ती से मना किया गया है। एक हदीस कहती है, ‘‘अल्लाह कयामत के दिन उन लोगों से सख्ती से पेश आयेगा जो पानी को सड़कों पर बहा देते हैं और मुसाफिरों (जरूरतमन्दों) को तरसाते हैं।’’ (बुखारी 3-838)
पानी पीने से जानवरों को भी रोकना इस्लाम में सख्ती से मना है, हदीस के अनुसार ‘‘अगर कोई व्यक्ति रेगिस्तान में कुआँ खोदता है तो उसे इसका अधिकार हरगिज नहीं कि वह उस कुएं से किसी जानवर को पानी पीने से रोक दे।’’ (बुखारी -5550)
रसूल (स-अ-) ने नदियों या साफ पानी के ज़खीरों में गंदगी बहाने से सख्ती से मना किया है। (मुस्लिम-553)
रसूल (स-अ-) ने पानी को बेचने के लिए भी सख्ती से मना किया है। (मुस्लिम - 3798)
गर्ज ये कि इस तरंह की बेशुमार कुरानी आयतें व रसूल की हदीसें इस्लाम में मौजूद हैं जो न सिर्फ हमें पानी की अहमियत बताती हैं बल्कि उसका सही इस्तेमाल कैसे किया जाये इसके तरीके भी बताती हैं। अगर इन पर सही तरंह से अमल किया जाये तो पानी के लिए न तो किसी को तरसना पड़ेगा और न ही जल संरक्षण दिवस मनाने की ज़रूरत होगी। 
वरना फिर यही पानी अज़ाब बनकर दुनिया को खत्म भी कर सकता है। जैसा कि तूफाने नूह में हुआ था.

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Wednesday, March 10, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग - 3 Understand Quran While Reading Part - 3

स लेख के पहले दो भाग आपने पढें होगें। अगर नही पढें है तो यहां पढ सकते है.....भाग-१, भाग-२

जो लोग कहते है कि आप अरबी कुरआन गैर-मुस्लमान को देगें और आपको सज़ा मिलेगीं तो मै कहता हुं की कोई हर्ज नही। अगर अल्लाह तआला मुझे ज़िम्मेदार ठहरायेगें अरबी कुरआन किसी गैर-मुस्लमान को देनें के लिये तो मैं हमारे आखिरी रसुल मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वस्ल्लम के साथ हुं क्यौंकी मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम की सिरत से हमें ये मालुम होता है की मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम ने गैर-मुस्लमान राजाओं को खत लिखवायें उन्होने सहाबा से कहा की खत लिखों और इन खतों मे कुरआन की आयत भी लिखवायीं। कई बादशाहों को लिखा यमन के बादशाह, मिस्र के बादशाह, बादशाह हरकुलिस। कई बादशाहॊं को लिखा सहाबाओं के ज़रियें की आप इस्लाम कुबुल कर करों और उन खतों के अन्दर कुरआन की आयत लिखवायी, कई बादशाहॊं ने इस्लाम कुबुल किया और कई बादशाहॊं ने खत को फ़ाडं दिया और पैर के नीचे मसला।
ऎसा एक खत मौजुद है कोप्टा के अजायबघर मे जिसके अन्दर अल्लाह के रसुल सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. ६४ लिखवातें हैं उस मे ज़िक्र है "कहों अहलेकिताब (ईसाई) से की आऒ उस बात की तरफ़ जो आप और हम मे समान है सबसे पहली बात है की अल्लाह सुब्नाह वतआला एक है, अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करें, हम आप और हम में से अल्लाह के अलावा किसी को रब ना बनायें, अगर वो फिर भी न मानें तो आप शहादत दो की हम मुस्लिम है"। इस कुरआन मजीद की आयत मे अल्लाह हमें एक तरीका बताते है की कैसे गैर-मुस्लमानॊं से बात करनी चाहियें और उन्हें इस्लाम की दावत देनी चाहियें।


मैं आप लोगों से एक सवाल पूछ्ता हू की आज की तारिख मे लगभग डेढ करोड अरब है जो कोपटिक क्रिसशन (ईसाई) है, एक करोड पचास लाख अरब हैं जो जन्म से ईसाई है। मैं आपसे पूछ्ना चाहता हू की एक अरब ईसाई को आप कौन सा तर्जुमा देंगे? अरबी तो उसकी मार्तभाषा है तो क्या आप कुरआन का फिर से अरबी में तर्जुमा करेंगे। आप उसको अरबी का कुरआन देंगे।


मारा फ़र्ज़ है की हम कुरआन को पढे, उसकों समझें, उस पर अमल करें और दुसरे लोगों तक कुरआन का पैगाम पहुचायें। अकसर कई मुस्लमान कहते है की कुरान मजीद को सिर्फ़ आलिम लोग ही समझ सकतें हैं, उन्हे ही पढना चाहिये, ये बहुत कठिन किताब है और इसको आलिम ही समझ सकते हैं। मैं आपको कुरआन मजीद की एक सुरह बताता हू जिसके अन्दर कम से कम चार बार दोहराते है, अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह कमर सु. ५४ : आ. १७, २२, ३२, ४०, में "हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया ताकि आप इसें समझ सकें, आप इसे याद रख सकें, हमनें ये कुरआन मजीद आपकें समझनें के लिये आसान बनाया, आप में से कौन शख्स इसकी बात नही मानेगा"। जब अल्लाह तआला ने कुरआन मे कई आयतों मे फ़र्माया की हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया तो आप किसकी बात मानेंगे अल्लाह की या उस मुस्लमान की जो कहतें हैं की सिर्फ़ उल्मा के लिये है। और अल्लाह तआला कई आयतों मे फ़र्मातें है सुरह बकरह सु. २ : आ. २४२ में "फ़िर आप नही समझोगें"। यानी अल्लाह तआला चाहतें है की आप कुरआन मजीद को समझ के पढॊं लेकिन अल्लाह तआला इसके साथ मे ये भी फ़र्माते है सुरह नहल सु. १६ : आ. ४३ और सुरह अम्बिया सु. २१ : आ. ७ में "अगर आप कुछ चीज़ को नही समझते है तो उनसे पूछिये जिसके पास इल्म है"। मान लिजिये कि आप कुरआन का तर्जुमा पढ रहे है और आपको कुछ आयतें समझ मे नही आती है तो कुरआन मजीद मे अल्लाह तआला ने बता दिया है की आप उनसे पूछिये जिनके पास इल्म है। अगर आप कुरआन मजीद की आयत पढते है जिसमें साइंस का ज़िक्र है तो आप किस से पूछेंगे? अपने पडोसी से जो हज्जाम है? नही आप साइंटिस्ट से पूछेंगे क्यौंकी साइंटिस्ट साइंस का आलिम है।

गर कुरआन मे बीमारी का ज़िक्र है तो किस से पूछेंगे? आप डाक्टर से पूछेंगे क्यौंकि डाक्टर दवाई के मैदान मे माहिर और आलिम है। अगर आप ये जानना चाहते है की कुरआन की ये आयत कब नाज़िल हूई तो आप उस से पूछेंगे जिसने दारुल उलुम मे सात - आठ साल पढाई की है तो कुरआन मे ये ज़िक्र आता है कि उनसे पूछिये जिनके पास इल्म हैं।

मैं आपको एक मिसाल देना चाहूगां कुछ बीस साल पहले कुछ अरब कुरआन मजीद मे जितनी भी आयतें है जो एम्रोलोजी के बारे मे ज़िक्र कर रही है। एम्रोलोजी का मतलब है मां के पेट के अंदर कैसे बच्चा बडा होता है उसकी पुरी जानकारी। तो कुरआन मे जितनी आयतों में ज़िक्र होता है की कैसे मां के पेट मे बच्चा बडा होता है उन सब आयतों का तर्जुमा लेकर वो जाते है प्रों. कीथ मूर के पास और उस वक्त प्रों. कीथ मूर सारी दुनिया के सबसे माहिर एम्रोलोजिस्ट थें, हैड आफ़ दा डिपार्ट्मेट आफ़ एनोटोमी, यूनिव्रसिटी आफ़ टोरंटो. कनाडा। वो ईसाई थे लेकिन अल्लाह तआला फ़र्माता है की उनसे पूछिये जो माहिर है चाहे वो मुस्लमान हो या गैर-मुस्लमान। तो ये अरब उन्हे कुरआन मजीद का तर्जुमा पेश करते है कि जिसके अन्दर ज़िक्र आता है कि कैसे मां के पेट के अंदर बच्चा बडा होता है। वो जब कई आयतों का तर्जुमा पढते है तो प्रो. कीथ मूर कहते है कि "अकसर जो आयतॊं मे ज़िक्र है वो आज की माडर्न एम्रोलोजी से मिलती जुलती है लेकिन चंद आयते है जिनके बारे मे ये नही कह सकता की ये सही है। मैं ये भी नही कहता हू की ये गलत है क्यौंकी मैं खुद नही जानता। उन आयतों मे दो आयतें ये थी जो सबसे पहले नाज़िल की गयी थी सुरह इकरा या सुरह अलक सु. ९६ : आ. १-२ जिसमें अल्लाह तआला फ़र्माते है "पढों अल्लाह के नाम से जिसने इन्सान को बनाया है खून के लोथडें से, लीच से, जोंक से"। प्रों. कीथ मूर ने कहा मैं नही जानता की बच्चा जब मां के पेट के अन्दर बडा होता है तो सबसे पहले लीच की तरह दिखता है, लीच का मतलब है जोंक जो खून चुसता है। तो प्रो. कीथ मूर अपनी लेबोरेट्री के अन्दर गये और एक बहुत पावरफ़ुल माइक्रोस्कोप के अन्दर देखा की जो मां के पेट के अन्दर बच्चा जब अपनी सबसे पहली स्टेज मे होता है एकदम पहली मंज़िल उसको माइक्रोस्कोप के अन्दर देखते है और उसे जोंक की तस्वीर से मिलाते है और हैरान हो जाते है की हुबहु दोनों बिल्कुल एक जैसे है।

जब उनसे एम्रोलोजी के बारे लगभग अस्सी सवाल पुछे गये तो उन्होने कहा की अगर आपने ये सवाल मुझसे तीस साल पहले पुछे होते यानी आज से पचास साल पहले तो मैं पचास प्रतिशत से ज़्यादा सवालॊं के जवाब नहीं दे सकता था क्यौंकी एम्रोलोजी साइंस का वो हिस्सा है जो अभी चंद सालॊ मे ही कुछ तरक्की किया है। प्रो. कीथ मूर को जो भी नयी चीज़ मिली कुरआन और हदीस से उन्होने अपनी नई किताब "Developing Human" की तीसरी एडीशन मे शामिल किया और उस किताब को उस वक्त का नंबर वन किताब का अवार्ड मिला सबसे बेहतरीन किताब जो एक डाक्टर ने लिखी है और इस किताब का अनुवाद कई ज़बानॊं मे किया जा चुका है।

इस किताब के ताल्लुक रखते कुछ लिन्क यहा मौजूद हैं......

http://www.geocities.com/aahem187/embryology.htm

http://www.islamic-awareness.org/Quran/Science/scientists.html

http://www.answering-islam.org/Responses/It-is-truth/chap03.htm

http://www.islamicvoice.com/january.97/scie.htm

http://www.thisistruth.org/truth.php?f=CreationOfMan

http://www.elsevier.com/wps/product/cws_home/712494


प्रो. कीथ मूर ने कहा "मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने में की कुरआन मजीद खुदा की किताब है और मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने मे की मुह्म्मद सल्लाहॊ अलैह वसल्लम खुदा के आखिरी पैगम्बर हैं"।

इस मिसाल से हमें ये मालुम होता है की जब भी आपको कुछ नही पता तो उससे पुछिये जो उस मैदान का माहिर है। जब भी आप कोई मशीन खरीदते है तो उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड आती है की किस तरह से मशीन को इस्तेमाल करना चाहिये। और आप अगर इज़ाज़त देंगे इन्सान को मशीन कहने के लिये तो ये हमें मानना पडेंगा की सबसे मुश्किल मशीन इन्सान है, सबसे पेचिदा मशीन इन्सान है। क्या इस मशीन के लिये कोई Instruction Manual युज़र गाइड की ज़रूरत नही? कोई किताब की ज़रुरत नही? इस मशीन की Instruction Manual युज़र गाइड है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन मजीद, इस कुरआन मजीद मे लिखा हुआ है की किस तरह इस मशीन की हिफ़ाज़त करनी चाहिये? किस तरह इस मशीन को चलाना चाहिये? इस मशीन के लिये क्या क्या फ़ायदे है.....हर मशीन के साथ एक किताब आती है और इस मशीन इन्सान की किताब है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन।

अगर आप कोई जापानी मशीन खरीदते है और उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड जापानी मे आपको मिलती है और जापानी आप समझतें नही हैं तो आप क्या करते हैं? आप दुकानदार से उस ज़बान की Instruction Manual युज़र गाइड मागंते है जो जिस ज़बान मे आपको महारत हासिल है ताकि आप समझ सकें की इस मशीन को कैसे इस्तेमाल करना है। तो अगर आप अरबी कुरआन मजीद को नही समझते है तो कम से कम इस कुरआन मजीद का तर्जुमा पढॊं और समझॊं और इस मशीन को सही तरह से इस्तेमाल करो।

मान लीजिये आप की कार खराब हो जाती है और कोई आप से कहता है की इसकी टंकी मे देसी घी डाल दो तो ये चलने लगेगी तो आप क्या करेंगे? उसकी बात मानेंगे नही क्यौंकी भले आप गाडीं सही करना नही जानते पर इतना जानते है की गाडी घी से नही चलती है। तो इसी तरह अगर हर मुस्लमान कुरआन को थोडा बहुत भी समझ कर पडें तो कोई भी आलिम, कोई भी मौलवी आपको बहका नही सकता, कोई भी आपकॊ गुमराह नही कर सकता है। आज के माहौल मे आप देखते है की मुस्लमान फ़िरकों मे बंटे हुए है एक आलिम ये कहता है, एक आलिम वो कहता है, अगर हम मुस्लमान कुरआन मजीद को समझ कर पढें तो कोई भी मौलाना आपको गुमराह नही कर सकता, कोई भी आलिम आपकॊ घुमा नही सकता।

ये आज मुस्लमानों की हालत जो है की सब जगह मुस्लमान पीटे जा रहे है क्यौंकी हम कुरआन मजीद समझ के नही पढते। अगर हम कुरआन मजीद समझ के पढें और इकट्ठा हो जाये तो इन्शाल्लाह हम मुस्लमानॊं के बीच कोई फ़िरका नही होगा। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. १०३ में "आप अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकडीये और आपस मे फ़िरके मत बनाइये"। अल्लाह की रस्सी क्या है कुरआन मजीद और मुह्म्मद सल्लाहो अलैह वसल्लम की सही हदीस अगर हम अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकड लेंगे और आपस मे फ़िरके नही बनायेंगे तो इन्शाल्लाह हम एक बार फिर से दुनिया की ऊचाई पर पहुचेंगें।

बाकी अगली कडीं मे...

अल्लाह आप सब कुरआन पढ कर और सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।

आमीन, सुम्मा आमीन
साभार :-  इस्लाम और कुरआन



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