Saturday, October 31, 2009
इस्लाम से निष्कासित ‹खारिज› करने वाली बातें by ISLAMHOUSE.com
Monday, October 26, 2009
महाराष्ट्र में खून-खराबे की आहट
महाराष्ट्र में भले ही कांग्रेस जीत गयी हो, लेकिन कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र चुनौती बनने जा रहा है। यह सच है कि कांगेस को तीसरी बार सत्ता में लाने का श्रेय राजठाकरे को भी है। 13 सीट जीतकर राजठाकरे की महत्वाकांक्षा को पंख लग जाएंगे। अपने चाचा बाल ठाकरे से मराठा मानुष की अस्मिता का मुद्दा छीनकर राजठाकरे ने जो 13 सीटें हथियाई हैं, उन्हें वे 130 करने में वही हथकंडा अपनाएंगे, जिस हथकंडे से 13 सीटें हासिल की हैं। आज राज ठाकरे शिवसेना को सत्ता से दूर रखने में कामयाब हुए हैं, कल वह हर हाल में सत्ता का स्वाद चखना जरुर चाहेंगे। राजठाकरे जैसे लोगों के पास जनता में अपनी पैंठ बढ़ाने के लिए कोई आर्थिक या सामाजिक एजेंडा तो है नहीं, जिसे आगे बढ़ाकर वे जनता में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सकें। मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उनकी प्राथमिकता नहीं है। कभी याद नहीं पड़ता कि शिवसेना ने इन मुद्दों पर कोई आन्दोलन किया हो। अब इन मुद्दों से वोट भी कहां मिलते हैं। वोट तो क्षेत्रीयता और धर्मिक भावनाओं को भुनाकर मिलते हैं। मराठी अस्मिता ही इनके लिए सब कुछ है। जैस नरेन्द्र मोदी के लिए गुजरात की अस्मिता ही सब कुछ हो गयी है। भले ही देश की अस्मिता दांव पर लग जाए लेकिन मराठी और गुजराती अस्मिता को आंच नहीं आनी चाहिए। नफरत और खून-खराबा ही राजठाकरों और नरेन्द्र मोदियों का एकमात्र एजेंडा है। बाल ठाकरे ने भी यही किया था। राजठाकरे ने भी यही किया, कर रहे हैं और आगे भी करेंगे।
शिवसेना बाल ठाकरे उस घायल बूढ़े शेर की तरह हो गए हैं, जो कमजोर हो गया है, जिसके दांत भी नहीं है। लेकिन वह दहाड़ रहा है। जंगल में आग लगाने की बात तो करता है, लेकिन कर कुछ नहीं सकता। ऐसा लगता है घायल होने के साथ ही उनका दिमागी संतुलन भी बिगड़ गया है। तभी तो वे 'सामना' में घृणास्पद और छिछोरी और उल-जलूल भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसी भाषा बालठाकरे इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे देखते हुए तो उन्हें जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए था, लेकिन वे बालठाकरे हैं। उनका कोई कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इस देश में कानून तो आम आदमी रुपी मेमने के लिए है, जिसकी जब चाहे गर्दन मरोड़ दी जाए। बालठाकरे ने हमेशा ही एक निर्मम तानाशाह जैसा बर्ताव किया है। बालठाकरे वैसे भी हिटलर जैसे तानाशाह को अपना रोल मॉडल मानते रहे हैं। लेकिन क्या उन्हें यह नहीं पता कि हिटलर ने भी खुदकशी करके कायरता का परिचय दिया था ? क्या वे सद्दाम हुसैन का हश्र भी भूल गए हैं ? सच यह है कि एक तानाशाह के डर की वजह से सब हां में हां मिलाते हैं, तो वह यह समझता है कि उसकी प्रजा उसकी बहुत इज्जत करती है। जबकि सच्चाई यह होती है कि बेबस जनता तानाशाह के कमजोर होने का इंतजार करती है। बालठाकरे के साथ भ्ी ऐसा ही हुआ। जनता ने दिखा दिया कि वही सबसे बड़ी ताकत है। सभी तानाशाह अन्दर से कमजोर और डरपोक हुआ करते हैं। बालठाकरे मराठियों के बारे में कह रहे हैं कि मराठियों ने उन्हें धोखा दिया है। पीठ में खंजर घोंपा है। बाल ठाकरे से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या एक लोकान्त्रिक देश की जनता को एक ही परिवार को शासन करने के लिए वोट देते रहना चाहिए ? यदि वे वोट नहीं दें तो गद्दार कहलाएं। क्या महाराष्ट्र या मुंबई ठाकरे परिवार की बपौती है ?
कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। मराठी वोटों के वर्चस्व के लिए चाचा-भतीजा में तलवारें खिंच गयी है। दोनों अपनी-फौजों को तैयार कर रहे हैं। बकौल चाचा बालठाकरे, 'उन्होंने हार के फूलों को संजो कर रखा है। यही फूल अंगोर बनेंगे।' चाचा के इन शब्दों का मतलब कोई अक्ल का अंधा भी निकाल सकता है। इधर, भतीजा राजठाकरे उत्साहित है। इस उत्साह में उनकी ब्रिगेड कब उत्तर भारतीयों को निशाना बनायी, यह देखना दिलचस्प होगा। इतना तय है कि मुंबई की सड़कों पर उत्तर भारतीयों पर एक बार फिर कहर टूटने वाला है। अमिताभ बच्चन जैसे बड़े लोग तो राजठाकरे या बालठाकरे की डयोढी पर जाकर सिर नवा आएंगे और बचे रहेंगे्र। लेकिन उन इलाहबादियों और बिहारियों का क्या होगा, जो दो जून की रोटी का जुगाड़ करने मुंबई जाते हैं। उन्हें चाचा-भतीजे के ताप से कौन बचाएगा ? महाराष्ट्र सरकार ने अतीत में ही राजठाकरे का क्या बिगाड़ लिया था, जो अब बिगाड़ेगी। तो क्या महाराष्ट्र का 'भिंडरावाला' ऐसे ही उत्पात मचाता रहेगा ? क्या आपको महाराष्ट्र में खून-खराबे की आहट सुनाई नहीं दे रही ? मुझे तो दे रही है।
कश्ती-ए-नूह(मनु) को पुरातत्ववेत्ताओं ने आखिर ख़ोज ही निकाला
with thanks: Umar saif
सनातन धर्म के अध्ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अाधारित famous-book-ab-bhi-na-jage-to
Sunday, October 25, 2009
महान चमत्कार के होते हुए एक मानव-मात्र

(1) मक्का वालों ने आपके संदेष्टा होने का प्रमाण माँगा तो आपके एक संकेत पर चाँद के दो टुकड़े हो गए जिसका समर्थन आधुनिक विज्ञान ने भी किया है। इस चमत्कार का समर्थन चाँद पर जाने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक निल आर्म्-स् ट्रंग ने भी किया बल्कि इसी कारण उन्होंने इस्लाम भी स्वाकार किया जिसे बहुत कम लोग जानते हैं।
(2) हुदैबिया की सन्धि के अवसर पर अंगुलियों से पानी निकला और 1400 व्यक्तियों ने प्यास बुझाई।
(3) मुहम्मद साहिब का सब से बड़ा चमत्कार दिव्य क़ुरआन है, वह कैसे ? क्यों कि वह न लिखना जानते थे न पढ़ना और न ही उनको किसी गुरू की संगती प्राप्त हुई थी, ऐसा इन्सान क़ुरआन पेश कर रहा है जो स्वयं चुनौती दे रहा है कि ( यदि तुझे क़ुरआन के ईश्वाणी होने में संदेह है तो इसके समान एक सूरः «अध्याय» ही पेश कर दो, यदि तुम सच्चे हो) [सूरः अल-बक़रः23] परन्तु इतिहास साक्षी है कि वह अरब विद्वान जिनको अपने भाषा सौन्दर्य पर गर्व था, अपनी भाषा के सामने दूसरों का गुंगा समझते थे, उसके समान एक टुकड़ा भी पेश न कर सके। हालांकि उन्हीं के समाज में पलने बढ़ने वाला एक अपढ़ व्यक्ति ऐसी वाणी पेश कर रहा था। जिस से ज्ञात यह होता है कि क़ुरआन मुहम्मद साहिब की वाणी नहीं बल्कि ईश्वर की वाणी है। औऱ आज तक क़ुरआन सारे संसार वालों के लिए चैलेंज बना हुआ है। जी हाँ! क़ुरआन की शैली ही ऐसी है कि उसके समान न कोई बना सका है न बना सकता है।
प्रिय भाई ! इन स्पष्ट चमत्कारियों के होते हुए क्या मुहम्मद सल्ल0 का हक़ नहीं था कि उनकी पूजा की जाए ? या वह अपने पूज्य होने का दावा करें ? यदि वह ऐसा दावा करते तो वह संसार जिस ने राम को ईश्वर बना डाला, जिसने कृष्ण जी को गभवान कहने से संकोच न किया, जिसने ईसा अलै0 (जिसस) को ईश्वर का बटा मान लिया। वह ऐसे महान व्यक्ति को ईश्वर मानने से कभी संकोच न करता। लेकिन वह ऐसा कैसे कह सकते थे जबकि वह सत्य संदेश ले कर आए थे। वह तो स्वंय को केवल एक मानव के रूप में प्रकट करते हैं और कहते हैं «मैं एक मानव-मात्र हूं तुम्ही जैसा» आज यदि कोई मुस्लिम मुहम्मद साहिब की पूजा करने लगे तो वह इस्लाम की सीमा से निकल जाएगा।
Saturday, October 24, 2009
चाँद तारा का निशान हिन्दुस्तान में कैसे आया?

3000 ईसा पूर्व के समय में सुमेरी सभ्यता में तारे का निशान देवी इनन्ना का माना जाता था और बेबीलोनी सभ्यता में इसका नाम देवी इस्टर मिलता है । शुक्र यानि वीनस ग्रह प्राचीन सितारों की पूजा करने वाले लोगों की पहली पसंद रहा है। और इसका आसमान में निकलना और छिपना और इसका हर रोज नए नए रूप में आना इनके लिए भविष्य जानने के संकेतों का काम करता था और ये भाग्य बताने वाले लोगों का मुख्य देवी या देवता रहा है।
प्राचीन काल में तुर्की लोग प्रकृतिक शाक्तियों की पूजा करते थे और ये मध्य एशिया से साइबेरिया तक फैले थे । ये लोग खुदा के लिए ‘तेंगरी’ शब्द का इस्तेमाल करते थे और इनके बहुत सारे खुदा थे जैसे ये लोग सूरज को ‘कुन तेंगरी’ चाँद को ‘ऐ तेंगरी’ और आसमान के मालिक को ‘कोक तेंगरी’ कहते थे। ये लोग राजा को कोक तेंगरी का प्रतिनिधि मानते थे और पृथ्वी पर राजा खुदा की तरफ से मुर्करर एक नुमाइनन्दा होता था और एक तरह से धरती का खुदा होता था और राजा अपने नाम भी आसमानी खुदाओं के नाम पर रखते थे जैसे तुमेन तान्गरीकत-240 -210 ईसा पूर्व, बातुर तान्गरीकत(210-174 ईसा पूर्व= कोक खान)174-161 ईसा पूर्व= कुन खान)161-126 ईसा पूर्व=
मध्य एशिया में चाँद और तारे के निशान को विभिन्न रंगों के परचमों पर दशार्या जाता था और चाँद के साथ तारे के कोण भी अलग अलग होते थे जिसके पीछे इन लोगों एक बडा खुबसूरत तर्क था।
ये लोग दिशाओं के बारे में एकमत नही थे कुछ कबीले 4 दिशा मानते थे तो कुछ 5, 8 या 10 मानते थे इसके साथ साथ इन लोगों ने अलग अलग दिशा के लिए एक खास रंग को अहमियत दे रखी थी जैसे पूर्व के लिए ये नीला रंग पश्चिम के लिए सफेद रंग)अक= दक्षिण के लिए लाल) कीजिल= और उत्तर के लिए ये काला रंग )कारा= को खास अहमियत देते थे और इसिलिए मध्य एशिआई इन कबीलें के झण्डों का रंग अलग अलग होता था और इन पर बने चाँद के साथ तारे के कोनों की संख्या अलग अलग होती थी ।
जिसका प्रभाव आज भी देखने को मिलता है।और इसी परम्परा को तब भी जारी रखा गया जब मध्य एशिया में तुर्की में संगठित साम्राज्यों का उदय हुआ।
ये लोग चाँद सितारों के पुजारी थे और इस निशान को ये लोग अपनी इबादतगाहों और कब्रों और विशेष धार्मिक स्थानों पर लगाते थे ।
तुर्की में हरन नामक प्राचीन चाँद तारे की इबादत करने वालों का आलमी केन्द्र रहा है यहां पर 3000 ईसा पूर्व में भी चाँद सितारों की पूजा के सबूत मिले हैं । हरन वासियों ने इस धर्म को और ज्योतिष को सुमेरीयों से अपनाया था । और इस्लाम के उदय के बाद ही इन्होनें इस धर्म को त्यागा था मगर इन्होने कभी भी अपने निशान चाँद तारे और लूटमार की प्रथा को नही छोडा । हालाकि ये लोग इस्लाम में दाखिल हो चुके थे ।
तुर्की साम्राज्य के झण्डें
यूं तो तुर्की के हर कबीले का अपना चाँद तारे वाला झण्डा रहा है मगर जब जिस कबीले ने संगठित राज्य किया तो उसने अपनी परम्परा के अनुसान राष्ट्रीय झण्डा आपनया जो निम्नलिखित है।
नेबोनिदस साम्राज्य 550 ईसा पूर्व=
मध्य एशिया में सम्राट नेबोनिदस ने भारी राज्य किया और इसने अपनी राजधानी तुर्की के हरन को बनाया । जो यहां पर चाँद तारे के मानने वालों का हजारों साल से काबा रहा था। इसका निशान पहले सप्ताह का चाँद था और इस निशान को इबादतगाहों, झण्डों आदि पर लगाया जाता था
हुन साम्राज्य 420-552 ईसवी
इनके झण्डें का रंग सफेद था और उस पर पांच कोनों वाला सुनहरा तारा बना होता था।
खाज़र साम्राज्य 602-1016 ईसवी
इनके झण्डें का रंग नीला था और उस पर पांच कोनों वाला सफेद तारा बना होता था।
गज़नी साम्राज्य 962- 1283 ईसवी
इनके झण्डें का रंग हरा था और उस पर चाँद और मोर का निशान बना होता था।
सेलजुक साम्राज्य 1040-1157 ईसवी
और रम के सेलजुकों 1077-1308 ईसवी इनके झण्डों पर चाँद के साथ तारा बना होता था ।इस काल के सिक्कों पर 5,6 और 8 कोनों वाला सितारा और चाँद बना होता था।
होर्ड साम्राज्य 1224-1502 ईसवी
इनके झण्डें का रंग सफेद था और उस पर लाल रंग का चाँद बना होता था उसके उपर एक काले रंग का गोल सूरज बना होता था।
उसमानी तुर्क साम्राज्य 1299-1922 ईसवी
इनके झण्डें का रंग लाल था और उस पर 8 कोनों वाला तारा बना होता था।
और आखिर में तुर्की के गणतंत्रात्रिक देश बन जाने के बाद इसके झण्डें पर बहस के बाद लाल रंग के कपडे पर सफेद रंग का चाँद तारे का निशान जिसमें पांच कोने बने हैं को अपना लिया गया । जो आज तक प्रचलन में है।
हिन्दुस्तान में चाँदतारा
हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने चाँद तारे की परम्परा को मक्का या मदीना से आए धर्म प्रचारकों से नही ली बल्कि इसका स्रोत तुर्की कबीले रहे हैं।
पूरी दुनिया में जब इस्लामी हुकुमतों का दौर चल रहा था, तो उस वक्त हुकुमत करने वाले और इस्लम का प्रचार के लिए जिहाद करने वाले लोगों में फर्क करना बडा ही मुश्किल काम है।
पूरी दुनिया में तुर्क अपने वहशीपन के लिए मशहूर रहे हैं । अगर गौर करें तो भारत में आने वाले तुर्क सरदारों का असल मकसद इस्लाम का प्रचार नही था बल्कि उनका असल मकसद हुकुमत हासिल करना था ।
इनकी फौज पूरी तरह इस्लामी नही थी बल्कि इन्होने अपने स्थानीय कबीलों के साथ समझौता करके या उनके सरदारों को हराकर उनकी फौजें हासिल की थी । और हिन्दुस्तान फतह करने के लिए चढायी करते रहते थे । ये आपस में भी लडते रहते थे जिसके सबूत इतिहास की किताबों में भरे पडे है।
तुर्को ने की दिल्ली सल्तनत की शुरूआत
998 ईसवी में महमूद गज़नी साम्राज्य का शाससक बना। इसने भारत के एक बडे हिस्से पर जीत हासिल की और भारत में तुर्की हुकुमत की नींव रखी ।
इसके बाद मौहम्मद गौरी ने हिन्दुस्तान में आकर जंग लडी और फतह हासिल की । सन 1206 में मुहम्मद गौरी के एक गुलाम कुतुबुददीन ऐबक उसका उत्तराधिकारी बना और उसने दिल्ली सल्तनत की बागडोर सम्भाली , ऐबक के बाद सन 1210-1236 ईसवी तक उसके खलीफा इल्तुतमिश ने हुकुमत की इसके बाद अन्य अनेक तुर्को ने राज किया। भारत में एक संगठित राज्य की स्थापना में तुर्को ने बडा योगदान दिया।
मै आपको ये बता रहा हूं कि तुर्क मुसलमान ही थे जिन्होनें सबसे पहले यहां पर हुकुमत की, तुर्को की सेना में सभी धर्मो के लोग काम करते थे । और वे लोग तुर्की संस्कृति को भारत में लाए थे ।
क्योंकि तुर्क भले ही मुसलमान बन गए हों उन्होने अपनी संस्कृति कभी नही छोडी और अपने खून और सभ्यता को दुनिया में सबसे बेहतर समझते थे ।
चांद तारे का ये निशान जिसके खिलाफ इब्राहीम अलै0 ने 4100 साल पहले जददोजहद की थी और अल्लाह के पैगम्बर हज़रत मुहम्मद स0 ने आज से 1400 साल पहले न जाने कितनी जंगें लडी थी और काबे को इन से पाक किया था। और उनके बाद न जाने कितने सहाबी जो तुर्की, सीरिया, रोम, फारस, ईराक, जोर्डन, सउदी अरब आदि में इस्लाम का पैगाम देने के लिए गए और उन्होनें वहां पर चाँद सूरज और सितारों के पूजने वालों के खिलाफ जंगे लडी और उन्हें एक अल्लाह की पूजा करना सिखाया , और न जाने चांद तारों के पुजारियों के खिलाफ छिडे इस अभियान में कितने सहाबियों और उनके ‘शैदाइयों ने अपनी जान कुर्बान की थी।
तुर्क सरदारों ने उसी निशान को बडी चतुराई से फिर से मुसलमानों की मस्जिदों और झण्डों पर पहूंचा दिया ।
इस पर ज्यादा शोध की जरूरत है और उलेमाओं को चाहिए की इस निशान को कतन हराम करार दें मस्जिदों और घरों से इसे बाहर निकालने का हुक्म जारी करें । और ऐसा नही किया जाता तो आने वाले दिनों में गैरूल्लाह के दूसरे निशानात भी धीरे धीरे हमारी इबादतगाहें कब्जा लेंगें। और हमारी कौम फिर से शिर्क में डूब जाऐगी।
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उलमाओं का फतवा चाँद तारा मुसलमानों का निशान नहीं है
thanks umar saif ''चाँद तारा का निशान हिन्दुस्तान में तुर्क हमलावर लाए थे'' बुलंद भारत,
Friday, October 23, 2009
अल्लाह आकाश से पानी बरसाता है तो धरती हरी भरी हो जाती है कुरान
Wednesday, October 21, 2009
अमन और सुकून का केन्द्र केवल इस्लाम

-मुहम्मद मार्माडियूक पिकथॉल,इंग्लैण्ड
Tuesday, October 20, 2009
चीन में मुसलमानों की अपनी एक अलग पहचान है

Sunday, October 18, 2009
दुनिया का हर चौथा इन्सान- मुसलमान Every Fourth Person of This World is following ISLAM !
मुसलमानों की आबादी 1.57 अरब, मगरिबी मुल्कों (पश्चिमी देशों) में मुसलमानों की तादाद में भारी इज़ाफा, जर्मनी में मुसलमानों की आबादी लेबनान से अधिक, चीन में मुसलमान शाम (Syria) से अधिक
दुनिया में मुसलमानों की आबादी बढकर 1 अरब 57 करोड हो गई इसका मतलब यह है के दुनिया का हर चौथा इन्सान मुसलमान है।
पूरी दुनिया में अमरिका, इसाईयों और यहूदियों ने इस्लाम को बदनाम करने की जो मुहिम आरम्भ की थी उसका उल्टा असर हुआ और पूरी दुनिया में सबसे अधिक वृद्धि हुई है। यह सर्वे रिपोर्ट किसी मुस्लिम संस्था की नहीं है बल्कि "प्यू फोरम ऑन रिलिजन एण्ड पब्लिक लाइफ" (PEW FORUM ON RELIGION AND PUBLIC LIFE) नामक संस्था की है. रिपोर्ट में कहा गया है के मुसलमानों की आबादी में उम्मीद से भी अधिक वृद्धि हुई है. यह तादाद एक अरब 80 करोड तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक़ हैरत की बात यह है के लेबनान से अधिक मुसलमानों की आबादी जर्मनी में हो गई है। शाम से अधिक मुसलमानों की आबादी चीन में हो गई है। अर्दुन और लिबिया में मोजूद मुसलमानों की आबादी से अधिक मुसलमान रूस में रहते हैं। ऐथोपिया में मुसलमानों की आबादी लगभग अफगानिस्तान के मुसलमानों की आबादी के बराबर हो गई है।
परिंस्टन युनिवर्सिटि के जमाल का कहना है के अब यह तथ्य गलत साबित हो रहा है के अरब का मतलब मुसलमान और मुसलमान का मतलब अरब है। परिंस्टन युनिवर्सिटि के अफसरान का कहना है के इसाईयत के बाद इस्लाम दुनिया का दूसरा सबसे बडा धर्म है। दुनिया में ईसाइयों की मजमूई तादाद 2 अरब 10 करोड से 2 अरब 20 करोड है। दुनिया के 232 मुल्कों में मुसलमान आबाद हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है के दुनिया में मुसलमानों की जो आबादी है उनमें से शिया मुसलमानों की आबादी 10 से 13 प्रतिशत है उनमें भी 80 प्रतिशत शीया दुनिया के केवल 4 मुल्कों इरान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान और इराक में रहते हैं।
मुसलमानों की आबादी के मामले में एशिया ने अरब दुनिया को पीछे छोड दिया है। सर्वे के मुताबिक दुनिया के 60 प्रतिशत मुसलमान एशिया में रहते हैं। जबके मशरीकी वस्ता और शिमाली अफरीका में केवल 20 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं। सहारत अफरीका में 15 फीसद, युरोप में 2.4 प्रतिशत, अमरिका में .3 प्रतिशत मुसलमान रहते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक़ मुसलमानों की बडी तादात अकल्लियत बनकर रहती है, 317 मिलियन मुसलमानों उन मुल्कों में रहते हैं जहां इस्लामी हकूमत नहीं है। ऐसे मुसलमानों की 3 चोथाई आबादी हिन्दुस्तान ; 16 करोड 10 लाख ऐथोपिया ; 2 करोड 80 लाख चीन, 2 करोड 20 लाख रूस ; एक करोड 60 लाख तन्जानिया आदि है। हिन्दुस्तान दुनिया में मुस्लमानों की आबादी के ऐतबार से तीसरा मुल्क है जहां सबसे अधिक मुस्लमान हैं, जबके हिन्दुस्तान में मुसलमानों की आबादी 13 प्रतिशत है।
रिपोर्ट पर एक नजरः