Tuesday, March 16, 2010

कौन दे रहा है इसलामी मदरसे में वेदों की शिक्षा ? vedas in islamic medressas .

जगह का नाम है स्याना ज़िला बुलन्दशहर । यहां गांव जलालपुर में वर्ष 1985 में समाजसेवी असरार ख़ां ने इस मदरसे की नींव रखी थी । यहां अरबी फ़ारसी के साथ संस्कृत अंग्रेज़ी और कम्प्यूटर की तालीम का भी इन्तेज़ाम है ।
बच्चों को पवित्र कुरआन याद है तो वे गायत्री मन्त्र भी पूरी तन्मयता से गाते हैं । मदरसे में 600 से भी ज़्यादा छात्र हैं । संस्कृत सभी के लिए अनिवार्य है । श्री सुरेन्द्रपाल सिंह संस्कृत की शिक्षा देते हैं । मदरसे के 26 लोगों के स्टाफ़ में 6 टीचर हिन्दू हैं ।150 लड़कियों को पढ़ाने के लिए 10 अध्यापिकाएं भी हैं ।
मदरसे के प्रबन्धक मुहम्मद अब्बास ख़ां हैं । फ़िलहाल यहां आई टी आई की मान्यता लेने का प्रयास चल रहा है ।
प्रस्तुत रिपोर्टिंग का सार तो यह है और आसार यह है कि अब निकट भविष्य में तर्क और ज्ञान का प्रभाव बढ़ता जाएगा । नफ़रत और दूरियों का ख़ात्मा होगा । समाज में एकता और भाईचारा बढ़ेगा । लोगों को भड़काकर राजनीति करने वाले हरेक समुदाय में दुत्कार दिये जाएंगे । निकट भविष्य में भारत सशक्त होगा और विश्व का नेतृत्व करेगा ।
यह रिपोर्ट इसी आशा को बल देती है ।
आपको क्या लगता है ?



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Sunday, March 14, 2010

प्रियदर्शन बने अब्दुल्लाह


प्रसिद्ध भारतीय मनोचिकित्सक ने इस्लाम अपनाया

यह खबर
गुरुवार की है.गवाह बना है अर रियाद का दावत केंद्र.

डा. प्रियदर्शन यानी अब्दुल्ला ने शुक्रवार को अरब न्यूज से कहा कि इस्लाम दुनिया का एकमात्र
धर्महैजिसके पास सीधे अल्लाह के यहाँ से अवतरित किताब कुर'आन है.

उन्होंने कहा कि तुलनात्मक धर्मों के एक छात्र के रूप में उनका का मानना है कि अन्य धर्मों की पुस्तकों परमेश्वर की ओर से मानव जाति के लिए सीधे नहीं अवतरित हुयी हैं .उन्होंने कहा कि पवित्र कुरान उसी प्रारूप और शैली
में भी है, जिस प्रकार यह पैगंबर मुहम्मद (सल लल लाहो अलैहे वसल्लम ) को नाज़िल हुई थी .

डॉ. अब्दुल्ला लॉस एंजिल्स में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर हैं.

उन्होंने एक प्रसिद्ध तमिल फिल्म
Karuthamma में अभिनय भी किया है. यह फिल्म भारत के कुछ दूरदराज के गांवों में नवजात शिशु [ लड़कियों] की हत्याओं पर केन्द्रित है.. फिल्म को उसके प्रोडक्शन के लिए भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था .

Wednesday, March 10, 2010

क्या कुरआन को समझ कर पढना ज़रुरी है? भाग - 3 Understand Quran While Reading Part - 3

स लेख के पहले दो भाग आपने पढें होगें। अगर नही पढें है तो यहां पढ सकते है.....भाग-१, भाग-२

जो लोग कहते है कि आप अरबी कुरआन गैर-मुस्लमान को देगें और आपको सज़ा मिलेगीं तो मै कहता हुं की कोई हर्ज नही। अगर अल्लाह तआला मुझे ज़िम्मेदार ठहरायेगें अरबी कुरआन किसी गैर-मुस्लमान को देनें के लिये तो मैं हमारे आखिरी रसुल मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वस्ल्लम के साथ हुं क्यौंकी मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम की सिरत से हमें ये मालुम होता है की मुह्म्मद सल्लाहॊं अलैह वसल्लम ने गैर-मुस्लमान राजाओं को खत लिखवायें उन्होने सहाबा से कहा की खत लिखों और इन खतों मे कुरआन की आयत भी लिखवायीं। कई बादशाहों को लिखा यमन के बादशाह, मिस्र के बादशाह, बादशाह हरकुलिस। कई बादशाहॊं को लिखा सहाबाओं के ज़रियें की आप इस्लाम कुबुल कर करों और उन खतों के अन्दर कुरआन की आयत लिखवायी, कई बादशाहॊं ने इस्लाम कुबुल किया और कई बादशाहॊं ने खत को फ़ाडं दिया और पैर के नीचे मसला।
ऎसा एक खत मौजुद है कोप्टा के अजायबघर मे जिसके अन्दर अल्लाह के रसुल सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. ६४ लिखवातें हैं उस मे ज़िक्र है "कहों अहलेकिताब (ईसाई) से की आऒ उस बात की तरफ़ जो आप और हम मे समान है सबसे पहली बात है की अल्लाह सुब्नाह वतआला एक है, अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करें, हम आप और हम में से अल्लाह के अलावा किसी को रब ना बनायें, अगर वो फिर भी न मानें तो आप शहादत दो की हम मुस्लिम है"। इस कुरआन मजीद की आयत मे अल्लाह हमें एक तरीका बताते है की कैसे गैर-मुस्लमानॊं से बात करनी चाहियें और उन्हें इस्लाम की दावत देनी चाहियें।


मैं आप लोगों से एक सवाल पूछ्ता हू की आज की तारिख मे लगभग डेढ करोड अरब है जो कोपटिक क्रिसशन (ईसाई) है, एक करोड पचास लाख अरब हैं जो जन्म से ईसाई है। मैं आपसे पूछ्ना चाहता हू की एक अरब ईसाई को आप कौन सा तर्जुमा देंगे? अरबी तो उसकी मार्तभाषा है तो क्या आप कुरआन का फिर से अरबी में तर्जुमा करेंगे। आप उसको अरबी का कुरआन देंगे।


मारा फ़र्ज़ है की हम कुरआन को पढे, उसकों समझें, उस पर अमल करें और दुसरे लोगों तक कुरआन का पैगाम पहुचायें। अकसर कई मुस्लमान कहते है की कुरान मजीद को सिर्फ़ आलिम लोग ही समझ सकतें हैं, उन्हे ही पढना चाहिये, ये बहुत कठिन किताब है और इसको आलिम ही समझ सकते हैं। मैं आपको कुरआन मजीद की एक सुरह बताता हू जिसके अन्दर कम से कम चार बार दोहराते है, अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह कमर सु. ५४ : आ. १७, २२, ३२, ४०, में "हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया ताकि आप इसें समझ सकें, आप इसे याद रख सकें, हमनें ये कुरआन मजीद आपकें समझनें के लिये आसान बनाया, आप में से कौन शख्स इसकी बात नही मानेगा"। जब अल्लाह तआला ने कुरआन मे कई आयतों मे फ़र्माया की हमनें कुरआन आपके लिये आसान बनाया तो आप किसकी बात मानेंगे अल्लाह की या उस मुस्लमान की जो कहतें हैं की सिर्फ़ उल्मा के लिये है। और अल्लाह तआला कई आयतों मे फ़र्मातें है सुरह बकरह सु. २ : आ. २४२ में "फ़िर आप नही समझोगें"। यानी अल्लाह तआला चाहतें है की आप कुरआन मजीद को समझ के पढॊं लेकिन अल्लाह तआला इसके साथ मे ये भी फ़र्माते है सुरह नहल सु. १६ : आ. ४३ और सुरह अम्बिया सु. २१ : आ. ७ में "अगर आप कुछ चीज़ को नही समझते है तो उनसे पूछिये जिसके पास इल्म है"। मान लिजिये कि आप कुरआन का तर्जुमा पढ रहे है और आपको कुछ आयतें समझ मे नही आती है तो कुरआन मजीद मे अल्लाह तआला ने बता दिया है की आप उनसे पूछिये जिनके पास इल्म है। अगर आप कुरआन मजीद की आयत पढते है जिसमें साइंस का ज़िक्र है तो आप किस से पूछेंगे? अपने पडोसी से जो हज्जाम है? नही आप साइंटिस्ट से पूछेंगे क्यौंकी साइंटिस्ट साइंस का आलिम है।

गर कुरआन मे बीमारी का ज़िक्र है तो किस से पूछेंगे? आप डाक्टर से पूछेंगे क्यौंकि डाक्टर दवाई के मैदान मे माहिर और आलिम है। अगर आप ये जानना चाहते है की कुरआन की ये आयत कब नाज़िल हूई तो आप उस से पूछेंगे जिसने दारुल उलुम मे सात - आठ साल पढाई की है तो कुरआन मे ये ज़िक्र आता है कि उनसे पूछिये जिनके पास इल्म हैं।

मैं आपको एक मिसाल देना चाहूगां कुछ बीस साल पहले कुछ अरब कुरआन मजीद मे जितनी भी आयतें है जो एम्रोलोजी के बारे मे ज़िक्र कर रही है। एम्रोलोजी का मतलब है मां के पेट के अंदर कैसे बच्चा बडा होता है उसकी पुरी जानकारी। तो कुरआन मे जितनी आयतों में ज़िक्र होता है की कैसे मां के पेट मे बच्चा बडा होता है उन सब आयतों का तर्जुमा लेकर वो जाते है प्रों. कीथ मूर के पास और उस वक्त प्रों. कीथ मूर सारी दुनिया के सबसे माहिर एम्रोलोजिस्ट थें, हैड आफ़ दा डिपार्ट्मेट आफ़ एनोटोमी, यूनिव्रसिटी आफ़ टोरंटो. कनाडा। वो ईसाई थे लेकिन अल्लाह तआला फ़र्माता है की उनसे पूछिये जो माहिर है चाहे वो मुस्लमान हो या गैर-मुस्लमान। तो ये अरब उन्हे कुरआन मजीद का तर्जुमा पेश करते है कि जिसके अन्दर ज़िक्र आता है कि कैसे मां के पेट के अंदर बच्चा बडा होता है। वो जब कई आयतों का तर्जुमा पढते है तो प्रो. कीथ मूर कहते है कि "अकसर जो आयतॊं मे ज़िक्र है वो आज की माडर्न एम्रोलोजी से मिलती जुलती है लेकिन चंद आयते है जिनके बारे मे ये नही कह सकता की ये सही है। मैं ये भी नही कहता हू की ये गलत है क्यौंकी मैं खुद नही जानता। उन आयतों मे दो आयतें ये थी जो सबसे पहले नाज़िल की गयी थी सुरह इकरा या सुरह अलक सु. ९६ : आ. १-२ जिसमें अल्लाह तआला फ़र्माते है "पढों अल्लाह के नाम से जिसने इन्सान को बनाया है खून के लोथडें से, लीच से, जोंक से"। प्रों. कीथ मूर ने कहा मैं नही जानता की बच्चा जब मां के पेट के अन्दर बडा होता है तो सबसे पहले लीच की तरह दिखता है, लीच का मतलब है जोंक जो खून चुसता है। तो प्रो. कीथ मूर अपनी लेबोरेट्री के अन्दर गये और एक बहुत पावरफ़ुल माइक्रोस्कोप के अन्दर देखा की जो मां के पेट के अन्दर बच्चा जब अपनी सबसे पहली स्टेज मे होता है एकदम पहली मंज़िल उसको माइक्रोस्कोप के अन्दर देखते है और उसे जोंक की तस्वीर से मिलाते है और हैरान हो जाते है की हुबहु दोनों बिल्कुल एक जैसे है।

जब उनसे एम्रोलोजी के बारे लगभग अस्सी सवाल पुछे गये तो उन्होने कहा की अगर आपने ये सवाल मुझसे तीस साल पहले पुछे होते यानी आज से पचास साल पहले तो मैं पचास प्रतिशत से ज़्यादा सवालॊं के जवाब नहीं दे सकता था क्यौंकी एम्रोलोजी साइंस का वो हिस्सा है जो अभी चंद सालॊ मे ही कुछ तरक्की किया है। प्रो. कीथ मूर को जो भी नयी चीज़ मिली कुरआन और हदीस से उन्होने अपनी नई किताब "Developing Human" की तीसरी एडीशन मे शामिल किया और उस किताब को उस वक्त का नंबर वन किताब का अवार्ड मिला सबसे बेहतरीन किताब जो एक डाक्टर ने लिखी है और इस किताब का अनुवाद कई ज़बानॊं मे किया जा चुका है।

इस किताब के ताल्लुक रखते कुछ लिन्क यहा मौजूद हैं......

http://www.geocities.com/aahem187/embryology.htm

http://www.islamic-awareness.org/Quran/Science/scientists.html

http://www.answering-islam.org/Responses/It-is-truth/chap03.htm

http://www.islamicvoice.com/january.97/scie.htm

http://www.thisistruth.org/truth.php?f=CreationOfMan

http://www.elsevier.com/wps/product/cws_home/712494


प्रो. कीथ मूर ने कहा "मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने में की कुरआन मजीद खुदा की किताब है और मुझे कोई एतराज़ नही ये मानने मे की मुह्म्मद सल्लाहॊ अलैह वसल्लम खुदा के आखिरी पैगम्बर हैं"।

इस मिसाल से हमें ये मालुम होता है की जब भी आपको कुछ नही पता तो उससे पुछिये जो उस मैदान का माहिर है। जब भी आप कोई मशीन खरीदते है तो उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड आती है की किस तरह से मशीन को इस्तेमाल करना चाहिये। और आप अगर इज़ाज़त देंगे इन्सान को मशीन कहने के लिये तो ये हमें मानना पडेंगा की सबसे मुश्किल मशीन इन्सान है, सबसे पेचिदा मशीन इन्सान है। क्या इस मशीन के लिये कोई Instruction Manual युज़र गाइड की ज़रूरत नही? कोई किताब की ज़रुरत नही? इस मशीन की Instruction Manual युज़र गाइड है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन मजीद, इस कुरआन मजीद मे लिखा हुआ है की किस तरह इस मशीन की हिफ़ाज़त करनी चाहिये? किस तरह इस मशीन को चलाना चाहिये? इस मशीन के लिये क्या क्या फ़ायदे है.....हर मशीन के साथ एक किताब आती है और इस मशीन इन्सान की किताब है अल्लाह का आखिरी कलाम कुरआन।

अगर आप कोई जापानी मशीन खरीदते है और उसके साथ Instruction Manual युज़र गाइड जापानी मे आपको मिलती है और जापानी आप समझतें नही हैं तो आप क्या करते हैं? आप दुकानदार से उस ज़बान की Instruction Manual युज़र गाइड मागंते है जो जिस ज़बान मे आपको महारत हासिल है ताकि आप समझ सकें की इस मशीन को कैसे इस्तेमाल करना है। तो अगर आप अरबी कुरआन मजीद को नही समझते है तो कम से कम इस कुरआन मजीद का तर्जुमा पढॊं और समझॊं और इस मशीन को सही तरह से इस्तेमाल करो।

मान लीजिये आप की कार खराब हो जाती है और कोई आप से कहता है की इसकी टंकी मे देसी घी डाल दो तो ये चलने लगेगी तो आप क्या करेंगे? उसकी बात मानेंगे नही क्यौंकी भले आप गाडीं सही करना नही जानते पर इतना जानते है की गाडी घी से नही चलती है। तो इसी तरह अगर हर मुस्लमान कुरआन को थोडा बहुत भी समझ कर पडें तो कोई भी आलिम, कोई भी मौलवी आपको बहका नही सकता, कोई भी आपकॊ गुमराह नही कर सकता है। आज के माहौल मे आप देखते है की मुस्लमान फ़िरकों मे बंटे हुए है एक आलिम ये कहता है, एक आलिम वो कहता है, अगर हम मुस्लमान कुरआन मजीद को समझ कर पढें तो कोई भी मौलाना आपको गुमराह नही कर सकता, कोई भी आलिम आपकॊ घुमा नही सकता।

ये आज मुस्लमानों की हालत जो है की सब जगह मुस्लमान पीटे जा रहे है क्यौंकी हम कुरआन मजीद समझ के नही पढते। अगर हम कुरआन मजीद समझ के पढें और इकट्ठा हो जाये तो इन्शाल्लाह हम मुस्लमानॊं के बीच कोई फ़िरका नही होगा। अल्लाह तआला फ़र्माते है सुरह अल इमरान सु. ३ : आ. १०३ में "आप अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकडीये और आपस मे फ़िरके मत बनाइये"। अल्लाह की रस्सी क्या है कुरआन मजीद और मुह्म्मद सल्लाहो अलैह वसल्लम की सही हदीस अगर हम अल्लाह की रस्सी को मज़बुती से पकड लेंगे और आपस मे फ़िरके नही बनायेंगे तो इन्शाल्लाह हम एक बार फिर से दुनिया की ऊचाई पर पहुचेंगें।

बाकी अगली कडीं मे...

अल्लाह आप सब कुरआन पढ कर और सुनकर, उसको समझने की और उस पर अमल करने की तौफ़िक अता फ़रमाये।

आमीन, सुम्मा आमीन
साभार :-  इस्लाम और कुरआन



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इस्लाम एक से अधिक विवाह की अनुमति क्यों देता है ?

आज कल हर तरफ़ नारे बाज़ी चल रही है नारी नारी की. इसी माहौल में एक सवाल भी उठता है कि क्यूँ इस्लाम में एक से अधिक विवाह की अनुमति है ? आईये इस विषय पर बिन्दुवार चर्चा करते हैं-






बहु-विवाह की परिभाषा-इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसके अनुसार व्यक्ति के एक से अधिक पत्नी या पति हों। बहु-विवाह दो प्रकार के होते हैं-
१. एक पुरूष द्वारा एक से अधिक पत्नी रखना।

२. एक स्त्री द्वारा एक से अधिक पति रखना । 

इस्लाम में इस बात की इजाजत है कि एक पुरूष एक सीमा तक एक से अधिक पत्नी रख सकता है जबकि स्त्री के लिए इसकी इजाजत नहीं है कि वह एक से अधिक पति रखे।




अब इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि इस्लाम में एक आदमी को एक से अधि· पत्नी रखने की इजाजत क्यों है?

१. पवित्र कुरआन ही संसार की धार्मिक पुस्तकों में एकमात्र पुस्तक है जो कहती है 'केवल एक औरत से विवाह करो।




संसार में कुरआन ही ऐसी एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जिसमें यह बात कही गई है कि 'केवल एक (औरत) से विवाह करो।' दूसरी कोई धार्मिक पुस्तक ऐसी नहीं जो केवल एक औरत से विवाह का निर्देश देती हो। किसी भी धार्मिक पुस्तक में हम पत्नियों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं पाते चाहे 'वेद, 'रामायण, 'गीता, हो या 'तलमुद व 'बाइबल। इन पुस्तकों के अनुसार एक व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार जितनी चाहे पत्नी रख सकता है। 

बाद में हिन्दुओं और ईसाई पादरियों ने पत्नियों की संख्या सीमित करके केवल एक कर दी। हम देखते हैं कि बहुत से हिन्दू धार्मिक व्यक्तियों के पास, जैसा कि उनकी धार्मिक पुस्तकों में वर्णन है, अनेक पत्नियाँ थीं। राम के पिता राजा दशरथ के एक से अधिक पत्नियाँ थीं, इसी प्रकार कृष्ण जी के भी अनेक पत्नियाँ थीं। प्राचीन काल में ईसाइयों को उनकी इच्छा के अनुसार पत्नियाँ रखने की इजाज़त थी, क्योंकि बाइबल पत्नियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं लगाती। मात्र कुछ सदी पहले गिरजा ने पत्नियों की सीमा कम करके एक कर दी। यहूदी धर्म में भी बहु-विवाह की इजाजत है। तलमूद कानून के अनुसार इब्राहीम की तीन पत्नियाँ थीं और सुलैमान की सैकड़ों पत्नियाँ थीं। इनमें बहु-विवाह का रिवाज चलता रहा और उस समय बंद हुआ जब रब्बी गर्शोम बिन यहूदा (९६० ई.-१०३० ई.) ने इसके खिलाफ हुक्म जारी किया। मुसलमान देशों में रहने वाले यहूदियों के पुर्तगाल समुदाय में यह रिवाज १९५० ई. तक प्रचलित रहा और अन्तत: इसराईल के चीफ रब्बी ने एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगा दी।




२. मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक पत्नियाँ रखते हैं सन १९७५ र्ई. में प्रकाशित 'इस्लाम में औरत का स्थान कमेटी की रिपोर्ट में पृष्ठ संख्या ६६, ६७ में बताया गया है कि १९५१ ई. और १९६१ ई. के मध्य हिन्दुओं में बहु-विवाह ५.०६ प्रतिशत था जबकि मुसलमानों में केवल ४.३१ प्रतिशत था। 

भारतीय कानून में केवल मुसलमानों को ही एक से अधिक पत्नी रखने की अनुमति है और गैर-मुस्लिमों के लिए एक से अधिक पत्नी रखना भारत में गैर कानूनी हैइसके बावजूद हिन्दुओं के पास मुसलमानों की तुलना में अधिक पत्नियां होती हैं। भूतकाल में हिन्दुओं पर भी इसकी कोई पाबंदी नहीं थी। कई पत्नियां रखने की उन्हें अनुमति थी। ऐसा सन १९५४ ई. में हुआ जब हिन्दू विवाह कानून लागू किया गया जिसके अंतर्गत हिन्दुओं को बहु-विवाह की अनुमति नहीं रही और इसको गैर-कानूनी करार दिया गया। यह भारतीय कानून है जो हिन्दुओं पर एक से अधिक पत्नी रखने पर पाबंदी लगाता है, न कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथ। 


अब आइए इस पर चर्चा करते हैं कि इस्लाम एक पुरूष को बहु-विवाह की अनुमति क्यों देता है?



३. पवित्र कुरआन सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है कि पवित्र कुरआन ही एकमात्र धार्मिक पुस्तक है जो निर्देश देती है कि 'केवल एक (औरत) से विवाह करो' कुरआन में है- ''अपनी पसंद की औरत से विवाह करो दो, तीन अथवा चार, परन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके मध्य समान न्याय नहीं कर सकते तो तुम केवल एक (औरत) से विवाह करो''(·कुरआन, ४:३)


कुरआन के अवतरित होने से पूर्व बहु-विवाह की कोई सीमा नही थी। बहुत से लोग बड़ी संख्या में पत्नियाँ रखते थे और कुछ के पास तो सैकड़ों पत्नियाँ होती थीं। इस्लाम ने अधिक से अधिक चार पत्नियों की सीमा निर्धारित कर दी। इस्लाम किसी व्यक्ति को दो, तीन अथवा चार औरतों से इस शर्त पर विवाह करने की इजाज़त देता है, जब वह उनमें बराबर का इंसाफ करने में समर्थ हो। कुरआन के इसी अध्याय अर्थात सूरा निसा आयत १२९ में कहा गया है : ''तुम स्त्रियों (पत्नियों) के मध्य न्याय करने में कदापि समर्थ न होगे।'' (कुरआन, ४:१२९)


कुरआन से मालूम हुआ कि बहु-विवाह कोई आदेश नहीं बल्कि एक अपवाद है। बहुत से लोगों को भ्रम है कि एक मुसलमान पुरूष के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना अनिवार्य है।


आमतौर से इस्लाम ने किसी काम को करने अथवा नहीं करने की दृष्टि से पाँच भागों में बांटा है-

(A) फ़र्ज़ अर्थात अनिवार्य।
(B) मुस्तहब अर्थात पसन्दीदा।
(C) मुबाह अर्थात जिसकी अनुमति हो।
(D) मकरूह अर्थात घृणित, नापसन्दीदा।
(E) 'हराम अर्थात निषेध।


बहु-विवाह मुबाह के अन्तर्गत आता है जिसकी इजाज़त और अनुमति है, आदेश नहीं है। अर्थात यह नहीं कहा जा सकता कि एक मुसलमान जिसकी दो, तीन अथवा चार पत्नियाँ हों, वह उस मुसलमान से अच्छा है जिसकी केवल एक पत्नी हो।

४. औरतों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है प्राकृतिक रूप से औरत एवं पुरूष लगभग एक ही अनुपात में जन्म लेते हैं। बच्चों की अपेक्षा बच्चियों में रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक होती है। शिशुओं के इलाज के दौरान लड़कों की मृत्यु ज्य़ादा होती है। युद्ध के दौरान स्त्रियों की अपेक्षा पुरूष अधिक मरते हैं। दुर्घटनाओं एवं रोगों में भी यही तथ्य प्रकट होता है। स्त्रियों की औसत आयु पुरूषों से अधिक होती है इसीलिए हम देखते हैं कि विश्व में विधवाओं की संख्या विधुरों से अधिक है।


. भारत में पुरूषों की आबादी औरतों से अधिक है जिसका कारण है मादा गर्भपात और भ्रूण हत्या भारत उन देशों में से एक है जहाँ औरतों की आबदी पुरूषों से कम है। इसका असल कारण यह है कि भारत में कन्या भ्रूण-हत्या की अधिकता है और भारत में प्रतिवर्ष दस लाख मादा गर्भपात कराए जाते हैं। यदि इस घृणित कार्य को रोक दिया जाए तो भारत में भी स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक होगी।

६. पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अधिक हैअमेरिका में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से अठत्तर लाख ज्य़ादा है। केवल न्यूयार्क में ही उनकी संख्या पुरूषों से दस लाख बढ़ी हुई है और जहाँ पुरूषों की एक तिहाई संख्या सोडोमीज (पुरूषमैथुन) है ओर पूरे अमेरिका राज्य में उनकी कुल संख्या दो करोड़ पचास लाख है। इससे प्रकट होता है कि ये लोग औरतों से विवाह के इच्छुक नहीं हैं। ग्रेट ब्रिटेन में स्त्रियों की आबादी पुरूषों से चालीस लाख ज्य़ादा है। जर्मनी में पचास लाख और रूस में नब्बे लाख से आगे है। केवल खुदा ही जानता है कि पूरे विश्व में स्त्रियों की संख्या पुरूषों से कितनी अधिक है।


७. प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक पत्नी रखने की सीमा व्यावहारिक नहीं है यदि हर व्यक्ति एक औरत से विवाह करता है तब भी अमेरिकी राज्य में तीन करोड़ औरतें अविवाहित रह जाएंगी (यह मानते हुए कि इस देश में सोडोमीज की संख्या ढाई करोड़ है)। इसी प्रकार ग्रेट ब्रिटेन में चालीस लाख से अधिक औरतें अविवाहित रह जाएंगी। औरतों की यह संख्या पचास लाख जर्मनी में और नब्बे लाख रूस में होगी, जो पति पाने से वंचित रहेंगी। यदि मान लिया जाए कि अमेरिका की उन अविवाहितों में से एक हमारी बहन हो या आपकी बहन हो तो इस स्थिति में सामान्यत: उस·के सामने केवल दो विकल्प होंगे। एक तो यह कि वह किसी ऐसे पुरूष से विवाह कर ले जिसकी पहले से पत्नी मौजूद है। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो इसकी पूरी आशंका होगी कि वह गलत रास्ते पर चली जाए। सभी शरीफ लोग पहले विकल्प को प्राथमिकता देना पसंद करेंगे।

पश्चिमी समाज में यह रिवाज आम है कि एक व्यक्ति पत्नी तो एक रखता है और साथ-साथ उसके बहुत-सी औरतों से यौन संबंध होते हैं। जिसके कारण औरत एक असुरक्षित और अपमानित जीवन व्यतीत करती है। वही समाज किसी व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी के साथ स्वीकार नहीं कर सकता, जिससे औरत समाज में सम्मान और आदर के साथ एक सुरक्षित जीवन व्यतीत कर सके। और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते इस्लाम सीमित बहु-विवाह की अनुमति देता है परन्तु मूल कारण यह है कि इस्लाम एक औरत का सम्मान और उसकी इ़ज्ज़त बाकी रखना चाहता है।

साभार: इस्लामिक वेबदुनिया

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Monday, March 8, 2010

इस्लाम में महिलाओं का सम्मान

यदि आप धर्मों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हर युग में महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया गया, हर धर्म में महिलाओं का महत्व पुरुषों की तुलना में कम रहा। बल्कि उनको समाज में तुच्छ समझा गया, उन्हें प्रत्येक बुराइयों की जड़ बताया गया, उन्हें वासना की मशीन बना कर रखा गया। एक तम्बा युग महिलाओं पर ऐसा ही बिता कि वह सारे अधिकार से वंचित रही। यह इस्लाम की भूमिका है कि उसने हव्वा की बेटी को सम्मान के योग्य समझा और उसको मर्द के समान अधिकार दिए गए। क़ुरआन की सूरः बक़रः (2: 228) में कहा गया "महिलाओं के लिए भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं जैसे मर्दों के अधिकार उन पर हैं।" इस्लाम में महिलाओं का बड़ा ऊंचा स्थान है। इस्लाम ने महिलाओं को अपने जीवन के हर भाग में महत्व प्रदान किया है। माँ के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, पत्नी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बेटी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बहन के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, विधवा के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, खाला के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, तात्पर्य यह कि विभिन्न परिस्थितियों में उसे सम्मान प्रदान किया है जिन्हें बयान करने का यहाँ अवसर नहीं हम तो बस उपर्युक्त कुछ स्थितियों में इस्लाम में महिलाओं के सम्मान पर संक्षिप्त में प्रकाश डालेंगे।

माँ के रूप में सम्मानः माँ होने पर उनके प्रति क़ुरआन ने यह चेतावनी दी कि "और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है - उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे - कि "मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है॥14॥ " कुरआन ने यह भी कहा कि "तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें 'उँह' तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्‍टापूर्वक बात करो॥23॥ और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ बिछाए रखो और कहो, "मेरे रब! जिस प्रकार उन्होंने बालकाल में मुझे पाला है, तू भी उनपर दया कर।"॥24॥ (सूरः बनीइस्राईल 23-25)
माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने का अन्तिम ईश्दुत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने भी आदेश दिया, एक व्यक्ति उनके पास आया और पूछा कि मेरे अच्छे व्यवहार का सब से ज्यादा अधिकारी कौन है? आप ने फरमायाः तुम्हारी माता, उसने पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारी माता. पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारी माता, पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारे बाप। मानो माता को पिता की तुलना में तीनगुना अधिकार प्राप्त है। अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः अल्लाह की आज्ञाकारी माता-पिता की आज्ञाकारी में है और अल्लाह की अवज्ञा माता पिता की अवज्ञा में है" (तिर्मज़ी)

पत्नी के रूप में सम्मानः पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फरमाया और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। (निसा4 आयत 19) और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "एक पति अपनी पत्नी को बुरा न समझे यदि उसे उसकी एक आदत अप्रिय होगी तो दूसरी प्रिय होगी।" (मुस्लिम) उसी प्रकार आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह भी फरमायाः "संसार भोग-विलास की चीज़ है और संसार की सब से उत्तम भोग-विलास की सामग्री नेक पत्नी है" (मुस्लिम)

बेटी के रूप में सम्मानः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "जिसने दो बेटियों का पालन-पोषन किया यहां तक कि वह बालिग़ हो गई वह महाप्रलय के दिन हमारे साथ होगा" (मुस्लिम) आपने यह भी फरमायाः जिसने बेटियों के प्रति किसी प्रकार का कष्ट उठाया और वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करता रहा तो यह उसके लिए नरक से पर्दा बन जाएंगी" (मुस्लिम)

बहन के रूप में सम्मानः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः जिस किसी के पास तीन बेटियाँ हों अथवा तीन बहनें हों उनके साथ अच्छा व्यवहार किया तो वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा" (अहमद)

विधवा के रूप में सम्मानः इस्लाम ने विधवा की भावनाओं का बड़ा ख्याल किया बल्कि उनकी देख भाल और उन पर खर्च करने का बड़ा पुण्य बताया है। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "विधवाओं और निर्धनों की देख रेख करने वाला ऐसा है मानो वह हमेशा दिन में रोज़ा रख रहा और रात में इबादत कर रहा है।" (बुखारी)

खाला के रूप में सम्मानः इस्लाम ने खाला के रूप में भी महिलाओं को सम्मनित करते हुए उसे माता का पद दिया। हज़रत बरा बिन आज़िब कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः "खाला माता के समान है।" (बुखारी)
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Sunday, March 7, 2010

क्या कुरआन में औरत को पीटने का हुक्म है?


महिला दिवस ८ मार्च पर विशेष 
कुरआन 4:34: "मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ आदमियों को बाज़ अदमियों पर फ़ज़ीलत दी है और चूंकि मर्दो ने अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो. पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाऐं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग है."


सुरः निसा की ये आयत पढ़कर अक्सर औरतें घबरा जाती हैं क्योंकि इसमें तो मर्दों को खुले तौर पर मारने की छूट दे दी है. गैर इस्लामी इस आयत को पढ़कर इस्लाम के औरत विरोधी होने का फतवा दे देते हैं. देखा जाए तो पूरी दुनिया में इस आयत को हथियार बनाकर इस्लाम में औरत के दोयम दर्जे की बात कही जा रही है. लेकिन क्या वास्तव में ये आयत यही मतलब बयान कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं की हमसे इस आयत का मतलब समझने में कोई भूल हो रही है?

एक मिसाल से अपनी बात की शुरुआत करते हैं. 


मान लिया एक मजदूर दिन भर अपनी मजदूरी की तलाश में जाने के बाद शाम को खाली हाथ घर लौटता है. उसकी औरत इस इन्तिज़ार में बैठी है की उसका शौहर कुछ कमाकर लाएगा तो दोनों के पेट में कुछ जाएगा. लेकिन उसे खाली हाथ देखकर उसका सब्र जवाब दे देता है. और वह शौहर को बुरा भला कहने लगती है. शौहर भी थका हुआ आया है और भूखा भी है. बीवी के ताने सुनकर उसे गुस्सा आता है और वह उसे मारने के लिए हाथ उठा देता है.

लेकिन उसी वक़्त उसे कुरआन की ये आयत याद आ जाती है और उसका उठा हुआ हाथ नीचे गिर जाता है. वह उसे समझाने लगता है और उनका गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो जाता है. थोड़ी कसर रह जाती है, जिसकी वजह से दोनों रात को अलग अलग सोते हैं और सुकून से अपने और साथी के बारे में सोचते हैं. लिहाज़ा अगले दिन जब सोकर उठते हैं तो दोनों का गुस्सा ठंडा हो चुका होता है. बीवी ख़ुशी ख़ुशी अपने शौहर को विदा करती है और वह नए जोश के साथ काम की तलाश में निकल जाता है. दो जनाब देखा आपने, जो आयत आपको औरत विरोधी दिख रही थी उसने एक जाहिल औरत को जाहिल मर्द से पीटने से बचा लिया.

ये आयत हरगिज़ औरत विरोधी नहीं है बल्कि मनोविज्ञान (Psychology) की निहायत अच्छी मिसाल है. बहुत खूबसूरती के साथ इसमें मर्द और औरत दोनों को समझाया गया है. पहले मर्द से कहा गया की तुम चूंकि औरत से जिस्मानी तौर पर ताक़तवर होते हो इसलिए अपने पर काबू रखो. हो सकता है वह तुमसे ज्यादा फजीलत रखती हो (बाज़ को बाज़ पर फजीलत है से यही मतलब निकलता है.) इसके बाद औरत को समझाया गया चूंकि मर्द तुम्हारे लिए दिनभर मेहनत करता है कुछ कमाकर लाता है तो तुम्हारा भी फ़र्ज़ बनता है की अपनी इज्ज़त व शौहर के माल की हिफाज़त करो. इसके बाद फिर मर्द को सलाह दी गई है की अगर अपनी बीवी की किसी बात पर तुम्हें गुस्सा आ जाए तो उसे कजोर और अपने को ताक़तवर समझकर उसे पीटना न शुरू कर दो बल्कि जो कुरआन कह रहा है उसपर अमल करो, तुम्हारा गुस्सा अपने आप ठंडा हो जाएगा.


ये आयत उस वक़्त नाजिल हुई थी जब एक नव-मुसलमान ने अपनी बीवी को तमांचा मार दिया था. और उससे पहले अरब में बीवियों को पीटना आम था. आगे कोई शख्स ऐसा क़दम न उठाये इसीलिये अल्लाह ने ऐसा हुक्म फरमाया. 

अब ये सवाल उठ सकता है की अल्लाह ने सीधे सीधे बीवी की पिटाई से क्यों नहीं मना किया? तो इसका जवाब ये है की अल्लाह बेइंसाफ नहीं है की एक को तो पूरी तरह पाबन्द कर दे और दूसरे को खुली छूट दे दे. बीवी को भी तो डर रहना चाहिए की वह हद से ज्यादा सरकश न हो जाए.

Saturday, March 6, 2010

दुनिया चाहे तसलीमा दीदी को वेश्या कहे लेकिन मैं उन्हें अपने घर में रखूंगा क्योंकि ... weeping crocodiles



दुनिया तसलीमा दीदी को लेडी रूश्दी कहती है उनका नाम उनके बराबर रखती है। उन्हें मक़बूल फ़िदा के समान समझती है । उन्हें अपनी यौनेच्छा का सम्मान करने के कारण वेश्या तक समझ लिया जाता है जबकि हक़ीक़त यह है कि उनका न तो इन दोनों मर्दों से कोई मुक़ाबला है और न ही उन्हें वेश्या कहा जा सकता है।

भाई उमर कैरानवी आपके दिए लिंक को देखा । http://janatantra.com/2010/02/28/taslima-on-husain-and-salman-rushdi/

तसलीमा नसरीन उन औरतों में से हैं जो ‘शोहरत पाने के लिए कपड़े तक उतार सकती हैं भले ही ये कपड़े किसी के भी हों ।

उनके द्वारा किसी के भी नंगे चित्र बनाने की बात कहा जाना खुद उनका इक़बालिया बयान है । ऐसे में उनके विचारों से कौन सहमत हो सकता है और कौन उनके विचारों का प्रसार कर सकता है ?

सिवाय उस आदमी के जो अपनी मां बहनों और आराध्यों को भी नंगा करके उनके सामने खड़ा करने के लिए तैयार हो ताकि तसलीमा जी अपने जी के अरमान पूरे कर सकें । ज़ाहिर है बंग्लादेश के लोग इस बेग़ैरती के लिए तैयार नहीं हुए और उन्हें निकाल बाहर किया । फिर उन्होंने अपनी बेग़ैरती के विषबीजों को बोने के लिए भारत को उपयुक्त समझा लेकिन उन्हें यहां से भी जाना पड़ा क्योंकि मेरे महान भारत के भी अक्सर लोगों की ग़ैरत और ज़मीर ज़िन्दा है । कुछ मुर्दा ज़मीरों ने उन्हें रोकने की भी कोशिश की लेकिन उनकी चल न सकी । वे लोग अब भी यदा कदा आवाज़ उठाते रहते हैं । इनमें बात को विचारे बिना गीदड़ों की तरह रोने वाले भी कुछ लोग ‘शामिल हो जाते हैं ।

ये वे लोग हैं जो मुसलमानों की फ़ज़ीहत का कोई भी मौक़ा गंवाना नहीं चाहते भले ही उनकी खुद की भी इज़्ज़त ( ? ) की अर्थी उठ जाए , जोकि मुर्दा तो पहले से ही है ।

तसलीमा जी सलमान रूश्दी के कमीनेपन की क़लई खोलकर उन सभी लोगों को नंगा करने में कामयाब हो गई हैं जो अतीत में अपनी कुंठाओं के चलते रूश्दी की हिमायत करते थे या अब भी करते हैं । यह अब साबित हो गया है कि स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति की छतरी का लाभ उठाने वाले रूश्दी को सबको इस अधिकार के न मिल पाने का कोई मलाल नहीं है । बल्कि उसने तो अपने स्टाफ़कर्मी की किताब को प्रकाशिज होने से रूकवाकर दूसरों से यह छीनने का ही काम किया है । प्रकाशक ने भी उनका सहयोग करके यह साबित कर दिया है कि उन्होंने भी अपना भगवान ‘ लक्ष्मी ‘ को ही बना रखा है । इसके बावजूद रूश्दी तसलीमा जी से फिर भी बेहतर है क्योंकि उनके अन्दर ग़लती करने के बाद क्षमा मांगने का भी गुण है । जबकि तसलीमा ग़लती करके उसपर अड़ने में उनसे कहीं आगे हैं ।

तसलीमा जी की आपत्ति ठीक है उनका नाम रूश्दी के साथ जोड़ना हरगिज़ इन्साफ़ नहीं है । तसलीमा जी को इस बात पर भी आपत्ति है कि सलमान रूश्दी को अपनी अमीरी के बल पर लड़कियां भोग कर छोड़ देने पर समर्थ पुरूष समझा जाता है । जबकि वे भी मर्दों की तरह कुछ कर दिखाना चाहती हैं तो उन्हें वेश्या कहा जाता है । इसमें तो समाज की मजबूरी साफ़ है । जिस काम को जिस ‘शब्द से जाना जाता है समाज वही शब्द तो इस्तेमाल करेगा । वह तसलीमा जी के लिए तो अपना ‘शब्दकोष बदलेगा नहीं।

लेकिन इसके बावजूद भी उन्हें वेश्या कहना ठीक नहीं । वेश्याओं को इस पर आपत्ति हो सकती है। वेश्या इस दलदल में मजबूरीवश हैं । वे तो अनैतिक संबन्धों से कोई सच्चा सहारा मिलते ही तौबा कर लेती हैं । इसके लिए न तो वे कोई फ़लसफ़ा घड़ती हैं और न ही उनके दिल में किसी आम या ख़ास आदमी के नंगे चित्र बनाने की ख्वाहिश या हिम्मत है । अपने अपने धर्मजनों की इज़्ज़त भी वे सामान्य रीति से ही करती हैं । तसलीमा जी के विचार जानकर वे भी अपने पास बैठाना पसन्द न करेंगी ।तसलीमा जी का यह कहना भी ग़लत है कि रूश्दी के ऐब पर उसे कोई बुरा नहीं समझता । अगर उनकी उठ बैठ ज़िन्दा ज़मीरों में होती तो उन्हें पता चलता कि 153 करोड़ मुसलिमों के साथ हर वह आदमी उनके ऐब पर उन्हें बुरा ही कहता है जो किसी नैतिकता और धर्म नियम का पाबन्द है । मक़बूल फ़िदा को खदेड़ भगाने वाले भी तसलीमा की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाते देखे जा सकते हैं। यह उनकी सियार मनोवृत्ति का ही परिचायक है ।

अपने आराध्य ठहरा लिये गये देवी देवताओं के नग्न यौनांगों की मूर्तियां हर नगर के चैराहों पर स्थापित करने वाले कौन हैं? मक़बूल फ़िदा या फिर वे खुद ? आप अपने देवी देवताओं को जिस रीति से सम्मान देंगे दूसरा भी उसी का तो अनुकरण करेगा । पोस्टर कैलेंडर और सामान की पैकिंग पर उनके फ़ोटो छापने वाला कौन है ? सामान प्रयोग करके इन चित्रों को खुद इनके पुजारी इन्हें कहां फेंकते हैं । यह सभी जानते हैं। जबकि आप मुसलमानों को न तो अपने बुज़ुर्गों के नंगे चित्र बनाते पाएंगे और न ही उनके धार्मिक चिन्हों को कूड़े के ढेर पर पड़ा हुआ देख सकते ।

यही वजह है कि मक़बूल फ़िदा मुसलिम बुजुर्गों का सम्मान ठीक उसी तरह करते हैं जैसे कि मुसलिम करते हैं और वे हिन्दू देवी देवताओं के प्रति अपना अनुराग ठीक वैसे ही प्रदर्शित करते हैं जैसेकि उन्होंने खुद हिन्दुओं को करते देखा । यह एक स्वाभाविक आचरण है । जबकि लेखिका नसरीन उनकी तरह इस मर्यादा का पालन करने से भी इनकार कर रही हैं तो उनका नाम उनके साथ रखना उचित भी नहीं है । इस सबके बावजूद मक़बूल फ़िदा को हिन्दू देवी देवताओं के नग्न चित्र नहीं बनाने चाहिये थे क्योंकि इसलाम अनावश्यक चित्र बनाने व फितना फैलाने से रोकता है । उनके कृत्य की हम भतर्सना करते हैं । मज़हब के नाम पर उन्माद फैलाने वालों और क़ानून अपने हाथ में लेने वालों की भी हम निन्दा करते हैं । ये लोग धर्म के मर्म से कोरे लोग हैं । इसलाम का अर्थ है ‘ ‘शान्ति ‘। समाज की ‘शान्ति भंग करने वालों का ‘शुमार नादानों और ज़ालिमों में तो हो सकता है लेकिन उन्हें खुदा का प्यारा बन्दा नहीं माना जा सकता और न ही उनके कामों के लिए इसलाम को दोष दिया जा सकता है । इसलाम हर ‘शख्स को उसकी अच्छी या बुरी मान्यताओं के साथ जीने की गारंटी देता है । इसलाम के न मानने की वजह से उनका यह हक़ उनसे कोई नहीं छीन सकता । वो जैसी भी हों और चाहे हम उनसे सहमत न भी हों । तब भी हम चाहते हैं कि उन्हें जीने की आज़ादी और हिफ़ाज़त मिले । अगर सरकार इजाज़त दे तो मैं खुद उन्हें अपने घर में रखना चाहूंगा लेकिन एक बहन की तरह । ताकि वे कुछ दिन कुछ ज़िन्दा ज़मीर लोगों के साथ रहकर इसलाम को उसके कल्याणकारी रूप में पा सकें । इसलाम ही वह ‘शान्ति का स्रोत है जो उनकी प्यासी आत्मा को तृप्त और व्याकुल मन को ‘शांत कर सकता है । आमीन
हम सच्चे मालिक प्रभु परमेश्वर अल्लाह से उनके अपने और सभी पाठकों के लिए पूर्ण सन्मार्ग प्रेरणा और लोक परलोक में सफलता की दुआ करते हैं । वह मालिक हमें अपनी ‘शक्ति से एक और नेक बनाये। इसी के साथ हम तसलीमा जी से विनती करेंगे कि दूसरे लोग भी उनकी ही तरह इनसान हैं । उनकी ही तरह वे भी दिल और भावनाएं रखते हैं । अगर आप चाहती हैं कि कोई आपका दिल न दुखाए तो आप भी दूसरों के जज़्बात का ख़याल रखें । सामान्य शिष्टाचार के पालन मात्र से ही आपकी सारी समस्या का ख़ात्मा हो जाएगा । अगर धार्मिक कट्टरता बुरी है तो नास्तिक कट्टरता भी निन्दनीय है । बेशक आप समाज में परिवर्तन लाएं लेकिन परिवर्तन के नाम पर पतन तो न लाएं ।

’आप किसी का भी नंगा चित्र बना सकती हैं ‘ आपका ये दावा भी झूठा दावा है जिसे आप हरगिज़ पूरा नहीं कर सकतीं । चहे खुद आपको यक़ीन न आये लेकिन सच यही है ।वर्ना अगर आप अपने दावे में सच्ची हैं तो अपनी मां का नंगा चित्र बनाकर दिखायें । खूब बिकेगा । आपका दावा भी सच्चा हो जाएगा और आपकी आर्थिक तंगी भी दूर हो जाएगी । आपको इस हिम्मत के बदले में अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाज़ा जाएगा ।क्या अपने दावे को सच करने हिम्मत है आपमें ?बढ़िए आगे बढ़िए । अब आपके क़दम क्यों लड़खड़ा रहे हैं ?दूसरों के आदरणीय लोगों के साथ तो आप बेशक कुछ भी कर सकती हैं लेकिन अपनी मां के साथ ...?सोचकर ही आपके बदन के रोंगटे खड़े हो गए ?स्त्री ‘शरीर पिपासु आपको पहले से ही घेरे बैठे हैं ।

हम मुसलमानों से भी कहना चाहेंगे कि आज उनके अमल पूरी तरह उनकी धार्मिक किताब के मुताबिक़ नहीं हैं जिससे लोगों को इसलाम के समझने और मानने में भारी दिक्क़त हो रही है और इससे स्वार्थी तत्व लोगों को भारी मात्रा में आसान शिकार मिल रहे हैं । अपना इल्म बढ़ाएं और अपना आचरण सुधारें । लोगों के लिए ‘शान्ति और रहमत का ज़रिया बनें । खुद को साक्षात इसलाम बना लें । भ्रम की धुंध स्वतः समाप्त हो जाएगी । अन्यथा मुसलमान मानवता के मुजरिम ठहरेंगे और उस परम प्रधान का दण्ड उनपर लागू हो जाएगा । तबाही से खुद भी बचें और दूसरों को भी बचायें । संवाद बढ़ाएं और प्यास मिटाएं।


अब बताइये कि कौन हम से सहमत है और कौन दीदी तसलीमा

से ?

काश ! कोई हमारी सदाकांक्षा उन तक पहुंचा दे ।


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